अमेरिकी ख़्वाब में ख़लल, ट्रंप के दौर में भारतीय छात्रों की बढ़ती चिंताओं के बीच क्या है उम्मीद की किरण?

भारतीय छात्र

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इमेज कैप्शन, एक अमेरिकी यूनिवर्सिटी के कैंपस में भारतीय छात्र (सांकेतिक तस्वीर)
    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

मुंबई में रहने वाली 21 साल की झील पांड्या अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ रोचेस्टर से मास्टर्स डिग्री करना चाहती हैं.

अमेरिका में पढ़ने के अवसर और ख़ास तौर से अपने कोर्स को लेकर वे उत्साहित हैं.

फ़िलहाल वे अमेरिका जाने के लिए वीज़ा का इंतज़ार कर रही हैं. उन्होंने बीबीसी हिंदी से वीडियो कॉल पर बात की.

उन्होंने बताया, "मैं अपने परिवार के साथ बैठी थी. हम लोग चाय पी रहे थे और टीवी पर न्यूज़ देख रहे थे. तब मेरे पिता ने मुझसे पूछा कि क्या मैं वाक़ई अमेरिका जाना चाहती हूँ? उन्होंने कहा कि वहाँ आए दिन कॉलेजों और विद्यार्थियों को हो रही परेशानियों के बारे में ख़बरें आ रही हैं. उनसे वे चिंतित हैं. फिर उन्होंने कई सवाल पूछे. जैसे, क्या वहाँ अपना कोर्स ख़त्म करने के बाद मैं काम कर पाऊँगी? मैंने उन्हें आश्वस्त करने की पूरी कोशिश की. वे मान भी गए लेकिन वे अंत तक चिंतित ही रहे.''

दरअसल, अमेरिका में पढ़ने से जुड़ी जैसी चिंता झील के घर में दिखी, वैसी चिंता फ़िलहाल भारत के कई घरों में दिख रही है.

इस मुद्दे पर पिछले दिनों बीबीसी हिंदी ने भारत में झील जैसे विद्यार्थियों, अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय विद्यार्थियों और विशेषज्ञों से बातचीत की. उनके मन की चिंता और अनिश्चितता को महसूस किया.

मुंबई में रहने वाली छात्रा
इमेज कैप्शन, 21 वर्षीय झील पांड्या

चिंता के कारण क्या हैं?

जो बाइडेन

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इमेज कैप्शन, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में इसराइल– ग़ज़ा युद्ध के ख़िलाफ़ अमेरिका के कई कॉलेजों में विद्यार्थियों ने विरोध प्रदर्शन किए थे.

भारत सरकार के डेटा के मुताबिक उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले भारतीय विद्यार्थियों के लिए अमेरिका 'सबसे चहेते देशों में से एक है'.

साल 2024 में सात लाख पचास हज़ार से ज़्यादा भारतीय विद्यार्थी पढ़ाई के लिए विदेश गए. इसमें से दो लाख से अधिक विद्यार्थी अमेरिका गए. यानी लगभग 27 फ़ीसदी विद्यार्थी.

हालाँकि, साल 2023 में विदेश जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या और उसमें भी अमेरिका जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या साल 2024 से अधिक थी.

इस बीच एक ख़बर के मुताबिक, अमेरिका में पढ़ने के लिए वीज़ा देने में कमी आई है.

अब बात कारणों की करते हैं.

पिछले साल पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में इसराइल– ग़ज़ा युद्ध के ख़िलाफ़ अमेरिका के कई कॉलेजों में विद्यार्थियों ने विरोध प्रदर्शन किए थे. पुलिस ने उनमें से कई विद्यार्थियों को गिरफ़्तार भी किया था.

तब अमेरिका में विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई के माहौल के बारे में सवाल उठे थे.

इस वर्ष, जब से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में क़ाबिज़ हुए हैं तब से नीतियों की समीक्षा, विश्वविद्यालयों के लिए फंडिंग प्रणाली में फेरबदल और कुछ विद्यार्थियों की गिरफ़्तारियाँ – जैसे मुद्दे सुर्खियों में छाए हुए हैं.

