भारत में डिजिटल असमानता के बीच कैसे तेजी से फल-फूल रहा है डिजिटल पेमेंट

    • Author, सुमेधा पाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली में ट्रांसवुमन के लिए बने एक शेल्टर होम में प्रियंका अपने सिंगल बेड पर बैठी हुई हैं. उनका फोन बज रहा है.

इस साधारण दिखने वाले कमरे से ही प्रियंका चाय का एक वैश्विक स्तर का कारोबार चलाती हैं.

वो भी ऐसे समय में जब कुछ वक़्त पहले तक ही उन्होंने तमाम तरह की मुश्किलें झेली थीं.

अपने पिता की मौत और कारोबार को आगे बढ़ाने के कम मौक़ों की वजह से प्रियंका को अपना गृह राज्य असम छोड़ना पड़ा था.

वो कहती हैं, ''मुझे इसका अहसास हुआ कि फूल तभी खिलते हैं, जब उन्हें पर्याप्त मौक़े और जगह मिलते हैं- मुझे फिर से नई शुरुआत के लिए अपना घर छोड़ना पड़ा.''

प्रियंका जैसे युवा उद्यमियों के लिए यूपीआई एक वित्तीय सशक्तीकरण का ज़रिया बन गया है.

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई रियल टाइम डिजिटल पेमेंट सिस्टम है जो यूजर्स को एक ही ऐप के ज़रिए बैंक खाते को मोबाइल एप्लिकेशन से जोड़ता है और यूजर पैसे ट्रांसफर करने से लेकर बिलों का भुगतान तक कर सकता है.

ऑनलाइन बैंकिंग या मोबाइल ऐप के ज़रिए किए जाने वाले सारे ट्रांजेक्शन डिजिटल पेमेंट कहलाते हैं.

डिजिटल पेमेंट बना सशक्तीकरण का हथियार

31 साल की प्रियंका ने शुरुआत में देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर चाय पत्ती बेचने से अपना कारोबार शुरू किया था. प्रियंका के सामने कई चुनौतियां थीं.

अपने पुराने नाम को पीछे छोड़ना, अपनी चुनी हुई पहचान यानी बतौर ट्रांसवुमन बैंकिंग करना, बैंकों में लंबी-लंबी क़तारों का सामना करना, दस्तावेज़ों को फिर से पेश करना और जटिल नौकरशाही से गुज़रना इसमें शामिल था.

प्रियंका मित्र ट्रस्ट नाम के गरिमा गृह में रहती हैं. यहां मिली ट्रेनिंग के ज़रिए उन्होंने यूपीआई के बारे में जाना और अपने व्यापार को शुरू किया.

प्रियंका कहती हैं, ''डिजिटल इकोसिस्टम ने मुझे अपने पैरों पर मज़बूती से खड़ा होने में मदद की है. फोन पर ऑर्डर मिलने से लेकर, जो वेंडर मेरा सामान स्टोर और पैक करते हैं, उनके पेमेंट तक, ये सब मैंने स्कैन-एंड-पे सिस्टम के ज़रिए किया है. मेरे दस्तावेज़ चोरी हो गए थे और पैसा भी चला गया. यूपीआई सिस्टम की वजह से मैंने इन चुनौतियों को पीछे छोड़ा और कारोबार को आगे बढ़ाया.''

प्रियंका उन 44 करोड़ डिजिटल ट्रांजेक्शन करने वालों में से एक हैं, जो हर रोज़ देश में स्वदेशी स्कैन-एंड-पे यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस (यूपीआई) का इस्तेमाल कर रही हैं.

इसे भारत के डिजिटल आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा क़दम माना जाता है.

कई बैंक खातों को एक ही मोबाइल ऐप पर लाकर और कई सारे बैंकिंग सुविधाओं के साथ कारोबारियों को भुगतान करने की सुविधा दी जा रही है.

ऐसे में सिर्फ़ 2024 में ही यूपीआई के जरिए 131 अरब ट्रांजेक्शन दर्ज़ हुए हैं, जिनकी कुल क़ीमत 2.39 ट्रिलियन डॉलर है.

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल असमानता और इंटरनेट की पहुंच जैसी गंभीर चुनौतियों पर ध्यान देने की ज़रूरत बनी हुई है.

हर रोज़ होने वाले इस ट्रांजेक्शन की संख्या 2026-27 तक एक अरब तक पहुंचने का अनुमान है.

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, साल 2022 में दुनियभर में की गई सभी रीयल टाइम पेमेंट का 46 फ़ीसदी भारत से ही किया गया.

यूपीआई पेमेंट के मामले में भारत डिजिटल पेमेंट करने वाले चार बड़े देशों को पीछे छोड़ चुका है, चीन और अमेरिका भी इसमें शामिल हैं.

''पैसा ही आज़ादी है''

देश में काम करने वाले लोगों में से 90 फ़ीसदी अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं.

