नारायण बारेठ : साहसी, संजीदा और सुलझे पत्रकार का चले जाना

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वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया शिक्षाविद और राजस्थान के पूर्व सूचना आयुक्त नारायण बारेठ का बीती रात जयपुर में 68 साल की उम्र में निधन हो गया.

नारायण बारेठ के मित्र पंकज भारद्वाज ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि उन्हें 31 जनवरी को अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

उन्हें जयपुर के मालवीय नगर स्थित एक निजी अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था.

उन्होंने कहा, "उन्हें फेफड़े की दिक्कत थी. उन्हें वेंटिलेटर पर लिया गया और बीच में कुछ तबीयत सुधरी भी थी लेकिन बाद में स्थिति और नाजु़क हो गई. कल रात में उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया था और सीपीआर दिए जाने के बाद भी बचाया नहीं जा सका."

पंकज भारद्वाज ने बताया कि उन्होंने 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया', 'नवभारत टाइम्स' और बीबीसी हिन्दी समेत कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के लिए काम किया था.

वे राजस्थान के हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में वर्ष 2013 से 2018 तक प्रोफ़ेसर भी रहे.

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा, "नारायण बारेठ जी के निधन का समाचार बेहद दुखद है. वे कई दिनों से निमोनिया से पीड़ित थे. नारायण जी ने बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता कर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई.''

''नारायण बारेठ ने कुशल प्रशासक के रूप में सूचना आयुक्त के पद पर रहते हुए भी अपनी अमिट छाप छोड़ी. वो न केवल एक प्रखर पत्रकार थे, बल्कि एक अत्यंत सरल और नेक इंसान भी थे. उनका ऐसे असमय जाना पत्रकारिता जगत और मेरे लिए व्यक्तिगत तौर पर एक बड़ी क्षति है.''

नारायण बारेठ के परिवार में बेटी, दामाद और एक नातिन है.

नारायण बारेठ के साथ काम कर चुके और निजी तौर पर परिचित कई लोगों ने अपने अनुभवों को साझा किया है.

संजीव श्रीवास्तव, बीबीसी हिन्दी के पूर्व संपादक

आजकल के हिसाब से देखें तो 68 वर्ष की आयु बहुत ज़्यादा नहीं होती है. इस लिहाज से वो बहुत जल्दी चले गए.

उनसे मेरी अंतिम बार बात 29 जनवरी को हुई थी. मैंने एक मुलाक़ात के लिए आमंत्रित करने को कॉल किया था.

तब उन्होंने कहा था कि उनकी तबीयत ख़राब है और फ़ोन पर उनकी बातचीत से भी लग रहा था कि उनकी सांस फूल रही है.

दरअसल उन्हें निमोनिया हो गया था और वो उनकी तबीयत नाज़ुक हो गई थी. 30 जनवरी को उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. इन पांच हफ़्तों में वो वेंटिलेटर पर भी रहे और लगभग बेसुध बने रहे. ये दुखद है कि वो अस्पताल से ठीक होकर लौट नहीं पाए.

उनके जाने का आघात इसलिए भी है क्योंकि बहुत सभ्य, मीठा बोलने वाले और एक आदर्श पत्रकार थे. उन्होंने बहुत प्रतिबद्धता और ईमानदारी से उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन का निर्वाह किया.

वो बहुत अच्छा बोलते थे. बेहद सुलझा दिमाग था उनका, न किसी के साथ न किसी के विरोध में बोलते थे.

राजनीतिक रूप से उनका रुझान उदारवादी था और दक्षिणपंथ से थोड़ी दूरी रखते थे, लेकिन उनके रिपोर्टों में कोई पूर्वाग्रह नहीं झलकता था.

चुटकी लेने के उनके अंदाज़ का बहुत से लोग कायल थे और उनके वन लाइनर से हंसी के फव्वारे छूटते थे.

मेरे ज़ेहन में उनसे जुड़े वाक़ये एक फ़्लैशबैक की तरह आ रहे हैं.

मेरी उनसे पहली मुलाक़ात तब हुई जब वो बीबीसी ज्वाइन करने आए थे. ये बात 1996 के आसपास की है. तब मैं लंदन से दिल्ली आया ही था. तभी से उनका करियर बीबीसी के साथ शुरू हुआ था.

इससे पहले वो नवभारत टाइम्स के लिए कोटा, जोधपुर, जयपुर में काम कर चुके थे. कुछ अख़बारों में भी काम किया था.

नारायण बारेठ बीबीसी हिन्दी सेवा के सबसे लोकप्रिय कांट्रीब्यूटर्स और रिपोर्टर्स में से एक थे. बीबीसी उर्दू सेवा के वो बहुत प्रिय थे क्योंकि उन्हें उर्दू में काफ़ी महारत हासिल थी.

शुरू से ही उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता की थी लेकिन बाद में उन्होंने अंग्रेज़ी में भी धीरे धीरे हाथ जमाया और जब वो रिपोर्ट्स भेजते थे वो बीबीसी भी उन्हें लेता था.

वो बहुत ही शानदार पेशेवर और सज्जन व्यक्ति थे, लेकिन दुख है कि वो बहुत जल्दी चले गए.

नितिन श्रीवास्तव, बीबीसी हिन्दी संपादक

2009 में राजस्थान के एक बड़े मंदिर में भगदड़ मच गई थी. उस समय नारायण बारेठ बीबीसी के एक अंदरूनी ट्रेनिंग प्रोग्राम में थे. ये ट्रेनिंग पांच दिन की थी पहले ही दिन इस घटना की ख़बर तड़के चार बजे आ गई.