अमेरिका के कैंपसों अनिश्चितता बढ़ी

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यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिल्वेनिया में पीएचडी कर रहे तेजस हरड़ साल 2023 में भारत से गए थे. उन्होंने बताया कि पिछले कुछ हफ़्ते से कैंपस में अनिश्चितता बढ़ी है.

वह बताते हैं, "हमें रोज़ एक नए ऑर्डर की जानकारी मिल रही हैं. विद्यार्थी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि कल क्या होने वाला है? अगले साल क्या होगा? कहीं फंड में कटौती हो रही है तो कोई विश्वविद्यालय अपने बजट को कम करने के तरीक़े ढूँढ रहा है. लोग सोच रहे हैं कि वे अपना ख़र्च किस तरीक़े से प्लान करें? हर दिन इन सब मुद्दों की चर्चा हो रही है. ईमेल आ रहे हैं. हालाँकि, हमारे विश्वविद्यालय ने आश्वस्त किया है कि हमारी फंडिंग पर फ़िलहाल कोई असर नहीं होगा."

पिछले दो महीनों में, अलग-अलग कारणों का ब्योरा देकर प्रशासन ने कई कदम उठाए हैं जिसने अमेरिका के विश्वविद्यालयों की मुसीबतें बढ़ाई हैं.

जैसे, फ़रवरी में प्रशासन ने घोषणा की कि बायोमेडिकल रिसर्च के लिए संस्थाओं और विश्वविद्यालयों को मिलने वाली राशि में कटौती की जाएगी.

यह बताया गया कि इस निर्णय से चार अरब डॉलर (34,400 करोड़ रुपए) की बचत होगी.

इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी सरकार ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी को मिलने वाली 400 मिलियन डॉलर (तक़रीबन 3400 करोड़ रुपए) की फंडिंग यह कह रोक दी कि वहाँ यहूदी मज़हब के विद्यार्थियों को सताया जा रहा था.

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इस साल 19 मार्च को ट्रंप प्रशासन ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिल्वेनिया की नीतियों का हवाला देकर सरकार से मिलने वाली 175 मिलियन डॉलर (तक़रीबन 1500 करोड़ रुपए) की फंडिंग पर रोक लगा दी.

इस तरह के फ़ैसलों से कई संस्थाओं ने, जैसे यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिल्वेनिया, स्टैंडफोर्ड, नॉर्थवेस्टर्न ने नई नियुक्तियों और बाकी ग़ैर-ज़रूरी ख़र्चों पर रोक लगा दी है.

विद्यार्थियों पर कार्रवाई

कुछ विद्यार्थियों पर गंभीर आरोप लगाकर प्रशासन ने गिरफ़्तारियाँ भी की हैं. उनके वीज़ा रद्द करने का निर्णय भी लिया है.

इसी महीने कोलंबिया यूनिवर्सिटी की पीएचडी छात्रा रंजनी श्रीनिवासन का वीसा रद कर दिया गया था. इसके बाद उन्होंने अपने आप ही देश छोड़ दिया था. उन पर हिंसा और चरमपंथ का समर्थन करने का आरोप था. हालाँकि, वे इन आरोपों को नकारती हैं.

जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के शोधार्थी और भारतीय नागरिक बदर ख़ान सूरी को हमास के प्रचार और उसके चरमपंथी गुट के नेता से नज़दीकी रिश्तों के आरोप में कुछ ही दिन पहले हिरासत में लिया गया था. सूरी के वकीलों ने इन आरोपों को नकारा है.

ऐसी आशंका जतायी जा रही है कि इन संस्थानों से वसूल किए जाने वाले टैक्स की दर भी बढ़ाई जा सकती है.

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घटेगी अमेरिका जाने वाले छात्रों की संख्या

एडवाइस इंटरनेशनल संस्था के मालिक
इमेज कैप्शन, सुशील सुखवानी

इन्हीं वजहों का ब्योरा देकर लगभग सारे जानकारों ने बीबीसी हिंदी को बताया कि अमेरिका में इस साल एडमिशन के आँकड़े पिछले वर्षों की तुलना में कम होंगे.

