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भारत का तेल आयात क्या अमेरिका तय कर रहा है? क्या कहते हैं आँकड़े
- Author, जैस्मीन निहलानी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
बीते महीनों में अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल ख़रीद बंद करने के लिए दबाव बनाया था.
लेकिन अब अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि उनका देश भारतीय रिफ़ाइनरियों को सीमित समय के लिए रूसी तेल ख़रीदने की "अनुमति" देगा.
शुक्रवार, छह मार्च को फ़ॉक्स बिज़नेस को दिए इंटरव्यू में बेसेंट ने कहा, "भारतीयों ने बहुत अच्छा काम किया. हमने उनसे प्रतिबंधित रूसी तेल ख़रीदना बंद करने को कहा था. उन्होंने ऐसा किया."
उन्होंने आगे कहा, "वे इसकी जगह अमेरिकी तेल लेने वाले थे. लेकिन दुनियाभर में तेल की अस्थायी कमी को कम करने के लिए हमने उन्हें रूसी तेल ख़रीदने की अनुमति दी है. हम दूसरे रूसी तेल पर लगे प्रतिबंध भी हटा सकते हैं."
उसी दिन बेसेंट ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि (भारतीय रिफ़ाइनरियों को) 30 दिन की ये छूट समंदर के ज़रिये तेल की आपूर्ति बाधित होने के लिए दी गई है और इससे रूस की सरकार को बहुत आर्थिक लाभ होने वाला नहीं है.
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अगस्त 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगा दिया था. यह दुनियाभर के देशों पर लगे सबसे ज़्यादा टैरिफ़ में से एक था. इसमें भारत पर रूसी तेल ख़रीदने की वजह से लगा 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ भी शामिल था.
ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि रूसी तेल ख़रीदकर भारत यूक्रेन में चल रहे युद्ध में रूस की वित्तीय मदद कर रहा है.
अमेरिकी टैरिफ़ के बाद पिछले कुछ महीनों में भारत ने तेल के लिए रूस पर अपनी निर्भरता कम की है.
इसके बाद फ़रवरी की शुरुआत में जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते के मसौदे पर सहमति बनी, तो ट्रंप प्रशासन ने रेसिप्रोकल टैरिफ़ घटाकर 18 फ़ीसदी कर दिया और अतिरिक्त 25 फ़ीसदी टैरिफ़ भी हटा दिया.
भारत रूस से पहले कितना तेल ख़रीदता था?
रूस हमेशा से भारत को कच्चा तेल सप्लाई करने वाला बड़ा देश नहीं रहा है. जनवरी 2022 में भारत के तेल आयात में उसकी हिस्सेदारी सिर्फ़ 1.8 फ़ीसदी थी. लेकिन यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद भारत ने रियायती दरों पर मिल रहे रूसी तेल का आयात बढ़ा दिया.
जुलाई 2024 तक भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर 44.6 फ़ीसदी तक पहुँच गई.
इस साल दो फ़रवरी को भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर सहमति की घोषणा से पहले ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया था, "उन्होंने (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) रूसी तेल ख़रीद बंद करने और अमेरिका से कहीं ज़्यादा तेल ख़रीदने पर सहमति जताई है..."
बाद में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ट्रंप के इस दावे को ख़ारिज कर दिया और कहा कि भारत ने रूसी तेल ख़रीद बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है. उन्होंने कहा कि भारत के तेल आयात का फ़ैसला देश के हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है.
हालाँकि आँकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2025 से भारत ने रूस पर अपनी निर्भरता कम करना शुरू कर दिया था. नवंबर 2025 में तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी 35 फ़ीसदी थी, जबकि इसके अगले महीने यह घटकर 24.9 फ़ीसदी रह गई.
जनवरी 2026 में रूसी तेल की हिस्सेदारी और घटकर 20.6 फ़ीसदी रह गई. अगस्त 2022 के बाद यह सबसे निचले स्तर है. उस वक़्त रूसी तेल की हिस्सेदारी 16.5 फ़ीसदी थी.
