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गौतम गंभीर: टीम इंडिया को दो बार चैंपियन बनाने वाले क्रिकेटर विवादों में क्यों घिर जाते हैं?
- Author, विधांशु कुमार
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय क्रिकेट शैली में बल्लेबाज़ी को शुरुआत से ही तवज्जो दी जाती रही है. इसके नतीजे में यहां महान बल्लेबाज़ों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है.
लाला अमरनाथ से लेकर विजय मांजरेकर, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली तक भारत ने ऐसे बल्लेबाज़ दिए हैं जिनका डंका पूरी दुनिया में बजा है.
दो दशक पहले भारत का मिडिल ऑर्डर इतना मज़बूत था जिसका कोई सानी नहीं मिलता. नंबर 3 पर राहुल द्रविड़, 4 पर सचिन तेंदुलकर, 5 पर सौरव गांगुली और 6 पर वीवीएस लक्ष्मण.
ऐसा बल्लेबाज़ी क्रम किसी सुखद सपने से कम नहीं था. यही नहीं तब पारी को मजबूत शुरुआत देती थी वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीर की आक्रामक ओपनिंग जोड़ी.
नंबर एक से छह तक टीम में ऐसे बल्लेबाज़ थे, जो दुनिया की किसी भी टीम में आसानी से जगह बना सकते थे. क्रिकेट की पिच पर इन सब के महान कारनामों के गीत सभी ने गाए और सुने. इन पर मोटी-मोटी किताबें भी लिखी गई हैं.
लेकिन कई जानकारों की राय है कि इन सबके बीच जिस खिलाड़ी को उनका सही क्रेडिट नहीं मिलता है, वो हैं गौतम गंभीर. चाहे वो 2011 की विश्व कप जीत में उनकी अहम भूमिका हो या किसी वक़्त टेस्ट क्रिकेट रैंकिग में नंबर 1 बल्लेबाज़ होने का गौरव हासिल करना- गंभीर की कामयाबियों को अक्सर भुला दिया जाता है.
गौतम गंभीर के शुरुआती दिन
नवंबर 2004 में गंभीर ने अपने दूसरे टेस्ट में ही दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ 91 रनों की शानदार पारी खेलकर बता दिया था कि वो लंबी रेस के लिए बने हुए हैं.
अगले ही महीने बांग्लादेश में उन्होंने एक पारी में 139 रन बनाए. यह टेस्ट क्रिकेट में उनका पहला शतक था. उस मैच के बाद मुझे भी गंभीर का इंटरव्यू करने का मौक़ा मिला. तब मैंने उनसे क्रिकेट, टीम और देश के प्रति उनकी भानवाओं को क़रीब से सुना. हालांकि गंभीर तब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में नए थे लेकिन उनमें गज़ब का आत्मविश्वास था. वो कभी भी टीम को दूसरे नंबर पर नहीं देखना चाहते थे.
पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अगली सिरीज़ में उन्होंने 3 अर्धशतक बनाए और भारतीय पारी को मज़बूत शुरुआत दी. गंभीर अपनी पहचान मुश्किल हालात में कड़ी चुनौती पेश करने वाले बल्लेबाज़ के रूप में बनाने लगे थे.
जब टेस्ट क्रिकेट में शीर्ष पर थे गौतम
साल 2008 तक आते आते गंभीर के करियर ने सही रफ़्तार पकड़ ली थी. श्रीलंका के ख़िलाफ़ तीन टेस्ट मैचों की सिरीज़ में उन्होंने 51 की औसत से 310 रन बनाए. उन्होंने अपनी कंसिस्टेंसी का अच्छा उदाहरण पेश किया.
इसके बाद की पांच सिरीज़ में गंभीर का टेस्ट में औसत 77, 90, 89, 94 और 69 का था. तब 12 मैचों में उन्होंने आठ शतक और पांच अर्धशतकों की मदद से 1750 से अधिक रन बनाए.
आईसीसी की रैंकिंग में सचिन तेंदुलकर, रिकी पोंटिंग, जैक कैलिस, राहुल द्रविड़, वीरेंद्र सहवाग, कुमार संगाकारा जैसे बल्लेबाज़ों को पीछे छोड़ते हुए गंभीर नंबर- 1 पर आ गए. आ गए नहीं बल्कि छा गए कहना ठीक रहेगा क्योंकि इसी दौरान उन्होंने लगातार पांच मैचों में शतक ठोके.
