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'सफ़ेद सोना' कहे जाने वाले लीथियम के लिए चीन के इस कदम से दुनिया भर में बढ़ रहा है तनाव
- Author, ग्लोबल चाइना यूनिट
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
कुछ महीने पहले आई किंग उत्तरी अर्जेंटीना की अपनी डॉरमेट्री में सो रही थीं कि अचानक आधी रात के वक़्त तेज़ आवाज़ वाले नारों से उनकी आंख खुल गई.
जब उन्होंने खिड़की खोलकर बाहर देखा तो सरकारी कर्मचारी परिसर को घेर रहे थे और दरवाज़े को जलते हुए टायरों से घेरकर बंद कर रहे थे.
किंग कहती हैं, "ये बहुत डरावना होता जा रहा था क्योंकि मैं आग की लपटों को उठते हुए देख सकती थी. स्थिति दंगे में बदल गई थी."
किंग एक चीन की कंपनी के लिए काम करती हैं जो एंडीस पर्वतों में नमक की चट्टानों से लीथियम निकालने का काम करती है. लीथियम को 'सफ़ेद सोना' भी कहा जाता है और इसका इस्तेमाल बैटरी बनाने में किया जाता है.
अर्जेंटीना के कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की वजह से हुए ये प्रदर्शन, दुनिया भर में चीनी कारोबारियों और स्थानीय समुदायों के बीच बढ़ रहे तनाव के मामलों में से एक है.
ग्रीन इकोनॉमी यानी हरित अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी खनिजों को प्रोसेस करने में चीन का दबदबा है. अब चीन ने इनका खनन भी ख़ुद शुरू कर दिया है.
दस साल पहले की बात है जब चीन की एक कंपनी ने अर्जेंटीना, बोलीविया और चिली के लीथियम ट्रैंगल में चीन के लिए पहली खदान को ख़रीदा था. दुनिया में लीथियम का सर्वाधिक भंडार इसी इलाक़े में है.
लीथियम का उत्पादन
खनन से जुड़े प्रकाशनों, कॉर्पोरेट, सरकारी और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ इसके बाद स्थानीय खनन कारोबारों में चीन के कई निवेश हुए.
चीनी कंपनियों के शेयरों की गणना के आधार पर बीबीसी को पता चला है कि दुनिया भर में इस समय लीथियम का जितना उत्पादन हो रहा है या जो उत्पादन की प्रक्रिया में है उसमें से 33 प्रतिशत चीनी कंपनियों के नियंत्रण में है.
लेकिन चीन की कंपनियों के कारोबार के इस विस्तार के साथ ही, उन पर उसी तरह उत्पीड़न करने के आरोप भी लग रहे हैं जैसे दूसरी बड़ी अंतरराष्ट्रीय खनन कंपनियों पर लगते रहे हैं.
आई किंग के लिए टायर जलाकर हुआ वो प्रदर्शन एक असभ्य जागृति जैसा था.
उन्होंने अर्जेंटीना में एक शांत जीवन की उम्मीद की थी लेकिन स्थानीय स्पैनिश भाषा के ज्ञान की वजह से उन्हें बिचौलिये की भूमिका भी निभानी पड़ी.
वो कहती हैं, "ये आसान नहीं था. भाषा से परे, हमें बहुत सी चीज़ों में नरम होना पड़ा, जैसे कि प्रबंधन को लगता है कि कर्मचारी आलसी हैं और कर्मचारी संघ पर बहुत अधिक निर्भर हैं, और कैसे स्थानीय लोगों को लग रहा है कि चीन के लोग यहां सिर्फ उनका शोषण करने के लिए हैं."
बीबीसी ग्लोबल चाइना यूनिट ने दुनिया भर में ऐसे कम से कम 62 खनन प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी जुटाई है जिनमें चीन की कंपनियों की हिस्सेदारी है और ये प्रोजेक्ट या तो लीथियम को निकालने या हरित अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी तीन खनिजों- कोबाल्ट, निकल और मैंगनीज़ में से किसी एक को निकालने के लिए स्थापित किए गए हैं.
