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बांग्लादेश में अमेरिका की मदद रोक दिए जाने का मामला क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका का राष्ट्रपति पद संभालते ही कई अहम फ़ैसले लिए हैं, जिनमें से एक फ़ैसला दुनिया में दी जाने वाली अमेरिका की मदद को लेकर भी है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर 90 दिनों के लिए विदेश में दी जाने वाली सभी प्रकार की सहायता पर रोक लगा दी थी. ये रोक विदेश नीति की समीक्षा होने तक लागू रहेगी.
डोनाल्ड ट्रंप के इस फ़ैसले से कई देशों पर असर पड़ा है, जिनमें से भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश भी है. बांग्लादेश को अमेरिका की यूनाइटेड स्टेट एजेंसी फ़ॉर इंटरनेशनल डिवेलपमेंट (यूएसएड) मदद देती है.
यूएसएड ने बांग्लादेश में हर तरीक़े की मदद पर तुरंत रोक लगा दी है. इस अमेरिकी एजेंसी ने अपनी परियोजनाओं में शामिल हर पार्टनर को अपना काम रोकने को कहा है. यूएसएड ने अपने पत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकारी आदेश का हवाला दिया है.
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ट्रंप के फ़ैसले का बांग्लादेश पर असर
बांग्लादेश को स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण, गुड गवर्नेंस, लोकतंत्र को बढ़ावा देने समेत दूसरे क्षेत्रों के लिए यूएसएड फंड करता है.
इसकी कुल रक़म तक़रीबन 20 करोड़ डॉलर है. इसके अलावा साल 2023 में अमेरिका ने विभिन्न एजेंसियों के ज़रिए बांग्लादेश की एक बार 49 करोड़ डॉलर और दूसरी बार 55 करोड़ डॉलर की मदद की थी.
बीते साल सितंबर में यूएसएड ने वादा किया था कि वो डिवेलपमेंट ऑब्जेक्टिव ग्रांट एग्रीमेंट (डीओएजी) के तहत बांग्लादेश की 20 करोड़ डॉलर की सहायता करेगा.
हालांकि, अमेरिका की बांग्लादेश में सबसे बड़ी आर्थिक मदद म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए दी जाती है.
साल 2017 में रोहिंग्या संकट शुरू होने के बाद लाखों शरणार्थियों ने बांग्लादेश में शरण ली थी. यूएसएड की वेबसाइट के मुताबिक़ इस संकट के बाद से अमेरिका ने बांग्लादेश की तक़रीबन ढाई अरब डॉलर की आर्थिक मदद की है.
इस रक़म का इस्तेमाल रोहिंग्या शरणार्थियों और दूसरे समुदायों की मदद करने के लिए किया गया है.
रोहिंग्या शरणार्थियों पर क्या असर
अमेरिका दुनिया भर में विकास कार्यों से लेकर सैन्य क्षेत्र तक अपनी आर्थिक मदद देता है.
अमेरिकी राष्ट्रपति के रोक लगाने के फ़ैसले से कुछ क्षेत्रों को ज़रूर बाहर रखा गया है. इनमें आपातकाल खाद्य सहायता, इसराइल और मिस्र को दी जाने वाली सैन्य सहायता को बाहर रखा गया है.
बांग्लादेश की कार्यकारी सरकार के प्रमुख सलाहकार प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस ने एक बयान जारी कर रोहिंग्या विस्थापितों के लिए जीवन रक्षक भोजन और पोषण समर्थन में छूट देने के लिए डोनाल्ड ट्रंप का शुक्रिया कहा है.
प्रमुख सलाहकार के प्रेस विंग ने बयान जारी कर बताया है कि ढाका में अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों ने उच्च प्रतिनिधि डॉक्टर ख़लील उर रहमान से मुलाक़ात की है, उन्होंने इस छूट के बारे में बताया है.
रविवार को ढाका की फॉरेन सर्विस अकेडमी में प्रमुख सलाहकार के प्रेस सेक्रेटरी शफ़ीक़ुल आलम और डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी अपूर्ब जहांगीर ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी की.
इस दौरान शफ़ीक़ुल आलम से सवाल किया गया कि इसका असर बांग्लादेश पर क्या होगा? इस पर उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में अमेरिका की मदद ख़ासतौर पर रोहिंग्या समुदाय के लिए ही आती है.
उन्होंने कहा कि इन निर्देशों से बांग्लादेश पर उतना असर नहीं पड़ेगा. हालांकि, बांग्लादेश की सरकार उम्मीद जता रही है कि आने वाले दिनों में ये मदद जारी रहेगी.
