अमेरिका-इसराइल के साथ जंग में ईरान के 'दोस्त' रूस और चीन कहां हैं?

    • Author, सर्गेई गोरयाश्को
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ रशियन
    • Author, शॉन युआन
    • पदनाम, ग्लोबल चीन यूनिट, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने एयरबेस 'रक्षात्मक' हमलों के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है.

उसके बाद सबका ध्यान इस बात पर गया है कि अब ईरान की मदद को कौन आगे आएगा.

रूस और चीन.. दोनों के ही ईरान के साथ मज़बूत कूटनीतिक, व्यापारिक और सैन्य रिश्ते हैं.

लेकिन मौजूदा टकराव से यह साफ़ होगा कि वे वास्तव में कहां तक उसका साथ देने को तैयार हैं.

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रूसः शोर ज़्यादा, मदद कम

अमेरिका और इसराइल के संयुक्त हमलों पर रूस की प्रतिक्रिया अब तक सीमित ही रही है.

रूस ने इसराइल-अमेरिका के इस क़दम के प्रति नाराज़गी और तेहरान के प्रति एकजुटता तो दिखाई, लेकिन कोई ऐसा क़दम नहीं उठाया जिससे उसे इस टकराव में सीधा उलझना पड़े.

रूसी राष्ट्रपति के कार्यालय क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने 'गहरी निराशा' जताई कि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता के बावजूद हालात इतने 'ख़राब हो गए कि सीधे आक्रामकता' तक पहुंच गए.

उन्होंने कहा कि ईरान के नेतृत्व और इस बढ़ते तनाव से प्रभावित खाड़ी देशों दोनों के साथ रूस लगातार संपर्क में है.

रूसी विदेश मंत्रालय ने अमेरिका और इसराइल की ओर से ईरान पर हुए 'बिना उकसावे के किए गए हमले' की निंदा की है. साथ ही कथित राजनीतिक हत्याओं तथा संप्रभु देशों के नेताओं को 'शिकार बनाए जाने' को ग़लत बताया है.

रविवार को राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान को ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या पर संवेदनाएं भेजीं और इसे 'मानवीय नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का दोषपूर्ण उल्लंघन' कहा.

इसके बावजूद रूस ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कोई निजी आलोचना नहीं की है और यूक्रेन को लेकर अमेरिका की मध्यस्थता की कोशिशों के लिए अब भी धन्यवाद दे रहा है.

सोमवार को जब पेस्कोव से पूछा गया कि रूस अब भी अमेरिका पर कैसे भरोसा कर सकता है, तो उन्होंने कहा कि रूस 'सबसे पहले सिर्फ़ ख़ुद पर भरोसा करता है' और अपने हितों की रक्षा करता है.

इन्हीं हितों से यह भी समझ आता है कि रूस का ईरान को समर्थन अब भी क्यों ज़्यादातर बयानबाज़ी ही है, क्योंकि यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने के हमले के बाद ईरान उसका सबसे क़रीबी सहयोगी बना रहा, उसने ड्रोन भेजे और रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के तरीके विकसित करने में मदद की.

ईरान भी रूस की उस सोच में फ़िट होता है, जिसके तहत दुनिया कई ताकतों में बंटी हो, जहां मानवाधिकारों से ज़्यादा अहमियत राज्य के अधिकारों को मिले और सरकारें अपने देश के भीतर सख़्त नियंत्रण रख सकें. ऐसे किसी शासन का गिरना, इस मॉडल के लिए बड़ा झटका होगा.

इसके साथ ही, रूस पहले भी यह दिखा चुका है कि वह अपने साझेदारों के लिए ज़रूरत से ज़्यादा जोखिम नहीं उठाएगा- चाहे बात वेनेज़ुएला की हो, सीरिया की, या फिर 2025 की गर्मियों में इसराइल और ईरान के बीच चले 12 दिन के युद्ध की.

रूस अभी यूक्रेन में बुरी तरह उलझा हुआ है और ऐसा लगता है कि वह सिर्फ़ कूटनीतिक समर्थन और सैन्य तकनीकी सहयोग से आगे कुछ देने को तैयार नहीं है, या देने की स्थिति में भी नहीं है.

17 जनवरी 2025 को रूस ईरान की जो रणनीतिक साझेदारी की संधि हुई थी, वह भी परस्पर रक्षा समझौता नहीं थी.

रूस और ईरान ने एक दूसरे से जानकारी साझा करने, संयुक्त सैन्य अभ्यास करने और 'क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने' का वादा तो किया, लेकिन यह नहीं कहा कि अगर एक पर हमला हो तो दूसरा उसकी रक्षा करेगा. दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते भी सीमित हैं और कारोबार लगभग 4 से 5 अरब डॉलर के बीच ही रहता है.

हालांकि सैन्य और औद्योगिक रिश्ते तेज़ी से बढ़ रहे हैं. फ़ाइनेंशियल टाइम्स की फ़रवरी की एक रिपोर्ट के अनुसार एक बड़े सौदे के तहत रूस ईरान को 500 मिलियन यूरो के वर्बा मैन-पोर्टेबल एयर डिफ़ेंस सिस्टम देगा.

