ईसाई बने पिता के अंतिम संस्कार के लिए हाई कोर्ट पहुंचा बेटा, ऐतिहासिक फ़ैसला

सार्तिक कोर्राम अपने पिता का अंतिम संस्कार गांव में कराने के लिए हाई कोर्ट पहुंच गए थे

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    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

बस्तर के मेडिकल कॉलेज में चार दिनों तक रखने के बाद ईश्वर के शव को आख़िरकार उनके गांव की ज़मीन नसीब हुई.

छिंदबाहर गांव के रहने वाले ईश्वर के शव का उनकी पुश्तैनी ज़मीन पर अंतिम संस्कार कर दिया गया है.

बरसों पहले ईसाई धर्म अपनाने के कारण गांव के कुछ लोग और हिंदू संगठन, गांव में उनके अंतिम संस्कार का विरोध कर रहे थे.

इससे पहले अवकाश के दिन शनिवार की शाम को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मामले में ईश्वर के बेटे सार्तिक कोर्राम की याचिका की सुनवाई करते हुए ज़िले के पुलिस अधीक्षक को अंतिम संस्कार के दौरान सुरक्षा व्यवस्था मुहैया करवाने का निर्देश दिया था.

सार्तिक कोर्राम ने बीबीसी से कहा, "गांव में जब विरोध हुआ तो मैं हाई कोर्ट गया. वहां से हमें गांव में ही पिताजी को दफ़नाने की अनुमति मिली. जिसके बाद हमने अपनी पुश्तैनी ज़मीन में पिताजी को रीति रिवाज के साथ दफनाया."

असल में दरभा इलाके के छिंदबाहर गांव के रहने वाले ईश्वर की तबीयत ख़राब होने के बाद, ज़िला मुख्यालय जगदलपुर के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया था, जहां गुरुवार को उनकी मौत हो गई.

गांव में पुलिस बल की तैनाती

बस्तर में तोड़-फोड़ का निशाना बने एक चर्च की फ़ाइल फोटो

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ईश्वर के परिजनों का कहना है कि जब परिवार के लोग ईश्वर का शव ले कर गांव लौटने की तैयारी कर रहे थे, उसी समय परपा थाना के प्रभारी ने उन्हें गांव में शव ले जाने से मना किया.

परिजनों को जानकारी दी गई कि गांव का एक वर्ग नहीं चाहता कि ईसाई धर्म अपना चुके ईश्वर का अंतिम संस्कार वहां हो. गांव में तनाव की स्थिति देखते हुए पुलिस बल को भी तैनात किया गया है.

उसके बाद से ईश्वर का शव ज़िला अस्पताल के मुर्दाघर में रखा हुआ था.

ईश्वर के बेटे सार्तिक कोर्राम ने ज़िले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को भी आवेदन देकर गांव में अंतिम संस्कार करने की अनुमति देने का अनुरोध किया लेकिन इस मामले में उनकी सुनवाई नहीं हुई.

बीबीसी ने इस संबंध में पुलिस अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने इस पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

क्या कहा हाई कोर्ट ने

हाई कोर्ट के दख़ल के बाद ही गांव में अंतिम संस्कार हो सका

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शनिवार की शाम को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अवकाश के दिन, इस मामले में दायर याचिका की सुनवाई की.

हाई कोर्ट में जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की पीठ ने अपने फ़ैसले की पहली पंक्ति में रामायण के युद्ध कांड के श्लोक-"मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव, जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" का उल्लेख करते हुए कहा कि मित्र, धन, धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है. किन्तु माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है.

अदालत ने कहा, "याचिकाकर्ता के पिता का जन्म और पालन-पोषण ग्राम छिंदबाहर में हुआ था और उनका बेटा उनके शव को उसी गाँव में दफनाना चाहता था, एक उद्धरण यहाँ उद्धृत करना उपयुक्त होगा अर्थात 'माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं', इसलिए याचिकाकर्ता की इच्छाओं का प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा भी सम्मान किया जाना चाहिए."

अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा, "यह पहले से ही कानून का एक सुस्थापित सिद्धांत है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में किसी व्यक्ति को सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार का अधिकार शामिल है. जीवन का अधिकार का तात्पर्य है मानवीय गरिमा के साथ एक सार्थक जीवन, न कि केवल एक पशु का जीवन और यह अधिकार उस व्यक्ति तक भी विस्तारित है, जिसकी मृत्यु हो चुकी है. यह अधिकार किसी व्यक्ति की मृत्यु तक मौजूद रहता है, जिसमें मृत्यु तक सभ्य जीवन का अधिकार सहित, सभ्य मृत्यु संस्कार भी शामिल है."

अदालत के इस फ़ैसले के बाद रविवार को जब छिंदबाहर गांव में ईश्वर का अंतिम संस्कार किया गया तो गांव के लोगों का कहना था कि विरोध करने वाले अधिकांश लोग बाहरी थे और उन्होंने गांव के लोगों को भड़काया था.

छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के प्रदेश अध्यक्ष अरुण पन्नालाल कहते हैं, "अदालत का यह फ़ैसला ऐतिहासिक है और इस फ़ैसले ने न्यायपालिका में हमारी आस्था को और बढ़ाया है. छत्तीसगढ़ का मसीही समाज पिछले कुछ सालों से अंतिम संस्कार को लेकर जगह-जगह होने वाले विवादों से लगातार जूझ रहा था. एक तो परिवार में किसी की मृत्यु हो जाए, ऊपर से उसके अंतिम संस्कार को लेकर भी विवाद हो, यह स्थिति भयावह थी. हमें उम्मीद है कि मसीही समाज को इससे मुक्ति मिलेगी."

अंतिम संस्कार पर विवाद

गांव में पुलिस

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इमेज कैप्शन, छत्तीसगढ़ के गांवों में ईसाई परिवारों में मौत के बाद गांव में अंतिम संस्कार को लेकर विवाद के मामले सामने आते रहते हैं

हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भले ईश्वर को उनके गांव की मिट्टी नसीब हो गई लेकिन सबकी किस्मत ईश्वर जैसी नहीं होती. ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासियों के अंतिम संस्कार को लेकर होने वाले विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं.

इसी साल फरवरी में जगदलपुर से ही लगे हुए नवागुड़ा गांव के 25 साल के मज़दूर तुलसी नाग की केरल में करंट लगने से मौत हो गई. लेकिन जब तुलसी का शव गांव में लाया गया तो गांव का एक वर्ग इस बात को लेकर अड़ गया कि तुलसी और उसके परिवार ने ईसाई धर्म अपना लिया है, इसलिए उनका अंतिम संस्कार गांव में नहीं किया जा सकता.

परिजनों ने संवैधानिक अधिकारों के हनन की बात कहते हुए शव को गांव के सरपंच के घर के पास रखा तो पुलिस शव को जगदलपुर के करकापाल स्थित ईसाई समाज के कब्रिस्तान में ले आई. पुलिस का कहना था कि गांव में तनाव का वातावरण है, ऐसे में तुलसी नाग के शव का अंतिम संस्कार गांव में नहीं किया जा सकता. पांच दिनों तक शव यूं ही पड़ा रहा.

अंततः तुलसी नाग का अंतिम संस्कार उनके गांव में नहीं हो सका.

बस्तर, नारायणपुर, कांकेर, कोंडागांव, दंतेवाड़ा समेत कई ज़िलों में ऐसी घटनाएं लगातार सामने आईं, जब शवों के अंतिम संस्कार को लेकर विवाद की स्थिति बनी और तनाव के बाद शवों को कहीं और ले कर दफ़नाया पड़ा.

कुछ मामले तो ऐसे भी सामने आए, जब दफ़नाए गए शवों को भी कब्र से निकाल कर बाहर कर दिया गया.

बस्तर पांचवीं अनुसूची का क्षेत्र है, जहां पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया यानी पेसा क़ानून लागू है. यहां ग्राम सभा की सहमति के बिना न फैक्ट्री लगाई जा सकती है और ना ही कोई प्रार्थना भवन बनाया जा सकता है. यहां तक कि कोई आयोजन भी नहीं किया जा सकता.

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यही कारण है कि कोयलीबेड़ा जैसे कई पंचायतों में तो बाक़ायदा ग्राम सभा से यह प्रस्ताव पारित किया जा चुका है कि ईसाई बने लोगों का, किसी भी हालत में गांव में अंतिम संस्कार नहीं करने दिया जाएगा. हालांकि राज्य के जो इलाके पांचवी अनुसूची में नहीं आते, वहां भी ऐसे विरोध-प्रदर्शन होते रहते हैं.

सर्व आदिवासी समाज के संरक्षक और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम कहते हैं, "बस्तर में आदिवासियों को कहीं हिंदू बनाया जा रहा है तो कहीं उन्हें ईसाई बनाया जा रहा है. इसलिए वहां टकराव के हालत बन रहे हैं. आदिवासी अपनी संस्कृति से कट रहा है और इन धार्मिक मान्यताओं के जाल में उलझ रहा है. आदिवासियों की मान्यताओं और उनकी परंपराओं का ध्यान रखा ही जाना चाहिए."

लेकिन हाई कोर्ट के अधिवक्ता पंकज शर्मा का कहना है कि संविधान अपनी धार्मिक स्वतंत्रता के लिए, किसी दूसरे की धार्मिक स्वतंत्रता के हनन का अधिकार नहीं देता है.

पंकज शर्मा कहते हैं, "गांवों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो रहा है. जिन आदिवासियों ने अपनी मर्जी से ईसाई धर्म अपना लिया, उन्हें अंतिम संस्कार के लिए गांव में जगह नहीं देने का यह तरीका, असल में दबाव बनाने की राजनीति का हिस्सा है, जिससे वे परेशान हो कर ईसाई धर्म का त्याग कर दें."

हालांकि हाई कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले के बाद ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासियों को उम्मीद है कि कम से कम अंतिम संस्कार को लेकर होने वाले विवादों से उन्हें राहत मिलेगी. लेकिन धरातल पर यह फ़ैसला पूरी तरह लागू होगा या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा.

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