आधे से अधिक इलेक्ट्रिक वाहन
इन सभी का इस्तेमाल लीथियम ऑयन बैटरी बनाने में किया जाता है जो इलेक्ट्रिक कारों में इस्तेमाल होती हैं. बैटरी और सोलर पैनल का उत्पादन इस समय चीन की ओद्योगिक प्राथमिकता में ऊपर हैं.
इनमें से कुछ प्रोजेक्ट दुनिया भर में इन खनिजों के सबसे बड़े उत्पादक हैं.
चीन लीथियम और कोबाल्ट को रिफ़ाइन करने के मामले में लंबे समय से अग्रणी है.
अमेरिकी थिंकटैंक 'चैटम हाउस' के मुताबिक़, साल 2022 में इन खनिजों के वैश्विक उत्पादन में चीन की साझेदारी 72 प्रतिशत और 68 प्रतिशत थी.
इन खनिजों और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों को रिफ़ाइन करने की क्षमता के दम पर चीन साल 2023 में ऐसे स्तर पर पहुंच गया था कि दुनिया भर में बिके आधे से अधिक इलेक्ट्रिक वाहन चीन में ही तैयार हो रहे थे.
पवन चक्की बनाने की वैश्विक क्षमता का 60 प्रतिशत चीन के पास है. यही नहीं, चीन सोलर पैनल की सप्लाई चेन के हर चरण के कम से कम 80 फ़ीसदी को नियंत्रित करता है.
इस क्षेत्र में चीन की भूमिका ने दुनिया भर में इन उत्पादों की न सिर्फ़ क़ीमत कम की है बल्कि लोगों की उन तक पहुंच भी आसान की है.
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ
लेकिन ग्रीन इकोनॉमी यानी हरित अर्थव्यवस्था के लिए सिर्फ़ चीन ही ऐसा देश नहीं है जिसे इन खनिजों के खनन और शोधन की ज़रूरत होगी.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यदि दुनिया साल 2050 तक ज़ीरो कॉर्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करना चाहती है तो साल 2040 तक इन पदार्थों के इस्तेमाल को 6 गुणा बढ़ाना पड़ेगा.
इसी बीच, अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ, सभी ने अपनी-अपनी रणनीति बना ली है, ताकि वो चीन पर अपनी निर्भरता कम कर सकें.
जैसे-जैसे चीन की कंपनियों ने दुनिया भर में अपना खनन कार्य बढ़ाया है, इन प्रोजेक्ट से पैदा हो रही समस्याओं को लेकर आरोप भी तेज़ी से बढ़े हैं.
ग़ैर सरकारी संगठन 'द बिज़नेस एंड ह्यूमन राइट्स रिसोर्स सेंटर' का कहना है कि ऐसी समस्याएं 'चीनी खनन के लिए अनूठी नहीं हैं.'
लेकिन पिछले साल इस संगठन ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें महत्वपूर्ण खनिजों के खनन में लगी चीन की कंपनियों से जुड़े 102 आरोपों की सूची दी गई थी.
इन आरोपों में स्थानीय समुदाय के लोगों के अधिकारों के हनन से लेकर पारिस्थितिक तंत्र को नुक़सान और असुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों से जुड़े आरोप शामिल थे.
विस्फोटकों का इस्तेमाल
ये आरोप साल 2021 से 2022 के बीच लगाए गए थे.
बीबीसी ने साल 2023 में लगाए गए चालीस और आरोपों की गणना की है जो या तो मीडिया रिपोर्टों में प्रकाशित हुए हैं या गैर सरकारी संगठनों की तरफ़ से लगाए गए हैं.
दुनिया के दो विपरीत हिस्सों के दो लोगों ने हमें अपनी आपबीती भी सुनाई है.
