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‘दिव्यांग मंदिर’ में प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती- शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
“मोदी जी ने कह दिया है कि विकलांग मत कहो, दिव्यांग कहो, तो आज की तारीख में यह दिव्यांग मंदिर है. दिव्यांग मंदिर में सकलांग भगवान को, जिनके सकल(सभी) अंग हैं, उन्हें कैसे प्रतिष्ठित कर सकते हैं?.”
“पीएम मोदी तीन बार धर्मनिरपेक्षता की शपथ ले चुके हैं...इसलिए किसी धर्म कार्य में उनका सीधा अधिकार नहीं बनता.”
“अगर वे विवाहित हैं, तो पत्नी के साथ बैठना होगा. पत्नी को दूर कर कोई भी विवाहित व्यक्ति किसी भी धर्म कार्य में अधिकारी नहीं हो सकता.”
“शिखर और ध्वज के बिना मंदिर में प्रतिष्ठा की गई तो वह मूर्ति तो राम की दिखाई देगी लेकिन उसमें असुर होगा. उसमें आसुरी शक्ति आकर बैठ जाएगी.”
ये कुछ बातें उस इंटरव्यू का हिस्सा हैं, जो 16 जनवरी को ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने बीबीसी को दिया है.
इस इंटरव्यू में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने न सिर्फ प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम पर सवाल उठाए हैं बल्कि पहली बार उन सवालों के जवाब भी दिए हैं, जो लगातार सोशल मीडिया पर पूछे जा रहे हैं.
प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से आप नाराज क्यों हैं?
मंदिर परमात्मा का शरीर होता है. उसका शिखर, उनकी आंखें होती हैं. उसका कलश, उनका सर और ध्वज पताका उनके बाल होते हैं. इसी चरण में सब चलता है. अभी सिर्फ धड़ बना है और धड़ में आप प्राण प्रतिष्ठा कर देंगे तो यह हीन अंग हो जाएगा.
मोदी जी ने कह दिया है कि विकलांग मत कहो, दिव्यांग कहो, तो आज की तारीख में यह दिव्यांग मंदिर है. दिव्यांग मंदिर में सकलांग भगवान को, जिनके सकल(सभी) अंग हैं, उन्हें कैसे प्रतिष्ठित कर सकते हैं?
वह तो पूर्ण पुरुष है, पूर्ण पुरुषोत्तम है, जिसमें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है. मंदिर के पूरा होने के बाद ही प्राण प्रतिष्ठा शब्द जुड़ सकता है. अभी वहां कोई प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती है, अगर हो रही है तो करने वाला तो कुछ भी बलपूर्वक कर लेता है.
ऐसे में इसे क्या कहना ठीक होगा?
अभी सर बना नहीं है. उसमें प्राण डालने का कोई मतलब नहीं है. पूरा शरीर बनने के बाद ही प्राण आएंगे और जिसमें अभी समय शेष है. इसलिए जो अभी कार्यक्रम हो रहा है, धर्म की दृष्टि से उसे प्राण प्रतिष्ठा नहीं कहा जा सकता.
आप आयोजन कर सकते हैं…रामधुन करिए, कीर्तन करिए, व्याख्यान कीजिए. ये सब कर सकते हैं, लेकिन प्राण प्रतिष्ठा शब्द का इस्तेमाल मंदिर बन जाने के बाद ही लागू होगा.
क्या प्रधानमंत्री प्राण प्रतिष्ठा कर सकते हैं?
प्रधानमंत्री जी ने तीन बार धर्मनिरपेक्षता की शपथ ली है. एक बार बीजेपी का सदस्य बनने के लिए, क्योंकि पार्टी ने चुनाव आयोग में धर्मनिरपेक्ष पार्टी होने का शपथ पत्र दिया हुआ है.
दूसरी बार संविधान की शपथ से वे सांसद बने और तीसरी बार प्रधानमंत्री होने के नाते उन्होंने धर्मनिरपेक्षता की शपथ ली. इसलिए किसी भी धर्म कार्य में उनका सीधा अधिकार नहीं बनता है.
