राहुल द्रविड़ की चुप्पी में ही छुपे होते हैं कई जवाब

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- Author, आनंद वासु
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
जब आप पीछे मुड़कर अतीत में हुई घटनाओं को याद करते हैं तो कभी-कभी यह समझना मुश्किल हो जाता है कि ब्रह्मांड कैसे काम करता है.
अगर पिछले साल नवंबर में रोहित शर्मा ने राहुल द्रविड़ को फोन नहीं किया होता तो शायद टी-20 वर्ल्ड कप की कहानी का अंत कुछ और होता.
पिछले साल वनडे वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया से भारत को हार मिली और कोच के रूप में राहुल द्रविड़ का कार्यकाल भी ख़त्म हो गया था.
द्रविड़ कोच की ज़िम्मेदारी छोड़ने के लिए तैयार थे और अपने परिवार के साथ वक़्त बिताने के लिए बेंगलुरु लौट आए थे. लेकिन, रोहित के फोन ने सब कुछ बदल दिया. उसके बाद जो हुआ, पूरी दुनिया उसकी गवाह बनी.
राहुल द्रविड़ साल 1996 से 2012 तक बतौर खिलाड़ी भारत के लिए खेले. अपने 16 साल के करियर में द्रविड़ ने कुल तीन वर्ल्ड कप खेले लेकिन ट्रॉफ़ी नहीं जीत पाए.
उस समय वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप जैसे टूर्नामेंट नहीं थे और राहुल द्रविड़ उन खिलाड़ियों में थे, जिनका मानना था कि सीनियर खिलाड़ियों को 2007 के टी-20 वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं लेना चाहिए, जिसे भारत ने जीता था.
एक शानदार खिलाड़ी के लिए, जिसने भारतीय क्रिकेट को इतना कुछ दिया है, उसके करियर का अंत बिना ट्रॉफ़ी के अंत होना थोड़ी नाइंसाफ़ी थी. लेकिन आख़िर में क्रिकेट भी खेल है.
इस लिहाज से देखा जाए तो कोच के रूप में विजयी अभियान का हिस्सा बनने से द्रविड़ को बड़ी राहत मिली होगी.