तत्कालीन संपादक संजीव श्रीवास्तव ने उन्हें रिपोर्टिंग के लिए जाने को कहा. और सुबह छह बजे वो गाड़ी लेकर निकल गए और चलते चलते कहा कि 'होस्टाइल (तनावग्रस्त) इलाक़े में काम करना मेरे नसीब में है लेकिन ऐसे इलाक़े में काम करने की ट्रेनिंग पाना मेरे नसीब में नहीं है.'

2006 में बीबीसी हिन्दी के तत्कालीन संपादक संजीव श्रीवास्तव ने मुझसे कहा कि राजस्थान विधानसभा चुनाव में रिपोर्टिंग करने जाना लेकिन वहां पहुंच कर सबसे पहले नारायण बारेठ से बात करनी होगी कि क्या बचा है जिसे किया जा सकता है.

आशय ये था कि नारायण बारेठ पहले ही काफ़ी कुछ रिपोर्ट कर चुके हैं.

जब यह बात मैंने नारायण बारेठ को बताई तो वो बहुत हंसे और कहा, "यह संजीव जी का बड़प्पन है. असल में वो कहना ये चाह रहे थे कि अब मैं कुछ रिपोर्टिंग उठकर करना शुरू कर दूं. शायद मैं उन्हें कुछ सुस्त पड़ा मालूम हुआ होउंगा."

इस वाकये पर संजीव श्रीवास्तव ने कहा, '' इसी बात में बारेठ की अदा झलक रही थी. उनमें एक सेंस ऑफ़ ह्यूमर था. वो हर बात को अपने अंदाज़ में एक ट्विस्ट देते थे. उसमें सबको मज़ा आता था."

रिपोर्टिंग की अनोखी स्टाइल

संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, ''बारेठ दिल के भी बहुत साफ़ और मोहब्बत वाले इंसान थे. मेरे प्रति उनका स्नेह बहुत था. एक सहकर्मी से अधिक मित्र के जाने का दुख है.''

''उनके जीवन में संघर्ष भी बहुत रहा है. पहले एक बार उन्हें चोट लग गई थी. मुंबई में उनका लंबा इलाज चला.''

''लेकिन उनका करियर बहुत शानदार रहा. बीबीसी के बाद उन्होंने जयपुर के हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में पढ़ाया, इसके बाद वो राजस्थान के सूचना आयुक्त बने.''

''उनका रवैया हमेशा ही विनम्र और शालीन बना रहा. उन्होंने कभी ये अहसास नहीं होने दिया को वो कोई हस्ती हैं. जबकि वो राजस्थान के एक हस्ती थे और इस बात को सबलोग जानते थे.''

संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि बारेठ की रिपोर्टिंग बेहतरीन होती गई थी और जैसा बीबीसी का अंदाज़ है गागर में सागर भारने का, उसपर वो सटीक बैठते थे.

एक दो मिनट में अपनी बात कहने और पूरी कहानी बयां करने में उन्होंने महारत हासिल कर ली थी.

आज रिपोर्टिंग का स्वरूप काफ़ी कुछ बदल गया है, साथ ही स्वतंत्र पत्रकारिता पहले से कहीं जटिल हो गई है. चाहे जितनी जानकारी सुनी सुनाई हो जबतक ज़मीनी रिपोर्टिंग नहीं होती है वो बात नहीं आ पाती है.

नारायण बारेठ इस तरह की रिपोर्टिंग के जीते-जागते मिसाल थे. अपने जीवन में उन्होंने इन सब बातों को उतारा था.

उन्होंने अपने जीवन में कभी भी समझौता नहीं किया. पत्रकारिता करियर में लंबा समय गुजारा और राजस्थान के गलियारों में उनका नाम गूंजता था लेकिन इसके बावजूद वो ज़मीन से जुड़े हुए बिल्कुल विनम्र और शालीन बने रहते थे.

उनकी जीवन शैली ऐसी थी कि कोई भी उनपर उंगली नहीं उठा सकता था. इसलिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है.

सीमा चिश्ती, वरिष्ठ पत्रकार

उनके साथ काम कर चुकीं बीबीसी हिंदी की पूर्व दिल्ली ब्यूरो संपादक और वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती ने कहा, "राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक और जानकर थे. न सिर्फ़ राजस्थान की राजनीति के बारे में सजग थे बल्कि समाज सुधार के प्रयास, उत्तर भारत की सामाजिक नींव और उसके इतिहास से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे."

"उनके चुटकुले, हमेशा ही राजनीतिक और बहुत तीख़े हुआ करते थे और हंसने पर मजबूर कर देते थे. वो बहुत शांत स्वभाव के और बहुत ही अच्छे, विनम्र व्यक्ति थे."

सीमा चिश्ती ने एक्स पर भी लिखा, "नारायण बारेठ के निधन की खबर दुखद है. वे ऐसे पत्रकार थे जिनमें साहस, गहरी समझ, भाषा पर मजबूत पकड़ और अपनी रिपोर्टिंग के विषयों से गहरा जुड़ाव था."

"उनके साथ काम करने का अवसर मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात रही. वे शांत स्वभाव के, विनम्र और संवेदनशील सोच वाले व्यक्ति थे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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