'पुलिस ने माओवादी बताया, माओवादियों ने मुख़बिर' मुकेश चंद्राकर की हत्या के बाद बस्तर में काम करने की चुनौतियों पर क्या बोले पत्रकार

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत में माओवादियों और सुरक्षाबलों की लड़ाई का केंद्र बन चुके बस्तर में पत्रकारों को केवल इन दो मोर्चों पर ही नहीं जूझना पड़ता.
इन पत्रकारों के हिस्से चौतरफ़ा मोर्चे हैं और कई बार इसकी क़ीमत जान दे कर चुकानी होती है. स्वतंत्र पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या इसका ताज़ा उदाहरण है.
मुकेश चंद्राकर की हत्या के छठवें दिन, मुख्य आरोपी और ठेकेदार सुरेश चंद्रकार को पुलिस ने हैदराबाद से गिरफ़्तार करने का दावा किया है.
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा है कि 'किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और जल्द से जल्द जांच पूरी की जाएगी.'

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बस्तर में पत्रकारिता के लिए क्या हैं चुनौतियां

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मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जब बस्तर में पत्रकारिता की चुनौतियों का ज़िक्र करते हैं, तो मुकेश चंद्राकर से जुड़े कई प्रसंग याद आ जाते हैं.
मुकेश चंद्राकर की हत्या से ठीक एक साल पहले, 1 जनवरी 2024 को माओवादियों के मध्य रीजन ब्यूरो के प्रवक्ता प्रताप द्वारा मुकेश चंद्राकर के नाम पर जारी एक चिट्ठी मेरे सामने है.
इसमें माओवादी प्रवक्ता ने मुकेश चंद्राकर को पुलिस और सरकार का दलाल घोषित करते हुए उन्हें धमकाया था.
इस चिट्ठी से कोई 10 दिन पहले, बीजापुर के ही मुर्कीनार इलाके में मुकेश चंद्राकर समेत पांच पत्रकारों पर सीआरपीएफ के जवानों ने बंदूक तान दी और उन्हें मारने की धमकी दी थी. मुकेश ने इस पर भी रिपोर्ट बनाई थी.
इस चिट्ठी और सीआरपीएक जवानों के बंदूक तानने की घटना के महज दो महीने पहले बीजापुर के अनुविभागीय दंडाधिकारी यानी एसडीएम ने मुकेश चंद्राकर समेत चार पत्रकारों को नोटिस जारी किया था.
नोटिस में 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया था कि उन्होंने माओवादियों की हिंसा से जुड़ी ख़बरें क्यों प्रसारित की? क्योंकि एसडीएम का दावा था कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं थी.
पिछले ही साल अप्रैल के महीने में, बीजापुर में कांग्रेस पार्टी के ज़िला अध्यक्ष लालू राठौर ने मुकेश चंद्राकर समेत चार पत्रकारों के बहिष्कार की चिट्ठी जारी की थी.
कांग्रेस अध्यक्ष का आरोप था कि एक राजनीतिक दल विशेष को लाभ पहुंचाने की नीयत से बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी के ख़िलाफ़ दुर्भावनापूर्ण, अनर्गल और बिना तथ्यों के लगातार ख़बरों का प्रकाशन और प्रसारण हो रहा था. ताकि विधायक विक्रम मंडावी की लोकप्रिय छवि ख़राब हो."
माओवादी, सरकारी तंत्र और राजनीतिक दलों से परे मुकेश की हत्या उन ठेकेदारों ने की, जो मुकेश चंद्राकर के रिश्तेदार भी थे और जिनके साथ मुकेश चंद्राकर का हर दिन का उठना-बैठना था.
दक्षिण बस्तर के एक छोटे-से गांव गुमियापाल में रहने वाले आदिवासी पत्रकार मंगल कुंजाम मानते हैं कि मुकेश चंद्राकर की हत्या ने दूसरे पत्रकारों के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी है.
ऑस्कर के लिए नामित 'न्यूटन' फिल्म में पत्रकार की भूमिका निभाने वाले मंगल कुंजाम ने बीबीसी से कहा, "धमकियां पहले भी मिलती रही हैं. पिछले कुछ समय से एक स्पॉन्ज आयरन से जुड़े लोग मुझे मैनेज करने के लिए जगह-जगह बातें कर रहे हैं. लेकिन मुकेश चंद्राकर की हत्या के बाद कहीं न कहीं, मुझे अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी है."
पुलिस ने माओवादी बताया, माओवादियों ने मुखबिर