जब द्रविड़ ने डॉक्टरेट की उपाधि लेने से किया इनकार
हालांकि, एक बात यह भी है कि द्रविड़ सिर्फ़ खेल पर ध्यान केंद्रित करते हैं. वह भावनाओं या किसी तरह की तारीफ़ का पीछा करने वालों में से नहीं हैं.
इस विश्व कप के दौरान जब उन्हें बताया गया कि सोशल मीडिया पर एक अभियान चल रहा है, जिसमें कहा गया है: #DoItForDravid (डु इट फोर द्रविड़). लेकिन द्रविड़ इस अभियान से सहमत नहीं थे.
द्रविड़ का कहना था कि यह किसी एक व्यक्ति या किसी दूसरे के लिए करने जैसा नहीं है.
उन्होंने कहा था, ''यह कुछ ऐसा है कि एक व्यक्ति ने पर्वतारोही से पूछा कि तुम एवरेस्ट पर क्यों चढ़ना चाहते हो और पर्वतारोही जवाब देता है, 'क्योंकि वह वहाँ है'.
इसके बाद द्रविड़ कहते हैं कि हमारे लिए भी वर्ल्ड कप ऐसा ही है.
अगर आप सोच रहे हैं कि द्रविड़ की सरलता का यही एक उदाहरण है, तो दोबारा सोचिए.
2017 की वह घटना याद कीजिए जब बैंगलोर यूनिवर्सिटी ने खेल में द्रविड़ के योगदान को देखते हुए मानद डॉक्टरेट की उपाधि देने का फ़ैसला किया था.
द्रविड़ ने विनम्रापूर्वक सम्मान लेने से इनकार कर दिया था.
बैंगलोर यूनिवर्सिटी ने कहा कि द्रविड़ मानद उपाधि लेने के बजाय खेल के क्षेत्र में कोई अकादमिक रिसर्च करके डॉक्टरेट की उपाधि लेने का प्रयास करेंगे.
अपने दोस्तों के साथ द्रविड़ ने इस मामले पर खुलकर बात की थी.
उन्होंने कहा, ''मेरी माँ पीएचडी हैं और मेरी पत्नी डॉक्टर हैं. मैं जानता हूँ कि उन्होंने इसके लिए कितनी मेहनत की है. मैं सिर्फ़ इसलिए पीएचडी कैसे स्वीकार कर सकता हूं क्योंकि मैंने क्रिकेट खेला है?''
पहली नज़र में देखने पर यह विनम्रता लग सकती है लेकिन यह उससे कहीं अधिक है.
एक खिलाड़ी के तौर पर, एक व्यक्ति के तौर पर और बतौर कोच द्रविड़ का ध्यान परिणाम के बजाय प्रक्रिया पर रहता है.
टीम इंडिया का कोच बनने से पहले द्रविड़ की कामयाबी
एक खिलाड़ी के तौर पर द्रविड़ प्रैक्टिस में वह सब कुछ करते थे, जिसकी उन्हें ज़रूरत होती थी. प्रैक्टिस के साथ अपनी डायट का भी ध्यान रखते थे.
मैच वाले दिन और बिना मैच वाले दिन दिनचर्या का ख़्याल रखते थे, जिससे उन्हें सफलता मिल सके. इसके बाद भी अगर किसी दिन, उनसे रन नहीं बने तो उन्होंने इसे सहजता से स्वीकार कर लिया.
एक व्यक्ति के तौर पर, द्रविड़ उन बातों पर ध्यान देते हैं, जो उनके लिए ज़रूरी हैं. यह उनके कोच, उनकी टीम के खिलाड़ी और उनके दोस्त हो सकते हैं लेकिन सबसे ऊपर उनका परिवार हो सकता है.
द्रविड़ ने कभी खु़द को नाम, सफलता और पैसे के मोह में नहीं फँसने दिया.
उनका साफ़ कहना था कि टीवी और मैदान पर लाखों क्रिकेट प्रेमियों के वो लिए एक हीरो हो सकते हैं लेकिन घर पर वह सिर्फ़ एक बेटा, एक भाई, एक पति और एक पिता हैं.
एक कोच के रूप में, द्रविड़ को सबसे बड़ी सफलता राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए), इंडिया 'ए' और अंडर-19 के साथ रहने के दौरान मिली.
बेशक, टी-20 विश्व कप की जीत को याद रखा जाएगा और हो सकता है कि उन्हें इसके लिए कोई बड़ा इनाम भी मिले. लेकिन उन्होंने अपना सबसे अच्छा काम पर्दे के पीछ रहकर किया था.
इनमें आम बात यह है कि प्रक्रिया परिणाम से ज़्यादा मायने रखती है. खिलाड़ियों को तैयार करना महत्वपूर्ण है.
आपको सही खिलाड़ियों की पहचान करनी होगा, एक ऐसा माहौल तैयार करना होगा, जिसमें खिलाड़ी सुधार कर सकें और उन्हें ऐसा बनाया जाए कि वो टीम इंडिया में अपना योगदान दे पाएं.
दबाव झेलने और चुपचाप काम करने की सोच
असल में कौन जानता है कि भारत की ए टीम ने कितने दौरों पर जीत हासिल की और वर्ल्ड कप से अलग अंडर-19 मुक़ाबलों के नतीजे क्या रहे?
जब भारत के कोच के रूप में उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी को संभाला तो काम करने की पूरी प्रक्रिया को चुनौती दी.
टीम पर प्रदर्शन का इतना दवाब था कि किसी को भी प्रक्रिया की चिंता नहीं थी.
अगर टीम जीती तो आप अच्छे कोच थे, अगर ऐसा नहीं होता तो आपको बर्खास्त कर दिया जाता.
यह बात खुलकर तब सामने आई जब भारत ने घरेलू मैदान पर टेस्ट मैच खेले.

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इस बात की लगातार आलोचना हो रही थी कि भारत ज़्यादातर टर्निंग विकेट (टर्न करने वाली पिच) पर खेल रहा है.
जो आलोचक द्रविड़ को सुनना चाहते थे, द्रविड़ उन्हें समझाते थे कि ऐसा क्यों हो रहा है .
वह कहते थे, ''जब घरेलू मैदान पर टेस्ट मैचों की बात आती है तो आप नहीं जानते कि खिलाड़ी किस तरह के दबाव में होते हैं. जब आप बाहर खेलते हैं तो आपको हमेशा चुनौती का सामना करना पड़ता है. इसका मतलब है कि आपसे घरेलू मैदान पर हर टेस्ट मैच जीतने की उम्मीद की जाती है. दूसरे देशों के लिए अच्छा प्रदर्शन करना और सर्वश्रेष्ठ की उम्मीद करना ठीक हो सकता है, लेकिन अगर भारत विश्व टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में नहीं पहुंचता है, तो इसे असफलता माना जाता है.''
द्रविड़ यह सब सार्वजनिक रूप से समझाने में सक्षम नहीं रहे क्योंकि वह स्वभाव से एक संकोची व्यक्ति हैं और भारत में हमेशा मुखर होना उचित नहीं है.
लेकिन उनकी ताक़त दबाव झेलने और चुपचाप अपना काम करने की रही है.
इस लिहाज से कोच के रूप में भी वर्ल्ड कप जीतना उस व्यक्ति के लिए ख़ास है, जिसने इस खेल को इतना कुछ दिया.
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