You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
तेल ख़रीद 'बंद' करने से रूस का भरोसा क्या भारत पर कम होगा?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि भारत रूस से तेल आयात बंद करने पर सहमत हो गया है. भारत ने ट्रंप की इस घोषणा पर न तो अब तक मुहर लगाई है और न ही ख़ारिज किया है.
फ़रवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था और अब भी जंग ख़त्म नहीं हुई है. जंग शुरू होने के बाद भारत और रूस के द्विपक्षीय व्यापार में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई.
वित्त वर्ष 2024-25 में रूस और भारत का द्विपक्षीय व्यापार 68.7 अरब डॉलर हो गया था लेकिन इसमें 52.73 अरब डॉलर का कच्चा तेल भारत ने रूस से ख़रीदा था.
अब ट्रंप कह रहे हैं कि भारत रूस से तेल आयात बंद करने पर सहमत हो गया है. अगर भारत तेल आयात पूरी तरह से बंद करता है तो दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 20 अरब डॉलर से भी नीचे हो जाएगा.
भारत के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने पिछले महीने कहा था कि रूस से कच्चे तेल के आयात में गिरावट जारी रहने की उम्मीद है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ईंधन ख़रीदार है. हरदीप पुरी ने कहा था कि भारत तेल आपूर्तिकर्ता देशों में विविधता ला रहा है.
27 जनवरी को ब्लूमबर्ग टेलीविजन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि रूस से होने वाली आपूर्ति पहले ही घटकर 1.3 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गई है, जो पिछले साल के औसत 1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन से कम है. पुरी ने कहा था कि इसमें गिरावट का रुझान है और ये बाज़ार-आधारित परिस्थितियां हैं.
हरदीप पुरी भले रूसी तेल आयात में कटौती के लिए अमेरिकी दबाव का ज़िक्र नहीं कर रहे हैं लेकिन ट्रंप खुलेआम कह रहे हैं कि उन्होंने भारत को रोका है.
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का क्या होगा?
2025 में अप्रैल से नवंबर महीने के बीच भारत का रूस से तेल आयात पिछले साल इसी अवधि की तुलना में लगभग 13% कम रहा.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, दिसंबर में भारत का रूसी तेल आयात पिछले दो वर्षों के सबसे निचले स्तर पर आ गया.
थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान ने इसका कारण बताते हुए एक्स पर लिखा है, ''भारत पर अमेरिका का 25% अतिरिक्त टैरिफ़ भारी पड़ रहा था. इसके अलावा अमेरिका ने रूसी तेल कंपनी रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगा दिया था.
भारत को सस्ता रूसी तेल पसंद था लेकिन 2024–25 में रूस के साथ भारत को 60 अरब डॉलर का व्यापार घाटा भी हुआ. भारत का यह व्यापार घाटा चीन के साथ 100 अरब डॉलर बाद दूसरा सबसे बड़ा है.''
क्या भारत रूस से तेल आयात शून्य कर लेगा? इसके जवाब में तन्वी मदान कहती हैं, ''कहना मुश्किल है. संभव है कि सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल आयात को और कम करे या शायद शून्य तक भी ले जाए. लेकिन अब भी आयात हो रहे तेल का बड़ा हिस्सा नायरा को जा रहा है.''
''नायरा रूसी कंपनी रोसनेफ्ट के स्वामित्व में है, जिसके अपने हिस्से को बेचने की योजनाएं ठप पड़ती दिख रही हैं. भारत अतीत में ईरान और वेनेज़ुएला से तेल आयात शून्य कर चुका है. लेकिन भारत शायद रूसी तेल आयात का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं करना चाहेगा, ख़ासकर अगर इस बात की संभावना हो कि ट्रंप प्रशासन रूस के साथ कारोबार करने के अपने दृष्टिकोण में बदलाव करे.''
ऐसे में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का क्या होगा?
