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दुनिया भर में फैलता चीनी जासूसों का जाल, पश्चिमी देश क्या क़दम उठा रहे हैं?
- Author, गॉर्डन कोरेरा
- पदनाम, बीबीसी रक्षा संवाददाता
पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियां सालों से चीन पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत पर बात करती आ रही हैं. इस हफ़्ते ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसी जीसीएचक्यू के प्रमुख ने इसे ''युग को प्रभावित करने वाली चुनौती'' बताया है.
ये बयान ऐसे समय में आया है जब कई लोग चीन के लिए जासूसी और हैकिंग के आरोप में पश्चिमी देशों में गिरफ़्तार हुए हैं. तीन लोगों पर हांगकांग की ख़ुफ़िया एजेंसियों को सहायता पहुंचाने का आरोप लगने के बाद सोमवार को चीन के राजदूत को ब्रिटेन के विदेश कार्यालय ने तलब किया था.
ऐसे में जब पश्चिमी देशों और चीन के बीच सत्ता और प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा चल रही है. ऐसी गिरफ़्तारियां इस प्रतिस्पर्धा के खुलकर सामने आने का संकेत हैं.
अमेरिका और उसके सहयोगी देश, चीन की चुनौती का जवाब देने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों की चिंता है कि पश्चिमी देशों ने चीन की चुनौती को गंभीरता से नहीं लिया है और ख़ुफ़िया गतिविधियों के मामले में ये देश पिछड़ गए हैं.
इससे पश्चिमी देशों पर चीन की जासूसी का ख़तरा बढ़ा है और दोनों ही पक्षों की तरफ़ से गंभीर गलतियां होने की आशंका भी बढ़ी है.
पश्चिमी देशों के अधिकारियों की किस बात की चिंता है?
पश्चिमी देशों के अधिकारियों की चिंता चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के संकल्प को लेकर है. जिनपिंग इस बात को लेकर प्रतिबद्ध हैं कि बीजिंग एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देगा.
ब्रिटेन की विदेशी खुफिया एजेंसी MI6 के प्रमुख रिचर्ड मूर ने चीन और पश्चिमी देशों पर बीबीसी की नई सिरीज़ के लिए दिए गए इंटरव्यू में कहा है, ''आख़िरकार वो (चीन) अमेरिका को सबसे बड़ी शक्ति के तौर से हटाने की इच्छा रखता है.''
लेकिन सालों की चेतावनी के बाद भी पश्चिमी देशों की एजेंसियां चीन की गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने को लेकर संघर्ष करती आ रही हैं.
साल 2006 में रिटायर होने से पहले MI6 में नंबर दो की हैसियत रखने वाले निगेल इंकस्टर का कहना है कि चीन ऐसे समय में प्रमुख वैश्विक शक्ति बनकर उभरा है जब पश्चिमी देश दूसरे कई मुद्दों में उलझे हुए थे.
2000 के दशक में जब चीन वैश्विक शक्ति बनकर उभर रहा था, उस वक्त पश्चिम के नीति निर्माताओं, सुरक्षा अधिकारियों और ख़ुफ़िया एजेंसियों का ध्यान तथाकथित आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध और अफ़गानिस्तान, इराक में सैन्य हस्तक्षेप पर था.
अमेरिका और यूरोप के अधिकारी मानते हैं कि हाल फिलहाल में रूस का फिर से उभरना और इसराइल-ग़ज़ा युद्ध बड़ी चुनौतियां हैं.
साथ ही चीन के सुरक्षा जोख़िमों का सामना करने की बजाय सरकार और व्यवसायों का ध्यान चीन के बड़े बाज़ार तक पहुंच बनाने पर रहा है.
इन देशों के नेता भी अक्सर ये पसंद करते थे कि ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख चीन का नाम सीधे तौर पर न लें. व्यवसाय भी ये मानने को तैयार नहीं थे कि उनके सिक्रेट्स को निशाना बनाया जा रहा है.
