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भारत-कनाडा राजनयिक विवाद: पीएम मोदी के लिए क्या कुछ है दांव पर
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और कनाडा के बीच चल रहा राजनयिक विवाद जारी है. भारत पर गंभीर आरोप लगाने के बावजूद कनाडा ने अभी तक कोई भी पुख़्ता सबूत न भारत से साझा किए हैं और न ही सार्वजानिक किए हैं.
जब से ये मामला शुरू हुआ है तब से कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो चर्चा में रहे हैं.
कनाडा में लोकप्रियता रेटिंग में पिछड़ रहे ट्रूडो के बारे में कहा जा रहा है कि निज्जर की हत्या का मामला उठाने के पीछे की वजहें उनकी घरेलू राजनीति से जुड़ी हुई हैं.
याद रहे कि जस्टिन ट्रूडो के सहयोगी एनडीपी नेता जगमीत सिंह हैं जो खालिस्तान समर्थक हैं और इसी वजह से ट्रूडो के खालिस्तानी अलगाववादियों के प्रति रुख़ को नरम माना जाता है.
राजनयिक विवाद के चलते भारत ने इस बात को भी उठाया है कि भारत में वॉन्टेड लोगों को कनाडा में पनाह मिलती रही है और कनाडा ने इन अपराधियों की ख़िलाफ़ न कोई कार्रवाई की है और न ही उनके प्रत्यर्पण में कोई मदद. जहां सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ट्रूडो का अगला क़दम क्या होगा, वहीं ये समझना भी दिलचस्प होगा कि दोनों देशों के बीच के इस विवाद के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए क्या दांव पर है.
2024 के चुनावों पर नज़र
जानकारों की मानें तो कनाडा के साथ विवाद के चलते प्रधानमंत्री मोदी की नज़र इस बात पर ज़रूर होगी कि इस घटनाक्रम को देश के भीतर किस तरह से देखा जाएगा.
साल 2019 के लोकसभा चुनाव प्रचार में भारतीय जनता पार्टी ने पाकिस्तान के बालाकोट में फरवरी 2019 में की गई भारतीय वायु सेना की कार्रवाई का कई बार ज़िक्र किया.
विश्लेषक मानते हैं कि इसका फ़ायदा भी पार्टी को मिला. तो क्या कनाडा से चल रहे विवाद की वजह से भी उसी तरह की स्थिति पैदा हो सकती है?
यहां ये याद रखना ज़रूरी है कि भारत ने कनाडा के आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया है लेकिन अनौपचारिक स्तर पर चर्चाओं के बाज़ार गरम हैं कि क्या वाक़ई भारतीय एजेंटों ने कनाडा की ज़मीन पर ऐसी कार्रवाई को सरअंजाम दिया होगा.
सत्ता में वापसी की संभावना
नीलांजन मुखोपाध्याय एक लेखक और राजनीतिक विश्लेषक हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रमुख हस्तियों जैसे विषयों पर किताबें लिखी हैं.
वे कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी की नज़र सत्ता में वापसी की संभावनाओं को ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ाने पर है. इसलिए वो विदेशों से संबंधों के बारे में चिंतित नहीं होंगे. मुझे लगता है कि चीज़ें उतनी सहज नहीं हैं जितनी इस साल जनवरी में दिख रही थीं. मोदी के पास वापसी की संभावनाओं को लेकर चिंतित होने के कारण होंगे और इसी पर उनका ध्यान होगा."
वे कहते हैं कि साल 2019 वाली "घर में घुस के मारा" वाली बात का इस बार व्यापक रूप से प्रचार करना प्रधानमंत्री मोदी के लिए मुश्किल होने वाला है. "भारत ये नहीं कह सकता उसने कनाडा में घुस के मारा. ये बात सार्वजनिक मंचों से नहीं की जा सकती. आप इसे बंद दरवाजे के भीतर कह सकते हैं."
मुखोपाध्याय मानते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम के चलते सरकार "घर में घुस के मारा" की बात के ज़रिये देश में एक मर्दाना छवि दर्शाने और जताने की कोशिश करेगी कि अब भारत के एजेंट अब पश्चिमी देशों में भी इस तरह की कार्रवाइयां कर रहे हैं.
सॉफ्ट-स्टेट की छवि को बदलने की कोशिश?
इस मामले में भारत के अब तक के रुख़ ने इस तरफ भी ध्यान खींचा है कि क्या भारत अपनी सॉफ्ट-स्टेट (नरम देश) की छवि को बदलने की कोशिश कर रहा है?
कुछ दिन पहले जब कनाडा की प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने अपनी संसद में खालिस्तानी अलगाववादी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के पीछे भारत का हाथ होने का इल्ज़ाम लगाया था तो भारत ने उसे बेतुका और प्रेरित बता कर ख़ारिज कर दिया था.
निज्जर की हत्या के बारे में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के आरोपों के बारे में जब सोमवार को भारतीय विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भारत ने कनाडा से कहा है कि ये (इस तरह की हत्याएं) भारत सरकार की नीति नहीं है.
साथ ही भारत ने कनाडा से कहा है कि अगर उनके पास कोई विशिष्ट और प्रासंगिक जानकारी है तो वो भारत को बताएं और भारत उस पर विचार करने के लिए तैयार है.
जयशंकर ने ये भी कहा कि भारत ने कनाडा को सक्रिय अलगाववादी ताक़तों से संबंधित संगठित अपराध और उनके नेतृत्व के बारे में बहुत सारी जानकारी दी है.
जयशंकर ने ये भी कहा कि संदर्भ के बिना तस्वीर पूरी नहीं होती और ये भी देखना होगा कि पिछले कुछ सालों में कनाडा ने अलगाववादी ताक़तों, हिंसा और उग्रवाद से संबंधित बहुत सारे संगठित अपराध देखे हैं और ये सब बहुत गहराई से आपस में घुला मिला हुआ है.
साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि भारत ने कनाडा से बड़ी संख्या में प्रत्यर्पण अनुरोध किए हैं और ऐसे आतंकवादी नेता हैं जिनकी पहचान कर ली गई है.
डॉ सुव्रोकमल दत्ता एक जाने-माने राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीति विशेषज्ञ हैं.
वे कहते हैं, "अगर आप आज भारत की छवि की तुलना 20 साल पहले की छवि से करें तो एक बड़ा फर्क़ है. पहले कोई भी ऐरा-गैरा भारत को निशाना बना सकता था. हमने देखा है कि कनाडा में एयर इंडिया के हाईजैक और विस्फोट के साथ क्या हुआ और कोई कार्रवाई नहीं की गई."
"क्यों? क्योंकि भारत को एक बहुत ही कमज़ोर और नाज़ुक देश माना जाता था. भारत की वो छवि थी. लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद ये छवि पूरी तरह बदल गई है. अब भारत अप्रिय मुद्दों को भी टाले बिना साफ़ तौर पर उन पर बोलता है."
दांव पर बहुत कुछ
खालिस्तान के मसले को छोड़ दिया जाए तो भारत और कनाडा के बीच संबंध ज़्यादातर सौहार्दपूर्ण ही रहे हैं. ताज़ा राजनयिक विवाद के चलते दोनों देशों के सम्बन्ध में तनाव बढ़ सकता है जिसका सीधा असर व्यापार और आर्थिक सहयोग पर पड़ सकता है.
प्रधानमंत्री मोदी की नज़र इस बात पर भी होगी कि इस विवाद से निपटने की उनकी रणनीति पर दुनिया भर के देश उनके नेतृत्व के बारे में क्या धारणा बनाते हैं.
कनाडा में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं और इस तरह का राजनयिक विवाद इन समुदायों भावनाओं पर असर डाल सकता है.
जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए ये भी एक चिंता का विषय हो सकता है.
नीलांजन मुखोपाध्याय के मुताबिक़, चिंता की बात यह है कि भारत और कनाडा के बीच चल रहे विवाद की वजह से "किसी तरह की आंतरिक अशांति भी भड़क सकती है, खासकर पंजाब में सिखों और गैर-सिखों के बीच."
वे कहते हैं, "अगर ऐसा कुछ होता है, तो ये मोदी को अपने हिंदू वोट-बैंक को मजबूत करने में मदद करेगा."
'पीएम मोदी की छवि पर कोई असर नहीं'
डॉ सुव्रोकमल दत्ता का कहना है कि जब घरेलू मजबूरियों या घरेलू राजनीति की बात आती है तो प्रधानमंत्री मोदी के लिए दांव पर बहुत कम लगा हुआ है.
वे कहते हैं, "भारत और कनाडा के बीच विवाद का पीएम मोदी की छवि पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है."
पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मारने की मिसाल देते हुए डॉ दत्ता पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंडों की बात भी उठाते हैं. लेकिन साथ ही वे ये भी दावा करते हैं कि निज्जर मामले में जो हुआ है वह आपसी गैंगवार है.
वे कहते हैं, "आतंकवादी आपस में लड़ रहे हैं और एक-दूसरे को मार रहे हैं. भारत सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है."
डॉ दत्ता के मुताबिक़, "भारत आज 'वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) का निर्विवाद नेता' है और 'पश्चिम भारत को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता'. सभी प्रमुख पश्चिमी देश जानते हैं कि वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में वे भारत को नजरअंदाज़ नहीं कर सकते हैं. अगर वो ऐसा करते हैं तो यह उनके अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए आत्मघाती होगा. इसीलिए हम ट्रूडो को अलग-थलग पड़ता देख रहे हैं."
'दोनों देशों के संबंधों में गिरावट'
नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं कि भारत ये जानता है कि अमेरिका भारत से पूरी तरह से अपना पल्ला नहीं झाड़ेगा क्योंकि उसे चीन पर लगाम कसने के लिए भारत की ज़रूरत है.
वे कहते हैं, "जब तक कि भारत जांच में उनके साथ सहयोग करने के लिए सहमत नहीं हो जाता, जिसकी कम से कम आधिकारिक तौर पर संभावना बहुत कम दिखती है, इस स्थिति पर काबू पाना एक मुश्किल बात होने वाली है क्योंकि अमेरिका ने कहा है कि यह उनके फाइव आइज़ अलायन्स की ख़ुफ़िया जानकारी थी जिसके आधार पर ट्रूडो ये इलज़ाम लगा पाए."
मुखोपाध्याय कहते हैं कि कूटनीतिक रूप से भारत को इस स्थिति से निकालना बहुत मुश्किल होगा जिसमें वे फंसा हुआ है.
वे कहते हैं, "भारत-कनाडा संबंधों में गिरावट आने वाली है. लोगों से लोगों के संबंधों के बीच समस्याएं होंगी जो घरेलू स्तर पर मोदी की समस्याओं को बढ़ाने वाली हैं क्योंकि इसके बावजूद इसके कि कनाडा कथित तौर पर भारत विरोधी खालिस्तानी ताकतों को मजबूत करने के लिए कुछ भी करे ले लेकिन भारतीय कनाडा को अपने लिए भविष्य के देश के रूप में देखते हैं".
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