जनवरी 2026 के बाद के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं.
भारतीय तेल आयात के स्रोतों में विविधता
जब भारतीय रिफ़ाइनरियों ने रूसी कच्चे तेल के ऑर्डर कम किए, तो सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से तेल ख़रीद में बढ़ोतरी हुई.
जनवरी 2026 में भारत ने अपने कच्चे तेल का 17 फ़ीसदी हिस्सा सऊदी अरब से आयात किया, जबकि एक साल पहले यह 12 फ़ीसदी था.
इसी तरह भारत के कच्चे तेल आयात में यूएई की हिस्सेदारी जनवरी 2025 के 7.3 फ़ीसदी से बढ़कर इस साल जनवरी में 9.3 फ़ीसदी हो गई.
ईरान के होर्मुज़ स्ट्रेट बंद करने से तेल की सप्लाई बाधित हुई है. इसी वजह से ट्रंप प्रशासन को रूसी तेल पर छूट की घोषणा करनी पड़ी.
होर्मुज़ स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्गों में से एक है. दुनिया के लगभग 20 फ़ीसदी तेल और एलएनजी की आवाजाही इसी जलमार्ग से होती है.
बीबीसी ने पहले रिपोर्ट किया था कि लाखों बैरल तेल और गैस होर्मुज़ स्ट्रेट के पास फँसे हुए हैं. इस संकरे समुद्री रास्ते से भारत के कच्चे तेल और गैस आयात का लगभग आधा हिस्सा गुजरता है.
भारत को मिली 'छूट' को विशेषज्ञ कैसे देख रहे?
रूसी तेल ख़रीद पर भारत को मिली अमेरिकी 'छूट' को विशेषज्ञ अलग-अलग तरह से देख रहे हैं.
ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा का मानना है कि अमेरिका ने अपने हितों को देखते हुए यह किया है.
उन्होंने कहा, "हमें पूरी स्थिति को वैश्विक तेल सप्लाई सिस्टम के संदर्भ में देखना होगा. अगर मौजूदा हालात में भारत रूस से ज़्यादा तेल नहीं ख़रीदता, तो इसका नतीजा यह होगा कि रूसी तेल वैश्विक सप्लाई सिस्टम में नहीं पहुँचेगा. तब कीमतें बढ़ेंगी और अमेरिका को सबसे ज़्यादा नुक़सान होगा. इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी. इसलिए उन्होंने जो भी किया है, अपने हित में किया है."
नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "लेकिन जहाँ तक भारत का सवाल है, अगर आज जैसी स्थिति हो जहाँ हम सऊदी अरब, कुवैत और फ़ारस की खाड़ी के देशों से तेल भारत नहीं ला पा रहे हों, तो तेल जहाँ से भी उपलब्ध हो, वहाँ से ख़रीदना होगा. इसमें रूस भी शामिल है."
वहीं, भू-राजनीति के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी इसे अलग तरह से देखते हैं. उन्होंने मोदी सरकार की ऊर्जा आयात नीति पर सवाल उठाए हैं.
ब्रह्मा चेलानी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, "भारत ने कुछ नहीं कहा है, लेकिन यह छूट बहुत कुछ बताती है. अमेरिका के दबाव में भारत की ऊर्जा आयात नीति चुपचाप बदल गई है."
उन्होंने आगे लिखा, "वेवर का मतलब किसी प्रतिबंध से छूट होता है. अगर भारत अब भी जहाँ से बेहतर दाम में तेल मिले वहाँ से ख़रीदने के लिए स्वतंत्र होता, तो उसे रूसी तेल लेने के लिए अमेरिकी ट्रेज़री से 30 दिन का लाइसेंस लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती."
ब्रह्मा चेलानी ने कहा, "यह छूट माँगकर मोदी सरकार चुपचाप उन नई सीमाओं को मान रही है जो अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के फ़्रेमवर्क के तहत बनाई गई हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.