निगेल इंकेस्टर का कहना है कि चीनी एजेंसियां 2000 के दशक से ही औद्योगिक जासूसी में लगी हुई थीं. लेकिन पश्चिमी कंपनियां इस पर चुप रहीं, ''वो डर से इसे रिपोर्ट नहीं करना चाहते थे, उन्हें ऐसा लगता था कि चीन के बाज़ार में उनकी स्थिति ख़तरे में पड़ जाएगी.''
अलग मकसद से जासूसी करता है चीन
दूसरी चुनौती ये है कि चीन की जासूसी, पश्चिमी देशों से अलग है. इससे जासूसी गतिविधि को पहचानना और उसका सामना करना दोनों कठिन हो गया है.
पश्चिमी देश के एक पूर्व जासूस का कहना है कि उन्होंने एक बार अपने चीनी समकक्ष को बताया था कि चीन ने ''गलत तरीके'' की जासूसी की है. उनके कहने का मतलब था कि पश्चिमी देश ऐसी ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं जिससे उनके विरोधियों को समझने में मदद मिल सके.
लेकिन चीनी जासूसों की प्राथमिकताएं अलग हैं.
कम्युनिस्ट पार्टी के हितों की रक्षा करना उनका मुख्य उद्देश्य है. एफ़बीआई के अधिकारी रोमन रोजाव्सकी कहते हैं, ''सत्ता की स्थिरता उनकी पहली प्राथमिकता है.''
इसके लिए आर्थिक विकास ज़रूरी है. इसलिए चीनी जासूस, पश्चिमी टेक्नोलॉजी हासिल करने को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़रूरी समझते हैं. पश्चिमी देशों के जासूस बताते हैं कि उनके चीनी समकक्ष अपनी जानकारी को चीनी सरकारी कंपनियों के साथ साझा करते हैं. ऐसा पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों की तरफ़ से नहीं किया जाता.
'फ़ाइव आई'
आस्ट्रेलियाई सुरक्षा और ख़ुफ़िया संगठन (Asio) के प्रमुख माइक बर्गेस ने मुझे समझाया, ''74 साल के इतिहास में अब मेरी एजेंसी पहले से कहीं व्यस्त है.''
वो कहते हैं, ''मैं शायद ही किसी देश पर आरोप लगाता हूं, क्योंकि जब जासूसी की बात होती है तो हम भी ये कर रहे होते हैं. कमर्शियल जासूसी पूरी तरह से अलग मामला है और इसलिए चीन के साथ अलग तरह से बर्ताव किया जाता है.''
माइक ने ये माना कि पश्चिमी देशों ने इस ख़तरे को समझने में देरी की है. वो कहते हैं, ''मुझे लगता है कि ये लंबे समय से चल रहा है और हम सामूहिक तौर पर चूक गए हैं.''
पिछले साल अक्टूबर में हमारी मुलाक़ात कैलिफोर्निया में हुई थी. जहां वो 'फाइव आई' की बैठक में हिस्सा लेने आए थे. 'फाइव आई', ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूज़ीलैंड की ख़ुफ़िया एजेंसियों का गठबंधन है.
इस अभूतपूर्व मुलाक़ात का मकसद चीन की तरफ़ से बढ़ते ख़तरे के बारे में चेतावनी को बढ़ाना था. क्योंकि, ख़तरे के बावजूद कई सारी कंपनियां और संगठन अभी भी नहीं सुन रहे हैं.
मुलाक़ात की जगह के तौर पर सिलिकॉन वैली का चयन भी बड़ी ही सावधानी से किया गया था. क्योंकि ये जगह टेक्नोलॉजी चोरी के लिहाज़ से संवेदनशील है. कभी साइबर जासूसी के जरिए तो कभी कभी अंदरूनी जासूसों के माध्यम से ये जगह चीन के निशाने पर रहा है.
जासूसी के लिए चीन के पास बड़े पैमाने पर संसाधन मौजूद हैं. एक पश्चिमी अधिकारी के अनुमान के मुत़ाबिक, दुनियाभर में क़रीब 6 लीख लोग चीन के लिए ख़ुफ़िया और सुरक्षा पर काम करते हैं. ये आंकड़ा दुनिया के किसी भी दूसरे देश से ज़्यादा है.
''गंभीर हो सकते हैं परिणाम''
ब्रिटिश ख़ुफ़िया एजेंसी MI5 के मुताबिक़, सिर्फ़ ब्रिटेन में ही 20 हज़ार से अधिक लोगों से चीनी जासूसों ने रिश्ता बनाने के लिए संपर्क किया. इन जासूसों ने लिंक्डइन जैसी प्रोफ़ेशनल नेटवर्किंग साइट्स का संपर्क के लिए इस्तेमाल किया है.
MI5 के प्रमुख केन मैक्कलम ने मुझसे कैलिफोर्निया में हुई मुलाक़ात के दौरान बताया, ''लोग इस बात से अनजान हो सकते हैं कि वो किसी दूसरे देश के इंटेलिजेंस ऑफिसर से बात कर रहे हैं लेकिन अंत में उन्हें ये अहसास होता है कि उन्होंने जो जानकारी दी है उससे उनकी कंपनी का भविष्य ख़तरे में पड़ गया है.''
केन कहते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं, इसका आर्थिक परिणाम भी हो सकता है. चीन अपने ख़ुफ़िया तंत्र का इस्तेमाल विदेशों में हो रही अपने काम की आलोचना को सीमित करने के लिए भी करता है.
हाल ही में चीनी जासूसों द्वारा पश्चिम के देशों की राजनीति को निशाना बनाने की खबरें सामने आईं, इसके बाद ब्रिटेन, बेल्जियम और जर्मनी में कई गिरफ़्तारियां भी हुईं और कनाडा में जांच चल रही है.
यूरोप और अमेरिका में चीनी ''पुलिस स्टेशन'' के होने की भी ख़बरें आईं. सुरक्षा अधिकारी बताते हैं कि जब बात पश्चिमी देशों में चीनी असंतुष्टों की हो तो चीनी ख़ुफ़िया एजेंसियां दूर से ही ऑपरेट करती हैं. कभी-कभी वो प्राइवेट इंवेस्टिगेटर्स काम पर रखती हैं तो कभी-कभी धमकी भरे फोन कॉल करती हैं.
2000 के दशक की शुरुआत में यूके सरकार के सिस्टम्स पर जो पहला साइबर हमला हुआ था वो रूस से नहीं बल्कि चीन से हुआ था. इस हमले का मक़सद तिब्बती और वीगर समुदाय के असंतुष्टों के बारे में जानकारी इकट्ठा करना था.
पश्चिमी देश नए कानून भी बना रहे हैं
राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर ऑस्ट्रेलिया चिंता जताने वालों में सबसे आगे रहा है. ऑस्ट्रेलियन सिक्युरिटी इंटेलिजेंस ओर्गेनाइज़ेशन (एएसआईओ) का कहना है कि उसने साल 2016 के आसपास गतिविधियों का पता लगाना शुरू किया, इसमें चुनावों में किसी उम्मीदवार को आगे बढ़ाने जैसा काम भी शामिल था.
माइक बर्गेस, बीबीसी से कहते हैं, ''वो अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. हम नहीं चाहते कि वो इसे गुप्त तरीके़ से आगे बढ़ाएं.''
इस तरह की ख़ुफ़िया गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए ऑस्ट्रेलिया ने साल 2018 में कुछ नए कानून पारित किए.
जनवरी 2022 में, MI5 ने एक चेतावनी जारी करते हुए आरोप लगाया कि यूके स्थित सॉलिसिटर क्रिस्टिन ली, बीजिंग के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कई ब्रिटिश राजनीतिक दलों को दान दे रही थीं. MI5 के इस दावे को लेकर फिलहाल कोर्ट में केस चल रहा है.
