पीएम मोदी ने कहा- बात हुई लेकिन अमेरिका के बयान से बांग्लादेश ग़ायब क्यों, छिड़ी बहस

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26 अगस्त को पीएम नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के बीच फ़ोन पर बात हुई. इस बातचीत के बाद दोनों देशों की ओर से बयान जारी किया गया.
दोनों देशों के बयानों में सिर्फ़ एक फ़र्क़ ये रहा कि भारत की ओर से बताया गया कि मोदी-बाइडन के बीच बांग्लादेश के मुद्दे पर भी बात हुई.
वहीं अमेरिकी व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में बांग्लादेश का नाम तक नहीं दिखा.
भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक़, दोनों नेताओं ने बांग्लादेश के मुद्दे पर चिंता ज़ाहिर की और क़ानून व्यवस्था के फिर से स्थापित होने पर ज़ोर दिया ताकि अल्पसंख्यकों ख़ासकर हिंदुओं की सुरक्षा सुनश्चित की जा सके.
अब इस मुद्दे पर ये चर्चा हो रही है कि आख़िर अमेरिका के बयान में बांग्लादेश का ज़िक्र क्यों नहीं है?
भारत से लेकर बांग्लादेश तक इस मुद्दे पर प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही है. इसके लेकर काफ़ी बहस हो रही है कि भारत ने जो बात कही, उस पर अमेरिका चुप क्यों रहा?

कांग्रेस ने उठाया सवाल
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर लिखा, ''अगर हमारे प्रधानमंत्री ने बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों ख़ासकर हिंदुओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था तो जो बाइडन को क्यों ये ज़रूरी नहीं लगा कि इसे प्रेस नोट में बताया जाए?''
खेड़ा ने सवाल उठाया कि जब हमारे प्रेस नोट में बांग्लादेश का ज़िक्र है तो अमेरिका के प्रेस नोट में क्यों नहीं है?
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सलाहकार कंचन गुप्ता ने इसका जवाब देते हुए लिखा, ''बाइडन, मोदी की बातचीत को पवन खेड़ा ग़लत तरीक़े से पेश कर रहे हैं. भारत सरकार की प्रेस रिलीज़ में कही गई हर बात पर चर्चा हुई. इसमें बांग्लादेश के हालात पर हुई चर्चा भी शामिल है. भारत सरकार का बयान बातचीत को सही ढंग से पेश करता है. ये आम चलन है कि बातचीत के बाद दो देश अलग-अलग बयान जारी करते हैं. जिन मुद्दों पर बात हुई, उनमें से कुछ का ज़िक्र बयान में हो सकता है और कुछ का नहीं.''
उन्होंने कहा, ''जब साझा प्रेस रिलीज़ या बयान जारी होता है तभी दोनों के बयान एक जैसे हो सकते हैं. किसी एक प्रेस रिलीज़ में कोई बात नहीं है तो उस पर चर्चा ही नहीं हुई- ये कहना ग़लत है.''
पूर्व विदेश सचिव और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार कंवल सिब्बल ने इस ट्वीट को साझा करते हुए लिखा, ''अगर किसी को कूटनीति से जुड़ी परंपराओं की जानकारी नहीं है तो बेहतर है वो चुप रहे.''
ऐसा नहीं है कि भारत और अमेरिका की प्रेस रिलीज़ में फ़र्क़ को सिर्फ़ भारत में ही नोटिस किया गया. बांग्लादेश में भी मुख्य विपक्षी दल बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) ने इस पर प्रतिक्रिया दी है.
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया की बीएनपी के सोशल मीडिया हैंडल्स की ओर से दोनों देशों के बयान को एक साथ साझा किया गया और लिखा गया- दो आधिकारिक बयान एक-दूसरे के साथ-साथ.
पत्रकार आदित्य राज कौल ने इस ट्वीट को री-ट्वीट करते हुए लिखा, '' बांग्लादेश में हिंदुओं पर भारतीय पीएम के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की हुई बातचीत को अमेरिका ने अपने बयान में जगह नहीं दी तो ख़ालिदा की पार्टी कटाक्ष कर रही है. एक तरह से बांग्लादेश की एक बड़ी राजनीतिक पार्टी अल्पसंख्यकों का मखौल उड़ा रही है. शर्मनाक.''
पांच अगस्त को जब शेख़ हसीना के हाथ से सत्ता चली गई थी, उसके बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा पर बहस हो रही है.

