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नीतीश कुमार का 'आख़िरी चुनाव' कहने का क्या मतलब है?
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी के लिए
"... जान लीजिए, आज चुनाव का आखिरी दिन है, अब परसों चुनाव है, और यह मेरा अंतिम चुनाव है, अंत भला तो सब भला."
बिहार विधानसभा चुनाव में आख़िरी चरण के मतदान के लिए गुरुवार को चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूर्णिया के धमदाहा में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए इस चुनाव को अपना 'आख़िरी चुनाव' बताकर सियासी गलियारे में एक नई चर्चा छेड़ दी है.
सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह चुनाव सच में नीतीश कुमार का आख़िरी चुनाव होगा? यदि हां, तो नीतीश के बाद उनकी पार्टी जदयू का चेहरा कौन होगा? और यदि नहीं तो क्या विपक्ष का यह आरोप सही है कि "नीतीश कुमार जनता को इमोशनली ब्लैकमेल कर रहे हैं?"
हालांकि, नीतीश के इस बयान के बाद जब उनके राजनीतिक जीवन से संन्यास लेने से जुड़ी प्रतिक्रियाएं आने लगीं तो जदयू ने उनके बयान पर सफ़ाई देते हुए आधिकारिक तौर पर कहा, "सीएम के 'आख़िरी चुनाव' कहने का मतलब चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन से और आख़िरी सभा से था. इसका ग़लत मतलब नहीं निकाला जाए."
पार्टी का रुख़
जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने इस बाबत बीबीसी से कहा, "पार्टी की ओर से पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि नीतीश कुमार के कहने का आशय क्या था! अभी रिटायरमेंट का तो कोई सवाल ही नहीं है क्योंकि उनमें अभी भी बहुत ऊर्जा बाक़ी है. वह अब भी दिनभर में 15 से अधिक सभाएं कर रहे हैं, 15 सालों से बिना थके सफलतापूर्वक सरकार चला रहे हैं."
दूसरी तरफ़ विरोधी दल के नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश के 'आख़िरी चुनाव' वाले बयान पर चुटकी ली है और कहा है, "हम शुरू से कहते आ रहे हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरी तरह से थक चुके हैं और आज आख़िरकार उन्होंने अंतिम चरण से पहले हार मानकर राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर हमारी बात पर मुहर लगा दी."
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार निराला कहते हैं, "नीतीश कुमार बहुत सोच-विचार कर बोलने वाले नेता हैं. अगर उन्हें इमोशनल कार्ड ही खेलना होता तो वे चुनाव प्रचार की शुरुआत से ही ये बात कहते या दूसरे चरण के मतदान से पहले कहते जो उनकी पार्टी के लिए तुलनात्मक रूप से कठिन था. लेकिन, उन्होंने आख़िरी दिन ये बात कही, इससे साफ़ होता है कि उनके मन में कुछ चल रहा है."
निराला आगे कहते हैं, "नीतीश कुमार के इस बयान को केवल वोट की राजनीति से जोड़कर देखना सही नहीं है. हां, यह ज़रूर है कि इस बयान से उन्हें वोटों के गुणा-गणित में हानि-लाभ हो. लेकिन यदि व्यापक नज़रिए से देखें तो उन्होंने यह बयान देकर एक प्रयोग किया है. ऐसे प्रयोग वे पिछले पांच-छह सालों से करते आ रहे हैं. चाहे वह मांझी को मुख्यमंत्री बनाना हो, ईबीसी, महादलित और महिलाओं को अलग से आरक्षण देना हो, पार्टी में जातिवाद और वंशवाद का विरोध करना हो या अब आबादी के हिसाब से आरक्षण देने की बात कहनी हो."
वाक़ई भाजपा के लिए ज़रूरी हैं नीतीश?
नीतीश कुमार का 'आख़िरी चुनाव' वाला बयान जितना महत्वपूर्ण जदयू के लिए है, उतना ही महत्वपूर्ण इस वक़्त भाजपा के लिए भी है क्योंकि दोनों अभी साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं.
'आख़िरी चुनाव' वाले बयान देने के थोड़ी ही देर बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से बिहारवासियों के नाम एक चिट्ठी पोस्ट की जिसमें उन्होंने लिखा, "मुझे बिहार में नीतीश कुमार की ज़रूरत है. मुझे विश्वास है कि डबल इंजन की ताक़त इस दशक में बिहार को विकास की नई ऊंचाई पर पहुंचाएगी."
बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल बीबीसी से कहते हैं, "नीतीश जी ने ऐसा क्यों कहा और वह क्या सोच रहे हैं इसके बारे में तो वो ही बताएंगे, लेकिन इस वक़्त बिहार को उनकी ज़रूरत है. वे चाहेंगे भी तो बिहार की जनता उन्हें राजनीति नहीं छोड़ने देगी. विपक्ष उनके ख़िलाफ़ लगातार ग़लत शब्द इस्तेमाल कर रहा है, हो सकता है उससे भी आहत होकर उनके मुंह से कुछ निकल गया हो जिसका अब बतंगड़ बनाया जा रहा है."
