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एक किलो चावल उगाने में इतना पानी होता है ख़र्च
- Author, फ़ूड चेन शो
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
चावल सिर्फ़ आहार नहीं है.
दुनिया की आधी आबादी के लिए यह न सिर्फ़ रोज़ाना के भोजन का हिस्सा है, बल्कि संस्कृति, परंपरा और आर्थिक जीवन का भी प्रतीक है.
फिलीपींस की राजधानी मनीला से बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की एक श्रोता एड्रिएन बियांका विलानुएवा कहती हैं, "चावल हमारे यहाँ के व्यंजनों की धड़कन है.
इसकी अहमियत मुख्य भोजन से कहीं ज़्यादा है. यह हमारी संस्कृति की बुनियाद है."
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वे बताती हैं, "फिलीपींस के अधिकतर लोग दिन में तीन बार चावल खाते हैं — नाश्ते, दोपहर के खाने और रात के खाने में. यहां तक कि मिठाई यानी डेज़र्ट में भी चावल शामिल होता है. मुझे स्टिकी राइस पसंद है, क्योंकि ये हमारी हर पारंपरिक मिठाई में यह होता है."
लेकिन अब जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ रहा है.
और इसके साथ यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या हमें चावल का खाना कम कर देना चाहिए?
संयुक्त राष्ट्र फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन के अनुसार, खाने योग्य वनस्पतियों की संख्या 50,000 से अधिक है, हालांकि दुनिया की भोजन की 90 प्रतिशत ज़रूरतें महज 15 फसलों से ही पूरी हो जाती हैं. चावल, गेहूं और मक्का इनमें सबसे प्रमुख फसलें हैं.
अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) की महानिदेशक डॉ. इवान पिंटो का कहना है, "दुनिया की कुल आबादी में 50 से 56 प्रतिशत हिस्सा, मुख्य भोजन के लिए चावल पर निर्भर है."
इसका मतलब है कि लगभग चार अरब लोग अपने मुख्य भोजन के रूप में रोज़ाना चावल खाते हैं.
दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में बड़े पैमाने पर चावल उगाया जाता है.
जबकि अफ़्रीका में भी इसकी मांग बढ़ रही है और इसकी कुछ किस्में तो यूरोप और दक्षिण अमेरिका में भी उगाई जाती हैं.
लेकिन वैश्विक खुराक में चावल की अधिकता की एक क़ीमत भी है.
स्पेन की बहुराष्ट्रीय कंपनी एब्रो फूड्स के स्वामित्व वाली ब्रिटेन स्थित चावल कंपनी टिल्डा के प्रबंध निदेशक जीन-फिलिप लाबोर्दे बताते हैं, "धान के पौधे को बहुत अधिक पानी की ज़रूरत होती है."
वे कहते हैं, "एक किलो चावल उगाने में लगभग 3,000 से 5,000 लीटर पानी लगता है. ये बहुत ज़्यादा है."
अधिकतर धान की फसल बाढ़ग्रस्त इलाकों में होती है, खासकर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में. यह तरीका धान की खेती के लिए अनुकूल माना जाता है, लेकिन इससे कम ऑक्सीजन वाला वातावरण बनता है, जिसे एनारोबिक कंडीशन कहा जाता है.
डॉ. इवान पिंटो के अनुसार, "जब खेतों में पानी भर जाता है, तो वहां मौजूद सूक्ष्म जीवाणु बड़ी मात्रा में मीथेन गैस पैदा करते हैं."
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक, मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो कुल वैश्विक तापमान वृद्धि में लगभग 30 प्रतिशत के लिए ज़िम्मेदार है.
आईआरआरआई (इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट) का अनुमान है कि वैश्विक कृषि क्षेत्र से होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में चावल उत्पादन का हिस्सा लगभग 10 प्रतिशत है.
टिल्डा कम पानी में धान उगाने की एक नई तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रही है, जिसे 'अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग' (एडब्ल्यूडी) कहा जाता है.
इस तकनीक में खेत की सतह से 15 सेंटीमीटर नीचे एक पाइप लगाई जाती है. पूरे खेत में लगातार पानी भरने के बजाय किसान तब सिंचाई करते हैं जब पाइप के अंदर का पानी पूरी तरह सूख जाता है.
टिल्डा के प्रबंध निदेशक जीन-फिलिप लाबोर्दे बताते हैं, "आमतौर पर एक फसल चक्र के दौरान 25 बार पानी देना होता है, लेकिन एडब्ल्यूडी तकनीक से इसे घटाकर 20 बार किया जा सकता है. पांच बार की सिंचाई बचाकर न सिर्फ पानी की बचत होती है, बल्कि मीथेन उत्सर्जन में भी कमी आती है."
साल 2024 में टिल्डा ने इस तकनीक का प्रयोग 50 से बढ़ाकर 1,268 किसानों के साथ किया. नतीजे काफी उत्साहजनक रहे.
