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बिहारः जातियों के आंकड़े का राजनीति पर क्या असर हो सकता है?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
बिहार में जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी कर दिए गए हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक़ बिहार की कुल आबादी 13 करोड़ 7 लाख 25 हजार 310 बताई गई है.
सोमवार को सरकार की तरफ़ से जो आंकड़े जारी किए गए हैं, उसके मुताबिक़ राज्य में सबसे बड़ी आबादी अत्यंत पिछड़ा वर्ग की है, जो राज्य की कुल आबादी के क़रीब 36 फ़ीसदी है.
आंकड़ों के लिहाज से बिहार में-
अत्यंत पिछड़ा वर्ग 36.01%
पिछड़ा वर्ग 27.12%
अनुसूचित जाति 19.65%
अनारक्षित यानी सवर्ण जातियां क़रीब 15.52% हैं,
जबकि राज्य में-
अनुसूचित जनजाति की आबादी 1.68% है.
जाति आधारित जनगणना में धार्मिक मान्यताओं के लिहाज से बिहार में सबसे ज़्यादा हिन्दू आबादी है. राज्य में हिन्दुओं की आबादी क़रीब 82% है जबकि,
मुस्लिम 17.7%
ईसाई 0.05%
बौद्ध 0.08%
सिख 0.01% फ़ीसदी हैं.
इसके अलावा राज्य में जैन और कुछ अन्य जातियां भी हैं. बिहार में महज़ 2146 यानी 0.0016 % लोग ऐसे हैं जो किसी भी धर्म को नहीं मानते हैं.
जाति आधारित सर्वे में जिन आंकड़ों की जानकारी जुटाने की कोशिश की गई थी, यानी राज्य में अलग अलग जातियों की आबादी कितनी है, वो आंकड़े भी जारी कर दिए गए हैं.
आंकड़ों में किसकी कितनी आबादी
यादव आबादी 14%
रविदास - चर्मकार 5.25%
कुशवाहा 4.21%
मुसहर की आबादी 3%
कुर्मी क़रीब 2.87%
तेली 2.81%
मल्लाह 2.6%
बनिया 2.31%
कानू 2.21%
बिहार की प्रमुख सवर्ण जातियों के लिहाज से बात करें तो राज्य में सबसे ज़्यादा ब्राह्मणों की आबादी है.
ब्रहाणों की आबादी 3.65%
राजपूतों की आबादी 3.45%
भूमिहारों की आबादी 2.86%
जबकि बिहार में कायस्थों की आबादी क़रीब 0.6% है.
वहीं जाति आधारित जनगणना में किन्नर, ट्रांसजेंडर समुदाय को अलग वर्ग में रखा गया है और राज्य में उनकी कुल संख्या 825 बताई गई है.
सियासी होड़
बिहार में जाति आधारित जनगणना का काम आसान नहीं रहा है. इस तरह की जनगणना को अदालत में भी चुनौती दी गई और यह मामला पटना हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा.
बिहार में जाति आधारित जनगणना के आंकड़े जारी होने के बाद कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी टिप्पणी की है.
उन्होंने सोशल प्लेटफार्म एक्स पर लिखा है, “बिहार की जातिगत जनगणना से पता चला है कि वहां ओबीसी + एससी + एसटी 84% हैं. केंद्र सरकार के 90 सचिवों में सिर्फ़ 3 ओबीसी हैं, जो भारत का मात्र 5% बजट संभालते हैं. इसलिए, भारत के जातिगत आंकड़े जानना ज़रूरी है. जितनी आबादी, उतना हक़ ये हमारा प्रण है.”
बिहार में सरकार यह दावा करती रही है कि जाति आधारित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सरकारी योजना बनाने में मदद मिलेगी और ज़रूरतमंद लोगों के लिए योजना बनाने में सरकार को मदद मिलेगी.
बिहार सरकार ने सोमवार 2 अक्टूबर यानी सरकारी छुट्टी के दिन जाति आधारित जनगणना के आंकड़े जारी किए हैं.
आंकड़े जारी होने के बाद अलग-अलग पार्टियां भी इसका श्रेय लेने की होड़ में शामिल हैं.
आरजेडी नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा है, “हम शुरू से इसकी मांग कर रहे थे और आज ऐतिहासिक दिन में यह जारी किया गया है. इस काम में बीजेपी ने बहुत अड़चन डालने की कोशिश की है. हमारी मांग को प्रधानमंत्री जी ने नकारा. लोकसभा में नकारा, राज्यसभा में नकारा गया.”
तेजस्वी यादव का कहना है कि इन आंकड़ों से हर वर्ग की आर्थिक स्थिति का भी पता चला है. अब आर्थिक न्याय का दौर है और सरकार की यह कोशिश होगी कि आंकड़ों के आधार पर विशेष योजना बनाकर लोगों को लाभ पहुंचाया जाए.
