You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पाकिस्तान: पीटीआई की महिला नेताओं की ज़मानत पर रिहाई और फिर गिरफ़्तारी की कहानी
- Author, उमरदराज़ नंगियाना
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, लाहौर
नौ मई की घटनाओं के मद्देनज़र पूर्व सत्ताधारी दल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) की लगभग 18 महिलाएं और दर्जनों कार्यकर्ता पिछले पांच महीने से अलग-अलग जेलों में बंद हैं.
इनमें कुछ नेताओं और कुछ कार्यकर्ताओं को पिछले कुछ समय में अदालतों से ज़मानत पर रिहाई भी मिली, लेकिन उन्हें रिहाई के तुरंत बाद दोबारा किसी न किसी मुक़दमे में गिरफ़्तार कर लिया गया.
हाल ही में पीटीआई की महिला कार्यकर्ता सनम जावेद को अदालत ने ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया, लेकिन वह जैसे ही लाहौर की कोट लखपत जेल से बाहर निकलीं, पुलिस उनके इंतजार में थी.
पुलिस ने उन्हें एक दूसरे मुक़दमे में गिरफ़्तार करके दोबारा जेल भेज दिया.
सनम जावेद की वकील ख़दीजा सिद्दीक़ी ने बीबीसी को बताया कि यह पहली बार नहीं है कि जब सनम जावेद को रिहाई मिलने के बाद दोबारा गिरफ़्तार किया गया.
सनम जावेद ऐसी अकेली महिला कार्यकर्ता नहीं हैं जिनके साथ ऐसा हो चुका है.
क्या कहना है वकील का
ख़दीजा सिद्दीक़ी कहती हैं कि सनम जावेद को पहले भी कम से कम तीन बार अदालत से ज़मानत मिलने के बावजूद दोबारा किसी न किसी दूसरे मुक़दमे में गिरफ़्तार किया गया.
उनके अलावा ख़दीजा शाह को भी अदालत से ज़मानत मिली लेकिन उनको रिहा नहीं किया गया बल्कि एक दूसरे मुक़दमे में जांच शुरू कर दी गई.
पिछले महीने आतंकवाद निरोधी एक अदालत में पीटीआई की महिला कार्यकर्ता सनम जावेद, अश्मिया शुजा, शाह बानो और अफ़्शां तारिक़ को लाहौर में ज़मानत पर रिहा किया था.
इन पर कोर कमांडर के आवास पर हमले का आरोप है. इन चारों महिलाओं को पुलिस ने रिहा होने के तुरंत बाद जेल के बाहर ही से दोबारा गिरफ़्तार कर लिया.
फ़ैशन डिज़ाइनर ख़दीजा शाह को भी लाहौर हाई कोर्ट ने हाल ही में ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया था. उनके साथ पीटीआई के छह पुरुष कार्यकर्ताओं को ज़मानत दी गई थी. लेकिन इस फ़ैसले के बावजूद ख़दीजा और दूसरों को अब तक रिहा नहीं किया गया है.
अदालत ने पुलिस को इसकी वजह बताने का आदेश दे रखा है.
ध्यान रहे कि नौ मई को पीटीआई के चेयरमैन इमरान ख़ान की इस्लामाबाद में गिरफ़्तारी के बाद देश के विभिन्न शहरों, विशेष तौर पर लाहौर में हिंसक प्रदर्शन हुए थे.
पुलिस के अनुसार लाहौर में पीटीआई के कार्यकर्ताओं ने उन प्रदर्शनों में सैनिक या सेना के नाम से जुड़ी संपत्तियों पर हमला किया और नुक़सान पहुंचाया. इनमें लाहौर के कोर कमांडर का आवास और मेन ब्लेवर्ड गुलबर्ग स्थित सैनिक टावर भी शामिल हैं. जिन प्रदर्शनकारियों को इन केसों में नामज़द किया गया उनमें बड़ी संख्या महिला कार्यकर्ताओं की भी शामिल थीं.
लेकिन पीटीआई का नेतृत्व इस बात का खंडन करता रहा है कि उनके कार्यकर्ता हिंसक घटनाओं या सैनिक संपत्ति पर हमले जैसे मामले में शामिल थे. उनका रुख़ यह है कि उनके कार्यकर्ताओं ने केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया.