बांग्लादेश की आर्थिक हैसियत
साल 1971 में बांग्लादेश का गठन हुआ, इसके बाद से इस देश पर अधिकतर समय अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनल पार्टी का शासन रहा.
बीते साल विरोध प्रदर्शनों के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को देश छोड़कर भारत आना पड़ा था.
साल 2009 में शेख़ हसीना ने जब देश की सत्ता संभाली थी तब देश की विकास दर 5 फ़ीसदी थी जो 2017-18 में तक़रीबन 8 फ़ीसदी हो गई.
साल 2023 में वर्ल्ड बैंक ने बांग्लादेश को दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था बताया था.
वर्ल्ड बैंक ने कहा था, "1971 में स्वतंत्रता के बाद से बांग्लादेश ने ख़ुद को एक ग़रीब मुल्क की श्रेणी से निकालकर 2015 में निम्न मध्यम आय वर्ग की श्रेणी में ला खड़ा किया."
हालांकि, बीते गुरुवार को दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम से इतर मोहम्मद यूनुस ने देश के विकास के आंकड़ों को पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के 'फ़र्ज़ी आंकड़े' क़रार दिया.
समाचार एजेंसी रॉटर्स के साथ इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा, "वो दावोस में आती थीं और हर किसी को बताती थीं कि देश कैसे चलाते हैं. किसी ने इस पर सवाल नहीं खड़ा किया."
"ये सब होने के लिए पूरी दुनिया ज़िम्मेदार है. ये दुनिया के लिए बहुत अच्छा पाठ है. वो कहती थीं कि हमारी विकास दर हर किसी से आगे पहुंच गई है. पूरी तरह फ़र्ज़ी विकास दर."
कोरोना महामारी के बाद से बांग्लादेश की विकास दर में गिरावट देखी गई थी. शेख़ हसीना के कार्यकाल 2009 से जुलाई 2024 के बीच बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था 6.3 प्रतिशत की दर से बढ़ी. जीडीपी का आकार 123 अरब डॉलर से बढ़कर 455 अरब डॉलर हो गया.
2009 में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी भी 841 डॉलर से बढ़कर 2024 में 2,650 डॉलर हो गई.
अमेरिका की मदद न देने का भारत पर क्या होगा असर
बीते दो दशकों में भारत की नीति किसी से आर्थिक सहायता लेने की नहीं बल्कि देने की रही है और इसकी शुरुआत साल 2004 की सुनामी के दौरान हुई थी.
सुनामी के बाद दुनियाभर से भारत को मदद की पेशकश की गई थी लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे ख़ारिज कर दिया था. इस फ़ैसले को देश की आपदा के समय मदद लेने की नीति में एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा गया था.
दिसंबर 2004 में मनमोहन सिंह ने कहा था, "हम मानते हैं कि हम हालात से ख़ुद निपट सकते हैं और अगर ज़रूरत पड़ी तो हम उनकी मदद लेंगे."
ये उस समय प्राकृतिक आपदा के समय मदद न लेने का फ़ैसला था. हालांकि भारत ने इसे दूसरे क्षेत्रों में भी लागू करना शुरू किया. हालांकि यूएसएड के ज़रिए भारत के स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, स्वच्छ ऊर्जा, पानी और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों की मदद की जाती है.
हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़, यूएसएड और दूसरे संगठनों के ज़रिए भारत में अमेरिकी मदद आती है जो कि बीते दशकों में घटकर कुछ करोड़ डॉलर ही रह गई है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, अमेरिकी प्रशासन के हालिया फ़ैसले के भारत पर असर को मांपना जल्दबाज़ी होगी. अमेरिकी दूतावास भी अपना आंकलन कर रहा है.
दूतावास के प्रवक्ता का कहना है, "यह सुनिश्चित करने के लिए कि कार्यकारी आदेश के तहत हम अनुदान दे पा रहे हैं या नहीं, इसकी समीक्षा की जा रही है."
अमेरिकी सरकार के फॉरेन असिस्टेंस पोर्टल के मुताबिक़, अमेरिकी सरकार के विभिन्न विभागों और एजेंसियों ने साल 2023 में 20 करोड़ डॉलर की मदद दी थी जो 2024 में घटकर 15 करोड़ रह गई.
विश्लेषकों का मानना है कि इस फ़ैसले से भारत पर बहुत ज़्यादा असर नहीं होगा बल्कि अफ़्रीका के कई देशों पर इसके बड़े प्रभाव पड़ सकते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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