नीतीश अगर आगे चुनाव नहीं लड़ते हैं तो क्या इसका लाभ बीजेपी को मिल सकता है?
प्रेम रंजन पटेल इस पर कहते हैं, "अगर नीतीश जी को स्वयं यह लगता है कि यह उनका आख़िरी चुनाव है तो ज़रूरत यह सोचने की है कि उनके बाद ऐसा कौन होगा जो बिहार को इसी तरह विकास के पथ पर उत्तरोत्तर गति से बढ़ाता रहे."
जेडीयू माइनस नीतीश का अर्थ
नीतीश कुमार पिछले 43 सालों से चुनावी राजनीति में हैं. 1994 में वे लालू प्रसाद यादव से अलग हुए और ख़ुद की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) बनाई. तब से लेकर अब तक जदयू के सबसे बड़े नेता वो ही रहे. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनके बाद क्या होगा?
जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह कहते हैं, "सबसे पहली बात की नीतीश कुमार अभी कहीं नहीं जा रहे हैं, वे फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बन रहे हैं. रही बात उनके बाद की तो वे ख़ुद पार्टी का नेता चुन लेंगे. हमारे यहां नेताओं की कमी नहीं है."
लेकिन जदयू और नीतीश कुमार को लंबे समय तक कवर करने वाले बिहार के वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "जेडीयू माइनस नीतीश कुमार कुछ भी नहीं है. अगर एकाध को छोड़ दें तो जदयू के अभी जितने भी शीर्ष नेता हैं वे कहीं ना कहीं से आए हुए हैं, जो कहीं और भी जा सकते हैं, और जैसे ही नीतीश कुमार पीछे जाएंगे भाजपा उनकी पार्टी को अपने ग्रिप में लेने की कोशिश करेगी."
राजनीतिक टीकाकार जदयू के कुछ अन्य शीर्ष नेताओं का नाम तो गिनाते हैं, मगर साथ ही ये भी कहते हैं कि नीतीश कुमार की अभी तक जैसी राजनीति रही है, वे उन नेताओं के हाथ में पार्टी की बागडोर कभी नहीं सौंपना चाहेंगे जिन्हें लेकर उनके मन में थोड़ा भी संशय हो.
निराला कहते हैं, "आरसीपी सिंह नीतीश के बाद पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता हैं, संगठन में बड़ी भूमिका भी निभाते हैं, मगर कभी फ्रंट पर नहीं आते, क्योंकि नीतीश कुमार नहीं चाहते कि उन पर जातिवादी होने का आरोप लगे. आरसीपी सिंह उनकी ही जाति से आते हैं. दूसरे रहे ललन सिंह तो वे भूमिहार समाज से हैं. लेकिन नीतीश कुमार की राजनीति कभी सवर्ण केंद्रित नहीं रही, वो ये भी नहीं चाहेंगे कि उनके जाने के बाद उनकी पार्टी पर सवर्ण प्रभुत्व हो."
निराला कहते हैं कि नीतीश कुमार को अगर अपना उत्तराधिकारी चुनना हुआ तो वे ईबीसी क्लास, महादलित या फिर किसी महिला को कमान सौंपेंगे क्योंकि नीतीश कुमार की अभी तक की राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द रही है.
आख़िरी चुनाव?
इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव की कैंपेनिंग के दौरान नीतीश कुमार ने मीडिया को तीन इंटरव्यू दिए हैं. हर इंटरव्यू में उनसे यह पूछा गया कि क्या यह उनका आख़िरी चुनाव होगा? उन्होंने हर बार जवाब 'ना' में ही दिया.
लेकिन, चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन उन्होंने स्वयं ही ये बात कह दी कि ये मेरा आख़िरी चुनाव है. आख़िर ऐसा क्यों?
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "यह सहानुभूति वोट बटोरने की कोशिश है. इससे ज़्यादा कुछ नहीं है. क्योंकि पिछले कुछ दिनों से विपक्ष ने जिस तरह मुद्दों पर उन्हें घेरा है, उनके पास कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं है. वोटिंग के रुझान भी बहुत तेज़ी से बदले हैं. कुल मिलाकर इसे एंटी इनकंबेंसी का डर कह सकते हैं."
लेकिन बीजेपी के नेता साफ़ कह चुके हैं एनडीए की जीत की सूरत में सीएम नीतीश कुमार ही होंगे.
पलट जाएंगे नीतीश कुमार?
नीतीश के शुरुआती दिनों में उनके सहयोगी और साथी रहे शिवानंद तिवारी जो अब राजद के वरिष्ठ नेता हैं, वो कहते हैं, "हम कैसे नीतीश कुमार पर यकीन करें कि यह उनका आख़िरी चुनाव है. उन्होंने तो विधानसभा के पटल पर कहा था कि मिट्टी में मिल जाएंगे पर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे. पर उन्होंने क्या किया, यह दुनिया जानती है. जिस तरह से उस बात से पलट गए, वैसे ही इस बात से भी पलट जाएंगे."
शिवानंद तिवारी की मानें तो नीतीश कुमार कुछ भी कह सकते हैं, अपना कहा किया या नहीं, इसकी उन्हें ज़रा भी परवाह नहीं रहती.
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