किसी की रहस्यमय हालात में मौत, किसी को रूस से भागना पड़ा, पुतिन के सामने नतमस्तक अरबपति

व्लादिमीर पुतिन

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इमेज कैप्शन, जिन अमीरों ने पुतिन का साथ दिया उनकी दौलत बढ़ती चली गई, लेकिन राजनीतिक असर ख़त्म हो गया (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, विताली शेवचेंको
    • पदनाम, संपादक, बीबीसी मॉनिटरिंग

यूक्रेन के साथ युद्ध के दौरान रूस में अरबपतियों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है.

लेकिन राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के 25 साल के शासन में रूस के अमीर और ताक़तवर लोग, जिन्हें ओलिगार्क कहा जाता है, लगभग पूरी तरह अपना राजनीतिक असर खो चुके हैं.

यह रूसी राष्ट्रपति के लिए अच्छी ख़बर है कि पश्चिमी देशों के प्रतिबंध अमीरों को उनका विरोधी नहीं बना पाए हैं और पुतिन की सख्ती और पुरस्कृत करने की नीति ने उन्हें खामोश समर्थक बना दिया है.

पूर्व बैंकिंग अरबपति ओलेग टिंकोव अच्छी तरह जानते हैं कि ये सख्ती कैसे काम करती है.

इंस्टाग्राम पर युद्ध को 'पागलपन' कहने वाली पोस्ट करने के अगले ही दिन उनके अधिकारियों से रूसी राष्ट्रपति भवन क्रेमलिन की तरफ से संपर्क किया गया.

उन्हें बताया गया कि अगर बैंक के संस्थापक से उन लोगों ने सारे रिश्ते नहीं तोड़े तो टिंकोफ बैंक जो उस समय रूस का दूसरा सबसे बड़ा बैंक था, को सरकारी नियंत्रण में ले लिया जाएगा.

टिंकोव ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, "मैं कीमत पर बात ही नहीं कर सकता था. यह बंधक जैसी स्थिति थी, जो दिया गया वही लेना था. मोलभाव की कोई गुंजाइश नहीं थी."

एक हफ्ते के भीतर व्लादिमीर पोटानिन से जुड़ी एक कंपनी ने बैंक ख़रीदने का एलान कर दिया. पोटानिन इस समय रूस के पांचवें सबसे अमीर कारोबारी हैं और लड़ाकू विमानों के इंजन के लिए निकेल की सप्लाई करते हैं.

टिंकोव के मुताबिक़ बैंक को उसकी असली कीमत के सिर्फ 3 फीसदी में बेचा गया.

आख़िरकार टिंकोव को अपनी क़रीब 9 अरब डॉलर की संपत्ति गंवानी पड़ी और उन्हें रूस छोड़ना पड़ा.

पुतिन से पहले अमीरों के पास थी ताक़त

जिस दिन पुतिन ने यूक्रेन पर पूरी तरह से हमला करने का आदेश दिया, उसी दिन उन्होंने बड़े कारोबारियों को क्रेमलिन में बुलाया था (फ़ाइल फ़ोटो)

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इमेज कैप्शन, जिस दिन पुतिन ने यूक्रेन पर पूरी तरह से हमला करने का आदेश दिया, उसी दिन उन्होंने बड़े कारोबारियों को क्रेमलिन में बुलाया था (फ़ाइल फ़ोटो)
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यह हालात उस दौर से बिल्कुल अलग हैं जब पुतिन राष्ट्रपति नहीं थे.

सोवियत संघ के टूटने के बाद के बरसों में कुछ रूसी लोग सरकारी कंपनियों पर कब्जा करके और शुरुआती पूंजीवाद के मौक़ों का फायदा उठाकर बेहद अमीर बन गए.

इस दौलत ने उन्हें राजनीतिक अस्थिरता के दौर में ताकत और असर दिया और वे ओलिगार्क कहलाने लगे.

रूस के सबसे ताकतवर ओलिगार्क बोरिस बेरेज़ोव्स्की ने दावा किया था कि साल 2000 में पुतिन को राष्ट्रपति बनाने में उनकी अहम भूमिका थी. बाद में उन्होंने इसके लिए माफ़ी भी मांगी.

उन्होंने साल 2012 में लिखा, "मैं उनमें भविष्य का लालची तानाशाह और सत्ता हड़पने वाले शख़्स के तौर पर नहीं देख पाया, जो आज़ादी को कुचल देंगे और रूस की प्रगति रोक देंगे."

इसकी भी संभावना है कि बेरेज़ोव्स्की ने अपनी भूमिका बढ़ा-चढ़ाकर बताई हो, लेकिन इसमें संदेह नहीं है कि उस समय ओलिगार्क सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों पर असर डाल सकते थे.

माफ़ी के एक साल बाद ही बेरेज़ोव्स्की ब्रिटेन में निर्वासन के दौरान रहस्यमय हालात में मृत पाए गए. तब तक रूसी ओलिगार्की भी तक़रीबन ख़त्म हो चुकी थी.

नहीं कर पाए युद्ध का विरोध

ओलेग टिंकोव

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इमेज कैप्शन, ओलेग टिंकोव ने अरबों डॉलर गंवा दिए और यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध की आलोचना करने के बाद रूस छोड़ दिया

इसी वजह से जब 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन पर स्पष्ट हमले का आदेश देने के कुछ घंटों बाद पुतिन ने रूस के सबसे अमीर लोगों को क्रेमलिन बुलाया, तो वे विरोध करने की हालत में नहीं थे.

हालाँकि उन्हें पता था कि उनकी दौलत को इस युद्ध से भारी नुक़सान होने वाला है.

पुतिन ने उनसे कहा, "मुझे उम्मीद है कि इन नए हालात में हम पहले की तरह मिलकर और उतनी ही प्रभावी तरीके से काम करेंगे."

बैठक में मौजूद एक रिपोर्टर ने अरबपतियों को 'पीले चेहरे वाले' और ऐसे लोगों के तौर पर बताया 'जिनकी नींद उड़ गई हो.'

हमले से पहले का समय भी अरबपतियों के लिए बुरा था और उसके तुरंत बाद का दौर भी.

फोर्ब्स पत्रिका के मुताबिक़ अप्रैल 2022 तक के एक साल में रूस में अरबपतियों की संख्या 117 से घटकर 83 रह गई. युद्ध, प्रतिबंध और कमजोर रूबल (रूसी मुद्रा) इसकी बड़ी वजह थे.

कुल मिलाकर इस दौरान उन्होंने 263 अरब डॉलर गंवाए, यानी औसतन अपनी दौलत का 27 फीसदी.

लेकिन इसके बाद के सालों में उन्हें पुतिन की वॉर इकोनॉमी का हिस्सा बनने से बड़े फायदे मिले.

युद्ध पर भारी ख़र्च से साल 2023 और 2024 में रूस की आर्थिक वृद्धि दर 4 फीसदी से ज़्यादा रही. इससे उन अमीरों को भी फायदा हुआ जो सीधे रक्षा सौदों से जुड़े हुए नहीं थे.

फोर्ब्स की वेल्थ टीम के जियाकोमो टोनिनी के मुताबिक़ साल 2024 में रूस के आधे से ज़्यादा अरबपतियों ने किसी न किसी रूप में सेना को सप्लाई की या हमले से फायदा उठाया.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "इसमें वे लोग भी नहीं हैं जो सीधे तौर पर शामिल नहीं हैं, लेकिन जिन्हें किसी न किसी रूप में क्रेमलिन से रिश्ता रखना पड़ता है. रूस में कारोबार चलाने वाले हर व्यक्ति को सरकार से संबंध रखने होते हैं."

विरोध करने पर मिली सज़ा

बोरिस बेरेज़ोव्स्की

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इमेज कैप्शन, ब्रिटेन में निर्वासित जीवन जी रहे बोरिस बेरेज़ोव्स्की की साल 2013 में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई

इस साल फोर्ब्स सूची में रूस में सबसे ज्यादा, 140 अरबपति दर्ज किए गए. उनकी कुल संपत्ति 580 अरब डॉलर रही, जो हमले से पहले के रिकॉर्ड से सिर्फ 3 अरब डॉलर कम है.

