भारत को रूसी तेल ख़रीदने के लिए क्या अमेरिका से इजाज़त लेने की ज़रूरत है?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर जानकारी दी कि अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने भारतीय रिफ़ाइनरियों को रूस से तेल ख़रीदने के लिए 30 दिन की छूट दी है.

कहा गया कि भारत को यह छूट इसलिए दी गई है कि मध्य-पूर्व में जारी युद्ध की वजह से तेल की कमी न हो. स्कॉट बेसेंट के इस बयान से दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के फ्रेमवर्क पर सवाल उठने लगे हैं.

विपक्ष का सबसे गंभीर सवाल यह था कि अमेरिका भारत को 4 अप्रैल 2026 तक रूस से कच्चा तेल ख़रीदने की "इजाज़त" देने की शर्तें कैसे तय कर सकता है, बल्कि सवाल यह भी उठाया गया है कि अमेरिका यह तय करने वाला "कौन" होता है.

भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौता होने के दौरान ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बढ़ाए गए टैरिफ़ को रद्द कर दिया था.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

इस क़दम के पीछे अमेरिका की क्या रणनीति थी, इसके बारे में अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने सफ़ाई दी है.

शुक्रवार को एक समाचार चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह अस्थायी क़दम है, जिसका मक़सद ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल के बाज़ार पर पड़ रहे दबाव को कम करना है.

क्रिस राइट ने एबीसी न्यूज़ से बातचीत में कहा कि यह रूस के प्रति अमेरिकी नीति में कोई बदलाव नहीं है, बल्कि सिर्फ़ एक अल्पकालिक व्यवस्था और एक 'व्यावहारिक तरीक़ा' है.

और कौन-से सवाल उठाए गए?

जाने-माने जियो-स्ट्रेटजिस्ट और स्तंभकार प्रोफ़ेसर ब्रह्म चेलानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, "छूट जो खेल (ट्रेड डील) का राज़ खोल देती है."

उन्होंने कहा, "जब से ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूसी तेल से दूर रखने के लिए एक ट्रेड डील डिज़ाइन करने के बाद इस समझौते में जीत का दावा किया है, मोदी सरकार स्पष्ट तौर पर चुप्पी साधे रही है. अब बात खुल गई है."

लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी के प्रवक्ता गोपालकृष्ण अग्रवाल ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "हमने रूस से ख़रीदना बंद नहीं किया है. यह उनका (अमेरिका) बयान है. यह एकतरफ़ा बयान है. हमारी स्थिति यह है कि हमें जहाँ भी सबसे सस्ते रेट पर तेल मिलेगा, हम उसे ख़रीदेंगे.''

अग्रवाल ने कहा, "हम (वित्त मंत्री के) बयान पर कमेंट नहीं कर रहे हैं.''

जेआरडी टाटा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ (एनआईएएस) के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर नरेंद्र पानी पूरे मामले को एक अलग नज़रिए से देखते हैं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "ज़्यादातर भारतीयों के लिए सबसे ज़्यादा निराशाजनक बात यह है कि हमने कभी किसी दूसरे को यह तय नहीं करने दिया कि हमें क्या करना चाहिए, क्या ख़रीदना चाहिए और कब ख़रीदना चाहिए. हमने कभी इसका सामना नहीं किया, चाहे हम कितने भी कमज़ोर क्यों न हों.''

युद्ध की वजह से होर्मुज स्ट्रेट पर असर पड़ने से भारत को रूसी कच्चे तेल की ज़रूरत बहुत बढ़ गई है. भारत में तेल रिफ़ाइन करने वाली कंपनियाँ रूस से कच्चा तेल मंगाकर उसे रिफ़ाइन कर कई देशों को बेचती रही हैं.

ऐसी प्रतिक्रिया की वजह क्या है?

अमेरिकी वित्त मंत्री बेसेंट ने अपनी पोस्ट में कहा, "राष्ट्रपति ट्रंप के एनर्जी एजेंडे की वजह से तेल और गैस का उत्पादन अब तक के सबसे ऊपरी स्तर पर पहुंच गया है. तेल को वैश्विक बाज़ार में आने देने के लिए, वित्त विभाग भारतीय रिफ़ाइनरी कंपनियों को रूसी तेल ख़रीदने के लिए 30 दिन की अस्थायी छूट दे रहा है."

उन्होंने दावा किया, "थोड़े समय के लिए जानबूझकर उठाए गए इस क़दम से रूसी सरकार को कोई ख़ास आर्थिक फ़ायदा नहीं होगा क्योंकि यह सिर्फ़ समुद्र में पहले से फंसे तेल की ख़रीद-बिक्री को ही मंज़ूरी देता है."

बेसेंट ने कहा, "भारत अमेरिका का एक ज़रूरी पार्टनर है, और हमें पूरी उम्मीद है कि वह अमेरिका से तेल की ख़रीद बढ़ाएगा. यह कामचलाऊ क़दम ईरान की ग्लोबल एनर्जी को बंधक बनाने की कोशिश से पैदा हुए दबाव को कम करेगा.''

उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पोस्ट के तुरंत बाद अमेरिकी वित्त विभाग ने एक बयान जारी किया जिसका शीर्षक था, "5 मार्च, 2026 तक जहाज़ों पर लोड किए गए रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पाद की भारत को डिलीवरी और बिक्री की मंज़ूरी."

इसमें कहा गया कि ऐसे कच्चे तेल या पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की डिलीवरी भारत में किसी पोर्ट पर हो और इसका ख़रीदार भारत के कानूनों के तहत बनी कोई कंपनी होनी चाहिए, इसके अलावा हर ख़रीद-बिक्री पर रोक होगी.

