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तेजस्वी और राहुल गाँधी की जोड़ी क्या बिहार में एनडीए को चुनौती दे पाएगी?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
शुक्रवार को कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के साथ आरजेडी के तेजस्वी यादव भी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में शामिल हुए. राहुल गाँधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान गुरुवार को दूसरी बार बिहार पहुँचे थे.
पिछले महीने यानी जनवरी में भी राहुल गाँधी दो दिनों के लिए बिहार के सीमांचल इलाक़े में पहुँचे थे. उस दौरान 29 जनवरी को आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और 30 जनवरी को तेजस्वी यादव को ईडी ने पूछताछ के लिए बुलाया था.
शुक्रवार को रोहतास में राहुल गाँधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में तेजस्वी यादव ने इस बात का ज़िक्र और दावा भी किया कि उन्हें राहुल गाँधी की सभा में शामिल होने से रोकने के लिए ही प्रवर्तन निदेशालय ने घंटों पूछताछ के लिए बैठा रखा था.
यानी राहुल गाँधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में 16 फ़रवरी को पहली बार राष्ट्रीय जनता दल का कोई शीर्ष नेता शामिल हुआ है.
बिहार में पिछले महीने 28 जनवरी को ही नीतीश कुमार ने महागठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए से हाथ मिला लिया था.
इस तरह से बिहार में आने वाले लोकसभा चुनावों में राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव के सामने बड़ी चुनौती होगी.
बीते हफ़्ते बिहार विधानसभा में नीतीश सरकार के फ़्लोर टेस्ट के दौरान तेजस्वी यादव ने दावा किया था कि वो बिहार में 'नरेंद्र मोदी को रोक कर' दिखाएंगे.
'तेजस्वी के साथ सहानुभूति'
बिहार में साल 2020 में हुए विधानसभा चुनावों में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. उसे राज्य की 75 सीटों पर जीत मिली थी जबकि बाद में एआईएमआईएम के भी चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए थे.
इस तरह से तेजस्वी यादव ने लालू प्रसाद यादव के बिना ही ख़ुद को और अपनी पार्टी को बिहार में ताक़वर बनाए रखा है.
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, “लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को हमेशा से बिहार के एक वर्ग की सहानुभूति मिली है. यह मुस्लिम, यादव और मंडल समर्थकों का वर्ग है जो लालू के साथ खड़ा है. जिस पर कम लोग ध्यान देते हैं.”
उनके मुताबिक़ लालू को सज़ा हुई तो उसमें भी लालू के समर्थक उनके साथ खड़े नज़र आए. यह इतना बड़ा समर्थन है कि बिहार में बीजेपी आज तक अकेले लालू को हरा नहीं पाई है. लालू को हराने के लिए बीजेपी और जेडीयू को एक होना पड़ता है.
उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के साथ मुस्लिम-यादव समीकरण और मायावती के साथ दलित-ब्राह्मण समर्थन रहा है. इसके बावजूद भी वहाँ साल 1991 ही में बीजेपी की सरकार बन गई थी.
सुरूर अहमद के मुताबिक़ बिहार में यह समर्थन अब तेजस्वी के साथ है. तेजस्वी के साथ जातीय समीकरण के अलावा भी युवाओं का एक वर्ग नज़र आता है और नीतीश के पाला बदलने से उनकी सहानुभूति तेजस्वी के साथ बढ़ी है.
ड्राइविंग सीट पर तेजस्वी यादव
बिहार में राहुल गाँधी ने तेजस्वी यादव को ड्राइविंग सीट दे दी है और माना जाता है कि बिहार में तेजस्वी यादव किसी भी गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती होंगे.
सुरूर अहमद मानते हैं, “विधानसभा चुनाव में तेजस्वी के सामने ‘ओल्ड हॉर्स’ या थका हुआ घोड़ा हो सकता है. जबकि लोकसभा चुनाव में राहुल और मोदी हैं. हालाँकि मोदी के लिए यह तीसरा चुनाव होगा, इसलिए उनके लिए भी यह चुनाव बहुत आसान नहीं होगा.”
माना जाता है कि बिहार में जनता दल यूनाइडेट यानी नीतीश कुमार की पार्टी के विपक्षी गठबंधन से निकलने के बाद कांग्रेस और आरजेडी मिलकर सेक्युलर और मुस्लिम वोटों का विभाजन रोक सकते हैं.
पिछले साल जारी हुए जातिगत सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक़ राज्य में 17 फ़ीसदी से ज़्यादा मुस्लिम आबादी है.