जहां एक तरफ वफादार लोगों को मुनाफ़ा कमाने दिया गया, वहीं पुतिन ने हमेशा लाइन से हटने वालों को सज़ा दी है.

रूस के लोग आज भी याद करते हैं कि तेल कारोबारी मिखाइल खोदोरकोफ़्स्की के साथ क्या हुआ था. कभी रूस के सबसे अमीर व्यक्ति रहे मिखाइल खोदोरकोफ़्स्की ने साल 2001 में लोकतंत्र समर्थक संगठन शुरू किया और इसके बाद उन्हें 10 साल जेल में रहना पड़ा.

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से लगभग सभी अमीर लोग चुप हैं. जिन्होंने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया, उन्हें देश छोड़ना पड़ा और अपनी बड़ी संपत्ति गंवानी पड़ी.

रूस के सबसे अमीर लोग पुतिन के युद्ध प्रयासों के लिए काफ़ी अहम हैं.

24 फरवरी 2022 को क्रेमलिन बुलाए गए कई कारोबारियों पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए हैं.

लेकिन अगर पश्चिम का मक़सद उन्हें ग़रीब बनाकर क्रेमलिन के ख़िलाफ़ करना था, तो वह नाकाम रहा. अरबपतियों की दौलत बनी रही और इस दौरान उनका विरोध भी नहीं दिखा.

पश्चिमी देशों के दूर जाने से स्थानीय कारोबारियों को मिला मौक़ा

रूस के सबसे अमीर आदमी और तेल कारोबारी मिखाइल खोदोरकोफ़्स्की

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इमेज कैप्शन, मिखाइल खोदोरकोफ़्स्की रूस के सबसे अमीर आदमी थे, लेकिन उन्हें जेल भेज दिया गया और उनकी तेल कंपनी युकॉस का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया

अगर किसी ने अरबों लेकर पश्चिमी देशों की तरफ भागने के बारे में सोचा भी होता, तो प्रतिबंधों ने वह रास्ता बंद कर दिया.

यूरोपीय नीति विश्लेषण केंद्र के अलेक्ज़ेंडर कोल्यांद्र कहते हैं, "पश्चिम ने हर संभव कोशिश की कि रूसी अरबपति झंडे के पीछे एकजुट हो जाएं."

वे बीबीसी से कहते हैं, "कोई योजना नहीं थी, कोई स्पष्ट रास्ता नहीं था कि वे सिस्टम छोड़ सकें. संपत्तियों पर प्रतिबंध लगे, खाते फ्रीज हुए, प्रॉपर्टी जब्त हुई. इससे पुतिन को अरबपतियों, उनकी संपत्ति और उनके पैसे को एकजुट करने में मदद मिली और उसे युद्ध में लगाया गया."

यूक्रेन पर हमले के बाद विदेशी कंपनियों के रूस से निकलने से एक खाली जगह बनी, जिसे क्रेमलिन के क़रीबी कारोबारियों ने जल्दी भर दिया. उन्हें सस्ती कीमतों पर बेहद मुनाफ़े वाली संपत्तियां ख़रीदने दी गईं.

कार्नेगी रूस यूरेशिया सेंटर की अलेक्ज़ेंड्रा प्रोकोपेंको के मुताबिक़ इससे "प्रभावशाली और सक्रिय वफ़ादारों की नई फौज" खड़ी हो गई.

वे कहती हैं, "उनका भविष्य रूस और पश्चिमी देशों के बीच टकराव जारी रहने पर टिका है और उनका सबसे बड़ा डर पुराने मालिक की वापसी है."

जियाकोमो टोनिनी के मुताबिक़ सिर्फ साल 2024 में इसी तरीके से 11 नए अरबपति रूस में उभरे.

युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद, और कुछ हद तक उन्हीं की वजह से, पुतिन ने देश के ताक़तवर लोगों पर अपनी पकड़ बनाए रखी है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.