दो दशक से काम कर रहीं फ़्रांस की पत्रकार को क्यों छोड़ना पड़ा भारत? – प्रेस रिव्यू

वेनेसा डॉनेक

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बीते दो दशक से भी अधिक वक्त से भारत में काम कर रही फ्रांसीसी पत्रकार वेनेसा डॉनेक ने शुक्रवार शाम कहा है कि उन्हें दुख के साथ भारत छोड़ना पड़ रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस में ही छपी एक ख़बर के अनुसार एक बयान जारी कर वेनेसा ने कहा, "आज मैं भारत छोड़ रही हूं. वो देश जहां मैं 25 साल पहले एक छात्र के रूप में आई थी और जहां बीते 23 सालों से पत्रकार के तौर पर काम कर रही हूं. मैंने यहां शादी की, अपने बेटे को पाला-पोसा. मैं इसे अपना घर कहती हूं. भारत सरकार मुझे देश छोड़ने के लिए मजबूर कर रही है."

अख़बार लिखता है कि बीते महीने फ़ॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफ़िस ने वेनेसा को एक नोटिस जारी कर उन पर "दुर्भावनापूर्ण" रिपोर्टिंग का आरोप लगाया था.

वेनेसा से पूछा गया था कि "नियमों के कथित उल्लंघन के लिए उनका प्रवासी भारतीय नागरिक (ओसीआई) का दर्जा क्यों रद्द नहीं किया जाना चाहिए." उन्हें जवाब देने के लिए दो फरवरी तक का वक्त दिया गया था.

वेनेसा का कहना है कि उन्हें भेजे नोटिस में उनकी रिपोर्ट्स को "दुर्भावनापूर्ण" कहा गया है जो "भारत की संप्रभुता और अखंडता के ख़िलाफ़ है."

उन्होंने कहा कि 16 महीनों पहले भारत के गृह मंत्रालय ने पत्रकार के तौर पर भारत में उनके काम करने पर रोक लगा दी थी. वेनेसा का कहना है कि इसे लेकर कोई कारण या दलील नहीं दी गई.

वो कहती हैं, "मैंने कई बार मंत्रालय को इस बारे में ख़त लिखकर इस फ़ैसले पर फिर से विचार करने को कहा लेकिन मुझे इसका जवाब नहीं मिला. ये स्पष्ट है कि मैं भारत में रहते हुए अपनी आजीविका नहीं कमा सकती. मैं इन आरोपों के ख़िलाफ़ लड़ रही हूं लेकिन मैं नतीजे आने तक का इंतज़ार नहीं कर सकती."

क़तर की जेल से रिहा हुए नौसेना के पूर्व अफ़सर ने सुनाई आपबीती

अमित नागपाल

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क़तर की जेल से रिहा हुए भारतीय नौसेना के आठ पूर्व सैनिकों में से सात वापस भारत लौट आए हैं. इनमें से एक का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी के हस्तक्षेप के कारण ही उन्हें रिहाई मिल सकी.

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पूर्व नेवी कमांडर अमित नागपाल का कहना है कि उन्हें कोई अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें क़तर में क्यों गिरफ्तार किया गया. क़तर में उन पर जासूसी का आरोप लगाया गया था.

आठ में से सात पूर्व नौसेना अधिकारी अब भारत लौट चुके हैं. पूर्व कमांडर पूर्णेंदू तिवारी, जो दाहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज़ के प्रबंध निदेशक थे, वो अभी भी दोहा में हैं. माना जा रहा है कि उन पर यात्रा को लेकर प्रतिबंध है.

अमित नागपाल ने अख़बार द हिंदू की संवाददाता सुहासिनी हैदर से बात की और बताया कि क़तर में बीते 18 महीनों में उन पर क्या बीती और इस बीच उनके परिवार ने क्या-कुछ झेला.

वो कहते हैं कि आख़िरी घड़ी तक उन्हें ये नहीं पता था कि उनका भविष्य क्या होने वाला है.

वो कहते, "11 फरवरी को, जब तक मैं दोहा की जेल से बाहर नहीं निकला था, तब तक मुझे नहीं पता था कि मुझे आज़ाद किया जा रहा है. मैंने भारतीय राजदूत को अपने सामने खड़े देखा और उनसे पूछा कि 'क्या हम भारत जा रहे हैं.' उन्होंने 'हां' कहा. तब जाकर मुझे अहसास हुआ कि अब मुझे आज़ाद किया जाएगा."

"जिस तेज़ी से हमें जेल में डाला गया था उसी तेज़ी से हम जेल से बाहर निकल आए. मेरी पत्नी क़तर में मेरे साथ थीं, लेकिन उन्हें भी नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला है."

