You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
दुनिया भर में आर्थिक मदद पहुँचाने वाली अमेरिकी एजेंसी यूएसएड को बंद करेंगे ट्रंप, भारत पर क्या होगा असर?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सरकार की प्रमुख विदेशी सहायता एजेंसी यूएसएड को बंद करके उसे विदेश मंत्रालय में शामिल करने एलान किया है.
सोमवार को इस सहायता एजेंसी के कर्मचारियों को वॉशिंगटन हेडक्वार्टर से दूर रहने और घर पर ही रहने को कहा गया था.
विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने पत्रकारों से कहा कि अब से वह, यूनाइटेड स्टेट एजेंसी फ़ॉर इंटरनेशनल डिवेलपमेंट (यूएसएड) के कार्यकारी प्रमुख हैं.
यह एजेंसी दुनिया भर में अरबों डॉलर की मदद बांटती है, जिनमें भारत समेत दुनिया के कई देश हैं. ऐसे में इस फ़ैसले से ज़ाहिर तौर पर इसके मार्फ़त चलने वाले स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कई कार्यक्रमों पर भी असर पड़ेगा.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर 90 दिनों के लिए विदेश में दी जाने वाली सभी प्रकार की सहायता पर रोक लगा दी थी. ये रोक विदेश नीति की समीक्षा होने तक लागू रहेगी.
यूएसएड पूरी दुनिया में गैर सरकारी संगठनों, सहायता ग्रुपों और ग़ैर लाभकारी संस्थाओं को अरबों डॉलर की मदद देती है.
यूएसएड की स्थापना 1961 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी ने की थी. दुनिया भर में इसके क़रीब 10,000 कर्मचारी हैं और इसका सालाना बजट क़रीब 40 अरब डॉलर है, जबकि अमेरिकी सरकार की विदेशों में सहायता पर कुल बजट 68 अरब डॉलर का है.
यूएसएड यूक्रेन, इथियोपिया, जॉर्डन, कांगो, सोमालिया, यमन, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, नाइजीरिया, दक्षिण सूडान और सीरिया को महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है.
आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहे भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में यूएसएड ने अपने सभी कामों पर तुरंत रोक लगाने की बात कही है.
भारत को कितनी मदद मिलती है?
यूएसएड के ज़रिए भारत के स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, स्वच्छ ऊर्जा, पानी और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों की मदद की जाती है.
खुद यूएसएड की वेबसाइट पर भारत को दी गई मदद के बारे में जो जानकारी दी गई है उसके अनुसार, इसने पोषण, टीकाकरण, स्वच्छता, पर्यावरण, क्लीन एनर्जी, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में अहम भूमिका निभाई.
यूएसएड की मदद से भारत में 8 कृषि विश्वविद्यालय, 14 इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित किए गए हैं. इसके अलावा, देश का पहला भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी खड़गपुर भी यूएसएड की मदद से स्थापित किया गया था.
लेकिन साल 2004 में सूनामी के दौरान भारत की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने सशर्त विदेशी मदद लेने की नीति में बदलाव किया, जिसके बाद यूएसएड से भारत को मिलने वाली मदद में अपेक्षाकृत कमी आई.
हालांकि कोविड महामारी के बाद से भारत को मिलने वाली यूएसएड मदद में बढ़ोतरी देखी गई.
अमेरिकी सरकार के फॉरेन असिस्टेंस पोर्टल के मुताबिक़, पिछले चार सालों में भारत को 65 करोड़ डॉलर की मदद मिली. जबकि 2001 से लेकर अबतक भारत को 2.86 अरब डॉलर की मदद मिल चुकी है.
पोर्टल के अनुसार, यूएसएड की ओर से भारत को 2022 में सबसे अधिक 22.82 करोड़ डॉलर की मदद मिली, 2023 में 17.57 करोड़ डॉलर और 2024 में 15.19 करोड़ डॉलर की मदद मिली.