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो (डीआरसी) के दूरस्थ दक्षिणी क्षेत्र में स्थित लुबुमबाशी के बाहरी इलाक़े में क्रिस्टोफ़े काब्वीटा रुआशी कोबाल्ट खदान के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं.
ये खदान 2011 से चीन के जिनचुआन समूह की है.
वो कहते हैं कि खुली खदान उनके घर के दरवाज़े से सिर्फ़ 500 मीटर दूर है, हर सप्ताह दो या तीन बार चट्टानों को हटाने के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल किया जाता है और इसकी वजह से स्थानीय लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है.
क्रिस्टोफ़े काब्वीटा रुआशी कहते हैं कि ये विस्फोट लोगों के लिए ये संकेत भी होता है कि वो जो कुछ भी कर रहे हैं, उसे छोड़कर सुरक्षित स्थान पर चले जाएं.
वो कहते हैं, "चाहें तापमान जो भी हो, तेज़ हवा चल रही हो या बारिश हो रही हो, हमें अपने घर छोड़कर पास बने शेल्टर में जाना पड़ता है."
'यहां कोई और सुरक्षित जगह नहीं है...'
क्रिस्टोफ़े काब्वीटा रुआशी कहते हैं कि यहां कोई और सुरक्षित जगह नहीं है और इसलिए ये सभी पर लागू होता है फिर चाहे हाल ही में मां बनीं महिलाएं हों, बीमार हों या बुज़ुर्ग हों.
साल 2017 में रिपोर्टों के मुताबिक़, कैटी काबोज़ो नाम की एक किशोरी की स्कूल से लौटते वक़्त उड़ते हुए पत्थर के टकराने की वजह से मौत हो गई थी, जबकि अन्य पत्थरों ने घरों की दीवारों और छतों में छेद कर दिए थे.
रुआशी खदान की प्रवक्ता एलिसा कलासा स्वीकार करती हैं कि "एक किशोरी उस जगह पर थी जहां उसे नहीं होना चाहिए था और वो उड़ते हुए पत्थरों से प्रभावित हो गई थी."
वो कहती हैं कि इस घटना के बाद से खदान ने तकनीक में सुधार किया है और अब "उन्हीं जगहों पर धमाके किए जाते हैं जहां पत्थर नहीं उड़ते हैं."
हालांकि, बीबीसी ने कंपनी के एक प्रोसेसिंग मैनेजर, पैट्रिक त्शीसैंड से बात की, वो एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं.
उन्होंने कहा, "अगर हम खनन करते हैं, तो हम विस्फोटकों का इस्तेमाल करते हैं. धमाकों की वजह से पत्थर उड़ सकते हैं, जो समुदायों में पहुंच सकते हैं क्योंकि समुदाय खदान के बहुत क़रीब रहता है. इसलिए इस तरह के कई हादसे हुए हैं."
प्रवक्ता कलासा ये दावा भी करती हैं कि साल 2006 से 2012 के बीच कंपनी ने 300 से अधिक परिवारों को यहां से कहीं और जाकर रहने के लिए मुआवज़ा भी दिया है.
'मुआवज़ा लेकर हट जाने का दबाव'
इंडोनेशिया के दूरस्थ ओबी द्वीप पर, चीन की कंपनी लाइजेंड रिसोर्सेज़ एंड टेक्नोलॉजी और इंडोनेशिया की बड़ी खनन कंपनी हरिता ग्रुप की साझेदारी वाली खदान ने कवासी गांव के पास जंगल को तेज़ी से निगल लिया है.
खनन पर नज़र रखने वाले स्थानीय समूह जातम का कहना है कि गांव वालों पर सरकार से मुआवज़ा लेकर यहां से हट जाने का दबाव है.
दर्जनों परिवारों ने अपना घर छोड़ने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है कि जो मुआवज़ा उन्हें दिया जा रहा है वो बाज़ार क़ीमत से कम है.
इसके नतीजे में, कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें एक राष्ट्रीय रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में खलल डालने के लिए क़ानूनी कार्रवाई की धमकी दी गई है.
