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कॉलेज में छात्रों को बताए गए दहेज के 'फायदे', छिड़ा विवाद
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बेंगलुरु के एक जाने-माने कॉलेज ने अपने छात्रों को दहेज प्रथा के गुणों का बखान करने वाले नोट्स दिए हैं. इस पर सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रिया मिल रही है.
लेकिन, कॉलेज का कहना है कि वो इस मामले की जांच कर रहे हैं क्योंकि इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं है कि छात्रों को पाठ्यक्रम के बाहर का कुछ क्यों दिया गया.
सोशियोलॉजी यानी समाजशास्त्र में बीए फाइनल ईयर के छात्रों को ये नोट्स पढ़ने के लिए रेफरेंस मैटीरियल के तौर पर दिए गए हैं.
इसमें दहेज प्रथा के फायदों के बारे में लिखा है, "आम तौर पर इसे एक कुप्रथा माना जाता है लेकिन कई लोग हैं जो इसका समर्थन करते हैं. वो अपनी परंपरा के तौर पर या फिर किसी और रूप में इसे बचाना चाहते हैं. उनके अनुसार इस प्रथा के कई फायदे हैं. जिनमें से कुछ हैं...."
इन नोट्स में दहेज प्रथा के जिन फायदों के बारे में बताया गया है, वो हैं-
- 'बदसूरत' लड़कियां, हो सकता है जिनकी शादी कभी न हो उनकी शादी दहेज में काफी पैसे देने से हो जाती है.
- ऐसे अच्छे लड़के जो शादी करना नहीं चाहते, दहेज के कारण कई बार वो भी शादी के लिए राज़ी हो जाते हैं.
- दहेज में मिले सामान और पैसों से नवविवाहित जोड़ा अपना नया घर शुरू कर सकता है. ज़िंदगी की कठिन परिस्थितियों का सामना करने में ये पैसा उनकी मदद करता है. इसकी मदद से कोई नया व्यवसाय भी शुरू किया जा सकता है.
- दहेज की मदद से गरीब परिवारों के बच्चे जो पढ़ाई में अच्छे हैं वो उच्च शिक्षा के मौके तलाश सकते हैं.
- दहेज की वजह से परिवार में महिला का रुतबा बढ़ जाता है. जो महिला दहेज में बड़ी रकम या सामान लाती है उसके आर्थिक योगदान के लिए उसके साथ अच्छा बर्ताव किया जाता है. इसका असर पति के प्यार में भी दिखता है.
- कुछ लोगों का मानना है कि दहेज से समाज में परिवार की स्थिति बेहतर होती है. अगर अधिक दहेज देकर कोई परिवार अपनी बेटी की शादी 'हाई स्टेटस' वाले परिवार में कर सकता है तो वो ऐसा करने की पूरी कोशिश करता है. इससे उन्हें ही अपना 'स्टेटस' बढ़ाने में मदद मिलती है.
- दहेज के कारण परिवार में शांति और एकता बनी रहती है. कुछ लोगों को लगता है कि दहेज प्रथा को ख़त्म नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन किसी महिला को उसके पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलना चाहिए.
दहेज के फायदों की इस लिस्ट के आख़िर में लिखा है, "ऊपर दिए इन फायदों का मतलब ये नहीं कि दहेज प्रथा की सिफारिश की जा रही है."
ऋतिका रमेश नाम की एक महिला ने इन नोट्स के एक पन्ने को अपने फेसबुक पन्ने पर पोस्ट किया. उन्होंने लिखा, "भारत के इज्ज़तदार कॉलेजों में पढ़ाई का ये स्तर है. 60 लोगों की एक कक्षा में भी कोई छात्र या शिक्षक इसके विरोध में उठकर खड़ा नहीं हुआ. बेंगलुरू के शांतिनगर में सेंट जोसेफ़ कॉलेज में बीए के एक छात्र को ये नोट्स दिए गए थे."
दहेज के ये कथित फायदे जल्द ही सोशल मीडिया पर भी शेयर किए जाने लगे और इस पर विवाद छिड़ गया.
विवाद में शामिल दानिश अली सैयद के अनुसार प्रस्तावना में "उन लोगों के अनुसार" लिख कर इस बात को बताने की कोशिश की गई है, "ये दहेज के समर्थकों की मानसिकता है. और इसमें तथ्यों को बताया गया है."
इसके जवाब में एक विद्युत कृष्णकुमार ने लिखा, "अगर कोई संस्थान ऐसे पाठ का समर्थन कर रहा है तो मुझे लंबे समय तक भी बदलाव नहीं दिख रहा है. "
ऋतिका रमेश ने इसके उत्तर में लिखा, "इस तरह से तो हत्यारों, बलात्कारियों, चरमपंथियों के विचारों को भी पाठ की सामग्री में शामिल कर लिया जाना चाहिए क्योंकि उनकी नज़र में जो वो कर रहे हैं, वो सही है."
इस मामले में सेंट जोसेफ़ कॉलेज ने एक बयान जारी कर कहा है, "घटना की जांच की जा रही है और हम मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. इस तरह के विचार कॉलेज पाठ्यक्रम का हिस्सा कभी नहीं रहे. जिस तरह के विचार इस पन्ने पर हैं असल में कॉलेज और विभाग उस तरह के प्रगतिविरोधी और पितृसत्तात्मक विचारों का विरोध करते हैं."
कॉलेज के प्रवक्ता प्रोफेसर किरण जीवन ने बीबीसी को बताया, "ये पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है. कॉलेज की वेबसाइट पर रेफरेंन्स के लिए जिन 20 किताबों की लिस्ट दी गई है, ये उन्हीं में से एक किताब से लिया गया है. इस लिस्ट में दूसरे कॉलेज के एक शिक्षक की लिखी किताब 'सोशल प्रॉब्लम्स' भी शामिल है."
प्रोफेसर जीवन ने कहा, "दहेज के कारण हुई मौतों का सेक्शन पाठ्यक्रम का हिस्सा है और छात्रों को केवल उसे पढ़ना है. एक छात्र को दहेज के कारण होने वाली मौतों के सेक्शन की प्रतियां बनाने के लिए कहा गया था तो उसने सभी पन्नों की नकल निकाल लीं."
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