यूएसएड से मदद पाने के मामले में भारत तीसरे स्थान पर रहा है.
यूएसएड ने 2023 में कहा था कि उसने कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए भारत को 20 करोड़ डॉलर आवंटित किए थे.
ढाई दशक से सामाजिक सुरक्षा और साफ़-सफ़ाई को लेकर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था जन पहल के राष्ट्रीय सचिव धर्मेंद्र कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हाल के समय में भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी बढ़ने के बाद यूएसएड के ज़रिए मदद भी बढ़ी है."
इसके अलावा यूएसएड ने भारत में क्लीन एनर्जी, स्वच्छ जल और स्वच्छता और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार के साथ मिलकर कई कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया है.
जून 2023 में भारत सरकार और यूएसएड के बीच भारतीय रेलवे को 2030 तक नेट ज़ीरो कॉर्बन लक्ष्य हासिल करने के लिए एक मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर किए गए थे.
भारत के लिए कितनी महत्वपूर्ण है मानवीय सहायता?
भारत में शिशु मृत्युदर को कम करना अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है. अभी भी शिशु मृत्युदर 20 (प्रति 1000 जन्म में) से नीचे लाने के लिए भारत संघर्ष कर रहा है.
यूएसएड एड जच्चा बच्चा पोषण के कार्यक्रमों में सरकार के साथ मिलकर काम करता है.
धर्मेंद्र कुमार कहते हैं, "शिशु मृत्युदर धीरे-धीरे कम हुई है, लेकिन यह अभी भी 20 से ऊपर ही बनी हुई है. शिशु और मातृ मृत्युदर में कमी लाने में यूएसएड ने अहम भूमिका निभाई है."
यह समस्या पोषण से जुड़ी हुई है. कुपोषण के अलग-अलग पैमानों, जैसे शरीर का विकास नहीं हुआ, लंबाई, वज़न, प्रतिरोधक क्षमता आदि के आधार पर अभी भी बड़ी संख्या में बच्चों में कुपोषण की स्थिति है.
धर्मेंद्र कुमार के अनुसार, "भारत में पूरी दुनिया के मुकाबले सबसे अधिक कुपोषण दर है. पांच साल से कम उम्र के हमारे 35 फ़ीसदी बच्चों का विकास कम (स्टंटेड) है. इसी तरह 48 प्रतिशत बच्चों की प्रतिरोधी क्षमता कमज़ोर है."
वह कहते हैं, "भारत के सामने ये सबसे बड़ी चुनौती रही है और इसमें सुधार लाने में यूएसएड की ख़ासी भूमिका रही है."
इसी तरह टीबी, पोलियो, एड्स जैसे रोगों के उन्मूलन कार्यक्रम को भी यूएसएड की सहायता से चलाया जाता रहा है.
यूएसएड का दावा है कि उसकी मदद से चलाए गए टीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के माध्यम से पिछले दो दशक में भारत में 70 लाख लोगों की जान बचाई गई.
धर्मेंद्र कुमार कहते हैं, "टीबी अभी भी भारत में ख़त्म नहीं हुआ है. बीच में टीबी के मामले घटे थे, लेकिन अगर कहें कि इसमें फिर से उभार आ रहा है तो ग़लत नहीं होगा. अगर भारत को टीबी मुक्त नहीं किया गया तो दुनिया को टीबी मुक्त नहीं किया जा सकता."
उन्होंने कहा कि एड्स रोकथाम में भी 'यूएसएड ने अग्रणी भूमिका' निभाई है.
सभी विदेशी मदद को कम करने के साथ अमेरिका विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से भी अलग हटने की घोषणा कर चुका है, जबकि वह इस वैश्विक संस्था का सबसे बड़ा डोनर है. दूसरे नंबर पर जर्मनी और तीसरे नंबर पर बिल एंड मिलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन आता है.
इसने वैश्विक मानवीय सहायता कार्यक्रमों को और जटिल बना दिया है. उदाहरण के लिए खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य.
धर्मेंद्र कुमार कहते हैं, "भारत यूएसएड के साथ मिलकर घरेलू स्तर पर और सहारा अफ़्रीका के ग़रीब मुल्कों में खाद्य सुरक्षा का कार्यक्रम चलाता है. यह एक इमर्जेंसी मदद है. यूएसएड बंद होने की स्थिति में भारत सरकार को इमर्जेंसी फ़ंड की योजना बनानी चाहिए."
यूएसएड पर ट्रंप प्रशासन की तल्खी क्यों बढ़ी?
राष्ट्रपति ट्रंप और उनके सबसे शीर्ष के सलाहकार, अरबपति एलन मस्क यूएसएड के कड़े आलोचक रहे हैं.
बीते सोमवार को व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने आरोप लगाया कि इस एजेंसी को 'कट्टर वामपंथी सनकी' चला रहे हैं. वे "बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार कर रहे हैं और नाम और अन्य जानकारियां साझा नहीं कर रहे हैं."
ट्रंप प्रशासन में सरकारी खर्च कटौती के लिए बने विभाग के अनौपचारिक प्रमुख एलन मस्क ने भी यूएसएड को बंद करने की बात कही थी. बीते एक सप्ताह में यूएसएड के दो शीर्ष अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया गया और एजेंसी की वेबसाइट डाउन हो गई.
यूएसएड पर भ्रष्टाचार और आर्थिक अनियमितता के आरोपों के अलावा मस्क ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं.
अपने मालिकाना हक वाले सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर मस्क ने यूएसएड को 'बुराई', 'एक आपराधिक संगठन' और 'कट्टर वामपंथी राजनीतिक मनोवैज्ञानिक अभियान' (आम तौर पर षड्यंत्रकारी या बुरे कारनामों को ढंकने के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द) कहा.
सोमवार को एक्स पर एक लाइव स्ट्रीम के दौरान उन्होंने कहा, "इस पूरे मामले से निजात पाने की ज़रूरत है. यह लाइलाज है... हम इसे बंद करने जा रहे हैं."
सोमवार अमेरिकी मीडिया में व्हाइट हाउस के अनाम सूत्रों के हवाले से ख़बर छपी की मस्क को बिना वेतन पार्ट टाइम विशेष सरकारी कर्मचारी नियुक्त किया गया है, जिससे वित्तीय जानकारियों को लेकर उनके साथ हितों का टकराव हो सकता है.
हालांकि ट्रंप ने मस्क का बचाव किया है और कहा है कि बिना उनकी अनुमति के कोई भी फैसला नहीं होगा. उन्होंने कहा, "एलन कोई भी काम बिना हमारी मंज़ूरी के न तो कर सकते हैं और न ही करेंगे."
मस्क को सरकार में खर्च कटौती की निगरानी करने वाली एक पहलकदमी- डिपार्टमेंट ऑफ़ गवर्नमेंट एफ़िशिएंसी (डीओजीई) का इंचार्ज बनाया गया है. हालांकि यह कोई सरकारी विभाग नहीं है.
सरकारी कार्यक्रमों को बंद करने की इसके क़ानूनी अधिकारों के बारे में भी स्पष्टता नहीं है. इसीलिए इसके ख़िलाफ़ कोर्ट में चुनौती दी गई है.
मस्क के बयान के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा है कि यूएसएड की कई सारी गतिविधियां जारी रहेंगी. उन्होंने कहा, "अब ये गतिविधियां अमेरिकी विदेश मंत्रालय का हिस्सा होंगी और इन्हें अमेरिकी विदेश मंत्रालय की नीतियों के हिसाब से चलना होगा."
हालांकि ये साफ़ नहीं है कि बदलाव के लिए ट्रंप प्रशासन के पास क्या योजना है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)