जातम का कहना है कि खदान के लिए रास्ता बनाने के लिए पुराने विकसित जंगलों को काटा जा रहा है.
उनका कहना है कि किस तरह नदियों और समंदर को तलछट से भर दिया गया है और इसका यहां के प्राचीन समुद्री वातावरण पर जो असर हुआ है उसका दस्तावेज़ीकरण समूह ने किया है.
कवासी गांव में रहने वाली एक शिक्षक नूर हयाती कहते हैं, "नदी का पानी अब पीने लायक नहीं है, ये इतना प्रदूषित हो चुका है, और समंदर, जो आमतौर पर बिलकुल नीला और साफ़ होता है बारिश के वक़्त लाल हो जाता है."
इस खदान की सुरक्षा के लिए इंडोनेशिया के सैन्य बलों को तैनात किया गया है और हाल ही में जब बीबीसी की टीम ने इसका दौरा किया तो सैन्य बलों की बढ़ी हुई तादाद स्पष्ट नज़र आई.
जातम का दावा है कि जो लोग खदान के ख़िलाफ़ बोलते हैं, सैन्य बल उन्हें डराते-धमकाते हैं और कई बार हमला भी कर देते हैं.
नूर कहती हैं कि "यहां रहने वाले समुदाय को लगता है कि सेना यहां स्थानीय लोगों के बजाय खदान के हितों की रक्षा के लिए तैनात की गई है."
राजधानी जकार्ता में सेना के प्रवक्ता का कहना है कि डराने-धमकाने के आरोप साबित नहीं हो सके हैं और भले ही "सैनिक वहां खदान की सुरक्षा के लिए हों", वो वहां "सीधे तौर पर समुदाय में हस्तक्षेप" करने के लिए नहीं हैं.
एक बयान में सेना के प्रवक्ता ने दावा किया कि खदान तक पहुंचने का रास्ता बनाने के लिए गांव वालों को हटाने का काम पुलिस देख रही है और ये "शांतिपूर्ण और बिना किसी रुकावट के हो रहा है."
नूर गांववासियों के उस समूह में शामिल थी जिसने जून 2018 में राजधानी जकार्ता पहुंचकर इस खदान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था.
हालांकि एक स्थानीय सरकारी प्रतिनिधि समसू अबुबकर ने बीबीसी को बताया है कि पर्यावरण को नुक़सान को लेकर जनता की तरफ़ से कोई भी शिकायत सरकार को नहीं मिली है.
उन्होंने एक अधिकारिक रिपोर्ट भी साझा की, जिसका निष्कर्ष है कि "हरिता समूह पर्यावरण प्रबंधन और निगरानी दायित्वों का पालन कर रहा है."
हरिता समूह ने स्वयं बीबीसी को बताया है कि वह "एथिकल बिज़नेस प्रैक्टिस यानी नैतिक व्यवसाय व्यवहार और स्थानीय क़ानूनों का सख़्ती से पालन करता है."
समूह का ये भी कहना है कि "वह किसी भी नकारात्मक प्रभाव को ख़त्म करने और कम करने के लिए लगातार काम कर रहा है."
समूह का दावा है कि उसने बड़े पैमाने पर जंगल नहीं काटे हैं और वह पीने के पानी के स्थानीय स्रोतों की निगरानी करता है और स्वतंत्र जांच से ये पता चला है कि पानी सरकार के गुणवत्ता के पैमाने पर खरा उतरता है.
समूह का ये भी कहना है कि उसने ज़बरदस्ती किसी को नहीं हटाया है और ना ही कोई अनुचित लेनदेन किया है और ना ही किसी को धमकाया है.
एक साल पहले, चीन की खनन कारोबार संस्था, जिसे सीसीसीएमसी के नाम से जाना जाता है, ने शिकायतों के समाधान के लिए एक व्यवस्था शुरू की थी.
