हनीफ़ का ब्लॉग : अमेरिकियों को नहीं पता कि उनके प्रेज़िडेंट कल कहां जंग शुरू करेंगे और क्यों

    • Author, मोहम्मद हनीफ़
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक
  • पढ़ने का समय: 4 मिनट

पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच झड़पें हुईं थीं और यह तीन-चार दिन तक चली थीं. मिसाइलें चलीं, ड्रोन उड़े, प्लेन क्रैश हुए और फिर सीज़फ़ायर हो गया.

उसके बाद अमेरिका के सदर (राष्ट्रपति) ट्रंप जब भी कैमरे के सामने आते हैं, तो कहते हैं कि इंडिया और पाकिस्तान एक-दूसरे को ख़त्म करने वाले थे. मैंने उनकी जंग रुकवाई है. वरना पता नहीं इन्होंने अपने एटम बम चला कर पूरी दुनिया को जलाकर राख कर देना था.

पाकिस्तान के नेता भी हल्का सा मुंह बनाकर कहते रहे हैं कि ट्रंप जैसा शांति पसंद इंसान इस धरती पर पैदा ही नहीं हुआ. सभी उन्हें मसीहा मानो और शांति का नोबेल पुरस्कार दे दो.

ट्रंप खुद भी दूसरी बार सदर बनने से पहले कहते थे कि अमेरिका ने कई जंगें लड़ी हैं, अब हम घर पर बैठेंगे, अपने लोगों के लिए काम करेंगे, हमने पूरी दुनिया की रखवाली का ठेका नहीं लिया है.

बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

और अब देखिए, एक नहीं, दो नहीं, बल्कि कई छोटी-छोटी ग्लोबल लड़ाइयां शुरू कर ली हैं.

वेनेजुएला के प्रेज़िडेंट को ऐसे उठा लिया है जैसे किडनैपर्स उठाते हैं, क्यूबा के सिर पर बैठे हैं और अब इसराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने पहुंच गए हैं.

ख़ामेनेई को मारकर दावा कर रहे हैं कि वह ईरान को आज़ाद करा देंगे.

ईरान ने जहां-जहां अमेरिकी ठिकानें हैं वहां पर मिसाइलें दागी हैं. कतर, यूएई, बहरीन में हर जगह मिसाइलें उड़ रही हैं और यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब ग़ाज़ा पर हमलों का ख़ौफ़ ख़त्म नहीं हुआ है.

ये है नोबेल पीस प्राइज़ के दावेदार की शांति. जहां अमेरिकियों को खुद नहीं पता कि कल को उनके सदर ने कहां जंग शुरू करनी है और क्यों.

'न अमेरिकी लोकतंत्र में ठौर, न राजशाही में ठिकाना'

अमेरिका खुद को सबसे ताक़तवर डेमोक्रेसी कहता है, लेकिन मजाल है कि कोई नई जंग शुरू करने से पहले अपनी कांग्रेस से पूछा हो या किसी और से सलाह ली हो.

जो लोग पहले अमेरिकी लोकतंत्र के दावे को दिखावा मानते थे और कहते थे कि हमारे पड़ोस के गल्फ कंट्री अच्छे हैं. ये दुबई, ये रियाद, ये दोहा, यहां वोट-छोट का कोई चक्कर नहीं, कोई पार्लियामेंट्री झूठ नहीं, ये तो सीधी-सीधी राजशाही है.

फ्रंट लाइन में राजकुमार भी लगे हुए हैं, लेकिन देखिए वहां कितनी तरक्की हुई है, अमन कितना है, और कितनी शांतिपूर्ण ज़िंदगी है.

भारत-पाकिस्तान के मज़दूरों को भी मज़दूरी मिलती है और जिनके पास ज़्यादा पैसे हैं, जो कराची, मुंबई की भीड़ से तंग आ चुके हैं, वे गोल्डन वीज़ा ले रहे हैं और प्रॉपर्टी खरीद कर अमन की ज़िंदगी जीते हैं.

अब उनके प्लाज़ा के ऊपर से मिसाइलें उड़ रही हैं. वे वहां से भागने के लिए प्राइवेट प्लेन ढूंढ रहे हैं. खलकत (सृष्टि) की जान न तो अमेरिका के लोकतंत्र में आज़ाद है और न ही उसे राजाओं के साम्राज्य में शांति मिली है. अब खलकत सोच रही होगी कि मैं किस तरफ जाऊं. मैं अपनी मंजी कहां बिछाऊं.

रब्ब राखा

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)