लाबोर्दे कहते हैं, "हमने 27% पानी, 28% बिजली और 25% उर्वरक की खपत घटाई. इसके बावजूद फसल उत्पादन में 7% की बढ़त दर्ज की गई."
वे यह भी जोड़ते हैं, "यह सिर्फ ज़्यादा निवेश से ज़्यादा मुनाफ़ा नहीं है, बल्कि कम लागत में ज़्यादा कमाई का तरीका है."
लाबोर्दे के अनुसार, मीथेन उत्सर्जन में भी 45% की कमी देखी गई है. उनका मानना है कि यदि सिंचाई की ज़रूरत को और कम किया जा सके, तो मीथेन उत्सर्जन में 70% तक कटौती संभव है.
हालांकि चावल ने अरबों लोगों को भोजन उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभाई है, ख़ासतौर पर हरित क्रांति के दौर में विकसित की गई आईआर-8 जैसी अधिक उपजाऊ किस्मों के ज़रिए. लेकिन अब जलवायु परिवर्तन इसके उत्पादन के लिए बड़ा ख़तरा बनता जा रहा है.
इसकी मुख्य वजह यह है कि जिन इलाकों में ये किस्में उगाई जाती हैं, वहां गर्मी, सूखा, भारी बारिश और बाढ़ की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं.
भारत में 2024 के धान सीज़न के दौरान तापमान 53 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था, जबकि बांग्लादेश में बार-बार और बड़े पैमाने पर आने वाली बाढ़ फसलों को गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं.
इस चुनौती से निपटने के लिए आईआरआरआई (इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट) अपने जीन बैंक में संरक्षित 1,32,000 धान किस्मों का विश्लेषण कर रहा है, ताकि समाधान तलाशा जा सके.
एक महत्वपूर्ण उपलब्धि में वैज्ञानिकों को एक ऐसा जीन मिला है जो पौधे को पानी के भीतर 21 दिन तक जीवित रख सकता है.
डॉ. पिंटो बताती हैं, "ये किस्में बाढ़ की स्थिति में पौधों को लंबे समय तक बचाए रख सकती हैं और उपज पर भी असर नहीं पड़ता."
उनका कहना है कि बांग्लादेश के बाढ़-प्रभावित इलाकों में ऐसी किस्में लोकप्रिय होती जा रही हैं.
कुछ देशों ने अपने यहां चावल की खपत कम करने की कोशिश की है.
बांग्लादेश में करीब 15 साल पहले जब चावल की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं, तो सरकार ने आलू को विकल्प के रूप में बढ़ावा देने के लिए एक अभियान चलाया.
ढाका में रहने वाले शरीफ़ शबीर याद करते हुए कहते हैं, "हमें आलू पसंद है... लेकिन मैं चावल की जगह पूरे खाने में सिर्फ आलू खाने की कल्पना नहीं कर सकता."
चीन ने भी 2015 में इसी तरह का अभियान शुरू किया और आलू को पोषक तत्वों से भरपूर 'सुपरफ़ूड' के रूप में प्रमोट किया. दरअसल, 1990 के दशक में चीन दुनिया का अग्रणी आलू उत्पादक बन चुका था, और देश के कई हिस्सों में लोग आलू को मुख्य भोजन के रूप में अपनाने लगे थे. हालांकि, यह अभियान सफल नहीं हो सका.
लंदन के एसओएएस विश्वविद्यालय में मानवविज्ञानी जैकब क्लेन बताते हैं, "दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पश्चिम चीन में आलू को कभी-कभी मुख्य भोजन के रूप में खाया जाता है."
लेकिन वे जोड़ते हैं, "कई इलाकों में आलू को ग़रीबी से जोड़ा जाता है."
क्लेन के अनुसार, "चीन के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों के कई लोगों ने मुझे बताया कि उन्होंने आलू खाते हुए बचपन बिताया है. दरअसल, आलू खाने के साथ एक तरह का सामाजिक अपमान जुड़ा हुआ है."
वैश्विक स्तर पर, चावल आम लोगों की ज़िंदगी का गहरे तौर पर हिस्सा है. यह स्वादिष्ट है, बनाने में आसान है और इसे आसानी से रखा जा सकता है और लाया ले जाया जा सकता है.
अनुमान है कि पूरी दुनिया में हर साल लगभग 52 करोड़ टन चावल खाया जाता है.
फिलीपींस की एड्रियान बियांका विलानुएवा स्वीकार करती हैं कि वो चावल खाना कम तो कर सकती हैं लेकिन छोड़ नहीं सकतीं.
वो कहती हैं, "अगर मैं चावल न भी खाना चाहूं तो भी, जब मैं किसी दूसरे के घर या पार्टी में जाती हूं, वे चावल के पकवान ही पेश करते हैं."
"मुझे लगता है कि मैं चावल खाना कम करूंगी, लेकिन इसे पूरी तरह छोड़ना मुश्किल है, क्योंकि यह हमारी रोज़ाना की ज़िंदगी का अहम हिस्सा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित