You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ब्रिटेन की गृह मंत्री के बयान से क्या भारत के साथ टूट जाएगा ये अहम समझौता?
- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लंदन के एक अख़बार ने दावा किया है कि भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाला मुक्त व्यापार समझौता (फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट या एफ़टीए) 'समाप्त होने के कगार' पर आ गया है.
लंदन से छपने वाले 'द टाइम्स' अख़बार ने भारतीय सूत्रों के हवाले से लिखा है कि भारत के कई मंत्री ब्रितानी गृहमंत्री के हालिया बयान से 'निस्तब्ध और निराश' हैं.
ब्रिटेन की गृह मंत्री सुएला ब्रेवरमैन ने कुछ दिनों पहले ब्रिटेन में भारतीय प्रवासियों को लेकर एक विवादास्पद बयान दिया था.
सुएला ख़ुद भारतीय मूल की हैं, लेकिन पिछले हफ़्ते 'द स्पेक्टेटर' नामक मैगज़ीन को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मुझे भारत के साथ खुली सीमा की नीति को लेकर चिंताएं हैं क्योंकि मुझे लगता है कि लोगों ने जब ब्रेग्ज़िट को चुना था, तब इसलिए वोट नहीं किया था."
उसी इंटरव्यू में सुएला ने कहा था कि ब्रिटेन में वीज़ा समाप्त होने के बाद सबसे ज़्यादा भारतीय प्रवासी ही रहते हैं.
अख़बार ने एक भारतीय सूत्र के हवाले से लिखा है, "अभी भी दोनों के बीच बहुत सद्भाव है, लेकिन अगर इस तरह के लोग सरकार में बने रहते हैं तो इससे बातचीत अटक सकती है."
'द टाइम्स' अख़बार के दावे का समर्थन करते हुए अमेरिका की वेबसाइट 'पॉलिटिको' ने दावा किया है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिवाली में ब्रिटेन जाने वाले थे और उसी दौरान एफ़टीए पर हस्ताक्षर करने वाले थे, लेकिन अब लगता है कि यह मामला टल गया है.
भारत या ब्रिटेन की तरफ़ से अभी तक इस बारे में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है.
फ़िलहाल बातचीत जारी: भारतीय मीडिया
लेकिन भारतीय मीडिया के कुछ हलकों का दावा है कि फ़िलहाल बातचीत जारी है और ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी कि एफ़टीए खटाई में पड़ गया है.
भारत से छपने वाले अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' ने लिखा है कि सेटबैक के बावजूद भारत और ब्रिटेन दोनों आशान्वित हैं कि एफ़टीए पर जल्द ही हस्ताक्षर किया जाएगा.
अख़बार ने रॉयटर्स समाचार एजेंसी के हवाले से ब्रितानी प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस की प्रवक्ता के एक बयान का ज़िक्र किया है.
जब उनसे पूछा गया कि क्या ब्रितानी सरकार को अब भी उम्मीद है कि दिवाली से पहले एफ़टीए पर समझौता हो जाएगा, तो प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस की प्रवक्ता का कहना था, "हां. हमलोग इस अति महत्वाकांक्षी फ़्री ट्रेड डील पर काम कर रहे हैं. यह समझौता ब्रिटेन को भारतीय मध्यवर्ग को वस्तु और सेवाए मुहैया कराने वालों की लाइन में सबसे आगे कर देगा."
अख़बार के अनुसार हो सकता है कि दिवाली के अवसर पर नरेंद्र मोदी ब्रिटेन न जाएं, लेकिन इसकी पूरी संभावना है कि मोदी नवंबर के शुरू में ब्रिटेन जाएं और इस व्यापार संधि पर हस्ताक्षर करें.
इस डील को लेकर उठे ताज़ा विवाद पर लंदन के किंग्स कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्यापक और फ़िलहाल भारतीय संस्था ओआरएफ़ से जुड़े प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं कि इसका एक बड़ा कारण ब्रिटेन की मौजूदा राजनीतिक स्थिति है.
ब्रिटेन की मौजूदा राजनीतिक स्थिति ज़िम्मेदार
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत ने इसके लिए दो कारण बताए.
बीबीसी के साथ बातचीत में उनका कहना था, "ब्रिटेन की प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस के पास फ़िलहाल पॉलिटिकल कैपिटल की कमी है. इस तरह के फ़ैसले के लिए सरकार के पास जो क्षमता होनी चाहिए, वो इस समय उनके पास नहीं है."
ब्रिटेन की गृहमंत्री के हालिया बयान के बारे में प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं, "भारत के प्रोफ़ेशनल्स (छात्र और पेशेवर) के मूवमेंट (ब्रिटेन जाने) पर ही बात नहीं बनती है तो उस व्यापार समझौते से भारत को क्या फ़ायदा होगा."
प्रोफ़ेसर पंत का कहना है कि लिज़ ट्रस सरकार इस समय अगर मज़बूत होती, तो वो अपने गृहमंत्री के बयान से पैदा होने वाले विवाद को फ़ौरन सुलझा लेती, लेकिन लिज़ ट्रस इस समय राजनीतिक तौर पर बहुत कमज़ोर हैं.
समझौते की ज़रूरत ब्रिटेन को ज़्यादा
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं कि इस समझौते से दोनों देशों को फ़ायदा होगा, लेकिन इस समय ब्रिटेन की ज़रूरत ज़्यादा है और भारत बेहतर स्थिति में है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "भारत के पास इस समय ट्रेड पार्टनर्स की कोई कमी नहीं है. ब्रिटेन जो इस समय पोस्ट-ब्रेग्ज़िट विदेश नीति ढूँढ रहा है, उसमें भारत के साथ व्यापार समझौता ब्रिटेन के लिए बहुत ज़रूरी है, ख़ासकर ऐसे समय में जब चीन जैसे देश से ब्रिटेन कन्नी काट रहा है."
