बेंगलुरु एयरपोर्ट पर नमाज़: बीजेपी ने सवाल उठाया, कांग्रेस ने किया पलटवार

बेंगलुरु एयरपोर्ट पर नमाज़ की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से बीबीसी हिंदी के लिए

बीजेपी ने बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट के टर्मिनल 2 के बाहर नमाज़ अदा करते कुछ मुसलमानों की तस्वीर साझा की थी.

इसके बाद बीजेपी और कांग्रेस के नेताओं के बीच जुबानी जंग शुरू हो गई है.

दरअसल, कर्नाटक बीजेपी के प्रवक्ता विजय प्रसाद ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर नमाज़ अदा करने की तस्वीरें डालकर पूछा था कि "क्या इसकी अनुमति है?"

कर्नाटक बीजेपी के प्रवक्ता विजय प्रसाद ने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह तस्वीर रविवार शाम को टर्मिनल-2 के गेट नंबर 3 के पास ली गई थी. मैंने वहाँ के पुलिस अधिकारियों से बात की है. उन्हें इसे रोकना चाहिए था."

कांग्रेस ने जवाब में आरएसएस के 'रूट मार्च' का हवाला देते हुए सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया.

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दरअसल हाल में कर्नाटक में आरएसएस के रूट मार्च कार्यक्रम को लेकर विवाद हुआ था और मामला अदालत तक पहुँच गया था.

कांग्रेस प्रवक्ता और कर्नाटक के ग्रामीण विकास मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस से सवाल करते हुए इसका जवाब दिया.

सोमवार को खड़गे ने कहा, "उन्होंने हमारे सरकारी आदेश पर हाईकोर्ट से रोक क्यों लगवा ली, जिसमें कहा गया था कि सार्वजनिक स्थान पर किसी भी आयोजन के लिए पहले से अनुमति लेनी चाहिए. उन्हें अपनी याचिका वापस ले लेनी चाहिए."

इस विवाद के मद्देनजर, बीबीसी हिंदी ने बेंगलुरु स्थित जुम्मा मस्जिद के प्रतिष्ठित मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना मकसूद इमरान रशादी से राय मांगी कि क्या ऐसी जगहों पर नमाज़ अदा करना उचित है.

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एयरपोर्ट पर नमाज़ की घटना के बारे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी पोस्ट में विजय प्रसाद ने पूछा, "बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 2 के अंदर इसकी इजाज़त कैसे दी जा सकती है? माननीय मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और मंत्री प्रियांक खड़गे, क्या आप इसे मंज़ूर करते हैं?"

उन्होंने पूछा, "क्या इन लोगों ने हाई सिक्युरिटी एयरपोर्ट में नमाज़ पढ़ने के लिए पहले से अनुमति ली थी? जब आरएसएस संबंधित अधिकारियों से अनुमति लेकर 'पद संचलन' करता है, तो सरकार उस पर आपत्ति क्यों जताती है? लेकिन प्रतिबंधित सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसी गतिविधियों पर वह आँखें मूंद लेती है. क्या ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में यह गंभीर सुरक्षा चिंता का विषय नहीं है?"

प्रसाद का इशारा उस विवाद की ओर है जो हाल के हफ्तों में कर्नाटक के मीडिया में काफ़ी छाया रहा है. दरअसल कांग्रेस सरकार ने साल 2013 में तत्कालीन बीजेपी सरकार के आदेश की तर्ज पर एक नया सरकारी आदेश जारी किया है.

आदेश में मुख्य रूप से कहा गया है कि राजनीतिक या अन्य उद्देश्यों के लिए सार्वजनिक स्थानों का उपयोग करने से पहले अधिकारियों से अनुमति लेनी होगी.

आरएसएस के मामले में अदालत ने क्या कहा था

आरएसएस का मार्च

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यह ताज़ा आदेश तब आया जब कलबुर्गी ज़िले के चित्तपुर में प्रशासन ने आरएसएस को अपनी स्थापना के 100 साल पूरे होने के मौके पर एक रूट मार्च निकालने की अनुमति देने से इनकार कर दिया. चित्तपुर, प्रियांक खड़गे का विधानसभा क्षेत्र है.

जब आरएसएस ने दोबारा अनुमति मांगी, तो पता चला कि भीम आर्मी जैसे कई और दलित संगठन भी जुलूस निकालने की तैयारी में थे. ये सभी संगठन उन्हीं रास्तों पर एक ही समय पर जुलूस निकालना चाहते थे जिन पर आरएसएस अपना रूट तय किया था.

आरएसएस ने हाई कोर्ट की कलबुर्गी पीठ के सामने ज़िला प्रशासन की इस दलील पर सवाल उठाया कि अगर किसी भी एक संगठन को अनुमति दी गई तो इससे क़ानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होगी.

न्यायाधीश एमजीएस जमाल की पीठ ने एडवोकेट जनरल से शांति बैठक बुलाने और यह सुनिश्चित करने को कहा कि आरएसएस की अनुमति पर विचार किया जाए.

इस बीच, हाई कोर्ट की धारवाड़ पीठ में सरकारी आदेश को रद्द करने की मांग को लेकर एक याचिका दायर की गई. जिसके बाद न्यायाधीश एम नागप्रसन्ना ने सरकारी अधिसूचना पर रोक लगा दी.

सरकार ने कहा कि यह आदेश आरएसएस के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि उन सभी संगठनों पर लागू होता है जो राजनीतिक बैठकों सहित किसी भी गतिविधि के लिए सार्वजनिक स्थान का उपयोग करना चाहते हैं.

इसी पृष्ठभूमि में, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बीते रविवार को चुनिंदा लोगों के साथ अपने संवाद में कहा कि आरएसएस असंवैधानिक नहीं है और इसे पंजीकृत कराने की भी कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह व्यक्तियों का एक समूह है.

प्रियांक खड़गे ने यह सवाल उठाया था कि आरएसएस रजिस्टर्ड संगठन क्यों नहीं है.

कांग्रेस ने क्या कहा

प्रियांक खड़गे

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बीजेपी प्रवक्ता के जवाब में कांग्रेस के प्रियांक खड़गे ने कहा, ''हम भी बीजेपी की तरह यही कह रहे हैं कि किसी को भी जनता को असुविधा नहीं पहुंचानी चाहिए.''

प्रियांक खड़गे ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश का ज़िक्र किया जिसमें बेंगलुरु शहर में फ्रीडम पार्क को छोड़कर बाकी जगहों पर धरने और जुलूसों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

उन्होंने कहा, "जब राहुल गांधी 'वोट चोरी' के प्रदर्शन के लिए यहाँ आए थे तब हमने भी इसी जगह पर प्रदर्शन किया था."

उन्होंने कहा, ''सरकारी आदेश सभी पर समान रूप से लागू होता है, चाहे वह आरएसएस हो या कोई अन्य संगठन.''

अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 2 के किनारे हुई नमाज़ के संदर्भ में, प्रियांक खड़गे ने कहा, "सभी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर सभी धर्मों की प्रार्थना के लिए जगह है. हाल ही में दिल्ली और अहमदाबाद हवाई अड्डों पर गरबा हो रहा था. लेकिन उसके लिए नियम हैं."

ऊपरी तौर पर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद, लखनऊ, तिरुवनंतपुरम, मंगलुरु, तिरुचिरापल्ली और गोवा के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर प्रार्थना कक्ष हैं, जहां सभी धर्मों के लोग अपने धर्म का पालन कर सकते हैं.

लेकिन ये सारे प्रार्थना कक्ष हवाई अड्डों के परिसर के भीतर हैं.

बेंगलुरु के मामले में नमाज़ तकनीकी रूप से हवाई अड्डे की इमारत के बाहर, लेकिन हवाई अड्डे के परिसर के भीतर अदा की जा रही थी. यह वो जगह है जहाँ लोग चेक-इन के लिए हवाई अड्डे में प्रवेश करने के लिए अपने वाहनों या टैक्सियों से उतरते हैं.

क्या इस्लाम में सड़क किनारे नमाज़ पढ़ना उचित है?

यह सवाल उठ उठता है कि क्या मुसलमानों के लिए उस जगह नमाज़ अदा करना उचित है, जहां उन्होंने ऐसा किया था?

बेंगलुरु स्थित जुम्मा मस्जिद के मौलाना मकसूद इमरान रशादी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "इस्लाम में नामुनासिब अमल नहीं है. अगर जगह साफ़-सुथरी है, तो आप कहीं भी नमाज़ पढ़ सकते हैं. पैगंबर ने कहा है कि आप जहाँ भी साफ़-सुथरी हो, वहाँ नमाज़ पढ़ सकते हैं. लेकिन सड़क किनारे नमाज़ नहीं पढ़नी चाहिए."

उन्होंने कहा, "कोई व्यक्ति काम से घर जा रहा है और अचानक ट्रैफ़िक रोककर सड़क पर नमाज़ पढ़ने लगता है तो यह अनुचित है. दूसरों को असुविधा पहुँचाकर नमाज़ पढ़ने की अनुमति नहीं है. यह भी सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि दूसरों को शिकायत करने का मौका न मिले और समाज में दरार न पड़े."

मई में, एक सरकारी बस ड्राइवर को बस रोककर ड्राइवर की सीट के ठीक पीछे वाली सीट पर नमाज़ पढ़ने के लिए निलंबित कर दिया गया था.

उसे निलंबित करने का कारण यात्रियों को असुविधा पहुँचाना बताया गया था.

ये वही ड्राइवर था जिसे 15 सालों में एक भी दुर्घटना में शामिल न होने के लिए स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.