सुशील सुखवानी एडवाइस इंटरनेशनल संस्था के मालिक हैं. उन्होंने हमें बताया, "हम समझते हैं कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों में कुल आवेदनों की संख्या में कमी आई है. उनके प्रतिनिधि इस संख्या के बारे में चिंतित हैं.''

''मुझे लगता है कि अनिश्चितता ट्रंप को पसंद है लेकिन यह हानिकारक भी है. अगर वह निर्णय लेते समय अधिक स्पष्ट होंगे, अपनी बात को सोच-समझ कर रखेंगे तो मदद मिलेगी, अन्यथा छात्र अमेरिका में आत्मविश्वास खो देंगे और कहीं और देखने लगेंगे."

बीबीसी हिंदी ने 71 अमेरिकी रिसर्च विश्वविद्यालयों के ग्रुप, एसोसिएशन ऑफ़ अमेरिकन यूनिवर्सिटीज से भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं मिल पाया.

विद्यार्थियों पर असर

बीबीसी को कई विद्यार्थियों ने अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि इन घटनाओं से उनके मन में या उनके परिवार वालों के मन में अमेरिका में पढ़ने पर सवाल पैदा हो रहे हैं.

झील पांड्या ने अगर अपने पिता से अमेरिका में पढ़ाई करने की वकालत की तो वहीं अनीश (बदला हुआ नाम) को उनके रिश्तेदारों ने समझाया कि उन्हें अमेरिका में पढ़ाई करने के अपने सपने को छोड़ना नहीं चाहिए.

अनीश कहते हैं, "पढ़ाई के बाद क्या मैं वहाँ नौकरी कर पाऊँगा? क्या वहाँ का मार्केट ऐसा होगा कि विदेशी विद्यार्थियों को नौकरियाँ मिलेंगी? मैंने उम्मीद छोड़ दी थी और यूरोप के देशों में अवसर ढूँढ रहा था लेकिन अमेरिका में मेरे जो रिश्तेदार हैं, उन्होंने मुझे कहा कि मुझे अमेरिका में ही पढ़ना चाहिए. अब मैं फिर से अमेरिका जाने की तैयारी में लगा हूँ."

न्यूयॉर्क में बसे भारतीय मूल के पत्रकार मेघनाद बोस ने पिछले साल कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मास्टर्स डिग्री हासिल की थी.

बोस

उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "यहाँ विद्यार्थियों और शिक्षकों के मन में डर और चिंता है. अपने सोशल मीडिया पर वे क्या लिख रहे हैं, उसे लेकर विद्यार्थी डरे हुए हैं. अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी जो यहाँ स्कॉलरशिप के ज़रिए आते हैं, उन्हें यह नहीं पता कि आगे फंडिंग मिलेगी या नहीं? क्या पढ़ाई ख़त्म करके नौकरी कर पाने के नियमों में कोई बदलाव होगा? यहाँ, अमेरिका में चीज़ें बड़ी तेज़ी से बदल रही हैं. ट्रंप प्रशासन पारदर्शिता से काम नहीं कर रहा. यह नहीं सोच रहा कि विद्यार्थी इतने बदलावों से एक साथ कैसे निपटेंगे."

कैंपस के अंदर की बातचीत का ब्योरा देते हुए तेजस बताते हैं, "मेरे अनुमान में अगले साल अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हम पीएचडी विद्यार्थियों की संख्या कम होता देखेंगे."

आम तौर पर पीएचडी विद्यार्थियों को कॉलेज द्वारा पूरी अवधि के लिए स्टाइपेंड और बाकी कुछ ख़र्चों के लिए हर महीने एक रकम दी जाती हैं. इसके बदले में वे अपनी पढ़ाई के अलावा शिक्षकों के काम में हाथ भी बँटाते हैं.

