प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा से यूक्रेन को क्या है उम्मीद?

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- Author, स्वितलाना दोरोश
- पदनाम, बीबीसी, यूक्रेन
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार 23 अगस्त को यूक्रेन पहुँच रहे हैं. इस दिन यूक्रेन का 'राष्ट्रीय ध्वज दिवस' भी मनाया जाता है. यह यात्रा रूस में व्लादिमीर पुतिन के साथ मोदी की मुलाक़ात के डेढ़ महीने बाद हो रही है.
रूस की यात्रा में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि भारत युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थक रहा है और रहेगा. इसके साथ ही उन्होंने इस प्रयास में सहायता करने के लिए भी भारत को तैयार बताया था.
अपनी मौजूदा यात्रा में यूक्रेन से पहले भारतीय प्रधानमंत्री पोलैंड पहुँचे.
10 साल पहले जब से रूस ने क्राइमिया पर कब्ज़ा किया है तब से लेकर अब तक भारत ने कभी भी रूस के आक्रमक रवैये की निंदा नहीं की है.

इस मुद्दे पर भारत ने कभी भी किसी संभावित बातचीत के लिए मध्यस्थता की भी पेशकश नहीं की है.
भारत ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस के आक्रमक रवैये की निंदा करने वाले संयुक्त राष्ट्र के किसी भी प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया है.
जब मोदी मॉस्को की यात्रा पर थे, उसी दौरान रूस ने यूक्रेन के कई शहरों पर मिसाइलें दाग़ी थीं.
मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को मित्र बताया था और भारत-रूस के बीच संबंधों को मज़बूत करने की वक़ालत की थी.
भारत के प्रधानमंत्री की यूक्रेन यात्रा के बारे में ऐसी भी ख़बरें थीं कि वो व्लादिमीर पुतिन का कोई संदेश यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की तक पहुँचाने के लिए तैयार हो सकते हैं.
हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि 23 अगस्त को यूक्रेन की उनकी यात्रा के दौरान ऐसा कुछ होगा या नहीं.
मोदी की यूक्रेन यात्रा का मक़सद

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नरेंद्र मोदी साल 2014 से भारत के प्रधानमंत्री हैं. उन्होंने पिछले महीने ही यानी जुलाई की शुरुआत में रूस का दौरा किया था. साल 2019 के बाद यह उनकी रूस की पहली यात्रा थी.
इसी साल जून में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनकी पहली विदेश यात्रा भी थी.
जुलाई में उनकी यात्रा यूक्रेन पर रूस के बड़े मिसाइल हमलों के साथ हुई थी. उस दौरान 8 जुलाई को रूसी हमले में यूक्रेन में कुल 47 लोग मारे गए थे.
इसमें अकेले राजधानी कीएव में 33 लोगों की मौत हुई थी. उस समय रूसी मिसाइलों ने यूक्रेन में बच्चों के अस्पताल पर भी हमला किया था.
रूस की यात्रा के दौरान बातचीत में पुतिन ने मोदी को ''अपना सबसे प्रिय मित्र'' भी बताया था. रूस में प्रधानमंत्री मोदी के पुतिन के साथ गर्मजोशी से गले मिलने को यूक्रेन में आक्रोश और निराशा के साथ देखा गया था.
यू्क्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने इससे जुड़ा एक पोस्ट भी सोशल मीडिया एक्स पर साझा किया था.
वहीं मॉस्को में नरेंद्र मोदी ने दोहराया था कि भारत सैन्य संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करता है.
उन्होंने पुतिन से कहा था, "आपके मित्र के तौर पर मैंने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि बंदूकों, बमों और मिसाइलों से संघर्षों का समाधान नहीं हो सकता है. इसके लिए हम बातचीत और कूटनीति पर ज़ोर देते हैं.”

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मोदी ने कहा था, “भले ही यह युद्ध, संघर्ष या आतंकवादी हमला हो; जो कोई भी मानवता में यक़ीन करता है उसे जीवन खो जाने पर दर्द होता है. “खासकर जब बेकसूर बच्चे मर जाते हैं, यह आपके दिल को खून से भर देता है और वह दर्द असहनीय होता है."
मोदी ने यह बयान उस वक़्त दिया था जब दुनिया को यूक्रेन में एक अस्पताल पर हमले की जानकारी मिली थी.
मोदी कहा था कि भारत बातचीत प्रक्रिया में प्रगति का समर्थन करेगा और सैन्य संघर्ष के राजनयिक समाधान के लिए किसी भी भूमिका में शामिल होने के लिए तैयार है.
हालाँकि साल 2014 में जब से मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री का पदभार संभाला है; यूक्रेन के डोनबास में युद्ध और क्राइमिया पर रूस ने कब्ज़ा कर लिया है.
भारत ने अब तक इस मुद्दे पर तटस्थता बनाए रखी है और कभी भी रूस के कदम की निंदा नहीं की है. भारत ने कभी भी किसी संभावित बातचीत में मध्यस्थता की पेशकश नहीं की है.

रूस पर भारत की निर्भरता

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जानकारों का कहना है कि भारत का यह रुख़ मुख्य रूप से हथियारों और तेल के मामले में रूस पर उसकी निर्भरता की वजह से है.
यूक्रेन के ख़िलाफ युद्ध की शुरुआत और रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध लगाने के बाद रूस ने भारत को अरबों डॉलर की छूट पर तेल बेचना शुरू कर दिया था.
इससे भारत और रूप के बीच व्यापार भी काफ़ी बढ़ा है.
अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर नज़र रखने वाले यूक्रेनियन प्रिज़्म सेंटर की विशेषज्ञ ओल्गा वोरोज़बिट ने बीबीसी यूक्रेन को बताया, "भारत अपने हितों का बहुत ध्यान रखता है और इस मक़सद से काम करता है कि उसका फायदा कहाँ है. और यह ग़लत भी नहीं है."
रूस से तेल ख़रीद पर वो कहती हैं, “रूस से तेल ख़रीदना एक ग़रीब देश के लिए फायदेमंद सौदा है और इसके लिए भारत अपनी मुद्रा यानी रुपये में भुगतान करता है."
दुनिया की बड़ी सेनाओं में शुमार होने वाली भारतीय फ़ौज रूसी हथियारों पर बहुत अधिक निर्भर है. यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध में रूस के भारी सैन्य ख़र्च बावजूद वह भारत को हथियार बेचने वाला प्रमुख देश बना हुआ है.
भारत के लिए एक और ज़रूरी विषय चीन के साथ उसके रिश्ते हैं. रूस, चीन के साथ क़रीबी संबंधों की दिशा में ज़रूरी कदम उठा रहा है, जिसके साथ भारत का सीमा विवाद है.
इसलिए रूस और चीन की मित्रता को भारत अनदेखा नहीं कर सकता है.

यूक्रेन को मोदी से क्या उम्मीद?

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जानकारों का अनुमान है कि मोदी की यूक्रेन यात्रा का मक़सद उनकी हाल की रूस यात्रा की आलोचना को कम करना है.
मोदी और पुतिन की पिछली बातचीत के दौरान ही वॉशिंगटन में नेटो का विशेष शिखर सम्मेलन भी हुआ था. इसमें नेटो के सदस्य देशों ने रूस की आक्रामकता की कड़ी आलोचना की थी.
ओल्गा वोरोज़बिट याद करती हैं कि साल 1991 के बाद से भारत के किसी प्रधानमंत्री ने कभी यूक्रेन का दौरा नहीं किया है.
भारतीय प्रधानमंत्री की यूक्रेन यात्रा पर दुनिया के मीडिया ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि भारत, अमेरिका और रूस के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है.
हालांकि, ब्लूमबर्ग मीडिया ने अपने सूत्रों के हवाले से बताया है कि भारतीय नेतृत्व युद्ध को समाप्त करवाने के लिए में मध्यस्थ की भूमिका से इनकार करता है.
ब्लूमबर्ग के सूत्रों ने संकेत दिए, "फिर भी भारत रूस और यूक्रेन के राष्ट्रपतियों के बीच संदेशों के आदान- प्रदान के लिए तैयार हो गया है."
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसे संदेश मोदी की मौजूदा यूक्रेन यात्रा का हिस्सा हैं या नहीं.
पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार विटाली पोर्टनिकोव का मानना है कि यूक्रेन के ‘राष्ट्रीय ध्वज दिवस’ पर मोदी की यात्रा व्लादिमीर पुतिन को इशारा है कि भारत यूक्रेन की संप्रभुता का समर्थन करता है.
उनका मानना है, “भारत अपने रुख़ पर कायम है कि एक नीति के तौर पर ‘युद्ध’ भारत के लिए अस्वीकार्य है. यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को दिखाता है, लेकिन यह पुतिन के लिए भी एक संकेत होगा."
पोर्टनिकोव कहते हैं कि राजनीतिक तौर पर मोदी की रूस यात्रा असहज थी और अब जैसे ही पुतिन यूक्रेन की सेना को कुर्स्क से बाहर निकालने के लिए ताकत जुटा रहे हैं, भारत के प्रधानमंत्री यूक्रेन के नेतृत्व से मिलने वाले हैं."
पोर्टनिकोव का यह भी कहना है कि मोदी की यह यात्रा अमेरिका के साथ मज़बूत संबंधों की दिशा में भारत के कदम की पुष्टि करेगी.
वे कहते हैं कि ये रणनीतिक साझेदारी का वह कदम हो सकता है जिस पर मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ सहमति जताई थी.

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यूक्रेन के राष्ट्रपति के कार्यालय ने वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की और नरेंद्र मोदी के बीच होने वाली बातचीत और द्विपक्षीय समझौतों को लेकर एक छोटा सा बयान जारी किया है.
हालांकि यह समझौता किस क्षेत्र में होगा यह अभी स्पष्ट नहीं है. इसी साल जून में इटली में जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की मुलाक़ात हुई थी.
इसमें दोनों ने आपसी व्यापार और ब्लैक सी ‘ग्रेन कॉरिडोर’ पर आगे काम करने पर चर्चा की थी. इस कॉरिडोर के लिए भारत ने तुर्की के साथ मिलकर काफ़ी कोशिश की है.
भारत ने यूक्रेन को नष्ट हुए स्कूलों और अस्पतालों के पुनर्निर्माण के लिए अनुदान और मानवीय सहायता की इच्छा भी जताई है.
यूक्रेनी प्रिज़्म के ओल्गा वोरोज़बिट के मुताबिक़ , “इसकी संभावना नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी युद्ध पर अपनी तटस्थ नीति को बदलेंगे. इसलिए उनके दौरे से सबसे ज़्यादा उम्मीद विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग को मज़बूत करने की ही की जा सकती है.”
उनका मानना है कि भारत ने पहले भी यूरोप में विभिन्न संघर्षों के मुद्दे पर हमेशा तटस्थ रहने की कोशिश की है. इसलिए ज़्यादा संभावना यही है कि वह यूक्रेन के साथ भी इसी नीति को अपनाएगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित












