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वक़्फ़ संशोधन बिल के विरोध में मुसलमान सांसदों की क्या हैं दलीलें?
- Author, सैयद मोज़िज इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वक़्फ़ संशोधन बिल संसद से पारित हो चुका है, और इसके ख़िलाफ़ दो मुस्लिम सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया है.
कांग्रेस के किशनगंज से सांसद मोहम्मद जावेद और एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. इससे पहले बिल को लेकर संसद से सड़क तक विरोध देखा गया, ख़ासकर मुस्लिम संगठनों और नेताओं की ओर से.
बिल में वक़्फ़ बोर्ड की संरचना, संपत्ति के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े कई अहम बदलाव किए गए हैं.
सरकार का कहना है कि वक़्फ़ संपत्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए ये ज़रूरी कदम हैं. वहीं विपक्षी दलों का तर्क है कि यह बिल अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है.
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सांसद मोहम्मद जावेद की ओर से याचिका दाख़िल करने वाले एडवोकेट अनस तनवीर ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''वक़्फ़ संशोधन बिल का मूल स्वरूप मुस्लिमों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. यह संविधान के अनुच्छेद 14, 25(डी) और 26 के ख़िलाफ़ है, क्योंकि इसके अमल में आने से सरकार का हस्तक्षेप मुसलमानों के वक़्फ़ में बढ़ जाएगा.''
वक़्फ़ संशोधन बिल के कौन से प्रावधानों पर है विवाद?
इस बिल के कई प्रावधानों पर मुस्लिम संगठनों ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं.
सरकार ने वक़्फ़ बोर्डों और सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल की संरचना में बदलाव किया है. इसमें अब ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों को भी शामिल किया गया है.
वक़्फ़ संपत्तियों के सर्वे का अधिकार वक़्फ़ आयुक्त से हटाकर ज़िले के कलेक्टर को दे दिया गया है.
सरकार के कब्ज़े वाली ज़मीनों पर विवाद की स्थिति में कलेक्टर के आदेश को अंतिम माना गया है.
वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के निर्णय को अब अंतिम फ़ैसला नहीं माना जाएगा. इसके फ़ैसलों को अब हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.
जो संपत्ति धार्मिक कार्यों के लिए इस्तेमाल में थी (वक़्फ़ बाय यूज़र), उसे अब वक़्फ़ नहीं माना जाएगा. नए प्रावधान में इसे हटाया गया है.
'वक़्फ़ बाय यूजर' के सिद्धांत का मतलब है कि ऐसी संपत्ति जो मस्जिदों और कब्रिस्तानों जैसे धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्य के लिए निरंतर उपयोग के कारण वक़्फ़ बन जाती है. भले ही इसे औपचारिक रूप से वक़्फ़ घोषित न किया गया हो.
वक़्फ़ करने के लिए अब यह शर्त जोड़ी गई है कि व्यक्ति को, कम से कम पिछले पांच साल से इस्लाम धर्म का पालन करने वाला होना चाहिए.
केंद्रीय वक़्फ़ काउंसिल और वक़्फ़ बोर्ड में ग़ैर-मुस्लिम सदस्य
बिल के जिन प्रावधानों पर सबसे तीखी आपत्तियां उठी हैं, उनमें वक़्फ़ संस्थाओं की संरचना से जुड़ा बदलाव अहम है.
पहले वक़्फ़ अधिनियम, 1995 के तहत केंद्रीय वक़्फ़ काउंसिल और राज्य वक़्फ़ बोर्ड में केवल मुस्लिम सदस्य ही हो सकते थे, जिनमें निर्वाचित और नामांकित दोनों तरह के सदस्य शामिल थे.
अब वक़्फ़ संशोधन बिल के ज़रिए यह व्यवस्था बदली गई है. सभी सदस्यों की नियुक्ति अब सरकार करेगी और उसमें कम से कम दो ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना अनिवार्य कर दिया गया है.
इस बदलाव पर कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इक़रा हसन ने तंज़ करते हुए कहा, "ग़ैर-मुस्लिम वक़्फ़ के लिए दान नहीं कर सकता, लेकिन वक़्फ़ काउंसिल और बोर्ड का सदस्य बन सकता है."
सरकार की ओर से जवाब में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद में भरोसा दिलाया कि इस बदलाव से मुसलमानों के धार्मिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के वकील फ़ुज़ैल अहमद अय्यूबी का मानना है कि ''जब यह बिल क़ानून बन जाएगा तो वक़्फ़ काउंसिल और राज्य वक़्फ़ बोर्ड में ग़ैर-मुस्लिम सदस्य बहुमत में हो सकते हैं.''
पहले के क़ानून में मंत्री को छोड़कर सभी सदस्यों का मुसलमान होना ज़रूरी था, जबकि अब संशोधित व्यवस्था में केंद्रीय वक़्फ़ काउंसिल के 22 में से 12 और राज्य वक़्फ़ बोर्ड के 11 में से 7 सदस्य ग़ैर-मुस्लिम हो सकते हैं, इसी बात की चिंता कुछ मुस्लिम संगठनों ने जताई है.
वक़्फ़, दान और 'वक़्फ़ बाय यूज़र' पर सवाल
इस्लामी परंपरा में वक़्फ़ को धर्मार्थ उद्देश्य से किया गया दान माना जाता है. इसका इस्तेमाल मस्जिदों, कब्रिस्तानों, स्कूलों, अस्पतालों या ग़रीबों की मदद जैसे कार्यों में किया जाता है.
वक़्फ़ संपत्ति का इस्तेमाल उस व्यक्ति की इच्छा के मुताबिक़ होना चाहिए जिसने उसे दान दिया है.
उदाहरण के लिए, अगर किसी ने कोई ज़मीन मस्जिद के रखरखाव के लिए दान की है, तो उसे किसी और काम में नहीं लगाया जा सकता.
मगर अब वक़्फ़ संशोधन बिल में इसे लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है. गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि 'वक़्फ़ संपत्तियों में घोटाले हुए हैं, उन्हें बेचा गया है और बहुत कम क़ीमतों पर लीज़ पर दिया गया है.'
अब तक वक़्फ़ बाय यूज़र प्रावधान ये सुनिश्चित करता था कि जो संपत्ति धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल हो रही हो, उसे वक़्फ़ माना जाए.
लेकिन नए बिल में कहा गया है कि अगर ऐसी किसी संपत्ति को लेकर विवाद हो, तो जब तक मामला हल न हो, उसे वक़्फ़ नहीं माना जाएगा.
एडवोकेट अनस तनवीर कहते हैं, "वक़्फ़ बाय यूज़र का मामला सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में 'एम. सिद्दीक बनाम सुरेश दास' केस में पहले ही स्पष्ट कर दिया था. इसके बावजूद अब इस प्रावधान को हटाया गया है."
कलेक्टर को असीमित अधिकार देने का आरोप
वक़्फ़ संशोधन बिल में वक़्फ़ संपत्तियों के सर्वे का अधिकार अब ज़िले के कलेक्टर को दे दिया गया है. पहले यह अधिकार वक़्फ़ कमिश्नर के पास था.
सरकार के कब्ज़े वाली वक़्फ़ संपत्तियों को लेकर विवाद की स्थिति में अब कलेक्टर का फ़ैसला प्रभावी माना जाएगा.
बिल में यह प्रावधान किया गया है कि अगर कोई सरकारी ज़मीन वक़्फ़ के रूप में पहचानी गई है, तो उसे वक़्फ़ नहीं माना जाएगा.
अनिश्चितता की स्थिति में क्षेत्रीय कलेक्टर यह तय करेगा कि संपत्ति पर किसका स्वामित्व है, और वह अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगा.
सुप्रीम कोर्ट में वकील महमूद प्राचा ने इस प्रावधान पर सवाल उठाते हुए कहा कि "जब कलेक्टर राजस्व मामलों में ख़ुद एक पक्ष होता है, तो वह तटस्थ कैसे रह सकता है?"
उन्होंने बताया कि किसी भी ज़मीन को वक़्फ़ घोषित करने से पहले सर्वेयर, जो एक सरकारी कर्मचारी होता है, सभी संबंधित विभागों को नोटिस भेजता है, ताकि अगर कोई आपत्ति हो तो उसका समाधान किया जा सके.
वक़्फ़ संशोधन बिल के मुताबिक़, अब वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के फैसले को अंतिम नहीं माना जाएगा. इन फ़ैसलों को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी. इससे मामलों के निपटारे में ज़्यादा समय लग सकता है.
हालांकि, मुस्लिम संगठनों का कहना है कि पहले भी हाईकोर्ट में अपील संभव थी और आज भी सैकड़ों मुक़दमे वहाँ लंबित हैं.
लिमिटेशन एक्ट के दायरे में वक़्फ़
वक़्फ़ संशोधन बिल में एक बड़ा बदलाव यह किया गया है कि अब अगर कोई व्यक्ति किसी वक़्फ़ संपत्ति पर 12 साल से ज़्यादा समय से कब्ज़ा किए हुए है, तो उसे ज़मीन का मालिकाना हक़ मिल सकता है.
इस प्रावधान को लेकर मुस्लिम समुदाय में गहरा आक्रोश है.
सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "वक़्फ़ एक समुदाय की सार्वजनिक ज़मीन होती है. जैसे सरकारी ज़मीन पर एडवर्स पज़ेशन (कब्ज़ेदार के कब्ज़ा) का नियम लागू नहीं होता, वैसे ही वक़्फ़ संपत्तियों पर भी यह नियम लागू नहीं किया जा सकता."
अब तक वक़्फ़ संपत्तियां लिमिटेशन एक्ट के दायरे से बाहर मानी जाती थीं. इसका मतलब था कि वक़्फ़ बोर्ड को जब भी पता चलता था कि कोई संपत्ति उसकी है, वह कभी भी बेदख़ली का मुक़दमा दर्ज कर सकता था.
लेकिन नए प्रावधान के तहत, अगर कोई व्यक्ति लगातार 12 साल से वक़्फ़ संपत्ति पर कब्ज़ा किए हुए है, तो उसे एडवर्स पज़ेशन के आधार पर मालिकाना हक़ मिल सकता है.
सरकार की तरफ़ से क्या कहा गया?
इन तमाम आपत्तियों और आलोचनाओं के बीच सरकार का कहना है कि वक़्फ़ संशोधन बिल वक़्फ़ प्रशासन का आधुनिकीकरण करने, मुक़दमेबाज़ी को कम करने और वक़्फ़ संपत्तियों के कुशल प्रबंधन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बिल के दोनों सदनों से पारित होने को एक "महत्वपूर्ण पल" बताते हुए कहा कि यह सामाजिक-आर्थिक न्याय, पारदर्शिता और समावेशी विकास की दिशा में एक बड़ा क़दम है.
एक्स पर किए गए पोस्ट में प्रधानमंत्री ने लिखा, "दशकों तक वक़्फ़ व्यवस्था को पारदर्शिता और ज़िम्मेदारी की कमी से जोड़ा जाता रहा. इससे ख़ास तौर पर मुस्लिम महिलाओं, ग़रीब मुसलमानों और पसमांदा मुसलमानों के हक़ प्रभावित हुए. संसद से पारित नए कानून पारदर्शिता बढ़ाएंगे और लोगों के अधिकारों की रक्षा करेंगे.''
फिलहाल, यह बिल क़ानून बनने की दिशा में आगे बढ़ चुका है और राष्ट्रपति की मंजूरी के इंतज़ार में है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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