जनवरी 2010 के मीरपुर टेस्ट में पूरी दुनिया का निगाहें गौतम गंभीर पर टिकी हुई थीं, क्योंकि एक शतक और लगाकर वो लगभग 75 साल पुराने सर डोनाल्ड ब्रैडमैन के रिकॉर्ड को तोड़ने वाले थे.
टेस्ट में लगातार 6 शतकों का रिकॉर्ड ब्रैडमैन के नाम था और गंभीर उससे बस एक शतक दूर थे. गंभीर ने उस मैच में अच्छी शुरुआत की और जल्दी ही अपनी फ़िफ्टी भी पूरी कर ली थी लेकिन 68 के निजी स्कोर पर वो तेज़ गेंदबाज़ शफ़ीउल इस्लाम की एक बाउंसर पर कीपर को कैच थमा बैठे.
मैच की दूसरी पारी में भारत को जीत लिए सिर्फ़ दो रन चाहिए थे इसलिए यहां शतक होने का सवाल ही नहीं था. इस तरह ब्रैडमैन का वो ऐतिहासिक रिकॉर्ड टूटने से बच गया.
भारत की नंबर वन सलामी जोड़ी
गंभीर ने वीरेंद्र सहवाग के साथ मिलकर टेस्ट में भारत की नंबर एक सलामी जोड़ी बनाई. दोनों ने 87 पारियों में 52.52 के औसत से 4412 रन बनाए.
इस दौरान सहवाग-गंभीर की जोड़ी ने 11 शतकीय साझेदारी भी निभाई और सुनील गावस्कर-चेतन चौहान के 10 शतकीय साझेदारी के रिकॉर्ड को तोड़ा. दोनों के नाम 25 अर्ध शतकीय साझेदारी भी हैं, जो उन्हें भारत की सबसे सफ़ल ओपनिंग जोड़ी बनाती है.
गंभीर ने अपने टेस्ट करियर में 58 मैचों में 41.95 की औसत से 4154 रन बनाए और नौ शतक लगाए. वहीं 147 वनडे में उन्होंने 39.68 की औसत से 5238 रन बनाए. टी20 में भी गंभीर एक सफल खिलाड़ी रहे. उन्होंने 251 टी20 मैचों में 6402 रन बनाए.
उन्होंने कोलकाता नाईट राइडर्स को दो बार आईपीएल की ट्रॉफ़ी भी दिलवाई. इस तरह गंभीर ने क्रिकेट के तीनों फॉरमैट में खुद को सफल खिलाड़ी साबित किया.
वर्ल्ड कप की जीत में भूमिका
साल 2007 के पहले टी20 वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में पाकिस्तान क खिलाफ़ 75 रन बनाकर गंभीर ने भारत को ट्रॉफ़ी जिताने में बड़ी मदद की थी.
वहीं उनके करियर का सर्वोच्च शिखर 2011 का वर्ल्ड कप रहा. अगर उस वर्ल्ड कप के बारे में किसी तस्वीर को याद करेंगे तो महेंद्र सिंह धोनी द्वारा छक्का लगाकर भारत को जीत दिलाना सबसे पहले आएगा.
वो छक्का भारत की करिश्माई जीत की कहानी ज़रूर बयान करता है लेकिन शायद उस छक्के से कहीं ज्यादा योगदान गंभीर की 97 रनों की पारी की थी. श्रीलंका के 275 रनों के जवाब में भारतीय टीम ने 31 रनों पर ही 2 विकेट खो दिए थे, लेकिन गंभीर ने फिर कोहली और बाद में धोनी के साथ मिलकर दो शानदार साझेदारी निभाई.
गंभीर ने 122 गेंदों पर नौ चौकों की मदद से 97 रनों की मैच जिताऊ पारी खेली और अपनी टीम के साथ वर्ल्ड चैंपियन होने का गौरव हासिल किया.
दमदार रिकॉर्ड की तारीफ़ करते वक्त एक और सवाल पूछा जाता है कि जुझारू गौतम गंभीर कहीं सीमाएं तो पार नहीं कर जाते?
विवादों के साए में गंभीर
क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद गौतम गंभीर कमेंट्री से जुड़े हैं और अपने कुछ बेबाक बयानों की वजह से विवादों में भी रहे हैं.
गंभीर ने कई इंटरव्यू में कहा कि 2007 में टी20 और 2011 में वनडे वर्ल्ड कप की जीत का श्रेय सिर्फ़ एक खिलाड़ी धोनी को देना ग़लत है क्योंकि इससे सिर्फ़ वो ही एक खिलाड़ी ब्रांड बन जाता है और बाकी खिलाड़ी पीछे छूट जाते हैं.