सबका प्रतिनिधि होने के नाते वे इस कार्यक्रम में शामिल होने की अगर बात करते हैं, तो वह तब हो सकता है जब वे देश के सभी धर्मों के कार्यक्रमों में शामिल हों और वहां प्रतिनिधित्व करें
किसी एक धर्म के साथ उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. या तो सभी धर्मों में करें या फिर किसी धर्म में न करें.
क्या पीएम मोदी यजमान बन सकते हैं
हमारी कुछ धार्मिक मान्यताएं हैं. पत्नी को दूर रख कर कोई भी विवाहित व्यक्ति किसी भी धर्म कार्य में अधिकारी नहीं हो सकता. आप विवाहित हैं. आपकी पत्नी है. न होती तो अलग बात है.
आपका उसके साथ क्या संबंध है, क्या नहीं है? बातचीत होती है कि नहीं होती है. साथ में रहते हैं कि नहीं रहते हैं. यह अलग बात है, लेकिन धर्म कार्य में उसका अधिकार है. वह आधा अंग है.
जिस समय साथ में सप्तपदी होती है, उस समय यह वचन होता है कि धर्मकार्य में तुमको मैं अपने बगल में स्थान दूंगा. यह पहले से वचन दिया जा चुका है, इसलिए धर्मकार्य में उसको अवसर तो देना पड़ेगा. आप उसको(पत्नी) वंचित नहीं कर सकते हैं.
आपको कहा जा रहा है कि आप खुद ब्राह्मण नहीं हैं?
ब्राह्मण ही संन्यासी हो सकता है, दंडी संन्यासी. हमारे धर्मशास्त्र में यह स्थापित विधि है और इसे ही कानून में भी माना गया है कि ब्राह्मण ही संन्यासी होगा और वह ही दंडी संन्यासी बनेगा और दंडी संन्यासी ही शंकराचार्य होगा.
जो लोग यह कह रहे हैं कि मैं ब्राह्मण नहीं हूं तो किसी कोर्ट में मुकदमा करना चाहिए. उन्हें कोर्ट में यह साबित करना चाहिए…अगर यह साबित हो जाता है तो हमें खुद ही इस सीट से उतर जाना पड़ेगा.
आप पर कांग्रेसी होने के आरोप भी लग रहे हैं?
ठीक है और वे कह भी क्या सकते हैं. सभी शास्त्र पुकार-पुकार कर कह रहे हैं कि मंदिर देवता का शरीर है. अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती.
उनके पास इसका जवाब नहीं है और इसके बदले वे मुझे कांग्रेसी, यह ब्राह्मण नहीं है, गुस्सैल, एंटी मोदी है, जैसी बातें कर रहे हैं. यह हमारे सवालों के जवाब नहीं हैं.
क्या आपको प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का विरोध करने पर डर नहीं लगता?
हम क्या हैं? हमारे पास इतनी बड़ी परंपरा का, इतने बड़े शास्त्रों का बल है. हम शास्त्रों के बल से बोल रहे हैं. जो ये राजनीतिक हिंदू हैं, इनकी संख्या नगण्य है.
अमित शाह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मिस कॉल का एक प्रकरण चलाया और कहा कि हमने 10 करोड़ लोगों को शामिल कर लिया. तो ऐसे 10 करोड़ भाजपाई हो गए. इन्हें करीब 21 करोड़ वोट मिलते हैं.
उतने लोग इनके हो गए, लेकिन देश में 100 करोड़ हिंदू हैं, 50 करोड़ हिंदू हैं, जो सनातनी हैं, वे गुरुओं के आदेश को मानते हैं… जितने हिंदू भारत में रह रहे हैं, उसमें से ज्यादातर हिंदू इनके साथ नहीं हैं. वे हमारे पीछे अभी भी हैं.
क्या आपको प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में निमंत्रण मिला है?
नहीं, मुझे कोई निमंत्रण पत्र नहीं मिला है.
जो प्रोटोकॉल परंपरा से चला आ रहा है, उसको आपने छीन लिया है. आप दलाई लामा को प्रोटोकॉल देते हैं जो कि हिन्दू धर्म का गुरु नहीं है. आप राम जी के मंदिर में शंकराचार्य को नहीं बुलाते हो. आप दलाई लामा को बुलाते हो यह क्या है?