जनता दल यूनाइटेड के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया है कि नीतीश कुमार जो कहते हैं वो करते हैं, बीजेपी इसे रोकने की कोशिश कर रही थी और सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल भी पेश हो गए थे.
दरअसल, इसी साल जनवरी में जाति आधारित जनगणना के पहले चरण में राज्य भर के मकानों की सूची तैयार की गई थी. इसमें मकान के मुखिया का नाम दर्ज किया गया था और साथ में मकान या भवन को एक नंबर दिया गया था.
इसमें क़रीब दो करोड़ 59 लाख़ परिवारों की सूची तैयार गई थी. कास्ट सर्वे का दूसरा चरण 15 अप्रैल से शुरू होकर 15 मई को ख़त्म होना था, लेकिन मई के पहले सप्ताह में पटना हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी.
पटना हाई कोर्ट ने अगस्त में यह रोक हटाई थी और जातिगत जनगणना का काम आगे बढ़ा था. लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के बाद यह मामला दोबारा सुप्रमी कोर्ट पहुंच गया. पहली बार में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पटना हाई कोर्ट जाने को कहा था.
यह मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, हालांकि कोर्ट ने इसपर किसी भी तरह की रोक लगाने से इनकार कर दिया था.
बीजेपी सांसद संजय जायसवाल दावा करते हैं कि बीते 33 साल में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जिन जातियों को आगे नहीं बढ़ा सके उनके लिए हम काम करेंगे, बिहार में जातिगत जनगणना के लिए राज्य में बीजेपी के ही वित्त मंत्री ने 500 करोड़ रुपए जारी किए थे और हर जगह हम साथ थे.
दरअसल पिछले साल अगस्त महीने में बिहार की सत्ता में साझेदार बीजेपी से अलग होकर नीतीश कुमार ने आरजेडी और अन्य दलों के सहयोग से सरकार बनाई थी.
इससे पहले तेजस्वी यादव लगातार जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे.
संजय जायसवाल ने आरोप लगाया, “नीतीश और लालू ने इस जनगणना में एक गुनाह ज़रूर किया है कि कुल्हड़िया, शेरशाहबादी जैसी मुस्लिमों की ऊंची जातियों को भी इन्होंने पिछड़ों में लिया है और पिछड़ों के साथ हक़मारी की है. बिहार में जानबूझकर बहुत सारे अल्पसंख्यकों को इसमें शामिल कर लिया गया है जिससे कि अति पिछड़े हिन्दुओं की हक़मारी हो सके.”
हालांकि सियासी तौर पर अलग-अलग राजनीतिक दल जितनी आसान दावे करते दिखते हैं, ज़मीनी स्तर पर जातियों के आंकड़े मौजूदा राजनीतिक तस्वीर को चुनौती दे सकते हैं.
इसमें संख्या के आधार पर जातिगत चेतना हर राजनीतिक दल पर सवाल खड़े कर सकती है.
नई शुरुआत
बिहार के लिहाज से देखें तो इसमें सबसे अहम भूमिका अत्यंत पिछड़े वर्ग से जुड़ी जातियों की हो सकती है, जिनकी आबादी क़रीब 36 फ़ीसदी है. अत्यंत पिछड़े वर्ग यानी ईबीसी में बिहार में कुल 113 जातियां शामिल हैं.
इनमें केवट, कानू, चंद्रवंशी कहार, धानुक, नोनिया, नाई और मल्लाह जैसी जातियां शामिल हैं. इनकी आर्थिक, सामाजिक स्थिति कमज़ोर होने के अलावा भी आबादी का बड़ा हिस्सा होने के बाद भी इनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है.
पटना के एएन सिंहा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास के मुताबिक़ बिहार में साल 2015 में तेली, तमोली और दांगी को अत्यंत पिछड़ा वर्ग में जोड़ा दिया गया था, जिसका आज भी विरोध हो रहा है.
इन्हें ईबीसी वर्ग से हटा दें तो 36 फ़ीसदी आबादी होने के बाद भी बिहार विधासभा में फ़िलहाल महज़ 7 फ़ीसदी विधायक ही ईबीसी वर्ग से हैं.
विद्यार्थी विकास कहते हैं, “बिहार की राजनीति में पहले सवर्ण जातियों का बोलबाला था, उसके बाद यहां की राजनीति में ओबीसी समुदाय का असर रहा है. अब जो आंकड़े आए हैं उससे ईबीसी समुदाय यह कह सकता है कि अगली बारी हमारी है और बिहार में यह वर्ग राजनीति में अपनी भागीदारी को लेकर नए शिरे से दावा कर सकता है.”
पिछले तीन दशक से ज़्यादा समय से बिहार में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और नीतीश कुमार ही शासन के मुखिया रहे हैं.
इसमें एक छोटा कार्यकाल जीतन राम मांझी का भी था, हालांकि उन्हें ख़ुद की राजनीतिक ताक़त ने नहीं बल्कि नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनाया था.
बिहार में यादव क़रीब 14 फ़ीसदी जबकि कुर्मियों की आबादी तीन फ़ीसदी से भी कम है.
लेकिन इसके बावज़ूद भी सत्ता के केंद्र में शुरुआती दिनों में सवर्ण जातियां रही हैं उसके बाद क़रीब 33 साल से बिहार में लालू-नीतीश ही राजनीति के केंद्र में रहे हैं.
हालांकि भारत की राजनीति और समाज पर नज़र रखने वाले योगेंद्र यादव का मानना है कि जातीय जनगणना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष केवल जातियों की संख्या का अनुमान नहीं है, यह बहुत गौण आंकड़ा है, इसपर बहुत राजनीतिक उठापटक होती है, लेकिन यह सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा नहीं है.
योगेंद्र यादव कहते हैं, “जाति आधारित जनगणना का असली महत्व इस बात में है कि इससे हर जाति की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति का अनुमान लगेगा. किस जाति में कितने ग्रेजुएट हैं, कितने अशिक्षित हैं, कितने लोगों के पास गाड़ी है, कितने सरकार नौकरी में हैं, कितने प्राइवेट नौकरी में हैं.”
योगेंद्र यादव कहते हैं कि अगर वो जाति आधारित जनगणना का समर्थन करते हैं तो वो यह जानना चाहते हैं कि जाति व्यवस्था की विषमताएं आज उस स्वरूप में मौजूद हैं या नहीं. जबकि शुरू में जातियों से जुड़े जो आंकड़े आते हैं, उसका एक अनुमान तो होता ही है, बस उसकी सरकारी पुष्टि की जाती है.
आरजेडी सांसद मनोज झा ने महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान संसद में ‘ठाकुर का कुआँ’ कविता पढ़ी थी. इस कविता पाठ के बाद बिहार की सियासत में ठाकुर बनाम ब्राह्मण की बहस भी हो रही थी. लेकिन जातियों के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में ब्राह्मणों और राजपूतों की कुल आबादी क़रीब 7 फ़ीसदी ही है.
ऐसी स्थिति में माना जाता है कि हर राजनीतिक दल अब इस तरह की बहसों से ज़्यादा पिछड़े वर्ग और अति पछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने पर ज़्यादा ध्यान देने वाली है. आंकड़े आने के बाद आबादी के लिहाज से इन वर्गों के नेताओं का महत्व भी बढ़ सकता है.
केंद्र सरकार पर दबाव
विपक्ष सामाजिक न्याय के नाम पर साल 2024 के चुनावों में जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाकर बीजेपी पर दबाव बनाने और दलित, पिछड़े वोट को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहा है.
जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं, “केंद्र ने पीएम यशस्वी योजना के नाम पर क्लास एक से आठवीं तक की छात्रवृत्ति बंद कर दी. अब इसका असर दिखेगा. कास्ट सेंसस के आंकड़े आने से ह्यूमन इंडेक्स के आधार पर पिछड़े राज्य केंद्र पर दबाव डाल सकते हैं.”
ज़ाहिर है केंद्र का लक्ष्य पिछड़े और ग़रीबों को आगे बढ़ाने की होगी तो ऐसे में राज्य के पास आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा के स्तर पर पिछड़ी आबादी आंकड़ा होगा और वह केंद्र पर आर्थिक सहयोग के लिए दबाव बढ़ा सकता है.
बिहार में सत्तारूढ़ महागठबंधन के सहयोगी दलों ने देश भर में जाति आधारित जनगणना कराने की मांग की है. भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने 18 जुलाई को बेंगलुरु में बैठक के बाद विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ ने देश में जातिगत जनगणना कराने की मांग की थी.
कांग्रेस पार्टी के कई बड़े नेताओं ने हाल के समय में जातिगत जनगणना के मुद्दे को ज़ोर शोर से उठाया है. जातिगत जनगणना के साथ एक नारा भी लगाया जाता है 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’.
राहुल गांधी ने भी 2011 जातिगत जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक करने और पिछड़े वर्ग, दलितों और आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण देने की मांग कई बार की है.
दरअसल जातिगत संख्या के आधार पर आरक्षण की मांग कर विपक्ष दलितों और पिछड़ों के बड़े वोट को अपने पक्ष में लाना चाहता है. माना जाता है कि इससे बीजेपी के कथित हिन्दू वोट बैंक को भी कमज़ोर किया जा सकता है.
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