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जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्लाह ने ली सीएम पद की शपथ, मुख्यमंत्री और एलजी मनोज सिन्हा के रिश्तों पर सबकी नज़र
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवादाता, दिल्ली
जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्लाह ने नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले ली है.
लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद और नई सरकार बनने से पहले जम्मू-कश्मीर के एलजी के नेतृत्व वाले प्रशासन के 24 घंटों के बीच लिए दो फ़ैसले चर्चा का विषय बन गए हैं.
अब जम्मू-कश्मीर एक केंद्र-शासित प्रदेश है इसलिए नई विधान सभा और नए मुख्यमंत्री के पास वैसी शक्तियां नहीं हैं जो एक राज्य की विधान सभा और मुख्यमंत्री के पास होती हैं.
लेकिन लेफ़्टिनेंट गवर्नर के प्रशासन के हालिया फ़ैसलों के बाद अटकलें लग रही हैं कि आने वाले दिनों में एलजी और मुख्यमंत्री के बीच शक्तियों को लेकर विवाद देखने को मिल सकता है.
हाल में लिए दो फ़ैसले क्या हैं?
दस अक्टूबर को जारी किए गए नए जम्मू और कश्मीर पुलिस (गज़ेटेड) सेवा भर्ती नियम, 2024 के तहत ये कहा गया है कि पुलिस में की जाने वाली सभी सीधी भर्तियां जम्मू-कश्मीर लोक सेवा आयोग करेगा.
साथ ही प्रमोशन या पदोन्नति के मामले डिपार्टमेंटल प्रमोशन कमिटी (डीपीसी) तय करेगी.
अतीत में पुलिस विभाग में रिक्तियों को भरने के लिए जम्मू-कश्मीर का अपना भर्ती बोर्ड था.
संशोधित नियमों के मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर पुलिस लेफ़्टिनेंट गवर्नर के नियंत्रण में आती है और उसके कामकाज में मुख्यमंत्री की कोई भूमिका नहीं होगी.
इस आदेश के एक दिन बाद 11 अक्टूबर को लेफ़्टिनेंट गवर्नर प्रशासन ने जम्मू और कश्मीर सिविल सेवा (विकेंद्रीकरण और भर्ती) अधिनियम, 2010 के तहत भर्ती नियमों में संशोधन को अधिसूचित किया.
इस संशोधन के मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर के सर्विस सिलेक्शन बोर्ड को सरकार के सभी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू), सरकारी कंपनियों, निगमों, और बोर्ड में सबोर्डिनेट सर्विसेज़ और नॉन-गज़ेटेड पदों के साथ-साथ चौथी श्रेणी (क्लास 4) की भर्तियां करने का भी अधिकार होगा.
इस आदेश का सीधा मतलब ये है कि नई सरकार के लिए क्लास 4 स्तर के खाली पदों को भरना भी मुश्किल होगा.
एलजी के अधिकार
इसी साल जुलाई में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक कार्यकारी अधिसूचना के ज़रिये ट्रांज़ैक्शन ऑफ़ बिज़नेस रूल्स में संशोधन करके जम्मू-कश्मीर के एलजी के प्रशासनिक अधिकारों को बढ़ा दिया था.
इन नए नियमों के तहत एलजी को उन ऑल इंडिया सर्विसेज़ के कामकाज पर अंतिम अधिकार दे दिया गया था जिनमे केंद्र शासित प्रदेश की वरिष्ठ नौकरशाही शामिल है.
नए नियमों के तहत एंटी-करप्शन ब्यूरो, डायरेक्टरेट ऑफ़ पब्लिक प्रॉसिक्युशन्स, जेल विभाग, और फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी को भी एलजी के नियंत्रण में दे दिया गया.
साथ ही इन नियमों में कहा गया कि एडवोकेट जनरल और अन्य लॉ अफ़सरों की नियुक्ति पर भी अंतिम मंज़ूरी एलजी की होगी.
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन एक्ट 2019 का सेक्शन 32(1) कहता है कि विधानसभा केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर के लिए क़ानून बना तो सकती है, लेकिन ऐसा वो उन्हीं मामलों में कर सकती है, जो स्टेट लिस्ट (राज्य सूची) में शामिल हैं.