इस बात को दस साल से अधिक हो चुके हैं लेकिन बीजापुर ज़िले के ही पत्रकार साईं रेड्डी की हत्या की घटना पुराने लोगों को अब भी याद है.
बांसागुड़ा के रहने वाले पत्रकार साईं रेड्डी को मार्च 2008 में पुलिस ने माओवादी बता कर बहुचर्चित 'छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा क़ानून' में जेल भेज दिया था.
रेड्डी पर आरोप था कि उनकी पत्नी की राशन दुकान से माओवादियों ने राशन लिया था.
बाद में रेड्डी किसी तरह रिहा हुए. लेकिन माओवादी होने के आरोप में कई महीनों तक जेल में रह कर आ चुके साईं रेड्डी को माओवादी पुलिस का आदमी बताते रहे.
यहां तक कि माओवादियों ने उनके घर को बम से उड़ा दिया था. रेड्डी और उनके परिवार को भाग कर पड़ोसी ज़िले आंध्रप्रदेश के चेरलापाल में रहने के लिए मज़बूर होना पड़ा था.
इतना सब होने के बाद भी पुलिस उन्हें लगातार माओवादी बताती रही.
इसके बाद 6 दिसबंर 2013 को बीजापुर के बांसागुड़ा के एक बाज़ार में भरी दोपहर, संदिग्ध माओवादियों ने 50 साल के साईं रेड्डी को मार डाला.
माओवादियों ने आरोप लगाया था कि साईं रेड्डी पुलिस के मुख़बिर के तौर पर काम कर रहे थे, इसलिए उनकी हत्या कर दी गई.
बस्तर के ही सुकमा के पत्रकार नेमीचंद जैन का किस्सा इससे अलग नहीं है.
12 फरवरी 2013 को माओवादियों ने नेमीचंद जैन की हत्या कर दी. 45 साल के नेमीचंद जैन के शव के पास माओवादियों ने एक पर्चा छोड़ा था.
उनपर आरोप था कि नेमीचंद जैन पुलिस के लिए जासूसी का काम करते थे, इसलिए उनकी हत्या कर दी गई.

नेमीचंद जैन हत्याकांड का जब पत्रकारों ने व्यापक विरोध किया तो माओवादियों ने एक बयान जारी कर कहा कि यह हत्या उन्होंने नहीं की है.
इसके बाद भी पत्रकारों का विरोध जारी रहा. पूरे बस्तर के पत्रकारों ने माओवादियों से जुड़ी ख़बरों का तब तक बहिष्कार करने का फ़ैसला लिया, जब तक कि माओवादी इस हत्या के लिए माफ़ी नहीं मांगते और अपने दोषी सहयोगियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करते.
आख़िरकार नेमीचंद जैन की हत्या के 45 दिन बाद जाकर माओवादियों ने अपनी गलती स्वीकारी.
उन्होंने बीजापुर के जंगल में पत्रकारों से बातचीत में माफ़ी मांगी और माना कि उनके संघम सदस्यों यानी निचले कैडर ने नेमीचंद जैन की हत्या की थी और शीर्ष नेतृत्व इस मामले में फ़ैसला कर दोषियों को दंडित करेगा.
बीजापुर के पत्रकार ने कहा, "संकट ये है कि हम पत्रकार किसी के साथ नहीं हैं. लेकिन हम पर चारों तरफ़ से निशाना साधा जाता है. किसी के ख़िलाफ़ लिख दें तो हमें दुश्मन खेमे का बता देना, उनके लिए सबसे आसान होता है. इससे भी आसान होता है हमें ब्लैकमेलर बता देना. ये पूछने का मन होता है कि रायपुर या दिल्ली के कितने पत्रकार अपनी छाती पर हाथ धर कर कह सकते हैं कि वे या उनके दूसरे पत्रकार साथी पाक साफ हैं? "
'न वेतन, न सुरक्षा'