रिहा होकर दोबारा गिरफ़्तार होने वाली महिलाएं कौन हैं?
नौ मई के प्रदर्शनों के बाद लाहौर से गिरफ़्तार होने वाले लोगों में जो महिलाएं शामिल थीं, उनमें से 18 महिलाएं ऐसी हैं जिनका संबंध पीटीआई से बताया जाता है.
इनमें राज्य की पूर्व मंत्री यासमीन राशिद और दूसरे कुछ असेंबली के मेंबरों के अलावा अधिकतर महिलाएं ऐसी हैं जो पीटीआई में कोई पद नहीं रखतीं या उनका संबंध दल में दूसरे दर्जे के नेतृत्व से है.
अधिकतर महिलाएं वह हैं जो पीटीआई और उसके चेयरमैन इमरान ख़ान के समर्थन में बात करती थीं. उनमें कुछ सोशल मीडिया इंफ़्लूएंसर भी शामिल हैं.
ख़दीजा शाह अमेरिकी नागरिकता रखने वाली फ़ैशन डिज़ाइनर हैं. वह ख़ुद पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल आसिफ़ नवाज़ जंजुआ की नातिन हैं जबकि उनके पिता सलमान शाह पाकिस्तान के पूर्व वित्त मंत्री रह चुके हैं.
सनम जावेद ख़ान मूल रूप से सोशल मीडिया इंफ़्लूएंसर और पीटीआई व इमरान ख़ान की समर्थक हैं.
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म इंस्टाग्राम पर उनके फ़ॉलोवर्स की संख्या एक लाख से अधिक है. इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी से पहले के दिनों में वह अक्सर ज़मान पार्क के बाहर दूसरी महिला कार्यकर्ताओं के साथ मौजूद होती थीं.
तैयबा राजा भी सोशल मीडिया पर डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं. इंस्टाग्राम पर उनके फ़ॉलोअर्स की संख्या चार लाख से अधिक है. तैयबा राजा उस समय ख़बरों में आईं जब नौ मई के प्रदर्शनों का उनका एक वीडियो सामने आया.
वीडियो में देखा जा सकता है कि तैयबा राजा अपने सर से काली चादर उतार कर पुलिस के एक अधिकारी की तरफ़ फेंकती हैं और पुलिस की ओर बढ़ती हैं. पुलिस अधिकारी उनको बालों से दबोच कर खींचता हुआ दूसरी तरफ़ ले जाता है.
उस वीडियो और कुछ तस्वीरों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तैयबा राजा बहुत अधिक चर्चित हुईं. आलिया हमज़ा असेंबली की पूर्व सदस्य हैं, उनको भी पुलिस ने उनके घर से गिरफ़्तार किया था.
कौन सी महिला कितने समय से क़ैद है?
डिज़ाइनर ख़दीजा शाह ने, जो ख़ुद लगभग पांच महीने से जेल में क़ैद हैं, जेल से पिछले महीने एक ख़त लिखा. उसे हाल ही में उनके पति ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर पोस्ट किया. उनके वकीलों की टीम की मेंबर ख़दीजा सिद्दीक़ी ने भी अपने सोशल मीडिया पर उस ख़त को पढ़कर सुनाया है.
कोट लखपत जेल, लाहौर से लिखे उस पत्र में ख़दीजा शाह ने बार-बार ज़मानत मिलने के बावजूद रिहाई न होने पर निराशा व्यक्त की है. इसमें उन्होंने अपने साथ क़ैद दस महिलाओं की हालत के बारे में भी लिखा है.
इस पत्र में उन्होंने दावा किया कि अफ़्शां तारिक़ एक घरेलू महिला हैं, जिनका एक ही बेटा है. "उनका छोटा सा परिवार है जिसके संसाधन सीमित हैं. अफ़्शां तारिक़ पिछले दो माह से जेल में हैं. इस दौरान उनके बेटे ने घर की रोटी नहीं खाई. उनकी आंखों में हर वक़्त आंसू रहते हैं."
एक और महिला फ़रज़ाना ख़ान के बारे में उन्होंने लिखा कि वह एक कैफ़े की मालिक और पांच बच्चों की मां हैं. उन्होंने पूरा जीवन काम करके अपने परिवार को पाला है. उन्हें जेल में रहते हुए ढाई माह से अधिक समय गुज़र चुका है.
