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रूमानियत भरी ज़िंदगी: कितनी हक़ीक़त, कितना दिखावा?
- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
1971 में आई बॉलीवुड फ़िल्म ‘आनंद’ में राजेश खन्ना का एक डॉयलॉग है- बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं.
इस संवाद में जीवन की तमाम मुश्किलों और पेचीदगियों के बावजूद भरपूर और खुलकर जीने का संदेश छिपा है. कहा गया है कि इंसान को वर्तमान में जीते हुए ज़िंदगी की ख़ूबसूरती का लुत्फ़ उठाना चाहिए.
जोश और सकारात्मकता के साथ इस तरह जीने को रूमानियत भरी ज़िंदगी कहा जाता है. अंग्रेज़ी में इसे कहते हैं- रोमांटिसाइज़िंग लाइफ़.
रूमानियत भरी ज़िंदगी जीना कोई नई बात नहीं है. मगर पिछले कुछ सालों में ज़िंदगी को रोमांटिसाइज़ करने के बारे में काफ़ी बात होने लगी है.
कोविड महामारी के कठिन दौर के बाद से सोशल मीडिया पर इसका चलन काफ़ी ज़्यादा देखने को मिला है.
लोग फोटो, वीडियो या रील्स के रूप में अपनी ज़िंदगी के उन हिस्सों को पेश करते नज़र आते हैं जहां कुछ करते हुए उन्हें ख़ुशी मिल रही होती है.
मक़सद क्या है?
सबके लिए रूमानियत का अर्थ अलग है. जैसे कि पसंदीदा कपड़े पहनना, घूमने जाना, ख़ुद के लिए फूल ख़रीदना, किसी के साथ समय बिताना या फिर कुछ अच्छा खाना.
दिल्ली में रहने वालीं लतिका जोशी बताती हैं कि उनके लिए ज़िंदगी को रोमांटिसाइज़ करने का मतलब है रोज़मर्रा की उलझनों, परेशानियों और संघर्षों को दरकिनार करके कुछ देर के लिए वह सब करना है, जिसमें सच्ची ख़ुशी मिले.
वह बताती हैं, “इसके लिए मैं योग या साइकलिंग करती हूँ, कोई फ़िल्म देख लेती हूँ, अपनी पसंद का खाना या फिर कोई एकदम नई डिश बनाती हूँ. कभी कोई किताब पढ़ती हूं तो कभी दोस्तों से बातें करती हूं. जैसे अभी आपके सवालों का जवाब देने से पहले मैंने अपने लिए एक बढ़िया सी कॉफ़ी बनाई.”
पूजा सिंह बधूला पति और दो बच्चियों के साथ अमेरिका के मिनेसोटा में रहती हैं. भारत में वह समाचार चैनल में एंकर थीं और इन दिनों फ्रीलांस पत्रकारिता कर रही हैं. इंस्टाग्राम पर वह अपनी ज़िंदगी के ख़ुशनुमा लम्हों को शेयर करती हैं.
वह बताती हैं, “मुझे हमेशा से व्यस्त रहना पसंद है. बेटियों की देखभाल करना, सोशल गैदरिंग करना, अपने ग्रुप के कार्यक्रमों में शामिल होना, घर पर अच्छा खाना बनाना और फिर बेटियों को सुलाने के बाद ग्रीन टी के साथ पति के साथ बातें करना मुझे पसंद है. एक और बात है, कैमरे पर आना बहुत मिस करती हूं तो रील्स और सोशल मीडिया का कॉन्टेंट बनाकर अरमान पूरे कर लेती हूं.”
लतिका और पूजा की तरह ही हममें से बहुत से लोग ऐसे कामों के लिए समय निकालते होंगे, जिन्हें करने में हमें ख़ुशी होती है. इसी ख़ुशी को बार-बार तलाशने और महसूस करना ही लाइफ़ को रोमांटिसाइज़ करना है.
दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में मनोविज्ञान की सहायक प्रोफ़ेसर डॉक्टर इशिता उपाध्याय मनोवैज्ञानिक के तौर पर काउंसलिंग भी करती हैं. वह बताती हैं कि ज़िंदगी को रोमांटिसाइज़ करना इंसान की स्वाभाविक और स्थायी चाहत होती है.
