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शास्त्रीय संगीत की दुनिया के बड़े नाम राशिद ख़ान की कहानी
- Author, इक़बाल परवेज
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
फ़िल्म निर्देशक इम्तियाज अली की फ़िल्म ‘जब वी मेट’ के लिए ‘आओगे जब तुम ओ साजना...’ गाकर मशहूर हुए शास्त्रीय गायक उस्ताद राशिद ख़ान का 55 वर्ष की उम्र में कोलकाता में मंगलवार को निधन हो गया है.
उस्ताद राशिद की मौत की ख़बर सुनकर बॉलीवुड से लेकर शास्त्रीय संगीत की दुनिया में उदासी का माहौल है.
राशिद ख़ान की मित्र और शास्त्रीय संगीत की जानी मानी हस्ती डॉक्टर सोमा घोष ने कहा, "ये कोई उम्र नहीं होती जाने की. इस उम्र में संगीत जवान होता है. राशिद का संगीत भी और जवान हो रहा था."
वहीं, बॉलीवुड और क्लासिकल सिंगर कविता सेठ ने कहा कि जिस समय से उनकी मौत की ख़बर आई है उस वक़्त से कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा. अचानक से आई इस ख़बर ने हम सबको अंदर से हिला कर रख दिया है."
पिछले कुछ दिनों से उनका कोलकाता के पियरलेस अस्पताल में इलाज चल रहा था. पिछले महीने ही उनकी तबीयत बिगड़ने की ख़बरें आई थीं जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था.
पिछले कुछ दिनों से वह आईसीयू में वेंटिलेटर पर थे.
इससे पहले उनका इलाज मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल में जारी था. लेकिन बाद में वे कोलकाता लौट आए. वहीं उनका निधन हुआ.
बॉलीवुड के मशहूर गीतकार फैज़ अनवर ने उनकी मौत पर दुख ज़ाहिर करते हुए कहा कि "शास्त्रीय संगीत के लिए बहुत दुख की ख़बर है कि इतनी जल्दी वो चले गए".
वहीं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट कर कहा, "उस्ताद राशिद ख़ान के अंतिम संस्कार पर उन्हें बंदूकों से सलामी देकर विदा किया जाएगा. उनके पार्थिव शरीर को रबींद्र सदन में रखा जाएगा. यहां उनके चाहने वाले उस्ताद को अंतिम अलविदा कह पाएंगे."
दुनिया भर में चर्चित थे उस्ताद राशिद ख़ान
उस्ताद राशिद खान को शास्त्रीय संगीत की दुनिया का सरताज कहा जाता था. उन्होंने अपनी बुलंद आवाज़ से देश ही नहीं, दुनिया भर नाम कमाया.
वहीं, बॉलीवुड में उन्होंने शाहिद कपूर और करीना कपूर की फिल्म 'जब वी मेट' के लिए' आओगे जब तुम' बंदिश को अपनी आवाज़ से सजाया था.
इसके साथ ही शाहरुख ख़ान की 'माई नेम इज ख़ान', 'राज 3', 'मंटो' और 'शादी में ज़रूर आना' जैसी फिल्मों को उन्होंने अपनी आवाज़ से सजाया था.
डॉक्टर सोमा घोष ने कहा, "राशिद ने फिल्मों में बहुत कम गाने गाए लेकिन जो गाने गाए उन्हें रूह तक पहुंचा दिया. 'आओगे जब तुम साजना' गाना कोई कैसे भूल सकता है. ये गाना अपने आप में एंथम की तरह है."
इस गाने को फ़ैज अनवर ने लिखा था जिन्होंने उस्ताद राशिद ख़ान तक ये गाना पहुंचने की कहानी बीबीसी को सुनाई.
फैज़ अनवर कहते हैं, "आओगे जब तुम साजना आज इतने सालों बाद भी सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग में रहता है. ये गाना नही, एंथम है जो तब तक ज़िंदा रहेगा जब तक संगीत रहेगा."
फ़िल्म निर्देशक इम्तियाज अली की फ़िल्म ‘जब वी मेट’ का म्यूज़िक प्रीतम ने दिया था. लेकिन ‘आओगे जब तुम’ गाने के संगीतकार संदेश शांडिल्य थे.