रिसर्च स्कॉलर
इमेज कैप्शन, सुयश देसाई

सुयश देसाई एक रिसर्च स्कॉलर हैं. वे चीन की सैनिक गतिविधियों को बारीकी से देखते हैं.

उन्होंने पिछले साल अमेरिका में पीएचडी करने के इरादे से बारह विश्वविद्यालयों के दरवाज़े खटखटाए. उन्हें एक भी कॉलेज में स्थान नहीं मिल पाया. इस बात से वे निराश हैं.

वे कहते हैं, "कई वर्षों की कोशिशों के बाद मैं इस मुकाम तक पहुँचा हूँ. आम तौर पर पीएचडी न मिलने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन यह साल कोई आम साल नहीं है. जितना मैं समझ पाया हूँ, अभी अमेरिका में बहुत सारे उतार-चढ़ाव हो रहे हैं. वहाँ के विश्वविद्यालय अपने आप को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. अपने मौजूदा विद्यार्थियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. वे नए पीएचडी विद्यार्थियों की संख्या कम से कम रखना चाहते हैं."

अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता ने क्या कहा

बीबीसी ने भारत में अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता से पूछा कि क्या कुछ स्कॉलरशिप स्कीम को लेकर विद्यार्थियों को दिक्कतें हो रही हैं?

इसके जवाब में उन्होंने बताया, "अमेरिकी सरकार विदेश मंत्रालय द्वारा किए जा रहे कार्यों की रणनीतिक समीक्षा कर रही है ताकि उनके सभी कार्य 'अमेरिका फर्स्ट' के एजेंडे से जुड़े हों. इसमें शैक्षिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कार्यक्रम भी शामिल हैं."

तो जो विद्यार्थी स्कॉलरशिप की अवधि के बीच में हैं और उनके सामने अनिश्चितता है, क्या ऐसे विद्यार्थियों की सरकार कोई मदद करेगी?

दूतावास ने बताया कि कुछ ऐसे प्रोग्राम हैं जिन पर असर होगा लेकिन इस बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं दी.

उन्होंने यह बात भी साफ़ नहीं की कि सरकार की रणनीतिक समीक्षा कब तक समाप्त होगी.

एजुकेशन काउंसलर करण गुप्ता ने बताया, "कुछ विश्वविद्यालयों ने विद्यार्थियों को दिए हुए प्रस्ताव वापस भी लिए हैं. इस बात ने विशेष रूप से 'स्टेम' यानी विज्ञान, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स में पोस्ट-डॉक्टरल शोधकर्ताओं और फ़ेलोशिप पाने वालों को प्रभावित किया है. इन विषयों में बाहरी फंडिंग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है."

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क्या घट रहा है अमेरिका का आकर्षण

केपी सिंह

विशेषज्ञों की राय इस सवाल पर बँटी नज़र आई.

केपी सिंह इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड फ़ॉरेन स्टडीज के संस्थापक और निदेशक भी हैं.

उनके अनुसार, "अमेरिका के विश्वविद्यालय आज भी उन सभी के लिए एक बड़ा आकर्षण हैं जो आधुनिक शोध पर काम करना चाहते हैं. हमारे विद्यार्थी वहाँ बेहतर क्वालिटी की शिक्षा के लिए जा रहे हैं. हम उन्हें राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहने के लिए कहते हैं.''

''इसके अलावा, आज दुनिया भर से सबसे अधिक संख्या में विद्यार्थी दो देशों से ही विदेश जा रहे हैं - भारत और चीन. हम देख रहे हैं कि चीनी विद्यार्थियों की संख्या में कमी आ रही है. इसलिए, बाजार केवल भारत पर निर्भर है. इसलिए, वो सभी देश जहां अच्छी शिक्षा मिलती है उन्हें भारतीय विद्यार्थियों की ज़रुरत है. इनमें अमेरिका भी शामिल है.''

केपी सिंह को लगता है कि अमेरिका में शोध के अवसर कम नहीं होंगे क्योंकि जहां सरकार पीछे हट रही है वहीं कंपनियां आगे आंगी.