क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आप व्यक्तिगत तौर पर नाराज हैं?
आप हमारी परिस्थिति समझिए. 2019 में हमने उनके(पीएम मोदी) खिलाफ एक व्यक्ति खड़ा किया था, क्योंकि विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर करीब 150 मंदिर तोड़ दिए गए. उनकी मूर्तियों को फेंकना शुरू कर दिया, जिसमें हमारे पौराणिक मंदिर थे.
कोई 2 हजार साल पुराना था, तो कोई 1 हजार साल पुराना…औरंगजेब से हम इसी कारण से नफरत करते थे और अब अगर यही काम कोई हमारा भाई या बहन करेगी तो उसे हम कैसे बख्श दें….इस बात को कोई अखबार या टीवी नहीं दिखा रहा था.
एक ही रास्ता हमें दिखाई दिया कि हम इनके खिलाफ एक संत को खड़ा करें, तो स्वाभाविक है कि उनका इंटरव्यू तो सब लेंगे ही, मोदी जी धर्म के व्यक्ति माने जाते हैं, और पूछा जाएगा कि उनके सामने संतों को खड़ा होने की जरूरत क्यों पड़ी.
जब वो खड़ा होगा तो वह अपनी बात कह पाएगा कि मंदिर तोड़े गए. हमारे धर्म की हानि हुई. इसलिए हम उसे खड़ा कर रहे थे, लेकिन उसके नामांकन को बिना गलती के खारिज कर दिया गया.
क्या हिंदू धर्म की परिभाषा को बदला जा रहा है?
अब हो रहा है कि वेद शास्त्रों, गुरुओं, धर्माचार्यों को नहीं मानेंगे और हमारा नेता ही सब कुछ है, जो वह कहेगा वही करेंगे. ये भावना भरकर हिंदुओं को पटरी से उतरा जा रहा है.
इसका घाटा ये होगा कि अगर हम राजा को अपना प्रतीक समझ लेंगे, तो राजा के साथ तो हर समय युद्ध होता रहता है. राजा को कोई न कोई शत्रु तो होता ही है. किसी समय में असावधानीवश राजा पराजित हो गया तो हिंदू कहां जाएगा, ऐसे में तो हिंदू पराजित हो जाएगा.
हमारे पूर्वजों ने यही तरीका अपनाया था कि हम राजा में पूरी तरह से अपने आप को समाहित नहीं करेंगे. राजा भी हमारा एक अंग है.
ये पद्धति बन गई है कि आप नेता के सर्कुलर को मानो तो आप हिंदू हैं. ये ठीक नहीं है, जो धर्मशास्त्र को मानें और उसके हिसाब से चले वह हिंदू है.
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से क्या आपकी कोई लड़ाई है?
हमारी कोई लड़ाई नहीं है. हक हमारा है, क्योंकि पहले से शंकराचार्यों को ट्रस्ट बना हुआ था, लेकिन उस ट्रस्ट को बिना कारण बताकर हटा दिया.
इसमें देश के बडे बडे धर्माचार्य थे, चार शंकराचार्य थे, पांच वैष्णव आचार्य, 13 अखाड़ों के प्रमुख थे. ऐसी ट्रस्ट को हटाकर अपने कार्यकर्ताओं की ट्रस्ट प्रधानमंत्री जी ने बनवा ली.
यह आयोजन वहां मौजूद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट कर रही है, उसकी जरूर कोई मजबूरी होगी और अगर इसे बड़े स्तर पर देखना पड़े तो उसमें वही लोग आएंगे जो देश में घर-घर जाकर चावल बांटने में उनकी मदद कर रहे हैं.
चंपत राय ने कहा कि ये मंदिर रामानंद संप्रदाय का है
अगर मंदिर रामानंद संप्रदाय का है तो आप क्यों बैठे हो, कृपा करके हटो और रामानंद संप्रदाय को दो…जगतगुरु स्वामी रामानंद रामनरेशाचार्य रामानंद संप्रदाय के सबसे बड़े गुरु हैं.उनके लोगों ने बताया कि हमारे यहां तो निमंत्रण तक नहीं आया है.
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