'क़तर भेजकर नेवी ने मुझे मौक़ा दिया था'

क़तर नेवी

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अमित नागपाल कहते हैं कि उनके साथ जो हुआ वो केवल उनके लिए सज़ा नहीं थी बल्कि उनके पूरे परिवार के लिए सज़ा थी.

वो कहते हैं, "मैंने जब पहली बार अपनी पत्नी से बात की तो उन्होंने कहा 'तुम्हें लिए बग़ैर मैं यहां से नहीं जाऊंगी.' इससे मुझे ताकत मिली. अगर परिवार ठीक रहे तो कोई भी व्यक्ति इस तरह की परेशानी से गुज़र सकता है."

अपने क़तर जाने के बारे में उन्होंने बताया कि उन्होंने 1987 में एनडीए ज्वाइन की और फिर 1990 में नेवी में बतौर अफ़सर शामिल हुए. उन्हें क़तर की नौसेना के साथ ट्रेनिंग का मौक़ा मिला था.

वो कहते हैं, "नौसेना ने मुझे किसी और देश में ट्रेनिंग का मौक़ा दिया था, मैं बेहद खुश था. हम वो पहले लोग थे जो यहां आए थे. आगे जो कुछ हुआ वो दुख की बात है."

अपनी गिरफ्तारी के बारे में उन्होंने बताया, "जिस वक्त मुझे गिरफ्तार किया गया मुझे अंदाज़ा हो गया था कि मामला गंभीर है. लेकिन मुझे यकीन था कि मैंने कुछ ग़लत नहीं किया और आज नहीं तो कल, मैं बाहर निकलूंगा. मुझे यक़ीन था कि अधिकारी हमारी बात समझेंगे इसलिए मैंने खुद पर लगे आरोपों के बारे में ज़्यादा नहीं सोचा."

"जब हम जेल में थे दो राजदूत हमसे मिलने आए थे. हमें आख़िरी के पांच-छह महीनों में कंसुलर एक्सेस भी मिला था उन्होंने हमें भरोसा दिया. बड़ी बात ये है कि उन्होंने हमारे परिवारों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए और उसे कहा कि जब भी ज़रूरत पड़े वो उनसे बात कर सकते हैं."

"मुझे पता है कि सरकार किसी की मदद करने को कह सकती है लेकिन व्यक्ति अपने स्तर पर जो करता है वो महत्वपूर्ण होता है. राजदूत विपुल और उनसे पहले राजदूत मित्तल की टीम का रवैया बढ़िया था."

'मौत की सज़ा के बाद सरकार ने दिखाई गंभीरता'

वीडियो कैप्शन, क़तर की जेल में बंद भारतीय नौसेना के आठ पूर्व अधिकारी हुए रिहा, सात भारत भी लौटे

23 अक्तूबर को क़तर की एक कोर्ट ने इन आठ भारतीय नौसैनिकों को मौत की सज़ा सुनाई.

अमित नागपाल इस बारे में कहते हैं, "वो बेहद मुश्किल दिन थे. मुझे कोर्ट के फ़ैसले के बारे में जानकारी नहीं थी. मैंने ख़बरों में सुना था, बाद में मेरी पत्नी ने मुझे बताया. मुझे यकीन नहीं हुआ क्योंकि हम पर जो आरोप लगाए गए थे, ये सज़ा उसके अनुपात में भी नहीं थी. बाद में मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि सरकार इस मामले को और गंभीरता से ले रही है. वो लोग विदेश मंत्री से मुलाक़ात करने वाले थे."

इसके बाद इस मामले में उच्चतम स्तर पर यानी पीएम के स्तर पर हस्तक्षेप की ख़बरें आने लगीं.

अपनी आज़ादी का श्रेय वो किसे देना चाहेंगे, इस सवाल के उत्तर में वो कहते हैं, "मैं इस पर नहीं जाऊंगा कि क्या हुआ, लेकिन अगर हस्तक्षेप उस वक्त हो सकता था तो उससे पहले भी हो सकता था. लेकिन अब ये पुरानी बात है. मैं अपने परिवार के साथ-साथ सरकार और पीएम मोदी को इसका श्रेय दूंगा. उनके स्तर पर हस्तक्षेप न होता तो ये भी नहीं होता."

"मुझे इस बारे में कोई शक नहीं है कि हमारी आज़ादी के लिए आदेश केवल क़तर के अमीर शेख़ तमीम बिन हमद अल-थानी के स्तर से आया होगा और प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत के बाद ही उन्होंने ये आदेश दिया होगा. मुझे यकीन है हमारी आज़ादी का तार यहीं जुड़ा. निश्चित तौर पर वही हैं जिन्होंने हमें जेल से बाहर निकाला."

