You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
छत्तीसगढ़ में कैंसर पीड़ित पति की चिता में पत्नी के जान देने का पूरा मामला जानिए
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायगढ़ से लौटकर
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ शहर से लगे हुए चिटकाकानी गांव के सुशील गुप्ता चाहते हैं कि उन्हें अपने पिता के साथ-साथ माँ के मृत्यु संस्कारों की अनुमति दी जाए.
हालांकि रायगढ़ ज़िले की पुलिस ने सुशील गुप्ता की माँ गुलापी गुप्ता की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कर रखी है, जिसमें लिखा है कि रविवार की रात से वो लापता हैं.
लेकिन गांव के लोगों का दावा है कि गुलापी गुप्ता, 65 साल के अपने पति जयदेव गुप्ता की जलती चिता में, रविवार की रात 'सती' हो गईं. कुछ लोग इसे 'आत्मदाह' बता रहे हैं.
जिस शमशान घाट में गुलापी गुप्ता ने कथित 'आत्मदाह' किया, वहां अब पुलिस का पहरा है. मुख्य सड़क पर सादी वर्दी में पुलिस के जवान तैनात हैं और हर आने-जाने वालों पर नज़र रख रहे हैं.
पुलिस को आशंका है कि शमशान घाट में कहीं कोई धार्मिक आयोजन न शुरू कर दिया जाए.
सुशील के घर से शमशान की जगह क़रीब 500 मीटर दूर है.
सुशील गुप्ता कहते हैं, “आधी रात के बाद जब गांव वालों के साथ मैं शमशान घाट पहुंचा तो वहां पिता की चिता से कुछ दूरी पर मेरी मां की साड़ी, चप्पल और चश्मा पड़ा हुआ था. पिता की चिता में ही, मेरी माँ का शरीर लगभग जल चुका था. फिर हम लोगों ने पुलिस को सूचना दी.”
रायगढ़ शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर कोतरलिया पंचायत का चिटकाकानी गांव, ओडिशा की सीमा से बराबर की दूरी पर है.
इस गांव में कई परिवार ओडिशा के हीराकुंड बांध के डूब क्षेत्र परसदा जुगनी से विस्थापित हो कर यहां बसे हैं.
इनमें से ही एक, कोलता समाज के जयदेव गुप्ता और उनकी पत्नी, घर से कुछ दूरी पर ही, दर्जी की दुकान चलाते थे.
क्या कहते हैं गांव के लोग
जयदेव गुप्ता के पड़ोसी बुजुर्ग मंगल खमारी बताते हैं, “पति-पत्नी में बहुत प्रेम था. दोनों बहुत ही सभ्य और शालीन थे. पिछले डेढ़ साल से जयदेव को कैंसर हुआ और पूरा परिवार उसके इलाज में उलझा रहा. रविवार को जयदेव का रायगढ़ अस्पताल में निधन हो गया. शाम को पांच बजे के आसपास शमशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया.”
सुशील बताते हैं कि रात दस बजे के आसपास लोग वापस आ गए. 11 बजे के आसपास जब सुशील की नींद खुली तो उनकी 57 साल की माँ गुलापी गुप्ता घर में नहीं मिलीं. घर का मुख्य दरवाज़ा भी खुला हुआ था.
काफ़ी तलाश के बाद गांव के लोग शमशान पहुंचे, जहां उन्हें चिता में अधजली लाश मिली.
गांव की सरपंच हरिमति राठिया का कहना है कि उन्हें सुबह पता चला कि गुलापी गुप्ता ने अपने पति की 'चिता में जल कर जान दे दी.'
सरपंच राठिया के भतीजे हेमंत कुमार ने बताया, “मैं रात ढाई बजे शमशान घाट पहुंचा तो वहां चिता की लपट उठ रही थी.”
आम तौर पर तीन-चार घंटे में लकड़ियां जल जाती हैं, ऐसे में चिता की आग आठ-नौ घंटे बाद तक कैसे जलती रही?
इस पर हेमंत कहते हैं, “गांव के एक-एक घर से लकड़ी एकत्र की जाती है. ट्रैक्टर भर के लकड़ी होती है और सारी लकड़ियों को चिता में डाला जाता है. इतनी लकड़ी में तीन-चार लोगों का दाह संस्कार किया जा सकता है.”