वह कहती हैं, “इंसान के अंदर अपने अस्तित्व और भावनाओं को समझने और अनुभव करने की एक गहरी इच्छा होती है. जीवन को रोमांटिसाइज़ करते समय लोग अपने अस्तित्व से और जुड़ाव महसूस करते हैं. उन्हें जीवन और ज़्यादा सार्थक लगने लगता है.”
“रोमांटिसाइज़ करते समय हम अपने विचारों और भावनाओं को गहराई से तलाश रहे होते हैं. हम चाहते हैं कि किसी चीज़ में खो जाएं. चाहे वह संगीत हो, सिनेमा हो या कोई और काम. खो जाने का यह भाव अपने जीवन में कुछ सार्थक तलाश करने का हिस्सा है. तो रोमांटिसाइज़ करने का मक़सद है- अपने जीवन और अपने आसपास की दुनिया में कुछ सार्थक तलाश करना.”
सोशल मीडिया का असर
सोशल मीडिया ऐप्स पर हमें बहुत से दोस्त और अन्य इन्फ्लुएंसर्स अपनी लाइफ़ को रोमांटिसाइज़ करते हुए नज़र आते हैं. इस तरह का कॉन्टेंट ख़ुशी भरा और सकारात्मक होता है.
लतिका जोशी कहती हैं कि सकारात्मकता देखने और शेयर करने से बढ़ती है. वह बताती हैं कि कोविड के दौरान जब उन्होंने साइकलिंग शुरू की थी तो बहुत से दोस्तों और फ़ॉलोवर्स ने साइकल खरीदकर उन्हें टैग करते हुए प्रेरित करने का श्रेय दिया था.
वह कहती हैं, “ऐसा नहीं है कि मैं किसी को प्रेरित करने के लिए यह सब करती हूं. मुझे उन चीज़ों के बारे में बताना अच्छा लगता है जिन्हें करके मुझे मज़ा आया. और उससे कोई प्रेरित हो जाए तो अच्छा ही है न.”
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सोशल मीडिया के कारण रोमांटिसाइज़ेशन का स्वरूप बदलने लगा है.
दिल्ली में मनोवैज्ञानिक पूजा शिवम जेटली बताती हैं कि बहुत से लोग सोशल मीडिया पर किसी को देखकर प्रेरणा लेते हैं कि उनकी ज़िंदगी भी ऐसी होनी चाहिए. इसमें कुछ बुरा नहीं है लेकिन समस्या तब आती है जब लोग सोशल मीडिया पर दिख रही चीज़ों को ही वास्तविकता मान लेते हैं.
उदाहरण देते हुए पूजा शिवम जेटली कहती हैं, “कुछ लोग घर को सजाने के वीडियो शेयर करते हैं. उन्हें देखकर आप भी अपने घर को वैसे ही सजाना चाहेंगे. लेकिन हो सकता है कि आपको दिखाने के लिए बनाए गए उस वीडियो में किसी एक हिस्से को सजाने के लिए पूरे घर में बेतरतीबी फैल गई हो.”
यानी सोशल मीडिया पर दिखाई गई ज़िंदगी और असल ज़िंदगी में अंतर हो सकता है. लेकिन इस तरह के कॉन्टेंट का किशोरों या कम उम्र के युवाओं पर ग़लत असर पड़ सकता है. वे अपने जीवन की तुलना किसी इन्फ्लुएंसर से करके हताशा में घिर सकते हैं.
मनोवैज्ञानिक डॉक्टर इशिता उपाध्याय बताती हैं, “यह देखा गया है कि सोशल मीडिया पर होने वाली तुलना के कारण हर आयु वर्ग के लोगों के आत्मविश्वास और स्वाभिमान को आघात पहुंच सकता है. लोगों को लगने लगता है कि वे किसी काम के नहीं हैं. वे प्रेरित होने के बजाय हीन भावना के शिकार हो सकते हैं. तुलना करने पर मन में ईर्ष्या का भाव भी आ सकता है.”
दिखावा करने का दबाव
यही नहीं, सोशल मीडिया पर रूमानियत भरे वीडियो शेयर वालों पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है. हो सकता है कि वे वास्तव में किसी काम में लुत्फ़ उठाने के बजाय दिखावा करने लगें.