बिहार में चुनावी आँकड़ों के लिहाज़ से भी इसी साल होने वाले लोकसभा चुनाव और राज्य के अगले विधानसभा चुनावों के लिए तेजस्वी यादव पर विपक्षी गठबंधन की सफलता की बड़ी ज़िम्मेदारी होगी.
तेजस्वी और राहुल की मुलाक़ात की एक ख़ास तस्वीर को कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल ने अपने सोशल मीडिया पर भी शेयर किया है. इसमें राहुल गाँधी और तेजस्वी एक ही गाड़ी पर सवार हैं और ड्राइविंग सीट पर तेजस्वी यादव हैं.
बिहार में कांग्रेस की क्या भूमिका होगी?
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, “यह एक सांकेतिक तस्वीर है कि बिहार में विपक्ष का नेतृत्व तेजस्वी करेंगे और कांग्रेस सहयोगी की भूमिका में होगी. यही नहीं विपक्ष के ‘इंडिया’ गठबंधन में हाल में जो कुछ हुआ उससे सबक लेते हुए कांग्रेस तेजस्वी यादव को काफ़ी महत्व और सम्मान भी देती दिख रही है.”
तेजस्वी यादव और राहुल गाँधी दोनों इस बात की अहमियत जानते हैं कि बिहार में युवाओं के लिए रोज़गार एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है. बिहार में राहुल गाँधी ने सेना में ‘अग्निवीर’ के मुद्दे को उठाया और केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश की.
इस मुद्दे पर बिहार के युवा भी राहुल गाँधी की बात से सहमत नज़र आ रहे थे. राहुल गाँधी रेलवे और अन्य सरकारी कंपनियों में नौकरी के मुद्दे को उठाकर भी युवाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते दिखे.
क्या कहना है बिहार के लोगों का?
औरंगाबाद के पिंकू कुमार कहते हैं, “देश में धर्म मुद्दा नहीं बनना चाहिए. धर्म के नाम पर बंटवारा न करके युवाओं के रोज़गार के लिए सरकार काम करे. एमबीए करने के बाद भी युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही है.”
पिंकू के साथ मौजूद कुछ युवाओं की शिकायत ईवीएम को लेकर भी है. उनका मानना है कि चुनावों में ईवीएम पर पाबंदी लगे और चुनाव में धर्म की बात कोई भी दल न करे.
राहुल गाँधी की सभा में पहुँचे कांग्रेस समर्थक प्रोफ़ेसर विजय कुमार का दावा है कि बिहार का युवा अब राहुल गाँधी के साथ दिखता है. नीतीश कुमार की कहानी की चर्चा बिहार के हर गाँव, हर घर में हो रही है. बिहार की जनता कह रही है कि नीतीश कुमार कभी भी पाला बदल लेते हैं.
वहीं बिहार में महिलाओं के लिए महंगाई, रोज़गार और महिला सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा है.
राहुल गाँधी की सभा में मौजूद अमिता का मानना है कि हर किसी का अपना मुद्दा होता है. राहुल गाँधी सबको सुन रहे हैं, इसलिए उनको बड़ा समर्थन मिल रहा है.
रोहतास में राहुल गाँधी ने किसानों से भी बात की है. इस दौरान किसानों ने उन्हें अपनी समस्या बताई है. राज्य में किसानों के लिए फसल का उचित दाम नहीं मिलना एक बड़ी समस्या है. जबकि किसानों ने ज़मीन के अधिग्रहण के बदले उचित मुआवज़ा न मिलने की भी बात की है.
बिहार में ‘इंडिया’ गठबंधन की उम्मीदें
राहुल गाँधी को देखने के लिए औरंगाबाद की सभा में भी बड़ी भीड़ दिखी और रोहतास में तेजस्वी की मौजूदगी में भीड़ और भीड़ का उत्साह भी ज़्यादा दिखा है.
लेकिन राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव कितने लोगों को अपने साथ जोड़ पाएंगे यह सभा में दिखने वाली भीड़ से बेहतर उन्हें चुनावों में मिलने वाली जीत ज़्यादा बता पाएगी.
फ़िलहाल राज्य की 40 में से महज़ एक लोकसभा सीट विपक्ष के पास है. राज्य में सीमांचल इलाक़े की किशनगंज सीट पर कांग्रेस का कब्ज़ा है. जबकि 16 लोकसभा सीट जेडीयू, 17 बीजेपी और 6 लोक जनशक्ति पार्टी के दो धड़ों के पास है.
राहुल गाँधी ने अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा में बिहार के उन इलाक़ों में पहुँचने की कोशिश की है, जहाँ कांग्रेस को अपने लिए उम्मीद दिखती है.
राहुला गाँधी ने अपनी यात्रा में जातिगत गणना और किसानों को उनकी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का ज़िक्र भी किया है. यानी उनकी कोशिश ऐसे हर मुद्दे को छूने की है जो बिहार के वोटरों पर असर डाल सके.
बिहार में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की उम्मीदें उन इलाक़ों पर टिकी हैं, जहाँ हाल के समय तक कांग्रेस की जीत होती रही है.
इसके अलावा आरजेडी के असर वाली भी कई लोकसभा सीट हैं. जबकि राज्य के पिछले विधानसभा चुनावों में वाम दलों का प्रदर्शन भी कुछ इलाक़ों में अच्छा रहा है.
बिहार में कहां कहां है कांग्रेस की ज़मीन
सीमांचल की बात करें तो यहां कि किशनगंज सीट पर कांग्रेस का लंबे समय से कब्ज़ा रहा है.
इसके अलावा सुपौल लोकसभा सीट से कांग्रेस की रंजीत रंजन साल 2014 में चुनाव जीत चुकी हैं. जबकि पूर्णिया और मधेपुरा सीट पर भी मुस्लिम-यादव समीकरण अच्छा असर दिखा सकता है.
माना जाता है कि मिथिलांचल की दरभंगा और मधुबनी सीट पर भी सही उम्मीदवार उतारकर विपक्षी गठबंधन एनडीए के सामने चुनौती पेश कर सकता है. दरभंगा सीट से आरजेडी ने पिछले चुनावों में अब्दुल बारी सिद्दीकी को चुनाव मैदान में उतारा था और वो हार गए थे.
साल 2019 में दरभंगा सीट से कांग्रेस के कीर्ति आज़ाद के चुनाव लड़ने की चर्चा भी चल रही थी.
पिछले लोकसभा चुनाव में मधुबनी सीट से कांग्रेस के डॉक्टर शकील अहमद चुनाव लड़ना चाह रहे थे, हालाँकि गठबंधन में यह सीट वीएसआईपी के उम्मीदवार को मिली थी जो दूसरे नंबर पर रहे थे, जबकि निर्दलीय लड़कर भी शकील अहमद अच्छे वोट के साथ तीसरे नंबर पर थे.
राहुल गाँधी ने अपनी यात्रा में बिहार के जिन इलाक़ों का दौरा किया है उनमें वाम दलों का भी अच्छा असर है. सासाराम मीरा कुमार की सीट रही है, जबकि उनके पिताजी यानी जगजीवन राम इस इलाक़े से कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं.
कैमूर, औरंगाबाद ऐसे इलाक़े हैं जहाँ से वाम दलों के कई विधायक साल 2020 के विधानसभा चुनावों में जीते थे.
बिहार में बीजेपी की चुनौती
नचिकेता नारायण कहते हैं, “नीतीश के आने के बाद भी एनडीए के लिए बिहार आसान नहीं है. आने वाले लोकसभा चुनाव का परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि एनडीए किस मुद्दे पर चुनाव लड़ता है. पिछली बार उसने पुलवामा और शहीदों को मुद्दा बनाया था, जो काम कर गया था.”
उनका मानना है कि इस बार अयोध्या के राम मंदिर के मुद्दे पर भी बीजेपी को बहुत भरोसा नहीं था, अगर ऐसा होता तो बीजेपी को नीतीश की ज़रूरत नहीं पड़ती. अगर बिहार में वोटों का ध्रुवीकरण नहीं हुआ तो एनडीए को यहाँ कड़ी चुनौती मिल सकती है.
ख़ास बात यह भी है कि दक्षिण बिहार के इलाक़े से ही एनडीए के ज़्यादातर छोटे साझेदार आते हैं. इनमें गया-नालंदा जीतनराम मांझी का क्षेत्र माना जाता है, जबकि रोहतास और औरंगाबाद के इलाकों को मिलाकर बनी काराकाट लोकसभा सीट से उपेंद्र कुशवाहा साल 2014 में चुनाव जीते थे.
ऐसे में विपक्ष के गठबंधन का मुक़ाबला एनडीए के छोटे खिलाड़ियों से हुआ तो एनडीए के लिए मुक़ाबला बहुत आसान नहीं होगा. इन इलाकों में जीत हासिल करने के लिए बीजेपी को अपने साझेदारों का पूरी ताक़त के साथ समर्थन करना पड़ सकता है.
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