मैरिटल रेप क्या है, भारत सरकार इसे अपराध क्यों नहीं बनाना चाहती

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- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट में मैरिटल रेप को अपवाद मानने से जुड़े मुद्दे पर आठ याचिकाएं लंबित हैं. तीन अक्तूबर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर हलफ़नामा दायर किया है.
आख़िर मैरिटल रेप क्या है? भारतीय न्याय संहिता के तहत अगर कोई पुरुष किसी महिला की सहमति के बग़ैर उसके साथ संबंध बनाता है तो ये बलात्कार है.
इसके लिए कम से कम दस साल की सज़ा का प्रावधान है और कुछ मामलों में ये सज़ा उम्रक़ैद भी हो सकती है.
हालांकि बिना सहमति के कोई व्यक्ति अगर अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाए और अगर पत्नी की उम्र 18 साल या उससे अधिक है तो ये क़ानूनन बलात्कार नहीं है. भारत के पिछले आपराधिक क़ानून यानी भारतीय दंड संहिता में भी इसी तरह का अपवाद था.

हालांकि ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेंस एसोसिएशन समेत कुछ संगठनों की दलील है कि ये अपवाद असंवैधानिक है.
लेकिन फ़ैमिली हार्मनी के हृदय नेस्ट जैसे कुछ पुरुष संगठनों ने इस अपवाद के समर्थन में अर्ज़ी दाख़िल की हैं.
तो पति को पत्नी के साथ ज़बरदस्ती करने पर कोई सज़ा नहीं होगी?

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कई महिला अधिकार समूह और महिला कार्यकर्ता लंबे समय से इस अपवाद को ख़त्म करने की मांग उठाते रहे हैं. यहां ये बताना ज़रूरी है कि मैरिटल रेप को 100 से अधिक देशों में अपराध माना जाता है.
भारत उन तीन दर्जन देशों में से एक है जहां शादी के बाद अपनी पत्नी से बिना मंज़ूरी के संबंध बनाने को बलात्कार नहीं माना जाता है.
साल 2022 के नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार औरतों पर यौन हिंसा ज़्यादातर उनके करीबी, जान पहचान वाले लोग करते हैं. कुल 6% महिलाओं ने कहा कि उनके साथ यौन हिंसा हुई है.
इस सर्वे के मुताबिक 18 से 49 साल की शादीशुदा महिलायों पर कभी भी यौन हिंसा हुई है, उसमे 82% का कहना था कि उनके पति ने ये किया और 14% ने कहा कि उनके पूर्व पति ने यौन हिंसा की.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर अभी बहस शुरू नहीं हुई है. दिल्ली हाई कोर्ट में इस मुद्दे पर जिरह हुई और जो तर्क दिए गए उनमें से कुछ ये हैं.
- याचिकाकर्ता ने ये दलील दी कि ये प्रावधान असंवैधानिक है क्योंकि ये उनके शरीर की स्वायत्तता और गरिमा के अधिकारों का हनन है.
- उनका कहना था कि एक शादीशुदा और अविवाहित महिला के बीच बलात्कार के मामले में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. याचिकाकर्ताओं ने दलील दी, "एक महिला को अपने पति के साथ संबंध बनाने से ना कहने का हक़ न देकर उनसे एक उत्पाद के जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता है."
- याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ये अपवाद औपनिवेशिक काल से चलते आ रहे हैं, जिस दौर में शादी के बाद महिलाओं के अधिकार उनके पति छीन लिया करते थे और वो अपने पति की मंज़ूरी के बग़ैर न तो कोई संपत्ति खरीद सकती थीं, न ही कोई सौदा कर पाती थीं.
- उनकी ये भी दलील थी कि बलात्कार 'गंभीर और जघन्य' अपराध है, जबकि इसके लिए मौजूदा सज़ा बहुत कम है.
- तर्क ये भी दिया गया कि एक बार अदालत मैरिटल रेप के अपवाद को खत्म कर देती है, तो ट्रायल कोर्ट व्यक्तिगत मामलों से निपट सकते हैं ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि क़ानून का दुरुपयोग न हो.
- मई 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों वाली एक बेंच ने मैरिटल रेप की संवैधानिकता से जुड़े मामले में बंटा हुआ फ़ैसला सुनाया था. इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट इस अपवाद की संवैधानिकता पर निर्णय करेगा.

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केंद्र सरकार ने क्या कहा?
तीन अक्तूबर को केंद्र सरकार ने एक हलफ़नामे में ये कहा कि शादीशुदा जोड़े के बीच असहमति से बना संबंध बलात्कार नहीं है. सरकार ने कहा कि ये 'अत्यधिक कड़ी व्यवस्था' होगी.
हलफ़नामे में कहा गया है कि शादियां रिश्तों की एक अलग श्रेणी हैं और उन्हें दूसरे मामलों की तरह नहीं लिया जा सकता.
इसमें कहा गया है कि किसी भी वैवाहिक संबंध में पति और पत्नी लगातार एक-दूसरे से उचित यौन संबंध की अपेक्षा रखते हैं.
हालांकि, इसका मतलब ये नहीं है कि पति अपनी पत्नी के शरीर की स्वायत्तता को भंग कर सकता है. इसलिए सरकार ने कहा है कि इसके लिए हमारे यहां घरेलू हिंसा और यौन हमले से जुड़े कानून के तहत सजा का प्रावधान है.
सरकार ने कहा है कि पति और पत्नी के बीच बगैर सहमति के यौन संबंध को रेप करार देने का शादी जैसी संस्था पर दूरगामी असर होगा.
ऐसा हुआ तो ये शादी जैसी संस्था में भारी उथल-पुथल पैदा करेगा.
इससे पहले केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में कहा था कि मैरिटल रेप को अपराध बना देने से गलत मकसद से दायर किए जाने वाले मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी.
राज्यों ने क्या कहा है?

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केंद्र ने अपने हलफ़नामे में इस मामले में अलग-अलग राज्य सरकारों के जवाब को भी शामिल किया है.
19 राज्यों ने अपने जवाब भेजे थे. दिल्ली, त्रिपुरा और कर्नाटक मैरिटल रेप के मामले भारतीय कानून में दिए गए अपवाद के ख़िलाफ़ थे.
छह राज्यों का कोई साफ नज़रिया नहीं था. जबकि 10 राज्य चाहते थे कि ये अपवाद जारी रखे जाएं.
हालांकि इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में जब ये मामला सुनवाई के लिए आया था तो दिल्ली सरकार ने कहा था कि वो भी मैरिटल रेप के अपवाद बने रहने के पक्ष में है.
राज्यों के अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला और बाल विकास मंत्रालय ने भी कहा है कि ये अपवाद बना रहना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित












