इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का चुनावी फंडिंग पर क्या असर होगा?

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    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

शुरू से ही विवादों में घिरी केंद्र सरकार की इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक क़रार दिया है.

इस स्कीम के तहत जनवरी 2018 और जनवरी 2024 के बीच 16,518 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे गए थे और इसमें से ज़्यादातर राशि राजनीतिक दलों को चुनावी फंडिंग के तौर पर दी गई थी.

पिछले कुछ सालों में सामने आई रिपोर्ट्स में ये पता चला कि इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को मिला था.

इन बॉन्ड्स पर पारदर्शिता को लेकर कई सवाल उठ रहे थे और ये आरोप लग रहा था कि ये योजना मनी लॉन्डरिंग या काले धन को सफ़ेद करने के लिए इस्तेमाल हो रही थी.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मायने

किस राजनीतिक दल को कितना मिला चंदा
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इलेक्टोरल बॉन्ड्स की वैधता पर सवाल उठाते हुए एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर), कॉमन कॉज़ और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी समेत पांच याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.

एडीआर के संस्थापक और ट्रस्टी प्रोफ़ेसर जगदीप छोकर कहते हैं, "ये फैसला क़ाबिल-ए तारीफ़ है. इसका असर ये होगा कि इलेक्टोरल बॉन्ड्स स्कीम बंद हो जाएगी और जो कॉरपोरेट्स की तरफ से राजनीतिक दलों को पैसा दिया जाता था जिसके बारे में आम जनता को कुछ भी पता नहीं होता था, वो बंद हो जाएगा. इस मामले में जो पारदर्शिता इलेक्टोरल बॉन्ड्स स्कीम ने ख़त्म की थी वो वापस आ जाएगी."

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को राजनीतिक पार्टियों को इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए मिली धनराशि की जानकारी 6 मार्च तक चुनाव आयोग को देनी होगी. ये जानकारी चुनाव आयोग को 13 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करनी होगी.

इस जानकारी के सार्वजनिक होने पर ये साफ़ हो जाएगा कि किसने इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदा और किसे दिया.

इस मामले से बतौर याचिकाकर्ता जुड़े रहे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी कहते हैं, "इस फैसले का हम स्वागत करते हैं. ये स्कीम असंवैधानिक थी और लेवल प्लेइंग फील्ड (समान अवसर) को ख़त्म करती थी. अगले तीन हफ़्तों में ये जानकारी सार्वजानिक करनी होगी कि किसने इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे और किसे दान दिया. तो अब पता चलेगा कि क्या क्विड प्रो क्वो (कुछ पाने के एवज़ में कुछ देना) हुआ, किस से कितना लिया और उनके लिए क्या किया."

येचुरी कहते हैं कि शुरू से ही उनकी और उनकी पार्टी की राय ये थी कि इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक भ्रष्टाचार को वैध बनाने का साधन है.

वो कहते हैं, "इसलिए हमने विरोध किया और तब से लेकर आज तक हमारी पार्टी ने एक भी इलेक्टोरल बॉन्ड स्वीकार नहीं किया. बाकी पार्टियां इलेक्टोरल बॉन्ड ले रही थीं लेकिन हमारी पार्टी नहीं ले रही थी इसीलिए कोर्ट ने हमारी याचिका को सुना."

क्या दानदाता चाहते थे गोपनीयता

बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद

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बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा, ''ये निर्णय एक बहुत ही प्रामाणिक उद्देश्य के लिए लाया गया था. चुनाव में पारदर्शिता हो फंडिंग में, इसके लिए लाया गया था. चुनाव में कैश का प्रभाव कम हो उसके लिए भी लाया गया था. इस बात को समझना बहुत ज़रूरी है. हमारे जितने चंदा देने वाले लोग हैं उनकी अपेक्षा थी कि उचित होगा कि हमारे लिए भी एक गोपनीयता रखी जाए.''

वो कहते हैं, ''ये बहुत अस्वाभाविक नहीं है. मैं आपको अपने राजनीतिक अनुभव से ये बात कहना चाहता हूँ. मान लीजिए कि कोई सरकार हार गई और उनके विरोधी दूसरी जगह आए तो वो चंदा देने वालों के ख़िलाफ़ हो जाते हैं. इसलिए कोई ईमानदारी से बिज़नेस कर रहे हैं तो वो अपना काम करें, ऐसा विचार था.''

रविशंकर ने कहा, ''माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला किया है. हम उनका सम्मान करते हैं. इस फैसले पर क्या बोलना है, निर्णय पढ़ने के बाद हम बताएँगे.''

'भष्टाचार पर से क़ानूनी जामा उतारा गया'

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ग्लोबल थिंक टैंक कार्नेगी एंडॉवमेंट में सीनियर फ़ेलो और निदेशक मिलन वैष्णव कहते हैं कि हम इस स्कीम के लागू होने से पहले की यथास्थिति पर वापस आ गए हैं, एक ऐसी स्थिति जिसकी ख़ासियत ऊँचे दर्जे की अपारदर्शिता भी थी.

वो कहते हैं, "अब यह सरकार पर निर्भर है कि वह संसद के साथ मिलकर एक नई प्रणाली तैयार करे जो व्यक्तियों और कॉरपोरेट्स दोनों की पारदर्शिता सुनिश्चित करे."

वैष्णव कहते हैं कि उनके लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला हैरान करने वाला है.

वे कहते हैं, "न्यायालय ने बार-बार सरकार के साथ सीधे टकराव से दूर रहने का विकल्प चुना है, ख़ासकर सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं या अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर. चूंकि ये फ़ैसला सर्वसम्मति से लिया गया है तो ये बताता है कि न्यायाधीशों ने दृढ़ता से महसूस किया कि बॉन्ड योजना संवैधानिक रूप से अस्थिर थी."

पत्रकार नितिन सेठी द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के सदस्य हैं और इलेक्टोरल बॉन्ड्स के मुद्दे पर इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग कर चुके हैं.

वो कहते हैं, "भ्रष्टाचार पर जो एक क़ानूनी जामा पहना दिया गया था वो सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड्स को रद्द करते हुए उतार दिया है. कोर्ट के फ़ैसले में कहा गया है कि अप्रैल 2019 से लेकर अभी तक जिन शैल कंपनियों ने इलेक्टोरल बॉन्ड के रास्ते से राजनीतिक दलों को पैसा दिया था वो पूरा ब्योरा बाहर आए. ये कोर्ट की तरफ से उठाया गया एक साहसिक क़दम है."

सेठी के मुताबिक़ ये याद रखना चाहिए कि "काला धन और बेहिसाब धन राजनीति में आने का ये एक ज़रिया है."

वो कहते हैं, "ये तो एक गदंगी थी जो और फैल गई थी लेकिन अभी बहुत से सुधारों की गुंजाइश है जो दिखता नहीं कि अभी जल्दी होंगे. आगे की तरफ देखें तो मुझे शक है कि सरकार नहीं चाहेगी कि ये बाहर आए कि कौन उनको पैसा देता था. हमने ये पाया था कि सबसे ज़्यादा पैसा इलेक्टोरल बॉन्ड से बीजेपी को और उन सरकारों को आता था जो राज्यों में सत्ता में हैं. मुझे लगता है कि कोशिश होगी कोर्ट के ज़रिए या किसी के ज़रिए केस फ़ाइल करके कि वो डेटा बाहर न आए. जो 16,500 करोड़ रुपये लिए गए उसका ब्यौरा बाहर न आए."

चुनावी फंडिंग पर क्या असर पड़ेगा?

भारत का सुप्रीम कोर्ट

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साल 2018 से पहले ये चर्चा होती थी की कैश से दिए गए चंदे की वजह से चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता नहीं है. इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को लाते वक़्त सरकार का कहना था कि ये स्कीम पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी.

अब जबकि इलेक्टोरल बॉन्ड्स को असंवैधानिक क़रार दे दिया गया है तो चुनावी फंडिंग पर इसका क्या असर पड़ेगा?

आर्थिक मामलों के जानकार और जेएनयू के पूर्व प्राध्यापक प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, "इलेक्टोरल बॉन्ड ख़त्म होने से चुनाव की फ़ंडिंग पर बहुत कम फ़र्क पड़ता है क्योंकि चुनावी फंडिंग का ज़्यादातर हिस्सा नक़दी में आता है. ये फ़ैसला केवल फंडिंग की पारदर्शिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. सत्तारूढ़ दल को धन मिलता रहेगा जबकि विपक्ष के धन का स्रोत कम हो जाएगा."

नितिन सेठी कहते हैं, "मुझे लगता है कि बहुत ज़्यादा असर नहीं होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इतनी देर कर दी कि तब तक सोलह हज़ार करोड़ रुपये कुछ सालों में ही जमा हो गए. एक 30 दिन की विंडो बची थी लोकसभा चुनाव से पहले जहाँ फिर से राजनीतिक दल फिर एक बार इलेक्टोरल बॉन्ड से पैसा लेते. राजनीतिक दलों का नुकसान समझें तो उनका 3-4 हज़ार करोड़ का नुकसान हो रहा है."

अब तक आ चुके पैसे का क्या?

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पांच फ़रवरी को वित्त मंत्रालय ने संसद में बताया कि 30 चरणों में अब तक 16,518 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे गए.

माना जा रहा है कि इसमें से ज़्यादातर बॉन्ड राजनीतिक पार्टियों ने भुना लिए हैं.

तो सवाल ये भी उठ रहा है कि जिस स्कीम के तहत पार्टियों को इतना पैसा मिला, क्या वो पैसा वापस नहीं किया जाना चाहिए जब वो स्कीम ही रद्द कर दी गई है?

मिलन वैष्णव कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने पार्टियों को उन बॉन्ड्स को वापस करने का निर्देश दिया है जिन्हें भुनाया नहीं गया है. यह उचित प्रतीत होता है. पार्टियों के लिए पहले ही खर्च किया जा चुका पैसा लौटाना मुश्किल होगा."

सीताराम येचुरी कहते हैं, "सही तो यही होगा कि पैसा वापस किया जाए क्योंकि ये स्कीम ही असंवैधानिक है. लेकिन हम चाहते हैं कि जिन कंपनियों ने ये पैसा राजनीतिक दलों को दान किया ये उन्हें वापस न जाए. ये पैसा सरकारी खाते में जमा होना चाहिए और चुनावों के स्टेट फंडिंग की योजना को शुरू किया जाना चाहिए."

तो क्या अब पारदर्शिता आएगी?

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सीताराम येचुरी के मुताबिक़, पारदर्शिता तभी आएगी जब चुनावों की फंडिंग राज्य करेगा और राजनीतिक दलों के चुनाव खर्च की सीमा तय की जाएगी.

वो कहते हैं, "अभी सिर्फ़ उम्मीदवारों के चुनाव खर्च की सीमा तय है और पार्टियां ये कह कर बच निकलती हैं कि खर्चा पार्टी ने किया उम्मीदवार ने नहीं. इस वजह से धांधली होती है. जब पार्टियों के खर्चे की भी सीमा तय होगी और पार्टियों को इसका का लेखा जोखा देना होगा, तभी पारदर्शिता आएगी."

येचुरी कहते हैं कि जब तीन हफ़्तों बाद ये जानकारी सामने आएगी कि किसने इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे और किस पार्टी को दिए तब ये पता चलेगा कि आगे और क्या करने की ज़रूरत है.

जगदीप छोकर कहते हैं कि पारदर्शिता को लेकर जो चिंताएं थीं वो इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम आने से ख़त्म नहीं हुई बल्कि पहले से ज़्यादा बढ़ गई थी क्योंकि इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम ने काले धन को राजनीतिक दलों को देने के ज़रिए सफ़ेद करने का तरीक़ा क़ानूनी बना दिया था.

वो कहते हैं, "पहले ये होता था कि जब काला धन सफ़ेद होता था और कोई उसको पकड़ लेता था तो वो एक क़ानूनी जुर्म होता था. इलेक्टोरल बॉन्ड्स स्कीम ने काले धन को राजनीतिक पार्टियों को देकर सफ़ेद बनाने को क़ानूनी बना दिया था. तो हालत जैसे 2017 में थे वैसे ही रहेंगे. जो हालात इलेक्टोरल बॉन्ड ने पहले से ज़्यादा ख़राब कर दिए थे वो अतिरिक्त ख़राबी अब दूर हो जाएगी.”

“इसे ऐसे समझिए. पहले हमें मानिए 70 चिंताएं थी... इलेक्टोरल बॉन्ड आने के बाद हमारी चिंताएं 100 हो गई. अब वो 30 चिंताएं हट गई और हम वापस 70 चिंताओं पर आ गए हैं."

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नितिन सेठी कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि "सरकार की मंशा है कि पारदर्शिता आए."