शहरी क्षेत्रों और दिल्ली में ये अनुपात 80 फ़ीसदी का है. इन्हीं लोगों में से एक हैं दिल्ली की अंजु.

48 साल की अंजु को प्लास्टिक के 1200 फूल जोड़ने पर दिन में एक डॉलर यानी क़रीब 83 रुपये से भी कम मिलता है.

अंजु की दूसरी भूमिकाओं में अपना घर चलाना और बतौर सिंगल मदर अपने बेटों और बुज़ुर्ग ससुर की देखभाल शामिल है.

वो कहती हैं, ''पहले बिचौलिए ये वादा करते थे कि वो हमारी दिहाड़ी भेज देंगे या अपने सहूलियत से पैसा ले आएंगे. लेकिन अब हमें हमारी कमाई तुरंत मिल जाती है और वो भी पूरी ज़िम्मेदारी के साथ.''

अंजु कहती हैं, ''सिंगल मदर होने का मतलब ये था कि मैंने कभी अपने घर के बाहर क़दम तक नहीं रखा था. अब डिजिटल पेमेंट की वजह से मैं अपनी सुविधा के हिसाब से घर चला पाती हूं.''

आर्थिक विश्लेषक चार्ल्स असीसी मोबाइल बेस्ड डिजिटल पेमेंट सिस्टम को तकनीक में नएपन के अलावा ''वित्तीय स्वतंत्रता का माध्यम'' मानते हैं.

वो कहते हैं, ''जब आपके पास सीधे पैसा भेजने का सिस्टम होता है, ऐसे पैसे में सामाजिक कल्याण के योजनाओं के ज़रिए भेजे जाने वाली सरकारी मदद भी शामिल हैं, जो ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़ों में भेजे जाते हैं, तब लोग ख़ुद को सशक्त महसूस करते हैं. आख़िरकार, पैसा ही तो आज़ादी है.''

एक अरब से ज़्यादा लोगों के लिए डिजिटल सिस्टम बनाना, तब जब इसमें से एक बड़ी आबादी डिजिटल असमानता और इंटरनेट की पहुंच की समस्या से जूझ रही है, एक ऐसा काम था जिसे ज़ीरो से शुरू करना था. मतलब ये है कि ज़ीरो से एक डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) को तैयार करना.

चुनौतियां

भारत के डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को अब दुनिया के कुछ देश अपना रहे हैं. लेकिन इसके साथ ही चुनौतियां भी बढ़ती जा रही हैं.

भारत की क़रीब 70 फ़ीसदी आबादी तक डिजिटल सर्विस की या तो पहुंच नहीं है या बेहद कम है. इस चुनौती को महिलाओं का आंकड़ा और गंभीर बना देता है.

महिलाएं, पुरुषों की तुलना में 41 फ़ीसदी कम मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल करती हैं.

भारत के 94 फ़ीसदी गांवों में कम से कम एक मोबाइल टावर है लेकिन इसकी गांव के हर कोने में पहुंच नहीं होती है. इन सबके बीच गुजरात का अकोदरा एक दशक पहले ही डिजिटल हो गया था.

वो ऐसा करने वाला देश का पहला गांव बना. भारत के दूरदराज के इलाक़े धीरे-धीरे कनेक्टिविटी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

झारखंड का एक छोटा सा आदिवासी गांव लोढ़ाई, जो देश की राजधानी से क़रीब एक हज़ार किलोमीटर दूर है. यहां के लोगों ने डिजिटल कनेक्शन हासिल करने के लिए सालों तक संघर्ष किया.

लोढ़ाई अब भी स्थिर इंटरनेट कनेक्शन से दूर है. लेकिन यहां की क़रीब 15 हज़ार की आबादी, जिसमें से ज़्यादातर जनजाति समुदाय से हैं, इन लोगों ने सस्ता समाधान निकाला है.

हर सुबह, दुकानदार अपने मोबाइल डिवाइस को सावधानी से पैक करके 20 से 30 फ़ुट की ऊंचाई पर लटका देते हैं ताकि उन्हें स्थिर इंटरनेट कनेक्टिविटी मिल सके. इस क़दम से दुकानों पर जो मोबाइल या लैपटॉप लगे होते हैं, उन्हें हॉट स्पॉट की तरह इंटरनेट मिल जाता है.

गाँव वालों को दस्तावेज़ मुहैया कराने वाले प्रज्ञा सेंटर नाम की दुकान के युवा प्रबंधक जॉन बंदिया कहते हैं, ''हम पहले नेटवर्क के लिए अपनी छतों पर चढ़ जाते थे. फिर हमने सोचा, हम दुकानों या बाज़ारों के लिए क्या कर सकते हैं? इस नई पहल के साथ हम अब दुनिया से कनेक्ट कर सकते हैं. हम पैसा, मैसेज और बहुत कुछ भेजने में सक्षम हैं.''

जॉन के बगल में ही बैठे एक ग्रामीण विश्वनाथ कंडैथ इस तरह के संघर्ष को याद करते हुए कहते हैं, ''हमारे पास स्मार्टफोन है, तब भी हम पर्याप्त इंटरनेट कनेक्शन पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हम भी भारत के दूसरे लोगों की तरह इसमें आसानी चाहते हैं.''

सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज इन चुनौतियों को बख़ूबी समझती हैं.

वो कहती हैं, ''भारत ने डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा में अहम क़दम उठाए हैं. साथ ही रिकॉर्ड्स और जानकारी के डिजिटलीकरण की दिशा में भी काम किया है. यहां सशक्तीकरण की अपार मौक़े हैं, ख़ासतौर पर उन लोगों के लिए जो समाज में हाशिए पर हैं. अब भी पहुंच का मुद्दा बना हुआ है और हमें ये समझना होगा कि डिजिटल सेटअप में कैशलेस अर्थव्यवस्था के लिए लोग हमेशा सक्षम नहीं होते हैं.''

वो कहती हैं, ''चुनौतियों के बारे में सोचना ज़रूरी है, जिससे कि ग्रामीण क्षेत्र के लोग पीछे न छूट जाएं. अगर किसी को दिक्क़त होती है तो वित्तीय धोखाधड़ी को ख़त्म करने के लिए शिकायत निवारण तंत्र होना चाहिए.''

कई देशों में अपनाया जा रहा है भारत का मॉडल

2025 के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में दुनिया के 50 फ़ीसदी रीयल टाइम डिजिटल पेमेंट हो रहे हैं और यूपीआई सिस्टम को दुनियाभर में मान्यता मिल रही है. यूपीआई सर्विस श्रीलंका, मॉरिशस, भूटान और नेपाल जैसे देशों में शुरू हो चुकी है.

मालदीव ने अपने देश में शुरू करने के लिए साझेदारी की है. ये सिस्टम दूसरे देश के नागरिकों के लिए आसान है, वो आसानी से अपने किसी भी बैंक कार्ड के ज़रिए यूपीआई डिजिटल वॉलेट में पैसा रख सकते हैं और फिर उसका इस्तेमाल किसी भारतीय कारोबार के लिए कर सकते हैं.

एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व ने भारतीय मॉडल को अपने-अपने देशों में लागू करने में दिलचस्पी दिखाई है. दूसरे देशों में जैसे फ्रांस ने भारतीय पर्यटकों के लिए यूपीआई क्यूआर कोड के इस्तेमाल की शुरुआत कर दी है.

अप्रैल, 2016 में लॉन्च किए गए यूपीआई को नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) नियंत्रित करता है. ये यूपीआई पेमेंट को नियंत्रित करने वाला एक सरकारी निकाय है.

हालांकि, यूपीआई की कामयाबी की भविष्यवाणी 2016 से बहुत पहले ही की जा चुकी थी.

भारत का डिजिटल आइडेंटिटी प्रोजेक्ट या यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (UIDAI) जिसे आधार के नाम से भी जाना जाता है, ये साल 2009 में लाया गया था. इसे कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन सरकार के वक़्त लाया गया था.

उस वक़्त इसके पीछे की सोच ये थी कि हर भारतीय को एक 12 अंकों वाली पहचान संख्या दी जाए, जिसका इस्तेमाल अलग-अलग सेवाओं में किया जा सके.

बैंकिंग सेवा को आधार नंबरों से जोड़ा गया, जिससे लाखों लोगों को अपने मोबाइल नंबर के ज़रिए बैंक खाता खोलने की सुविधा मिली.

इससे देश में साल 2013 से 2017 के बीच रिकॉर्ड संख्या में बैंक अकाउंट खोले गए, ये संख्या दुनिया भर में खोले गए सभी खातों का आधा था.

भारत सरकार के पूर्व वित्तीय सलाहकार अशोक पाल सिंह, ऐसे लोगों में शामिल थे, जिन्होंने देश में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए नीतियां बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. वे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) में वित्तीय समावेशन के प्रमुख रह चुके हैं.

वो कहते हैं, ''सरकारी बैंकों ने कैशलेस बदलाव की दिशा में शुरुआती भूमिका निभाई थी. छोटे यूनिट्स को उस वक़्त बिज़नेस कॉरस्पॉन्डेंस के तौर पर इस्तेमाल किया गया और बैंकिंग के कामकाज़ में उन्हें लगाया गया. बैंकिंग के लिए एक यूनिक आईडी बनाना एक ऐसा काम बन गया, जो पहले कभी भी नहीं देखा गया.''

ऐसे में दुनिया भारत से क्या सीख सकती है?

अशोक पाल सिंह कहते हैं, ''पहला है, तकनीक आधारित प्लेटफॉर्म और ओपन सिस्टम मॉडल बनाना. दूसरी, वो चीज़ है जो भारत और बेहतर कर सकता है और दूसरे देश हमारे मॉडल से सीख सकते हैं, वो है कि स्टेट या सरकार आधारित एकाधिकार मॉडल नहीं बनाना और इसे बाज़ार को अपने हिसाब से तैयार करने देना.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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