उन्होंने कहा कि दोनों ही वर्ल्ड कप के असल हीरो युवराज सिंह थे जिन्होंने शानदार ऑलराउंड प्रदर्शन किया था.
बाद के इंटरव्यू में उन्होंने तेज़ गेंदबाज़ ज़हीर ख़ान और स्पिनर हरभजन सिंह के योगदान को भी याद दिलाया. दरअसल गंभीर 'हीरो की पूजा' के ख़िलाफ़ लगातार बोलते आए हैं. वे कहते हैं कि ये भारतीय क्रिकेट के लिए सही नहीं है.
हाल ही में कमेंट्री के दौरान गंभीर मोहम्मद कैफ़ से भी उलझ गए.
वर्ल्ड कप के लिए भारतीय टीम की घोषणा से पहले एशिया कप की टीम में केएल राहुल को शामिल नहीं किया गया है.
इस पर जब कैफ़ कह रहे थे की टीम से राहुल चोट की वजह से बाहर हुए हैं न कि फ़ॉर्म की वजह से, इसलिए जब वो फिट होते हैं तो पहले नंबर पर कीपर-बल्लेबाज़ वही होंगे.
इस पर गंभीर का कहना था ईशान किशन इस वक्त फ़ॉर्म में हैं और उन्हें ही चुनना चाहिए न कि किसी बड़े नाम को.
वैसे गंभीर की दलील में दम तो था लेकिन उनके बोलने का कड़ा अंदाज़ कई बार लोगों को नागवार गुज़रता है.
जब विराट से उलझे गंभीर
कमेंट्री के अलावा मैदान पर भी गंभीर विवादों में उलझते नज़र आए हैं. सबसे चर्चित विवाद विराट कोहली के साथ पिछले आईपीएल में देखा गया.
लखनऊ और बंगलुरु के बीच मैच में जब कोहली मैच के बाद लखनऊ के खिलाड़ी को कुछ कहने आए तो गंभीर उनकी तरफ़ बढ़े और कहा, 'क्या बात है मुझे बोलो?'
कोहली ने कहा, 'मैं आपसे कुछ नहीं कह रहा' तो गंभीर ने कहा कि उनकी टीम को कहना उन्हें कहने के जैसा है क्योंकि टीम ही उनका परिवार है.
टीवी पर करोड़ों लोगों ने भारत के दो दिग्गज खिलाड़ियों को बच्चों की तरह बहस करते देखा जो निश्चय ही दोनों के कद के बराबर की हरकत नहीं थी.
अफ़रीदी संग पुरानी तकरार
पाकिस्तान के शाहिद अफ़रीदी के साथ भी गंभीर का पुराना विवाद रहा है.
2007 में कानपुर के मैच में दोनों खिलाड़ियों के बीच अच्छी खासी गर्मा-गर्मी हुई थी. हाल ही में अपनी किताब में अफ़रीदी ने गंभीर के बारे में लिखा कि वो साधारण खिलाड़ी थे और उनके रिकॉर्ड कुछ खास नहीं हैं.
इस पर गंभीर ने ट्वीट किया, 'जो खिलाड़ी अपनी उम्र नहीं याद रख सकता वो मेरे रिकॉर्ड कैसे याद रखेगा, लेकिन उन्हें बता दूं कि 2007 में टी20 के फ़ाइनल में गंभीर ने 75 रन बनाए जबकि अफ़रीदी ने 0 रन बनाए थे और वर्ल्ड कप भी भारत ने जीता था.'
अभी हाल ही में एक और वीडियो सामने आया जिसमें गंभीर कुछ फैंस को मिडिल फिंगर दिखा रहे हैं.
गंभीर ने कहा कि कुछ पाकिस्तानी फैंस भारत विरोधी नारे लगा रहे थे जिसके जवाब में उन्होंने ऐसा किया.
दरअसल क्रिकेट के मैदान पर गंभीर की छवि एक जीवट और जुझारू खिलाड़ी के तौर पर बनी है.
असल ज़िंदगी में भी वो बेबाक बोलते हैं जिसपर मिली-जुली राय आती रहती है.
जैसा कि गंभीर कहते हैं की वो 'हीरो वर्शिप' के ख़िलाफ़ हैं, उसी लिहाज़ से उनके बयान भी उन्हें पापुलर बनाने के बजाए इस बात पर टिके होते हैं कि उससे भारतीय क्रिकेट को कितना फ़ायदा हो रहा है. कम से कम गंभीर तो ऐसा ही मानते हैं.
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