विदेशी ताक़तें कैसे खोज रही हैं सीरिया में दख़ल करने के रास्ते

    • Author, जेरेमी हॉवेल
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

बीते 13 सालों के गृह युद्ध के बाद अब देश को एकजुट करने के लिए सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-श'रा अपनी सरकार के नियंत्रण को स्थापित करने की कोशिश में लगे हुए हैं.

इस बीच, उन्हें तुर्की जैसे देशों से आने वाले राजनीतिक दबाव का भी सामना करना होगा. दबाव अमेरिकी की तरफ़ से भी होगा जो इस क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है.

दिसंबर 2024 में इस्लामी हथियारबंद ग्रुप हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) और उसके सहयोगियों ने सीरिया की राजधानी दमिश्क पर कब्ज़ा कर लिया था और पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद को रूस भागना पड़ा था.

इसके बाद एचटीएस के नेता अहमद अल-श'रा अंतरिम राष्ट्रपति बन गए. हालांकि, अभी तक एचटीएस का पूरे देश पर शासन स्थापित नहीं हो पाया है.

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वॉशिंगटन आधारित थिंक टैंक मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट से जुड़े डॉ. पॉल सालेम ने कहा, "एचटीएस के नियंत्रण में सीरिया के पश्चिम की एक पट्टी है, इदलिब से दमिश्क तक."

"देश का एक बड़ा हिस्सा है जो अंतरिम सरकार के नियंत्रण में नहीं है."

सीरिया में तुर्की के 10,000 सैनिक हैं, हालांकि इसमें अधिकांश संख्या दोनों देशों की सीमाओं के बीच तैनात है.

देश के उत्तरी हिस्से में सक्रिय मिलिशिया ग्रुपों को तुर्की हथियार, सैन्य मदद और राजनीतिक समर्थन भी देता है.

इन मिलिशिया ग्रुपों में से अधिकांश सीरियन नेशनल आर्मी (एसएनए) के बैनर तले सक्रिय हैं. जब असद सत्ता में थे तो ये मिलिशिया ग्रुप उनका विरोध करते थे.

कुछ अनुमानों के अनुसार, एसएनए के 70 हज़ार से 90 हज़ार लड़ाके हैं.

सीरिया में अमेरिका के 900 सैनिक हैं और उसका कुर्द लोगों की अगुवाई वाले सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेस (एसडीएफ़) को समर्थन है. इस ग्रुप का अधिकांश नियंत्रण देश के उत्तर-पूर्व और पूर्वी हिस्से में है. इन ग्रुपों में कुर्दिश नीत पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स (वाईपीजी) भी शामिल है.

कुछ अनुमानों के अनुसार, देश में एसडीएफ़ के लड़ाकों की संख्या 40 हज़ार से 60 हज़ार के बीच है, जबकि वाईपीजी में 20 हज़ार से 30 हज़ार लड़ाके हैं.

दक्षिणी सीरिया में बड़ी संख्या में द्रूज़ आबादी रहती है और इस इलाक़े में साउदर्न फ़्रंट और साउदर्न ऑपरेशंस रूम जैसे मिलिशिया ग्रुप भी हैं.

हालांकि डॉ सालेम का कहना है, "लगभग सभी द्रूज़ गांव वालों ने एचटीएस का शासन स्वीकार कर लिया है."

सीरिया में तुर्की क्या चाहता है?

जब इदलिब पर एचटीएस का शासन था तो तुर्की उस इलाक़े को मदद करता था जैसे बिजली और टेलीकॉम जैसी सेवाओं मुहैया कराकर.

जब दमिश्क पर एचटीएस ने नियंत्रण स्थापित किया तो तुर्की पहला देश था जिसने अपने प्रतिनिधि भेजे थे. इनमें तुर्की के इंटेलिजेंस चीफ़ इब्राहिम कालिन भी थे.

ब्रसेल्स के एक थिंक टैंक इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के डॉ. नानार हावाश के अनुसार, सीरिया में तुर्की के दो मक़सद हैं.

उन्होंने कहा, "वह चाहता है कि सीरिया में पर्याप्त स्थिरता आए ताकि तुर्की में रह रहे 30 लाख सीरियाई शरणार्थियों की घर वापसी संभव हो सके."

उनके अनुसार, "वह अपनी सीमा से सटे इलाक़ों से कुर्दिश हथियारबंद ग्रुपों को सीरिया के अंदर धकेलना चाहता है, क्योंकि उसका मानना है कि वे उसके विरोधी पीकेके (कुर्दिश वर्कर्स पार्टी) की मदद करते हैं."

लेकिन डॉ. सालेम का कहना है, "तुर्की चाहता है कि सीरिया एसडीएफ़ के सभी लड़ाकों को एक नियमित सेना में एकीकृत किया जाए और कुर्द लोगों की एक स्वायत्त क्षेत्र की मांग को ख़ारिज़ कर दे. श'रा का भी यही मक़सद है."

सीरिया में अमेरिका क्या चाहता है?

सीरिया में अमेरिका का प्राथमिक उद्देश्य रहा है जिहादी हथियारबंद संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) को दबाना.

अमेरिका ने सीरिया में 2014 में जंग लड़ी और वॉशिंगटन आईएस का विरोध करने वाले कुर्दिश हथियारबंद संगठनों का समर्थन करता है.

अमेरिका के समर्थन का एक कारण तो यह है कि कुर्दिश मलिशिया उत्तर-पूर्वी सीरिया में मौजूद उन जेलों की रक्षा करते हैं, जिनमें आईएस का सदस्य होने के आरोप में हज़ारों लोगों को क़ैद किया गया है.

डॉ. हावाश ने कहा, "ये बहुत अनुभवी और विचारधारा के पक्के लड़ाके हैं, जिन्हें अगर रिहा किया गया तो वे सीरिया को अस्थिर बना सकते हैं."

जब असद सत्ता में थे तो अमेरिका ने उनकी सरकार द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन किए जाने को लेकर सीरिया पर बहुत कड़े प्रतिबंध लगाए थे. ये प्रतिबंध अभी भी जारी हैं.

उन्होंने कहा, "सीरिया से सबसे ज़्यादा अमेरिका जो चीज़ चाहता है वो यह कि प्रतिबंध हटाए जाएं, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय देश में निवेश करना शुरू करे."

सीरिया में अरब के खाड़ी देश क्या चाहते हैं?

अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर श'रा ने अपनी पहली विदेशी यात्रा के लिए सऊदी अरब को चुना था.

लंदन स्थित थिंक टैंक रॉयल यूनाइटेड सर्विसेस इंस्टीट्यूट के डॉ. एचए हेलयेर ने कहा, "सऊदी अरब और अमीरात जैसे खाड़ी के देश श'रा और एचटीएस को संदेह से देखते हैं क्योंकि उनका अतीत जिहादी वाला रहा है."

उन्होंने कहा, "हालांकि वे इस मामले में स्पष्ट हैं कि सीरिया का पुनर्निर्माण होना चाहिए. वे चाहते हैं कि सीरिया को अरब इलाक़े में शामिल किया जाए और यह ईरान का प्रॉक्सी न रह जाए."

डॉ. सालेम ने जोड़ा, "गृह युद्ध के बाद तुर्की ने सीरिया के नए सिरे से निर्माण के लिए मदद की पेशकश की थी, लेकिन पैसा तो खाड़ी के देशों के पास सबसे अधिक है."

सारिया से रूस क्या चाहता है?

रूस ने 2015 में असद की सरकार का समर्थन किया था और इसके बदले उसे सीरिया में उसे सैन्य अड्डा बनाने की इजाज़त मिली.

तार्तूस में नौसैनिक अड्डे ने रूस को भूमध्यसागर में उसकी मौजूदगी सुनिश्चित की. इसके अलावा सीरिया के मेइमिम में रूसी वायुसैनिक अड्डा 'अफ़्रीका कोर' के संचालन के लिए एक लॉंचिंग पैड जैसा है.