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क्या कह रहे हैं विश्लेषक
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने एक्स पर लिखा, ''व्हाइट हाउस के बयान में बांग्लादेश का कोई ज़िक्र नहीं है. अल्पसंख्यकों ख़ासकर हिंदुओं की सुरक्षा का ज़िक्र तक नहीं किया गया है. बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा पर चिंता व्यक्त करने का एक और मौक़ा अमेरिका चूक गया है. अमेरिका सिर्फ़ भारत में अल्पसंख्यकों पर चिंतित रहता है. साफ़ है कि अमेरिका बांग्लादेश के उस नैरेटिव को ही सही मान रहा है कि वहां अल्पसंख्यक हिंदू सुरक्षित हैं और उनकी दुर्दशा की ख़बरें सही नहीं हैं.''
इसी ट्वीट के जवाब में रिसर्चर सुमित कोचर कहते हैं- अमेरिका के बयान में बांग्लादेश का कोई ज़िक्र नहीं है और न ही हिंदुओं की सुरक्षा का. देखना है तो आप ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बनीज़ के बयान को देखिए.
ऑस्ट्रेलियाई पीएम ने जन्माष्टमी के मौक़े पर पीएम मोदी से बात की थी. तब दोनों राष्ट्रप्रमुखों की ओर से जो बयान जारी किया गया था, वो एक जैसा था.
इस पर कंवल सिब्बल ने कहा- ऑस्ट्रेलिया पीएम का सहानुभूति से भरा संदेश.
अपने दूसरे ट्वीट में सिब्बल कहते हैं- अमेरिका के लिए बांग्लादेश में कोई समस्या है ही नहीं. अमेरिकी विदेश मंत्रालय के लिए कोई एक समस्या है तो वो है- भारत में अल्पसंख्यकों की समस्या.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने सोशल मीडिया पर लिखा, ''अमेरिका नहीं चाहता था कि बांग्लादेश बने. आज भी बांग्लादेश के मुद्दे पर अमेरिका और भारत एकमत नहीं हैं. अमेरिका ने बांग्लादेश में सत्ता बदलने का स्वागत किया मगर वो मानवाधिकार उल्लंघन, अल्पसंख्यकों पर हमले, जबरन इस्तीफे़ दिलाने और नेताओं को हिरासत में लिए जाने पर चुप रहता है.''
चेलानी कहते हैं, ''जब बाइडन ने मोदी को फोन किया तो बांग्लादेश के मुद्दे पर चर्चा हुई. भारत के बयान से ये पता चलता है. लेकिन अमेरिका के बयान में बांग्लादेश के बारे में हुई बातचीत का ज़िक्र नहीं मिलता.''

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बांग्लादेश पर अमेरिका के रुख़ के मायने
बांग्लादेश में हुए बड़े सियासी बदलाव के पीछे कुछ लोगों ने उंगली अमेरिका की तरफ़ भी उठाई थी.
जब बांग्लादेश में आम चुनाव हुए थे, तब अमेरिका ने चुनावों के निष्पक्ष तरह से ना कराए जाने जैसी बातें कही थीं.
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो बीते साल भारत ने अमेरिका को सतर्क किया था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के मुद्दे पर अमेरिकी दबाव बांग्लादेश को चीन के क़रीब धकेल सकता है और इसका क्षेत्र पर असर पड़ेगा.
ये अगस्त 2023 की बात थी. इसके एक साल बाद बांग्लादेश में हिंसक आंदोलन के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ.
बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख़ हसीना ने अप्रैल 2023 में संसद में अमेरिका का नाम लिए बगैर कहा था- वे चाहें तो किसी भी देश की सत्ता पलट सकते हैं.
हसीना ने ये बयान तब दिया था, जब बांग्लादेश के तत्कालीन विदेश मंत्री डॉ मोमिन अमेरिका के दौरे पर थे. इस दौरान एंटनी ब्लिंकन ने कहा था- अमेरिका बांग्लादेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होते देखना चाहता है.
शेख़ हसीना ने अमेरिका पर अपराधियों को पनाह देने का भी आरोप लगाया था.
जब शेख़ हसीना के हाथ से हाल ही में सत्ता छिनी तो उनके बेटे सजीब वाजिद ने पश्चिमी देशों की भूमिका पर बात की थी.
वाजिद ने कहा था- इस बात के सुबूत नहीं हैं कि अमेरिका इसमें शामिल था या नहीं. लेकिन हालात पर गौर करें तो पाएंगे कि सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शनकारियों को भड़काया गया.
2021 और 2023 में अमेरिका ने बांग्लादेश को डेमोक्रेसी सम्मेलन में शामिल नहीं किया था. जानकारों की मानें तो बांग्लादेश में हो रही कई चीज़ों को लेकर अमेरिका में नाराज़गी थी.
दिसंबर 2021 में अमेरिका ने बांग्लादेश के अर्धसैनिक बल रैपिड एक्शन बटालियन और इसके कई वरिष्ठ अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाए थे.
मई 2023 में अमेरिका ने बांग्लादेश की चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करने वाले लोगों पर वीज़ा प्रतिबंध लगाने की चेतावनी भी दी थी.

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अमेरिका ने बांग्लादेश पर क्या नीति बदली
प्रोथोमालो वेबसाइट ने जून 2023 में शेख़ हसीना के हवाले से एक बयान छापा था. इस बयान के मुताबिक़- अगर सेंट मार्टिन आईलैंड लीज़ पर दे दिया तो सत्ता में बने रहने में कोई दिक़्क़त नहीं होगी, पर मैं ऐसा नहीं करूंगी.
जब हाल ही में शेख़ हसीना से सत्ता छिनी तो ये बयान फिर चर्चा में आ गया. इसके बाद शेख़ हसीना के बेटे वाजिद ने इस बयान के हवाले से छपी रिपोर्ट्स को ग़लत बताया.
जियो पॉलिटिकल लिहाज़ से बांग्लादेश को दक्षिण एशिया में काफ़ी अहम माना जाता है.
अमेरिका की इलिनोइस स्टेट यूनिवर्सिटी में 'शासन और राजनीति' के जाने-माने प्रोफ़ेसर अली रियाज़ ने जनवरी 2022 में बीबीसी से कहा था, ''मेरा अनुमान है कि भारत और पाकिस्तान को छोड़कर दक्षिण एशिया के देशों जैसे श्रीलंका, मालदीव, नेपाल को लेकर अमेरिका वाक़ई पुनर्विचार कर रहा है.''
अमेरिका के थिंक टैंक 'रैंड कॉर्पोरेशन' में सेंटर फ़ॉर एशिया-पैसिफ़िक पॉलिसी के निदेशक रफ़ीक़ दोसानी ने भी कहा था, ''मुझे लगता है कि ट्रेंड बिल्कुल साफ़ है कि अमेरिका, भारत पर बांग्लादेश की निर्भरता घटाना चाहता है. वो ये भी चाहता है कि इस क्षेत्र पर भारत का प्रभुत्व न रहे."

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भारत में शेख़ हसीना
बांग्लादेश से शेख़ हसीना जब निकलीं तो उन्होंने भारत आना चुना. शेख़ हसीना को भारत के प्रति झुकाव वाला माना जाता रहा है.
अतीत में बांग्लादेश में वो इस मुद्दे को लेकर घेरी भी जाती रही हैं.
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संसद में कहा था कि कुछ लम्हों के लिए भारत में हैं.
क्या शेख़ हसीना के भारत में होने से बांग्लादेश से संबंधों पर असर होगा? बांग्लादेश की नई अंतरिम सरकार ने इससे इनकार किया था.
अंतरिम सरकार में विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहिद हुसैन ने कहा था कि बांग्लादेश हमेशा भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश करेगा.
द्विपक्षीय रिश्तों को बड़ा मसला बताते हुए हुसैन ने जवाब दिया था, "ये एक काल्पनिक सवाल है. अगर कोई किसी देश में रहता है तो उस देश से द्विपक्षीय रिश्ते क्यों प्रभावित होंगे? इसकी कोई वजह नहीं है."
हालांकि बांग्लादेश के लेखक और पत्रकार अहमद हुसैन ने द वायर में एक लेख लिखा है.
हुसैन इस लेख में कहते हैं- भारत को बांग्लादेश में नए दोस्त तलाशने होंगे क्योंकि उसकी पुरानी नीति नाकाम रही है. भारत के पुराने दोस्त जनता की नज़र से दूर जा चुके हैं.
हालांकि भारत ने मोहम्मद यूनुस की नई अंतरिम सरकार से भी संबंध बनाने की शुरुआत की है. मोहम्मद युनूस ने भारतीय पीएम मोदी से बात भी की थी और दोनों नेताओं के बीच अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा पर भी बात की थी.
मगर बांग्लादेश में आई बाढ़ के कारण भारत से मतभेद सामने आ रहे हैं.
बांग्लादेश में कुछ संगठनों का दावा था कि देश में आई बाढ़ भारत के त्रिपुरा में बांधों से छोड़े पानी के कारण आई है. भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर इन आरोपों को ख़ारिज किया था.
अब अमेरिकी न्यूज़ चैनल सीएनएन बांग्लादेश की बाढ़ को कवर कर रहा है. इन रिपोर्ट्स में लोगों के किए दावों के हवाले से बाढ़ के लिए भारत को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है.
रिपोर्टर ये भी कहती सुनाई देती हैं कि भारत इन दावों को ख़ारिज करता है और भारत ने कोई माफ़ी नहीं मांगी है.
हाल ही में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने कवरेज के लिए वीज़ा चाह रहे पत्रकारों को अनुमति देने की बात कही थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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