उन्होंने लिखा है, "उन पर बहुत अधिक दबाव है लेकिन वह दृढ़ हैं और न केवल पीटीआई की महिलाएं बल्कि जेल के दूसरे क़ैदियों के लिए भी एक उदाहरण है. ख़दीजा शाह चार और महिलाओं के बारे में भी उस पत्र में बताती हैं.''
"हर सोमवार को उनकी तीन साल की बेटी जेल में उनसे मिलती है."
रूबीना ख़ान के बारे में ख़दीजा शाह ने उस पत्र में लिखा है, ''उनके चार बच्चे हैं. सबसे छोटी बेटी तीन साल की जबकि सबसे बड़ी बेटी साढ़े बारह साल की है. पाकिस्तान में कोई रिश्तेदार नहीं इसलिए उनके बच्चों का ध्यान रखने वाला कोई नहीं है."
उनकी बड़ी बेटी उनके बच्चों का ख़्याल रख रही है. पत्र में दावा किया गया है, ''उनकी तीन साल की बेटी हर सोमवार को जेल में उनसे मुलाक़ात करने के लिए आती है. वह दोनों जेल के सलाख़ों के पीछे से एक दूसरे की अंगुलियां छूती हैं. हम अब इस तरह अपने प्यारों से मिलते हैं. सलाख़ों के पीछे से."
एक और साथी क़ैदी शाह बानो के बारे में ख़दीजा शाह ने लिखा, ''उनके तीन बच्चे हैं. मेरी तरह उनकी भी सबसे छोटी बेटी पांच साल की है."
वह कहती हैं कि पुलिस ने शाह बानो को उनकी बेटी की पांचवीं सालगिरह से एक दिन पहले उनके घर से गिरफ़्तार किया. उनकी बेटी ने उसके बाद से चुप्पी साध रखी है और अपनी गुड़िया को सीने से लगाए मां से दोबारा मिलने का इंतज़ार कर रही है.
गिरफ़्तारी, रिहाई, फिर गिरफ़्तारी और प्रेस कॉन्फ़्रेंस
नौ मई की घटनाओं के बाद पुलिस ने पूरे देश से पूर्व सत्ताधारी दल पीटीआई के लगभग समूचे नेतृत्व को गिरफ़्तार कर लिया. इनमें से बहुत से नेताओं के साथ भी ऐसा ही होता रहा. वह जब भी अदालत से ज़मानत मिलने पर रिहा होते तो पुलिस उनको दोबारा गिरफ़्तार कर लेती. इसके बाद वह नेता रिहा होकर एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते जिसमें वह राजनीति से अलग होने और पीटीआई छोड़ने की घोषणा करते.
उनमें से कुछ ने हाल ही में बनने वाले राजनीतिक दल इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी (आईपीपी) में शामिल होने का भी ऐलान किया. हाल ही में पीटीआई की नेता अंदलीब अब्बास भी उन नेताओं में शामिल हो गईं.
वकील ख़दीजा सिद्दीक़ी कहती हैं कि डिज़ाइनर ख़दीजा शाह की तरह अंदलीब अब्बास के ख़िलाफ़ भी एक ही तरह के आरोप हैं, लेकिन उनको इसलिए रिहाई मिल गई क्योंकि वह पीटीआई को छोड़कर नए दल आईपीपी में शामिल हो गईं.
ख़दीजा सिद्दीक़ी ने बीबीसी को बताया कि अब जबकि उन्होंने उन गिरफ़्तार महिलाओं की ज़मानत के लिए हाई कोर्ट में आवेदन दिया है तो उन आवेदनों पर सुनवाई नहीं हो पा रही है.
उन्होंने दावा किया कि ज़मानत के केस कॉज़ लिस्ट में होते हैं लेकिन तारीख़ आने पर अदालत उनको सुनती ही नहीं. बताया जाता है कि जज दूसरे महत्वपूर्ण मुक़दमों में व्यस्त हैं हालांकि बेंच मौजूद भी होती है.
वह कहती हैं कि कई महीने का समय गुज़र जाने के बावजूद पुलिस ने अब तक किसी मुक़दमे में जांच मुकम्मल करके चालान अदालत में पेश नहीं किया जिसके बाद अदालती कार्रवाई शुरू हो सके.
क़ैद महिलाओं को जेल से रिहाई क्यों नहीं मिल रही?
वकील ख़दीजा सिद्दीक़ी कहती हैं कि इससे पहले वह यह समझ रही थीं कि शायद शासन की ओर से केवल विशेष तौर पर महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन अब उनको अपनी सोच बदलनी पड़ी है.
वो कहती हैं, "नौ मई से जुड़े जितने भी लोगों को उन्होंने गिरफ़्तार किया था, जिनमें अधिकतर को जिओ फ़ेंसिंग की मदद से गिरफ्तार किया गया, उनमें से किसी को भी जेल से रिहा नहीं होने दिया जा रहा है. उनमें पुरुष भी शामिल हैं. जिसको भी ज़मानत मिलती है वह दूसरे मुक़दमों में गिरफ़्तार हो जाते हैं."
ख़दीजा सिद्दीक़ी कहती हैं कि उनके विचार में उन लोगों को अंदर रखना असल मक़सद है ताकि उनको तंग किया जाए. हालांकि उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है, फिर भी कोशिश की जा रही है कि उन्हें किसी तरह भी ज़मानत न मिले.
उन्होंने बताया कि महिलाओं समेत सभी गिरफ़्तार लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमों में आरोप एक जैसे हैं, जैसे कि नारेबाज़ी और तोड़फोड़ करना. इसके कारण उनके ख़िलाफ़ आतंकवाद निरोधी धाराओं को भी एफ़आईआर का हिस्सा बनाया गया है.
वकील ख़दीजा सिद्दीक़ी समझती हैं कि ऐसा महसूस होता है कि पुलिस उन सभी गिरफ़्तार लोगों के मुक़दमे जेल के अंदर चलाना चाहती है.
"वह केवल दिखाना चाहते हैं कि हम कितने कठोर हैं"
पाकिस्तान में मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान की चेयरपर्सन हिना जिलानी ने बीबीसी से कहा कि उनके विचार में पीटीआई की महिला कार्यकर्ताओं को बार-बार ज़मानत मिलने के बावजूद दोबारा गिरफ़्तार करने के पीछे वजह यह है कि शासन यह बताना चाहता है कि वह किसी को आसानी से जाने नहीं देगा.
वो कहती हैं, "मेरे ख़्याल में इसकी एक वजह तो यह है कि इस तरह वह यह दिखाना चाहते हैं कि देखो हम कितने कठोर हैं. और दूसरा जिस तरह पीटीआई को निशाना बनाया गया है यह लोग उसका शिकार भी हो रहे हैं."
हिना जिलानी कहती हैं कि अगर किसी ने जुर्म किया है तो उसको उसकी सज़ा मिलनी चाहिए, लेकिन उसको उसका क़ानूनी अधिकार भी मिलना चाहिए. ज़मानत एक क़ानूनी अधिकार है.
हिना जिलानी के अनुसार ऐसा लगता है कि जिस तरह के मुक़दमों में उन लोगों को शामिल किया गया है, उनमें से बहुत से मुक़दमों में सत्यापित दस्तावेज़ भी उपलब्ध नहीं किए गए जबकि अधिकतर आरोप ऐसे हैं जिनमें ज़मानत मिल सकती है.
वह कहती हैं कि इसके बावजूद इतनी लंबी क़ैद का आधार नहीं बनता. हिना जिलानी के विचार में बहुत से मुक़दमों में पुलिस ने अब तक जांच पूरी करके अदालत में चालान जमा ही नहीं करवाए इसलिए उन मुक़दमों की अदालती कार्रवाई ही शुरू नहीं हो सकी.
वो कहती हैं, "हम छूट दिए जाने के ख़िलाफ़ हैं. किसी को भी छूट नहीं मिलनी चाहिए. जिसने जुर्म किया उसको सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन उन लोगों को न्याय के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. आपको अपना ग़ुस्सा नहीं निकालना है, आपको तो क़ानून के अनुसार चलना है."
ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान की चेयरपर्सन हिना जिलानी कहती हैं कि अदालतों को उन महिलाओं और लोगों के मुक़दमों की अलग-अलग पहलुओं से जांच पड़ताल करनी चाहिए और देखना चाहिए कि उनकी न्याय पाने की कोशिश में अड़ंगा तो नहीं डाला जा रहा है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)