रूस की 'अफ़्रीका कोर' कई अफ़्रीकी देशों में सुरक्षा सेवाएं मुहैया करवाती है.

रूस ने सीरिया से अपने रणनीतिक सैन्य उपकरणों को हटा दिया है, जैसे कि युद्ध पोत और विमान. अब वह एचटीएस के साथ वार्ता कर रहा है कि भविष्य में इन सैन्य अड्डों का कैसे इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है.

डॉ. हावाश के अनुसार, "रूस को नाराज़ करना सीरिया के बस की बात नहीं है. वरना, इससे समस्या पैदा हो सकती है."

क्या सीरिया में दूसरे मुल्क समस्या पैदा कर सकते हैं?

डॉ. सालेम कहते हैं, "श'रा के पक्ष में सबसे अच्छी बात है कि अधिकांश मुल्क चाहते हैं कि सीरिया में स्थिरता आए और देश में मौजूदा अधिकांश ग्रुप अंतरिम सरकार का समर्थन करते हैं."

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर ग्रुप श'रा के साथ हो.

अमेरिका के थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ वॉर के अनुसार अलेप्पो प्रांत के पूर्वी हिस्से में तुर्की के समर्थन वाले एसएनए ग्रुप का कुर्द नेतृत्व वाले एसडीएफ़ ग्रुप से संघर्ष है.

डॉ. सालेम कहना है कि जोख़िम ये है कि एसडीएफ़ खुद को भंग करने से मना करता है तो तुर्की एसएनए को अपने हमले को बढ़ाने को कह सकता है.

उन्होंने कहा, "हालांकि यह तुर्की का पहला विकल्प नहीं होगा, लेकिन यह उसके कई विकल्पों में से एक है."

डॉ. हावाश ने कहा, "अभी तक, कुर्दों के साथ तुर्की के विवाद को और आगे बढ़ने से अमेरिका रोक रहा है."

हालांकि अभी तक कोई नहीं जानता कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सीरिया में अमेरिकी मौजूदगी को जारी रखना चाहेंगे या नहीं.

पिछले साल दिसंबर में उन्होंने कहा था कि "वहां की लड़ाई हमारी लड़ाई नहीं है."

इसराइल और ईरान के क्या हित हैं?

सीरिया में इसराइल की भी सैन्य मौजूदगी है.

असद सरकार के पतन के कुछ ही दिनों बाद इसराइल ने सीरिया के गोलान हाइट्स में सीमा से आगे भी अपनी सेना को तैनात किया है और उस बफ़र ज़ोन पर कब्ज़ा कर लिया है जो सीरियाई और इसराइली सेना को अलग करती है.

इसने अपनी सेना को बफ़र ज़ोन से आगे भी बढ़ा दिया है और सीरियाई सेना के अड्डों पर 500 से अधिक हवाई हमले किए और उनके बहुत सारे उपकरणों को नष्ट कर दिया.

इसके अलावा सारिया में ईरान की दख़लंदाज़ी की भी आशंका है.

1979 में हुई इस्लामी क्रांति के बाद से ही ईरान सीरिया का सहयोगी रहा है और माना जाता है कि गृह युद्ध के दौरान उसने असद की सरकार बचाने में मदद की.

डॉ. सालेम ने कहा, "असद सरकार का पतन ईरान के लिए बड़ा झटका रहा है, क्योंकि उसने अपने सहयोगी हिज़्बुल्लाह को हथियार पहुंचाने के लिए सीरिया का इस्तेमाल किया है."

उन्होंने कहा, "मौजूदा समय में सीरिया में ईरान अपने प्रभाव को फिर से हासिल नहीं कर सकता, लेकिन अगर अंतरिक सरकार विफल होती है और सीरिया में मौजूद अलग अलग गुट एक दूसरे से लड़ना शुरू कर देते हैं, तो ईरान के लिए अवसर है. वो किसी न किसी ग्रुप का समर्थन करके दोबारा सीरिया में प्रवेश कर सकता है."

डॉ सालेम कहते हैं कि ईरान अक्सर ऐसे मौक़ों की तलाश में रहता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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