इसका उद्देश्य चीन के मालिकाना हक़ वाले खनन प्रोजेक्टों से जुड़ी शिकायतों का समाधान करना है. इस संस्था की प्रवक्ता लेलिया ली कहती हैं कि "इन कंपनियों के पास स्थानीयों समुदायों या नागरिक संगठनों से वार्तालाप करने के लिए सांस्कृतिक और भाषाई क्षमता की कमी है."
हालांकि, अभी ये व्यवस्था पूरी तरह से चालू नहीं हैं. इसी बीच, विदेशी खनन में चीन की भागीदारी का बढ़ना निश्चित नज़र आ रहा है.
ब्रिटेन स्थित पर्यावरण थिंक टैंक 'एम्बर' के एशिया कार्यक्रम निदेशक आदित्या लोल्ला कहते हैं, "अहम बाज़ार पर नियंत्रण करना सिर्फ़ भू-राजनैतिक खेल ही नहीं बल्कि कारोबारी नज़रिए से भी ये समझ में आता है."
वो कहते हैं, "चीन की कंपनियां अधिग्रहण कर रही हैं क्योंकि, इसमें वो सिर्फ़ फ़ायदा देख रही हैं."
इसके नतीजे में, दुनिया भर के खदान प्रोजेक्ट में काम करने के लिए चीन के कर्मचारियों को भेजा जाता रहेगा और अधिकतर मामलों में इन कर्मचारियों के लिए ये प्रोजेक्ट अच्छी कमाई करने का मौका होते हैं.
डीआरसी में चीन की कोबाल्ट खदान में दस साल से काम कर रहे 48 साल के वांग गैंग कंपनी से मिले निवास स्थान में रहते हैं और कर्मचारियों की कैंटीन में खाते हैं. वो रोज़ाना दस घंटे, सप्ताह में सातों दिन काम करते हैं. हर महीने उन्हें चार छुट्टियां मिलती हैं.
चीन के हुबेई प्रांत में रह रहने अपने परिवार से दूरी को उन्होंने स्वीकार कर लिया है क्योंकि अपने घर रहकर जितना वो कमा सकते थे उससे कहीं अधिक यहां कमा रहे हैं. वो डीआरसी के घने जंगलों और साफ़ आसमान का आनंद भी ले रहे हैं.
वो स्थानीय खदान कर्मचारियों से फ्रेंच, स्वाहिली और अंग्रेज़ी के मिश्रण से बनी भाषा में बात करते हैं लेकिन वो ये भी कहते हैं कि "हम काम की बातों को छोड़ दें तो बहुत कम ही बात करते हैं."
आई किंग, जो अपने मेज़बान देश की भाषा को धाराप्रवाह बोलती हैं, भी काम के बाहर अर्जेंटीना के लोगों से बहुत कम ही बात करती हैं.
हाल ही उन्होंने एक साथी चीनी कर्मचारी से मेलजोल बढ़ाया है और अपने जैसे लोगों के साथ ही बाहर निकलती हैं. घर से हज़ारों मील की दूरी ने इन सभी को एक दूसरे के क़रीब ला दिया है.
उनकी ज़िंदगी का सबसे रोमांचक पल होता है एंडेज़ पर्वत की ऊंचाई पर नमक की चट्टानों तक पहुंचना जहां से लीथियम का खनन किया जा रहा है. उनके लिए ज़िंदगी यहां अच्छी है.
वो कहती हैं, "ऊंचाई पर मैं बीमार हो जाती हूं- मैं सो नहीं सकती और मैं खा नहीं सकती. लेकिन मैं वहां जाना पसंद करती हूं क्योंकि वहां चीज़ें बहुत सरल हैं और कार्यस्थल की राजनीति भी नहीं है."
आई किंग और वांग गैंग बदले हुए नाम हैं.
(इस रिपोर्ट में एमिरी माकूमेनो, ब्योबे मालेंगा और लूसियन काहोज़ी ने सहयोग किया है.)
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