वे कहते हैं, "ये वो सरकार है जो नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर क़ानून में कमज़ोरी डालकर चुनाव आयोग के ही दांत तोड़ रही थी . इस सरकार की मंशा दस साल में नहीं दिखी कि वो चुनावी फंडिंग के रास्ते पारदर्शी करना चाह रही है. ये भी है कि इस समय सरकार में रहते हुए भाजपा ने जितना पैसा जमा किया है वो अगली तीन पार्टियों को मिलाकर भी ज़्यादा बनता है. ''

नितिन सेठी बोले, ''पार्टी के पास पैसा इलेक्टोरल बॉन्ड से भी आया, अन्य रास्ते से भी आया... तो चेक और कैश भी आया. इलेक्टोरल बॉन्ड से पैसा बढ़ता जा रहा था लेकिन अभी भी कैश का इस्तेमाल राजनीतिक दलों में बहुत ज़्यादा है. बाक़ी रास्ते तो अभी खुले हैं. उन रास्तों से पार्टियां पैसे जमा करती रहेंगी और इलेक्शन कमीशन इतना कमज़ोर हो जाएगा कि वो खर्चे पर नज़र रखने का केवल ड्रामा करता रहेगा और पार्टियां अपना धंधा चलाती रहेंगी."

मिलन वैष्णव कहते हैं, "हालांकि सरकार को फटकार लगाई गई है, पर अगर उसने एक नई पारदर्शी व्यवस्था बनाई तो उसे बड़े राजनीतिक लाभ मिल सकते हैं. आख़िरकार, सत्तारूढ़ दल की स्थिति सुरक्षित है और उसे पहले से ही छह साल के बॉन्ड से लाभ हुआ है, जिससे उसे अपनी स्थिति को और मजबूत करने में मदद मिली है. मुझे शक है कि वो इस दिशा में जाएंगे लेकिन उनके पास इस पर हार के जबड़े से जीत छीनने का ये एक रास्ता है."

क्या कुछ और किया जाना चाहिए था?

चुनाव आयोग की झांकी

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कई विशेषज्ञों का मानना है कि गुरुवार के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से इलेक्टोरल बॉन्ड पर तो रोक लग गई लेकिन इन योजना की वजह से जो कथित भ्रष्टाचार हुआ है उस की तह तक पहुँचने की कोशिश अभी बाकी है.

नितिन सेठी कहते हैं, "कौन सी ऐसी शैल कंपनियां है जो बिना मुनाफा कमाए भी राजनीतिक दलों को पैसा देना चाह रही थी और किस वजह से देना चाह रही थी. मेरे मानना है कि एक कमीशन बैठनी चाहिए थी जो पता लगाता कि किन किन लोगों ने पैसा दिया और इससे उनको क्या-क्या फ़ायदे मिले. ''

''नकली कंपनियां जो पैसा दे रही थीं वो कुछ काम निकालने के लिए दे रही थीं. वो इन्वेस्टमेंट के तौर पर नेता को पैसा दे रही थीं कि एक रुपये दिए तो पांच वापस मिलेंगे. तो एक कमीशन बैठनी चाहिए थी जो देखती कि पिछले चार-पांच सालों के दरम्यान उन कंपनियों के पक्ष में क्या नीतियां बनाई गईं."

Reporters Collective Website
ये मुद्दा सिर्फ़ राजनीतिक फंडिंग का नहीं बल्कि भ्रष्टाचार का भी है. तो ये भ्रष्टाचार की नब्ज़ पकड़ने का एक अच्छा मौका था.
नीतिन सेठी
पत्रकार, द रिपोर्टर्स कलेक्टिव

वे कहते हैं, ''ये मुद्दा सिर्फ़ राजनीतिक फंडिंग का नहीं बल्कि भ्रष्टाचार का भी है तो ये भ्रष्टाचार की नब्ज़ पकड़ने का एक अच्छा मौका था."

सेठी के मुताबिक़, चूंकि पार्टियों के पैसा आने के कई ज़रिए हैं जिनमें से इलेक्टोरल बॉन्ड एक है तो "जो पैसा अलग-अलग तरीक़ों से जमा हो गया उस पर सुप्रीम कोर्ट का आर्डर कोई घात नहीं करता है."

वे कहते हैं, "ये एक मौका था सुप्रीम कोर्ट के पास कि वो एक ज़्यादा सुधार करने वाला फ़ैसला दे सकता था जिसमें बाकी रास्ते भी बंद हों और पूरी पारदर्शिता आए. पारदर्शिता की तरफ़ सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर में जगह नहीं है. कोर्ट ने ख़ुद को इलेक्टोरल बॉन्ड को बंद करने तक सीमित रखा. हम ख़ुश हैं कि ऐसा हुआ. ग़नीमत है कि ये तो हुआ लेकिन हमारे इलेक्टोरल सिस्टम को बदलने के लिए ये काफ़ी नहीं है."

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