इस गाने को याद करते हुए फ़ैज़ अनवर ने कहा, "फिल्म के निर्देशक इम्तियाज अली ने इस गाने को गाने के लिए उस्ताद राशिद का चयन किया था. जब गाना बन रहा था तब लग रहा था कि गाना बहुत शानदार है और लोग इसे पसंद करेंगे. मगर इतना बड़ा हिट होगा ये गाना, इसकी उम्मीद न मुझे थी और न ही राशिद ख़ान साहब को थी"
फ़ैज़ अनवर कहते हैं, "आओगे जब तुम साजना से पहले करीब 15 साल पहले से फ़िल्मों में क्लासिकल गाना बंद हो चुका था और जब ये गाना आया तो लोगों के दिलों - दिमाग़ में बस गया."
वहीं, कविता सेठ इस गाने को याद करते हुए कहती हैं, “हमने फ़िल्मों में बहुत क्लासिकल गाने सुने हैं मगर उनमें से ये गाना, आओगे जब तुम साजना, अलग मुकाम पर है."
पार्टियों के शौकीन थे राशिद ख़ान
गायकी से अलग निजी ज़िंदगी में राशिद ख़ान बहुत ही आम इंसान की तरह थे. यारों के यार थे. जूनियर्स गायकों को सही राह दिखाते थे. पार्टी के भी शौकीन थे जहां यारों के साथ अक्सर अड्डा जमा करता था.
डॉक्टर सोमा घोष कहती हैं, "राशिद पार्टी के बहुत शौकीन थे. पार्टी खूब किया करते थे. दोस्तों के साथ महफिल जमा करती थी. इतना ही नहीं हमें अक्सर भिंडी मटन अपने हाथों से खिलाते थे."
वहीं कविता सेठ उन्हें याद करते हुए कहती हैं, “कई बार मेरी मुलाकात उनसे हुई. वो अपने छोटों से खूब प्यार किया करते थे. संगीत के बारे में बताया करते थे."
फ़ैज़ अनवर ने बीबीसी से बताया कि "वो बहुत खुलुस और मोहब्बत वाले इंसान थे. बहुत ही रहमदिल इंसान थे."
ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान से मिली ट्रेनिंग
उस्ताद राशिद ख़ान का जन्म 1 जुलाई 1968 को उत्तर प्रदेश के बदायूं स्थित सहसवान में हुआ. उन्होंने शुरुआती तालीम अपने नाना उस्ताद निसार हुसैन खान से ली.
हालांकि, बचपन में उन्हें गायकी से कुछ खास लगाव नहीं था मगर उनके मामा गुलाम मुस्तफ़ा ख़ान ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और बाद में उन्हें ट्रेनिंग देकर निखारा.
राशिद ख़ान की पहली मंचीय प्रस्तुति 11 साल की उम्र में थी. वे रामपुर-सहसवान घराने के गायक थे.
डॉक्टर सोमा घोष ने बीबीसी को बताया, "राशिद ने अपने इस सफ़र में बहुत कड़ी मेहनत की. मुस्तफ़ा खान से सीखा और खूब रियाज़ किया. बहुत सारी मेहनत के बाद ही राशिद दूसरों से अलग हैं और दुनिया भर में इतना सम्मान कमाया है."
राशिद ख़ान खुद अपने नाना की तरह विलंबित ख्यालों में गाते थे. वे उस्ताद अमीर खां और पंडित भीमसेन जोशी की गायकी से काफी प्रभावित थे. राशिद खान ने स्वर साधना की. एक-एक नोट के लिए घंटों या पूरे पूरे दिन रियाज़ किया करते थे.
फ़ैज़ अनवर के मुताबिक़, "इस देश में हजारों क्लासिकल सिंगर चले गए और हज़ारों सिंगर आज भी हैं मगर राशिद ख़ान सबसे अलग थे. शास्त्रीय गायकी में इनकी अलग पहचान थी. अलग रुतबा था. और इन्हें सबसे अलग बनाता है इनकी आवाज़ और इनका रियाज़. राशिद ख़ान की तैयारी मुकम्मल थी. वो किसी गीत को बहुत ही शानदार तरीक़े से पेश करते थे"
कविता सेठ कहती हैं, "जहां भी उनका कार्यक्रम होता था, अक्सर वहां मैं पहुंच जाती थी. उनकी गायकी से सीख मिलती थी. उनके गाने का अलग अंदाज़ था जो बहुत कम लोगों के पास होता है."
उस्ताद राशिद ख़ान को साल 2006 में पद्मश्री और पद्मभूषण से नवाजा गया था.
साल 2012 में उन्हें बंगा भूषण से सम्मानित किया गया. और साल 2010 में राशिद ख़ान को ग्लोबल इंडियन म्यूज़िकल एकेडमी अवॉर्ड (GIMA) भी मिला था.
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