लेकिन राज्य सूची में भी 'पब्लिक ऑर्डर' और 'पुलिस' से जुड़े मामलों पर केंद्र-शासित जम्मू-कश्मीर की विधान सभा क़ानून नहीं बना सकती.
इसी तरह विधान सभा कॉन्करेन्ट लिस्ट (समवर्ती सूची) में दर्ज मामलों में तभी क़ानून बना सकती है अगर वो मामले केंद्र शासित प्रदेशों से सम्बंधित हों.
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन एक्ट 2019 के सेक्शन 36 के मुताबिक़ वित्तीय मामलों से जुड़े कोई भी विधेयक लेफ़्टिनेंट गवर्नर की सिफ़ारिश से ही विधानसभा में पेश किए जा सकते हैं.
इसलिए इस बात की भी चर्चा है कि क्या एलजी की मंज़ूरी के बिना जम्मू-कश्मीर की नई सरकार कोई भी ऐसा काम कर पाएगी जिसमें सरकारी ख़जाने से पैसा ख़र्च किया जाना हो.
हाल में हुए ये कानूनी बदलाव एलजी और मुख्यमंत्री के बीच संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं.
दिल्ली भी एक केंद्र शासित राज्य है जहां मुख्यमंत्री और एलजी के बीच अधिकारों की जंग छिड़ी रहती है जिसमें कई बार सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा है.
शपथ से पहले किए गए बदलाव मुख्यमंत्री और एलजी के बीच संबंधों का असर डाल सकते हैं.
मुख्यमंत्री या मेयर?
जम्मू-कश्मीर चुनाव के नतीजे आने के एक दिन बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्लाह ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि ये वो असेंबली नहीं है जिस असेंबली का जम्मू-कश्मीर के लोग हक़ रखते हैं.
उन्होंने कहा, "ज़ाहिर सी बात है कि इस असेंबली में वो सारे इख़्तियारात नहीं है जो किसी एक रियासत को होने चाहिए. हमसे स्टेटहुड का दर्जा बिना किसी वजह से छीना गया."
जम्मू-कश्मीर में बहुत से लोगों का कहना है कि चूंकि जम्मू-कश्मीर के पास अभी राज्य का दर्जा नहीं है इसलिए अगले मुख्यमंत्री की हालत एक मेयर जैसी होगी.
यही बात जब बीबीसी ने उमर अब्दुल्लाह से पूछी तो उन्होंने कहा, "ये वो लोग कहते हैं जो इलेक्शन हारे हैं. मैं उन लोगों से ये बयान सुनता हूँ जिन्होंने हाल ही में इलेक्शन लड़ा. अगर उनको जम्मू कश्मीर की हुकूमत को एक मेयर के तौर पर देखते थे तो उन्होंने इलेक्शन लड़ा क्यों?"
"नहीं लड़ना चाहिए था. फिर बाहर रहते. मेयर और चीफ मिनिस्टर में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ होगा. आज भी अगर आप दिल्ली देखें तो दिल्ली के मेयर और दिल्ली के चीफ मिनिस्टर में फ़र्क़ तो है न?”
“जम्मू-कश्मीर में भी चलिए.. जो सेंट्रल सब्जेक्ट्स हैं वो हमारे दायरे में नहीं है. जो कंकररेंट लिस्ट के सब्जेक्ट्स हैं वो भी हमारे दायरे में नहीं हैं. लेकिन कई सारे स्टेट सब्जेक्ट्स हैं जो हमारे पास हैं. क्या उनपर हम कार्रवाई नहीं कर सकते? बिलकुल कर सकते हैं और करेंगे."
एक बड़ा सवाल ये है आने वाले वक़्त में जम्मू-कश्मीर के नए मुख्यमंत्री और लेफ़्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा के रिश्ते कैसे होंगे?
इस पर उमर अब्दुल्लाह ने कहा, "फिलहाल तो नेशनल कॉन्फ्रेंस का एलजी साहब के साथ कोई रिश्ता नहीं बना. शायद ही हमारी कहीं उनसे मीटिंग हुई है. लेकिन अब एक दूसरे के साथ काम करना सीखना पड़ेगा. एलजी साहब को भी सीखना पड़ेगा कि अब वो यहाँ पर आल पावरफुल नहीं हैं.”
“यहाँ चुनी हुई सरकार है. और चुनी हुई सरकार की भी अपनी ज़िम्मेदारियाँ हैं. और मिलकर हमें यहाँ लोगों के लिए काम करना होगा. हम झगड़ा करने के लिए नहीं आये हैं. और हम उम्मीद करेंगे कि चाहे राज भवन हो या मरकज़ की हुकूमत, वो भी कोई झगड़ा शुरू नहीं करना चाहेंगे."
शक्तियां परिभाषित करने की ज़रूरत?
श्रीनगर में रहने वाले डॉ शेख़ शौक़त हुसैन एक जाने-माने राजनीतिक विशेषज्ञ हैं.
वे कहते हैं, "भारत के संविधान में ये साफ़ बताया गया है कि राज्यों की शक्तियां क्या होंगी. उप-राज्यपाल के आदेशों का संवैधानिक मूल्यांकन किया जायेगा."
"ऐसा तो नहीं है कि देश गवर्नरों या लेफ़्टिनेंट गवर्नरों की सनक या मर्ज़ी पर चलता है. संविधान है और संविधान में हर अथॉरिटी की शक्तियों को परिभाषित किया गया है."
डॉ हुसैन के मुताबिक़ चूंकि एक नई सरकार बनने जा रही है तो ऐसे में इस तरह "जल्दी-जल्दी ऐसे आदेश पास करना एक सन्देश देने जैसा है कि जिन्हें जनादेश मिला है उनकी इज़्ज़त नहीं की जा रही है".
वे कहते हैं, "संविधान में राज्यों और केंद्र के बीच शक्तियों का बटवारा किया गया है. तो क्या ये (हालिया आदेश) उसके मुताबिक़ है? या ये है कि जो मन में आ जाए वो किया जाए."
"अगर ऐसे ही चलता रहा तो लगता है कि दिल्ली की तरह यहाँ भी स्थानीय सरकार और एलजी के बीच टकराव होता रहेगा. सवाल ये है कि क्या एक बॉर्डर स्टेट में भारत ऐसा होने देना चाहेगा?"
डॉ हुसैन कहते हैं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस या पीडीपी जब भी सत्ता में रही है तो उनका केंद्र के साथ सुचारु तरीक़े से काम बहुत कम ही चला. "लगता है वही सिलसिला आगे भी चलता रहेगा. उसी का नतीजा फिर कश्मीर की उथल-पुथल भी है."
पारदर्शिता और जवाबदेही
श्रीनगर में भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर कहते हैं कि लेफ़्टिनेंट गवर्नर वही फ़ैसले ले रहे हैं जिन्हें लेने का उन्हें हक़ है.
वे कहते हैं, "जो लेफ़्टिनेंट गवर्नर की शक्तियां होती हैं वो उनके पास होनी चाहिए. नई सरकार अभी बनी नहीं है. सरकार बनेगी तो उसके बाद देखा जायेगा कि क्या शक्तियां उस सरकार के पास पास आएगी."
अल्ताफ़ ठाकुर कहते हैं कि जहां तक भर्तियों की बात है तो "बड़ी मुश्किल से जम्मू-कश्मीर में पारदर्शिता और जवाबदेही आई है".
वे कहते हैं, "पिछली सरकारों ने क़रीब एक लाख दिहाड़ी मज़दूर लगाए हैं जिनका कोई भविष्य नहीं है. कोई नीति नहीं थी जिसके तहत उनकी भर्ती की गई."
"पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए गवर्नर इंतज़ामिया का इस पर नियंत्रण होना बहुत ज़रूरी है नहीं तो कश्मीर में फिर ये अपने कार्यकर्ताओं को डेली-वेजर या नीड-बेसिस पर लगा देंगे."
"और ये सारा बोझ जम्मू-कश्मीर के ख़ज़ाने पर पड़ेगा. इससे जम्मू-कश्मीर हर दिन पीछे चला जाएगा. बहुत अच्छी बात है लेफ्टिनेंट गवर्नर साहब ने अपने हाथ में नियंत्रण लिया क्यूंकि जहाँ तक भर्तियों या गृह विभाग का सवाल है बड़ी मुश्किल से जम्मू-कश्मीर में अमन आया है और बहुत मेहनत लगी है केंद्र सरकार और एलजी साहब को जम्मू-कश्मीर में अमन कायम करने में."
अल्ताफ़ ठाकुर के मुताबिक़ लेफ़्टिनेंट गवर्नर और अगले मुख्यमंत्री के पास जो जो इख़्तियारात हैं वो रहेंगे. "इसमें टकराव वाली बात ही नहीं है. इसमें साथ चलने वाली बात है. एक दूसरे की मदद करने की बात है. एलजी साहब यहां मदद करने आए हैं."
मुख्यमंत्री और एलजी के बीच टकराव?
नूर अहमद बाबा कश्मीर यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफ़ेसर रह चुके हैं और एक राजनीतिक विश्लेषक हैं.
वे कहते हैं, "लोकतांत्रिक व्यवस्था को उचित सम्मान देना होगा. ये बात पहले ही साफ़ हो गई थी कि जो नया प्रशासन होगा उसके पास शक्तियां नहीं होंगी क्यूंकि शक्तियों के मामले में केंद्र-शासित प्रदेश राज्यों के बराबर नहीं हैं."
"लगातार कई ऐसी घोषणाएं हुई हैं जिससे शक्तियां एलजी के हाथों में केंद्रित हो गई हैं. राज्य का दर्जा मिल जाता तो नई सरकार के पास ज़्यादा शक्तियां होती. लेकिन अब इसका उल्टा ही हो रहा है."
नूर अहमद बाबा के मुताबिक़ जम्मू कश्मीर को राज्य का दर्जा देने और सरकार को सशक्त बनाने के बजाय लेफ़्टिनेंट गवर्नर बिना किसी लोकतांत्रिक परामर्श के अपनी शक्तियों को मजबूत कर रहे हैं.
वे कहते हैं, "ये दिखाता है कि आपको प्रतिनिधि सरकार पर भरोसा नहीं है. आपको लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार पर भरोसा नहीं है. इससे पता चलता है कि आप यह मान रहे है कि जनता के प्रतिनिधियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता."
"सिर्फ़ कुछ ही लोगों पर भरोसा किया जा सकता है जो प्रशासनिक अधिकार की वजह से बिना किसी प्रतिनिधि चरित्र के होते हुए भी सत्ता पर काबिज़ हैं. और वे इसके लिए जवाबदेह भी नहीं हैं."
तो क्या आने वाले वक़्त में नए मुख्यमंत्री और लेफ़्टिनेंट गवर्नर के बीच टकराव बढ़ेगा?
नूर अहमद बाबा कहते हैं, "हम उम्मीद कर रहे थे कि नई सरकार और एलजी के बीच टकराव न हो. उमर अब्दुल्लाह ने चुनाव के नतीजे आने के बाद जो बयान दिए हैं उनसे लगा कि वो टकराव नहीं चाहते और केंद्र सरकार और एलजी दोनों के साथ मिल कर चलना चाहते हैं."
"लेकिन उनके पास प्रशासन की बहुत सीमित शक्तियां हैं. उनके पास सुरक्षा मुद्दों पर कोई अधिकार नहीं है. ये उनके लिए बहुत निराशाजनक हो सकता है. लोगों को प्रशासन से काफी उम्मीदें हैं."
बाबा कहते हैं कि कश्मीर के संदर्भ में प्रतिनिधि लोकतांत्रिक संस्थानों में लोगों का विश्वास फिर से बनाने की जरूरत है. "इसलिए अगर आप स्थानीय सरकार और प्रतिनिधि संस्थानों को कुछ भी करने में अक्षम बना रहे हैं तो इससे इन संस्थानों में लोगों का विश्वास मजबूत नहीं होता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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