उदाहरण देते हुए पूजा शिवम जेटली कहती हैं, “मैं हाल ही में विदेश यात्रा पर गई थी. वहां एक लड़की नज़ारों और माहौल का आनंद उठाने के बजाय रील्स रिकॉर्ड करके यह दिखाने में व्यस्त थी कि उसे कितना मज़ा आ रहा है.”
“इसे वास्तविकता से दूर होकर अपनी प्रॉजेक्टेड सेल्फ़ की ओर बढ़ना कहा जाता है. यानी हम दुनिया के सामने अपनी एक अलग छवि गढ़ने लगते हैं. और जब भी उस प्रॉजेक्टेड सेल्फ़ के बारे में दूसरो की राय बदलती है तो हम निराश होने लगते हैं.”
पूजा सिंह बधूला से पूछा कि क्या वे भी इस तरह का दबाव महसूस करती हैं कि उनके फ़ॉलोअर्स उनके बारे में क्या सोचेंगे?
उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया, “मैं रील्स तभी बनाती हूं जब मैं वाकई ख़ुश होती हूं. असल पूजा और रील्स में दिखने वाली पूजा में ज़्यादा फ़र्क नहीं है. मुझे किसी की राय का फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन कई बार सोचा कि रिकॉर्ड की हुई रील्स को पोस्ट करूं या नहीं. कई बार लगा कि पीछे तो घर गंदा दिख रहा है. लेकिन पति ने कहा कि कोई कहेगा तो कहने दो. तबसे मैं परवाह नहीं करती.”
लेकिन सबके साथ ऐसा हो, यह ज़रूरी नहीं है. डॉ. इशिता उपाध्याय कहती हैं कि बहुत से लोग एक्सटर्नल वैलिडेशन यानी किसी काम के लिए दूसरों से समर्थन और प्रोत्साहन चाहने लगते हैं.
वह बताती हैं, “मेरे पास एक केस आया था जिसमें पति-पत्नी के बीच अनबन थी. उन्हें नहीं पता था कि भविष्य में साथ रहेंगे या नहीं. लेकिन पत्नी चाहती थी कि पति के साथ विदेश घूमे. फिर वह सोशल मीडिया पर पति के साथ ऐसी तस्वीरें डालती थी मानो दोनों बहुत प्यार में हों. लेकिन हक़ीकत एकदम अलग थी.”
यानी संभव है कि सोशल मीडिया पर रोमांटिसाइज़ करने वाला कॉन्टेंट डालने वाले लोग एक बनावटी तस्वीर दुनिया के सामने दिखा रहे हों.
क्या करना चाहिए?
जिंदगी में हमें कई सारे संघर्षों और चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है. लेकिन सोशल मीडिया पर रोमांटिसाइज़ करने के चलन में ज़िंदगी के सिर्फ़ ख़ूबसूरत और अच्छे पहलू ही नज़र आते हैं.
दिल्ली में मनोवैज्ञानिक पूजा शिव जेटली कहती हैं कि यह याद रखना ज़रूरी है कि जिंदगी अच्छे और बुरे दोनों का मेल है और इनके बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है.
वह कहती हैं, “सोशल मीडिया को वास्तविकता मानने के बजाय मनोरंजन और सूचनाओं का स्रोत समझना चाहिए. ज़िंदगी को रोमांटिसाइज़ करने या और किसी ट्रेंड में शामिल होना ग़लत नहीं है. बस ख़ुद से सवाल करें कि आप ख़ुश हैं तो कुछ दिखा रहे हैं या दिखाने के लिए ख़ुश होने का दिखावा रहे हैं.”
जानकारों का यह भी कहना है कि सोशल मीडिया पर रोमांटिसाइज़ करने वाले वीडियो से प्रेरित होने में बुराई नहीं है लेकिन किसी और को देखकर तुलना करने से बचना चाहिए.
दिल्ली विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. इशिता उपाध्याय कहती हैं कि कोशिश यह होनी चाहिए कि ज़िंदगी को अपने हिसाब और अपनी क्षमता से हिसाब से अच्छे से जिएं.
वह कहती हैं, “जिस काम में आपको ख़ुशी मिलती है, वह ज़रूर करना चाहिए. मगर ध्यान रखना है कि आप सोशल मीडिया पर क्यों जा रहे हैं. एक सीमा तय करें कि आपको इससे आगे नहीं जाना है और किसी दूसरे को इसके अंदर नहीं आने देना है.”
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