लेकिन एडवाइज़ इंटरनेशनल के सुशील सुखवानी के मुताबिक जो विद्यार्थी पढ़ाई के अवसर ढूँढ रहे हैं, वे अमेरिका के अलावा बाकी विकल्पों को तलाशने में भी लगे हैं.

वे कहते हैं, "विद्यार्थियों ने नए देशों की ओर देखना शुरू कर दिया है. जर्मनी को देखा जा रहा है. फ्रांस को भी देखा जा रहा है. दुबई को भी देखा जा रहा है क्योंकि दुबई की अर्थव्यवस्था अच्छी है. विद्यार्थी वहाँ काम कर सकते हैं. पढ़ सकते हैं. नौकरियाँ पा सकते हैं. आयरलैंड पहले से बेहतर कर रहा है.''

उनका कहना है, ''दरअसल जब राष्ट्रपति ट्रंप बड़े संस्थानों में रिसर्च की फंडिंग में कटौती कर रहे हैं, तो यह निश्चित रूप से उन लोगों में डर पैदा कर रहा है जो लंबे समय के काम के बारे में सोच रहे हैं. जैसे, स्कॉलर्स. वे अब अन्य देशों की ओर देखना शुरू कर रहे हैं."

अमेरिकन यूनिवर्सिटीज़ एसोसिएशन और कई कॉलेजों ने ट्रंप प्रशासन के 'फंडिंग कट ऑर्डर' के जवाब में एक मुकदमा दायर किया है. उसमें चेतावनी दी है कि अगर इसे लागू किया गया तो यह कटौती अमेरिका के विश्वविद्यालयों में चिकित्सा अनुसंधान को 'तबाह' कर देगी.

चिंता के साथ उम्मीद भी

श्रेया

श्रेया मालवानकर मुंबई में अपनी डिग्री पूरी कर रही हैं.

इसके बाद वह अमेरिका के पर्ड्यू विश्वविद्यालय से मास्टर्स डिग्री लेने की ख़्वाहिशमंद हैं. वह एक डेटा विश्लेषक बनना चाहती हैं.

हमने उनसे पूछा कि अमेरिका में जो हो रहा है, उसे वह कैसे देखती हैं?

उन्होंने कहा, "ज़ाहिर है, मुझे डर लग रहा है लेकिन मुझे यह भी लगता है कि वहाँ की गुणवत्ता बाक़ी देशों से बेहतर है. इसलिए मैं वहाँ जाना चाहती हूँ. मुझे पर्ड्यू से आंशिक स्कॉलरशिप मिली है. इससे मेरी ज़िंदगी थोड़ी आसान हो गई है. साथ ही, मैं लोन लेने जा रही हूँ. मैं अपने माता-पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती. लेकिन मुझे उम्मीद है कि वहाँ की स्थिति जल्दी सुधर जाएगी. अगर यह जारी रहा तो भविष्य में विद्यार्थी डरेंगे. वे अमेरिका में पढ़ाई करने का निर्णय लेने से पहले दो बार सोचेंगे."

'द कॉर्नेल डेली सन' 1880 में स्थापित हुआ कॉलेज का स्वतंत्र रूप से चलने वाला अख़बार है.

कॉर्नेल विश्वविद्यालय में दूसरे वर्ष की छात्रा और अख़बार की मैनेजिंग एडिटर भी हैं
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डोरोथी मिलर अख़बार की मैनेजिंग एडिटर हैं और कॉर्नेल विश्वविद्यालय में दूसरे वर्ष की छात्रा भी हैं.

उन्होंने कहा कि इस अशांति के दौर का एक सकारात्मक परिणाम यह हुआ है कि विद्यार्थी समूह अपने समुदायों के भीतर समर्थन पा रहे हैं.

वे बताती हैं, "छात्र एक-दूसरे का साथ ढूँढ रहे हैं. वे आश्वासन की तलाश कर रहे हैं. और वे अपने समुदायों में इसे पा भी रहे हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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