साल 2023 में ब्रिटेन में एक नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को पास किया गया. इस कानून के तहत विदेशी राज्यों के हस्तक्षेप और दूसरी गतिविधियों से निपटने के लिए नई शक्तियां दी गई हैं.आलोचकों का तर्क है इसमें देरी हुई है.
इसमें कोई शक नहीं है कि पश्चिमी देश भी चीन की जासूसी कर रहे हैं, जैसे चीन पश्चिमी देशों की कर रहा है. लेकिन चीन पर ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा करना MI6 और सीआईए जैसी पश्चिमी ख़ुफ़िया एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण काम है.
चीन से ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा करना बेहद मुश्किल
चीन में जिस हद तक सर्विलांस है, फेशियल रिकग्निशन और डिजिटल ट्रैकिंग है, उसकी वजह से एजेंटों से आमने-सामने मिलना लगभग नामुमकिन है.
चीन ने क़रीब एक दशक पहले सीआईए एजेंट्स के बड़े नेटवर्क का सफाया कर दिया था. जीसीएचक्यू और अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (NSA) के लिए चीन से जानकारी जुटाना तकनीकी तौर पर काफ़ी मुश्किल काम है. क्योंकि वो कम्युनिकेशन इंटरसेप्ट के लिए और डिजिटल इंटेलिजेंस जुटाने के लिए पश्चिम का नहीं बल्कि अपनी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं.
एक पश्चिमी अधिकारी बताते हैं, ''हमें वास्तव में नहीं पता कि चीनी पोलित ब्यूरो कैसे सोचता है.''
जानकारी की ये कमी गलतफहमी पैदा कर सकती है और इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. शीत युद्ध के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब पश्चिमी देश ये समझने में नाकाम रहे कि मास्को कितना असुरक्षित महसूस करता था, नतीजा ये हुआ कि दोनों पक्ष विनाशकारी युद्ध के क़रीब आ गए, जिसे दोनों ही पक्ष नहीं चाहते थे.
ऐसा ही गलत आकलन का जोखिम आज भी है,ख़ासकर ताइवान पर नियंत्रण हासिल करने की चीन की इच्छा को लेकर. दक्षिण चीन सागर में भी तनाव बढ़ रहा है, यहां भी संघर्ष हो सकता है.
MI6 के प्रमुख रिचर्ड मूर मुझसे कहते हैं, ''हम जिस ख़तरनाक दुनिया में रह रहे हैं, हमें संघर्ष को लेकर हमेशा चिंतित रहना चाहिए और इससे बचने के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए.''
MI6 की भूमिका के बारे में वो कहते हैं कि इसका काम संभावित जोखिमों से निपटने के लिए जरूरी जानकारी मुहैया कराना है.
वो कहते हैं, ''गलतफहमी हमेशा ख़तरनाक होती है, बातचीत के दरवाजे खुले हों ये हमेशा बेहतर होता है, जिससे आप प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं उसके इरादों को जानना भी बेहतर होता है.''
बातचीत के रास्ते खुले हों ये सुनिश्चित करना प्राथमिकता है. आतंकी ख़तरों को लेकर MI6 और चीनी समकक्ष के बीच संपर्क है. ये भी तथ्य है कि अमेरिका और चीन के बीच कुछ सैन्य संपर्क फिर से शुरू हो गए हैं, जिसका स्वागत भी किया गया.
ऐसे में जब हालिया महीनों में बीजिंग और वॉशिंगटन के बीच सैन्य और राजनयिक संपर्क ने माहौल को थोड़ा शांत, लेकिन इसके बावजूद दीर्घकालिक तौर पर ख़तरे की घंटी तो बज ही रही है.
जासूसी के बारे में जिस तरह से खुलासे हो रहे हैं उससे दोनों तरफ़ की जनता के बीच अविश्वास और आशंका बढ़ने का ख़तरा है. घातक संघर्ष से बचने के लिए एक-दूसरे के साथ रहने और समझने का तरीका ढूंढना अहम होगा.
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