ईरान को याक 130 ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट, एमआई 28 अटैक हैलिकॉप्टर मिल चुके हैं, और वह एसयू 35 फाइटर जेट्स की उम्मीद कर रहा है. हालांकि रूस ने अभी तक वर्बा सिस्टम की सप्लाई नहीं की है.

यूक्रेन युद्ध के मोर्चे पर ईरानी शाहेद ड्रोन रूसी सेना की रणनीति में बड़ा बदलाव लाए. लेकिन पिछले साल मॉस्को ने अपने ड्रोन उत्पादन में तेज़ी से बढ़ोतरी की, जिससे ईरानी हथियारों पर उसकी निर्भरता कम हो गई.

मॉस्को के लिए, ईरान इतना अहम तो है कि उसे ढहने न दिया जाए लेकिन इतना भी अहम नहीं कि उसके लिए लड़ाई में कूद पड़े. यह सोच भविष्य में बदल सकती है, लेकिन फ़िलहाल रूस की दख़लअंदाज़ी ज़्यादातर बयानबाज़ी तक ही सीमित रहने वाली है.

चीन की भूमिका

चीन ने आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या की कड़ी निंदा की है, और बीजिंग शुरू से ही दुनिया भर में अमेरिका की सरकारें बदलने वाली नीतियों का विरोध करता रहा है.

चीन-ईरान रिश्ते की जड़ में एक दोनों को फ़ायदा देने वाली आर्थिक साझेदारी है. चीन ईरान का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है और उसका सबसे अहम ऊर्जा ग्राहक भी.

अमेरिका की लंबे समय से लगाई गई सख़्त पाबंदियों के बावजूद, चीन ईरान की आर्थिक लाइफ़लाइन बना रहा है. वह बड़ी मात्रा में छूट पर ईरानी तेल ख़रीदता रहा है. यह तेल 'घोस्ट फ़्लीट्स' कहलाने वाले जहाज़ों (जो झूठे रजिस्ट्रेशन के सहारे पाबंदियों से बचकर तेल ढोते हैं) के बेड़ों के ज़रिए ईरान से चीन तक पहुंचता रहा है.

उदाहरण के लिए, 2025 में चीन ने ईरान के निर्यात किए गए तेल का 80% से ज़्यादा ख़रीदा था. भले ही पश्चिमी बाज़ार ईरान के लिए बंद हो गए थे, चीन से मिली इस आय ने उसे अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने और रक्षा ख़र्च चलाने में मदद दी.

साल 2021 में हुई 25 साल की रणनीतिक साझेदारी की संधि ने इस रिश्ते को और मज़बूत किया. इसमें चीन ने ईरान के बुनियादी ढांचे और दूरसंचार में सैकड़ों अरब डॉलर के निवेश का वादा किया.

चीन का 'दीर्घकालिक खेल'

ऐतिहासिक रूप से ईरान के इसराइल और अमेरिका से तनाव पर चीन ने हमेशा रणनीतिक संतुलन की नीति अपनाई है. पिछले तनावों में- जैसे कि 2025 की गर्मियों में चले 12 दिन के इसराइल ईरान युद्ध के दौरान, चीन ने बार-बार 'संयम' की अपील की और दोष 'बाहरी हस्तक्षेप' पर डाला, जो लगभग खुले तौर पर अमेरिका की नीति की तरफ़ इशारा था.

पहले हुए ईरान-इसराइल टकराव में, चीन ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के लिए कूटनीतिक ढाल का काम किया, जैसे कभी वीटो लगाकर, और कभी उसका संकेत देकर- ताकि प्रस्तावों की भाषा नरम हो जाए. मगर चीन ने कभी सीधा सैन्य दख़ल नहीं दिया.

चीन की रणनीति हमेशा से यह रही है कि अमेरिका को मध्य पूर्व में उलझाए रखो, लेकिन इतना भी नहीं कि पूरा इलाका अस्थिर हो जाए और तेल की क़ीमतें आसमान छूने लगें.

ईरान में किसी पश्चिम समर्थित सरकार का आना चीन के लिए भू राजनीतिक तबाही जैसा होगा, क्योंकि ईरान सिर्फ़ ऊर्जा का स्रोत ही नहीं है, बल्कि क्षेत्र में भी अमेरिका के प्रभाव के ख़िलाफ़ एक मज़बूत संतुलन भी है.

ईरान ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) दोनों का सदस्य है, और मध्य एशिया, कॉकसस और मध्य पूर्व को जोड़ने वाला एक अहम भौगोलिक पुल भी है.

ईरान के इस्लामी गणराज्य का ढह जाना उन बहुपक्षीय ढांचों की विश्वसनीयता को कमज़ोर कर सकता है जिन्हें मॉस्को और बीजिंग मिलकर मज़बूत करने में लगे हैं.

अगर अमेरिका और इसराइल.. ईरान पर पूर्ण सैन्य आक्रमण नहीं करते, तो देश की राजनीतिक और सैन्य संरचनाएं संभवतः बनी रहेंगी.

जो भी ख़ामेनेई की जगह नया नेता बनेगा बीजिंग हमेशा की तरह अपना 'दीर्घकालिक खेल' खेलेगा, और उससे अच्छे रिश्ते बनाने की कोशिश करेगा. उधर रूस अपने लिए मौक़े ख़ुद तलाशेगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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