तन्वी मदान कहती हैं, ''भारत की सरकारों के पास अक्सर रणनीतिक स्वायत्तता शुद्धतावादी नहीं रही है. सरकारें अक्सर समझौते तौलती हैं और इस आधार पर निर्णय लेती हैं कि भारत के हित में क्या सबसे बेहतर है. इस मामले में भारत सरकार यह तौल रही होगी कि तेल आयात जारी रखने के लाभ, अमेरिका के साथ भारत के संबंधों पर पड़ने वाली लागत के मुक़ाबले उचित है या नहीं.''
तन्वी मदान ने लिखा है, ''भारत सरकार यह भी ध्यान में रखेगी कि रूस से मिलने वाली छूट, अमेरिकी बाज़ार तक पहुंच या भारत में नौकरियों के नुक़सान की भरपाई नहीं करेगी. वास्तविकता यह है कि अमेरिकी बाज़ार, पूंजी और टेक्नोलॉजी तक पहुंच, रूसी तेल आयात पर मिलने वाली छूट की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. यह भारत–अमेरिका संबंधों के अन्य कारणों को अलग रखते हुए भी सच है.''
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
ट्रंप को अमेरिका के बाक़ी राष्ट्रपतियों की तुलना में रूसी राष्ट्रपति पुतिन के प्रति ज़्यादा उदार माना जाता है. लेकिन भारत और रूस के संबंधों को लेकर ट्रंप बहुत ही आक्रामक रहे हैं.
पिछले साल जुलाई में ट्रंप ने कहा था, ''मुझे इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि भारत रूस के साथ क्या करता है. वे चाहें तो अपनी मरी हुई अर्थव्यवस्थाओं को साथ-साथ नीचे ले जाएं, मुझे कोई आपत्ति नहीं है. हमने भारत के साथ बहुत कम व्यापार किया है, उनके टैरिफ़ बहुत ज़्यादा हैं, दुनिया में सबसे ऊंचे टैरिफों में शामिल हैं.''
ऊर्जा के अलावा भारत और रूस के संबंधों में रक्षा साझेदारी काफ़ी अहम है लेकिन यहाँ भी रूस की भूमिका लगातार कम हो रही है.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच भारत ने अपने सैन्य उपकरणों का 36% रूस से आयात किया था. इसके साथ ही रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता देश था. लेकिन यह 2006-10 की अवधि से एक बदलाव था. तब भारत के 82% सैन्य उपकरण रूस से आयात किए गए थे.
ट्रंप का दबाव भारत और रूस के संबंधों पर जिस तरह से पड़ रहा है, उसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. कहा जा रहा है कि भारत इस दबाव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बरकरार नहीं रख सकता है.
थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सीनियर फेलो मनोज जोशी कहते हैं कि भारत ट्रंप के दबाव में रूस से तेल आयात बंद करता है तो यह हमारी विदेश नीति पर गंभीर सवाल खड़ा करता है.
मनोज जोशी कहते हैं, ''भारत अगर तेल आयात बंद कर देता है तो इसे रूस भी अपने लिए झटके के रूप में देख सकता है. भारत अगर ख़ुद से बंद करता तो इसकी कोई आलोचना नहीं करता लेकिन ट्रंप के दबाव में कर रहा है तो यह मोदी सरकार की रणनीतिक स्वायत्तता और विदेश नीति पर सवाल है.''
मनोज जोशी कहते हैं, ''भारत की विश्वसनीयता पर सवाल उठेगा. रूस को अभी ज़रूरत है कि भारत तेल ख़रीदे. रूस पश्चिम के कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. ऐसे में भारत का यह रुख़ रूस में सकारात्मक रूप में नहीं लिया जाएगा. भारत ऐसा तब कर रहा है, जब मिडिल पावर वाले देशों के एकजुट होने की बात की जा रही है और भारत ब्रिक्स का अध्यक्ष है. यह रूस के नुक़सान से ज़्यादा भारत की साख का सवाल है.''
क्या रूस नाराज़ होगा?
लेकिन एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा ऐसा नहीं मानते हैं. उनका कहना है कि भारत और रूस के संबंधों को केवल ट्रेड के आईने में नहीं देखना चाहिए.
नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ''पहली बात तो यह कि भारत ने अभी ख़ुद से नहीं कहा है कि रूस से तेल आयात पूरी तरह से बंद करने जा रहा है. दूसरी बात है कि तेल आयात को लेकर भारत किसी से बंधा नहीं है. यूक्रेन युद्ध जब शुरू हुआ तो उसके ठीक बाद भारत को रूस से तेल आयात में ज़्यादा छूट मिल रही थी. भारत को प्रति बैरल कम से कम 15 डॉलर का फ़ायदा मिल रहा था. अब यह फ़ायदा न के बराबर रह गया है.''
नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ''भारत को अपने विकास के लिए पूंजी, तकनीक और बाज़ार की ज़रूरत है. ये तीनों चीज़ें क्या हमें रूस से मिलेंगी? चीन से मिलेंगी? इसका जवाब है- नहीं. ये तीनों चीज़ें हमें अमेरिका से मिलेंगी. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है. ऐसे में भारत अपनी ऊर्जा आयात की नीति में बदलाव लाता है, तो अतार्किक नहीं कहा जा सकता है.''
तनेजा कहते हैं, ''भारतीय कंपनियों ने रूस के एनर्जी सेक्टर में 17 अरब डॉलर का निवेश किया है. इसलिए हम दोनों देशों के संबंधों को अमेरिका के एक राष्ट्रपति की नीतियों के आईने में नहीं देख सकते हैं. हालात के हिसाब से चीज़ें ऊपर-नीचे होती हैं लेकिन कुछ भी बिल्कुल काला और सफ़ेद नहीं होता है.''
ट्रंप के बारे में कहा जाता है कि उनकी एक बात मान लो इसका मतलब यह नहीं है कि वह वहीं रुक जाएंगे. रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी कहते हैं कि अगर ट्रंप ने भारत को रूस से तेल आयात बंद करने पर मजबूर कर दिया तो वह अगली चोट रक्षा साझेदारी पर भी कर सकते हैं.
राहुल बेदी कहते हैं, ''ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सैंक्शन्स एक्ट लाया था. इसके तहत भारत रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम नहीं ख़रीद सकता था. लेकिन बाइडन ने भारत को इसमें छूट दे दी. ऐसे में ट्रंप अगला निशाना भारत और रूस की रक्षा साझेदारी को बना सकते हैं. मुझे लग रहा है कि भारत ख़ुद को फँसा हुआ पा रहा है. न रूस को छोड़ सकता है और न ही खुलकर साथ रह सकता है.''
राहुल बेदी कहते हैं, ''ट्रंप के दबाव में रूस से तेल आयात बंद करना उसके लिए झटका है. भारत के साथ रक्षा साझेदारी को लेकर रूस की जो प्रतिबद्धता है, वह इससे कमज़ोर होगी. रूस भारत की रक्षा चिंताओं को उस तरह से नहीं देखेगा क्योंकि उसे भी ज़रूरत है कि मोदी सरकार वहाँ से तेल ख़रीदती रहे.''
''अगर न्यूक्लियर सबमरीन में रूस ने हाथ पीछे खींच लिए तो भारत को कहीं और से मदद नहीं मिलेगी. पाकिस्तान के साथ पाँच दिन चले संघर्ष में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल और एस-400 की अहम भूमिका रही. यह बताने के लिए काफ़ी है कि रूस भारत की रक्षा रणनीति में कितना अहम है.''
भारत के लिए हमेशा से यह चुनौती रही है कि वह रूस को पूरी तरह से चीन के पाले में जाने से रोके. यूक्रेन में जंग शुरू होने के बाद से रूस की निर्भरता चीन पर बढ़ी है. चीन के साथ पाकिस्तान की क़रीबी को भारत अपने ख़िलाफ़ मानता है. अगर इसमें रूस भी शामिल होता है तो भारत के लिए चुनौती और बढ़ने की आशंका है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.