चक्रधरनगर थाने के एक पुलिसकर्मी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा कि लोग बताते हैं कि पति पत्नी में बहुत प्रेम था.
जयदेव गुप्ता को बचपन से जानने वाले वासुदेव प्रधान कहते हैं, “जयदेव बचपन में मुझसे एक क्लास आगे पढ़ते थे. वे इस इलाके के फेमस टेलर थे. पति पत्नी में बहुत प्रेम था और बाज़ार हो या खेत वो दोनों पति-पत्नी एक साथ जाते और काम करते थे.”
स्टाम्प वेंडर का काम करने वाले 54 साल के राकेश कश्यप कहते हैं, “मैंने तो अब तक छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश में इस तरह की घटना कभी सुनी नहीं थी. इस तरह का यह पहला मामला जानकारी में आया है.”
गांव के लोग इस घटना को लेकर हैरान हैं.
प्रशासन का क्या कहना है?
रायगढ़ ज़िले के एसपी दिव्यांग पटेल का कहना है कि परिवार वालों के बयान के आधार पर सभी पहलू को लेकर जांच की जा रही है.
उन्होंने कहा कि रात 11 बजे के बाद गुलापी गुप्ता के साथ क्या हुआ, इसका कोई भी चश्मदीद गवाह नहीं है.
दिव्यांग पटेल ने मीडिया से कहा, "इस संबंध में गुमशुदगी का मामला कायम किया गया है और पूरे मामले की जांच-पड़ताल की जा रही है. फोरेंसिक टीम, मेडिकल टीम की भी मदद ली जा रही है और जो भी मामला सामने आ रहा है, हर पहलू से उसकी जांच की जा रही है."
फोरेंसिक टीम बची हुई हड्डियों के साथ बिलासपुर लौट चुकी है. जब रिपोर्ट आएगी, उसके बाद फिर डीएनए जांच की प्रक्रिया शुरू होगी.
लेकिन तब तक गुलापी गुप्ता, सरकारी फ़ाइलों में गुम इंसान के तौर पर दर्ज रहेंगी.
घर वालों की इच्छा है कि जयदेव गुप्ता और गुलापी गुप्ता के दशकर्म और भोज समेत अन्य शोक आयोजन साथ-साथ हों और पुलिस-प्रशासन इसमें कोई अड़ंगा न लगाए.
आज़ादी से पहले बना क़ानून
ब्रिटिश शासन राज में 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध का क़ानून लागू किया गया था. इस क़ानून को बनवाने में राजा राममोहन राय की मुहिम का बड़ा योगदान था.
भले ही महिला ने अपनी इच्छा से आत्मदाह किया हो, इस क़ानून के तहत, पति की मृत्यु के बाद महिला को जलाने, मदद करने या उकसाने वाले को ग़ैर इरादतन हत्या का अपराधी माना जाता है.
आज़ादी के बाद सती प्रथा का सबसे चर्चित मामला 1987 में आया, जब राजस्थान के सीकर ज़िले के दिवराला गांव में 18 साल की रूप कुंवर के पति की चिता के साथ आत्मदाह करने की घटना सामने आई.
चार सितंबर 1987 को हुई इस घटना में 32 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. हालांकि अक्टूबर 1996 में सभी लोगों को रिहा कर दिया गया.
दुनिया भर में जिस तरह से सरकार की आलोचना हुई, उसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी को इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
इस दौरान राजस्थान सरकार ने राजस्थान सती निरोधक अध्यादेश 1987 पेश कर दिया, जिसे 1988 में केंद्र सरकार ने भी संघीय क़ानून में शामिल किया.
तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार के समय बने इस क़ानून में 'सती प्रथा के गुणगान' को अपराध बनाया गया. इसमें सात साल की सज़ा हो सकती है.
इस क़ानून में प्रथा को हत्या से जोड़ दिया गया और जो इसे बढ़ावा देता है उसे मौत की सज़ा का प्रावधान है.
महत्वपूर्ण जानकारी-
यदि आपको आत्महत्या के विचार आ रहे हैं या आपकी जानकारी में किसी और के साथ ऐसा होता है, तो आप भारत में आसरा वेबसाइट या वैश्विक स्तर पर बीफ्रेंडर्स वर्ल्डवाइड के ज़रिए सहयोग ले सकते हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)