छत्तीसगढ़ में बस्तर से लेकर सरगुजा संभाग तक, ग्रामीण इलाक़ों में काम करने वाले अधिकांश पत्रकारों को अख़बार या टीवी चैनल न तो कोई नियुक्ति पत्र देते हैं और न ही उन्हें काम के बदले कोई निश्चित वेतन मिलता है.
अख़बार या चैनल में प्रकाशित, प्रसारित होने वाले विज्ञापनों का एक छोटा हिस्सा ही उनकी आमदनी का अकेला स्रोत होता है.
ऐसे में अगर कोई घटना हो जाए तो आम तौर पर मीडिया घराने पल्ला झाड़ लेते हैं. फिर चाहे बस्तर में दरभा के पत्रकार संतोष यादव हों, सोमारु नाग या गीदम के पत्रकार प्रभात सिंह.
जब इन पत्रकारों को माओवादी समर्थक बता कर गिरफ़्तार किया गया तो जिन संस्थानों के लिए ये काम करते थे, उन्होंने ही सबसे पहले इनसे पल्ला झाड़ा.
हालांकि बाद में इन पत्रकारों को अदालत से सभी मामलों में बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया. लेकिन जेल और मुक़दमों में खुद और परिवार ने जो प्रताड़ना झेली, उसकी भरपाई संभव नहीं है.

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दंतेवाड़ा के एक पत्रकार कहते हैं, "कस्बाई रिपोर्टर के रिपोर्ट की तारीफ़ संपादक भी करेंगे. लेकिन आप जैसे ही मानदेय की बात करेंगे तो उनके मुंह का जायका बिगड़ जाता है. ऐसे में बस्तर के पत्रकारों की मज़बूरी है कि वो पत्रकारिता के अलावा भी आर्थिक सुरक्षा के लिए दूसरे काम करते हैं. लेकिन पत्रकारिता की आड़ में जब काम शुरु होता है या वसूली होती है तो संकट गहरा जाता है."
रायपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रफुल्ल ठाकुर कहते हैं कि पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर 'हम सब चिंतित हैं.' लेकिन पत्रकार सुरक्षा क़ानून, फ़ाइलों से बाहर धरातल पर निकल ही नहीं पाता.
वह कहते हैं कि इस सुरक्षा क़ानून से कोई चमत्कारिक बदलाव नहीं आएगा लेकिन कम से कम पत्रकारों को बेहतरी की उम्मीद तो रहेगी.
प्रफुल्ल ठाकुर कहते हैं, "किसी पत्रकार के नाम-पते के उल्लेख के साथ चिट्ठी या किसी माओवादी साहित्य की बरामदगी, पुलिस के लिए बहुत आसान है. ऐसी चिट्ठियां और साहित्य, पुलिस के पास पर्याप्त मात्रा में होती हैं."
प्रफुल्ल के अनुसार, "कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल में क़ानून बनाया भी लेकिन प्रस्तावित क़ानून के सारे प्रावधान बदल दिए गए."

हालांकि विधानसभा अध्यक्ष और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने संभावना जताई है कि इस बजट सत्र में पत्रकार सुरक्षा क़ानून को विधानसभा में पेश किया जा सकता है.
राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बीबीसी से कहा, "पत्रकार सुरक्षा कानून की विसंगतियां ध्यान में आयी हैं. उसे जिस नीयत से लागू किया जाना था, वैसा नहीं हो पाया है. संवैधानिक प्रावधानों की मर्यादा में जिस तरह का भी सुधार अपेक्षित हो, उसे करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है. इस संबंध में सभी हितधारकों से विचार विमर्श कर कानून को प्रभावी बनाया जाएगा."
ज़ाहिर है, तब तक तो बस्तर और छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के हिस्से चुनौतियां ही चुनौतियां हैं, ख़ास तौर पर ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले पत्रकारों को तो अभी इन चुनौतियों का सामना अकेले ही करना होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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