अपनी गिरफ्तारी और इस इलाक़े से जुड़े भू-राजनीतिक कारणों के बारे में वो कहते हैं, "मुझे कोई अंदाज़ा नहीं कि जो हुआ वो क्यों हुआ. मैं उम्मीद करता हूं कि बाद में कभी मुझे इसके पीछे के कारण का पता चल सके. इसराइल से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट्स बकवास हैं."

"हमने कुछ नहीं किया. हम क़तर के दोस्त हैं, जासूसी का आरोप दुश्मन लगाता है. हम ऐसा क्यों करेंगे?"

रूस की नई तकनीक पर अमेरिका चिंतित

सैटेलाइट

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शुक्रवार को अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर और चीन के वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ वांग यी से मुलाक़ात की.

अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक ख़बर के अनुसार म्यूनिख़ सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस के दौरान हुई इस मुलाक़ात में ब्लिंकन ने चिंता जताई कि रूस एंटी सैटेलाइट हथियार बना रहा है.

एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, उनका "इस तरह की क्षमता विकसित करना चिंता का विषय होना चाहिए."

इससे पहले गुरुवार को अमेरिकी के व्हाइट हाउस ने कहा कि रूस अंतरिक्ष को देखते हुए हथियार बना रहा है जो 'परेशान करने वाला' है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार व्हाइट हाउस के प्रवक्ता और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के सलाहकार जॉन किर्बी ने इसे राष्ट्रीय ख़तरा बताया.

उन्होंने कहा अमेरिकी ख़ुफ़िया अधिकारियों के अनुसार "हम ऐसे हथियार के बारे में बात नहीं कर रहे हैं जिसका इस्तेमाल इंसानों पर हमला करने के लिए या यहां धरती पर कोई नुक़सान पहुंचाने के लिए किया जा सकता है."

हालांकि अमेरिका के इन आरोपों को रूस ने खारिज किया है.

रूस ने कहा है कि अमेरिका नए रूसी हथियार के बारे में आरोप लगाकर कांग्रेस को मजबूर करने की साज़िश रच रहा है ताकि यूक्रेन के लिए जैसे-तैसे अतिरिक्त फंड का इंतज़ाम किया जा सके.

भारत आज करेगा इनसैट-3डीएस का लॉन्च

जीएसएलवी

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने कहा है कि शनिवार शाम 5 बजकर 35 मिनट पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेन्टर से मौसम संबंधी आंकड़े जुटाने वाला इनसैट-3डीएल सैटेलाइट लॉन्च किया जाएगा. इसे जीएसएलवी की मदद से लॉन्च किया जाएगा.

अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार ये इस रॉकेट का 16वां और देश में ही बने क्रायोजेनिक इंजन के इस्तेमाल से छोड़ा जाने वाले 10वां मिशन होगा. इस रॉकेट को 'नॉटी बॉय' कहा जा रहा है.

अख़बार लिखता है कि जीएसएलवी लॉन्च व्हीकल के लिए ये मिशन इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि बाद में ये एनआईएसएआर नाम का अर्थ ऑब्ज़र्वेटरी सैटेलाइट ले कर अंतरिक्ष में जाने वाला है. एनआईएसएआर को नासा और इसरो की मदद से बनाया जा रहा है.

इसरो के अनुसार ये 12 दिनों में पृथ्वी का पूरा चक्कर काटेगा और धरती की पारिस्थितिकी, बर्फ खंड, समुद्र के जलस्तर, प्राकृतिक आपदाओं को लेकर आंकड़े जुटाएगा.

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जीएसएलवी की मदद से अब तक 15 लॉन्च किए गए हैं जिनमें से चार नाकाम रहे हैं. इसकी तुलना में पीएसएलवी लॉन्च व्हीकल की मदद से अब तक 60 मिशनों को अंजाम दिया गया है जिनमें से केवल तीन नाकाम रहे हैं. इससे पहले एलवीएम-3 लॉन्च व्हीकल की मदद से सात मिशन छोड़े गए हैं, ये सभी कामयाब रहे हैं.

2,274 किलोग्राम के इनसैट-3डीएस सैटेलाइट की उम्र 10 साल है. ये 2013 में छोड़े गए इनसैट-3डी और 2016 में छोड़े गए इनसैट-3डीआर के काम को आगे बढ़ाएगा. इनसैट-3डी और इनसैट-3डीआर का जीवन अब ख़त्म हो चुका है.

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