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि इसी साल भारत ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ कारोबारी समझौता किया है और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी एक महत्वाकांक्षी व्यापार समझौता किया है. इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच करों में 85 फ़ीसदी तक की कटौती हो सकती है.
भारत ने यूरोपीय संघ के साथ भी कारोबारी समझौते के लिए बातचीत शुरू कर दी है और उनके मुताबिक़ बातचीत सही तरीक़े से आगे बढ़ रही है.
क्या होता है मुक्त व्यापार समझौता?
फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट या मुक्त व्यापार समझौते का मतलब दो या फिर इससे ज़्यादा देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के आयात और निर्यात में रुकावटों को कम करने के लिए क़रार है.
एफ़टीए के तहत वस्तुओं और सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार ख़रीदा और बेचा जा सकता है, जिसके लिए बहुत कम सरकारी शुल्क, कोटा तथा सब्सिडी जैसे प्रावधान किए जाते हैं.
इस समझौते से व्यवसाय करने वाले दोनों देशों को फ़ायदा होता है.
भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता
भारत और ब्रिटेन ने जनवरी 2022 में दिल्ली में मुक्त व्यापार समझौते के लिए वार्ता शुरू की थी.
लेकिन इसकी बुनियाद रखी गई थी साल 2021 में, जब ब्रिटेन की मौजूदा प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस ने बॉरिस जॉनसन की कैबिनेट में अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री की हैसियत से भारत-ब्रिटेन वृहद ट्रेड पार्टनरशिप (ईटीपी) पर हस्ताक्षर किए थे.
ईटीपी ने ही बाद में एफ़टीए का रूप ले लिया है.
इसका मक़सद ऐसा व्यापार समझौता करना है जो दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर के कारोबार को बढ़ावा दे.
ये भी पढ़ें:-ब्रिटेन भारत से कितनी दौलत लूट कर ले गया?
लिज़ ट्रस ब्रितानी विदेश मंत्री की हैसियत से इसी साल अप्रैल में भारत आई थीं. उन्होंने उस समय कहा था कि वो एफ़टीए को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं.
इसी साल भारत दौरे पर आए तत्कालीन ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भी कहा था कि वह एफ़टीए को लेकर प्रतिबद्ध हैं और उम्मीद जताई थी कि दिवाली तक इस पर हस्ताक्षर हो जाएंगे.
प्रधानमंत्री बनने के लिए प्रचार के दौरान भी लिज़ ट्रस ने उम्मीद जताई थी कि दिवाली तक इस पर समझौता हो जाएगा.
इस समझौते से 2035 तक दोनों देशों के बीच सालाना कारोबार 28 अरब पाउंड तक बढ़ जाएगा. साल 2021 में दोनों देशों के बीच 24 अरब पाउंड का कारोबार हुआ था.
एफ़टीए से किसको क्या मिलेगा?
भारत के साथ कारोबारी समझौता करना ब्रिटेन सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी नीतियों में से एक है.
भारत साल 2050 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है.
जीडीपी के मामले में भारत हाल ही में ब्रिटेन से आगे निकल गया है.
इसलिए ब्रिटेन भारत के साथ व्यापार समझौते को सुनहरे मौक़े के रूप में देखता है.
ब्रिटेन चाहता है कि भारत ब्रिटेन से व्हिस्की जैसे उत्पादों की ख़रीद को बढ़ाए.
ब्रिटेन को उम्मीद है कि अगर समझौता होता है तो भारत, ब्रिटेन की ग्रीन टेक्नोलॉजी और ब्रितानी सेवाओं का बड़ा ख़रीदार बनेगा. बैंकिंग और क़ानूनी सेवा के क्षेत्र में भी ब्रिटेन को बहुत उम्मीदें हैं.
कितना बड़ा मुद्दा
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं कि ब्रिटेन की सत्तारूढ़ कंज़र्वेटिव पार्टी के एक हिस्से के लिए प्रवासियों का मुद्दा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है और इस पर ख़ुद पार्टी के अंदर कोई आम सहमति नहीं बन पाई है.
उनके अनुसार प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस का नेतृत्व इतना सशक्त नहीं है कि वो पार्टी के अंदर इस पर कोई एक सहमति बना पाएं.
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि ब्रिटेन की अंदरूनी राजनीति एक तरफ़ है, लेकिन दिक़्क़त यह है कि लेबर मोबिलिटी (पेशेवर लोगों का आना-जाना) अगर एफ़टीए का हिस्सा नहीं बनता है, तो फिर इस पूरे समझौते का भारत के लिए कोई मायने ही नहीं रह जाएगा.
भारत चाहता है कि भारतीयों के पास ब्रिटेन में काम करने और वहाँ रहने के अधिक से अधिक अवसर हों.
ब्रिटेन के साथ किसी भी तरह के कारोबारी समझौते में भारत की प्राथमिकता भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए वीज़ा नियमों में राहत हासिल करना होगी.
अगर दोनों देशों के बीच समझौता हो जाता है तो कपड़ा, चमड़ा, आभूषण, आईटी, फ़ार्मा और कृषि जैसे क्षेत्रों में भारत के निर्यात को काफ़ी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)