क्या यह अमेरिका के हुक्म का पालन है?

पहले अमेरिका टैरिफ़ का इस्तेमाल राजस्व बढ़ाने, घरेलू उद्योगों को बचाने, आयात पर रोक लगाने और दूसरे देशों के साथ व्यापार समझौता करने के लिए करता था.

उस वक़्त 2% अमेरिकी टैरिफ़ काफ़ी कम माने जाते थे. लेकिन पिछले एक साल में भारत और दूसरे देशों के मामले में टैरिफ़ की कहानी महज़ ट्रेड से कहीं अलग एक हथियार बन गया है.

वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार आनंद सहाय अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान को "भारत को अमेरिका का हुक्म मानने" के लिए मजबूर करने की स्पष्ट कोशिश के तौर पर देखते हैं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "भारत अंतरिम व्यापार समझौते पर साइन करने ही वाला था कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने ट्रंप के ऑर्डर को रद्द कर दिया. अमेरिकियों ने भारत को शर्मिंदा किया क्योंकि भारत सरकार अमेरिका के साथ रिश्ते के स्वरूप को छिपाने की कोशिश कर रही थी."

उन्होंने कहा, "अंतरिम समझौते में यह भी शामिल था कि भारत अगले पांच सालों में अमेरिका से पांच अरब अमेरिकी डॉलर का सामान ख़रीदेगा, लेकिन यह सब नहीं था. वह यह भी चाहता था कि भारत की सुरक्षा और विदेश नीतियां अमेरिका के हिसाब से हों."

"असल में, यह समझौता भारत को एक नई औपनिवेशिक ताक़त की आंशिक कॉलोनी बना देगा. हम सन 1947 से पहले के दौर में वापस जा रहे हैं.''

फ़रवरी 2025 में, राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करके पांच सौ अरब अमेरिकी डॉलर करने पर सहमति जताई थी.

पिछले साल अप्रैल में अमेरिका ने भारतीय सामान के आयात पर 26 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया, इसका भारतीय निर्यात पर असर पड़ा.

बाद में अमेरिका ने 90 दिनों के लिए 16 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ़ को सस्पेंड करने का फैसला किया.

फिर जून के महीने में जुलाई की डेडलाइन पूरी करने के लिए बातचीत हुई. अमेरिका ने सभी आयात पर 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने का फ़ैसला किया.

सीधे शब्दों में कहें तो भारतीय आयात पर और बोझ डाला. अगस्त में अमेरिका ने टैरिफ़ को दोगुना करके 50 फ़ीसदी कर दिया.

इस बीच दोनों देशों के बीच ट्रेड पर बातचीत जारी रही और इस साल फरवरी में सहमति बनी कि अमेरिका टैरिफ़ को 25 से घटाकर 18 फ़ीसदी कर देगा.

लेकिन, फिर राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ज़रूरी शर्त जोड़ दी कि भारत को रूस का तेल ख़रीदना बंद कर देना चाहिए. उनका तर्क था कि रूस से कच्चा तेल ख़रीदने से रूस को हो रही कमाई का इस्तेमाल यूक्रेन से लड़ने में हो रहा है.

छूट का क्या मतलब है?

प्रोफ़ेसर चेलानी ने अपनी पोस्ट में कहा है, "यह छूट एक रोक से छूट है. अगर भारत अभी भी सबसे अच्छी कीमत देने वाले किसी भी देश से तेल ख़रीदने के लिए आज़ाद होता, तो उसे रूसी तेल लेने के लिए अमेरिका से 30-दिन के लाइसेंस की ज़रूरत नहीं होती."

"छूट मांगकर, मोदी सरकार चुपचाप भारत-अमेरिका फ्रेमवर्क ट्रेड डील से बनी नई रुकावटों को मान रही है. जैसा कि अमेरिकी वित्त मंत्री ने कहा अमेरिका उम्मीद करता है कि भारत अमेरिकी तेल की ख़रीद बढ़ाएगा."

उन्होंने आगे कहा, "मोदी सरकार ने ईरान के ख़िलाफ़ भारत को अमेरिका-इसराइल एक्सिस के और क़रीब ला दिया है. फिर भी अजीब बात यह है कि भारत को अब अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से पैदा हुए हालात के दौरान भी रूसी तेल ख़रीदने के लिए अमेरिका की मंज़ूरी की ज़रूरत है.''

प्रोफ़ेसर पानी.. आनंद सहाय की इस बात से सहमत हैं कि टैरिफ़ पर लड़ाई 1947 से पहले के ज़माने जैसी थी.

उन्होंने कहा, "लेकिन जब 'छूट' का जश्न मनाया जाता है तो यह चौंकाने वाला है. असली फ़ैसले लेने वाले अमेरिकी नहीं हैं. यह ईरान है.''

उन्होंने कहा, "उन्होंने भारत को वह बताया जो उन्हें मंज़ूर नहीं था. लेकिन हम दौड़े-दौड़े गए और दिखावा किया कि हम इसराइल के दोस्त हैं और फिर (आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत पर) शोक जताने के लिए देरी से ईरान के पीछे दौड़े."

"फिर भारत के विदेश मंत्री दिल्ली में ईरान के उप विदेश मंत्री से मिलते हैं. यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अगर ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट को ब्लॉक करने का फ़ैसला करता है, तो जिस तेल पर हम निर्भर हैं, वह भारत नहीं आएगा.''

उन्होंने कहा कि यह सिर्फ़ तेल के उत्पादन का सवाल नहीं था.

वो कहते हैं, "अगर हम अपना स्कूटर या अपनी कार नहीं निकाल सकते तो ही भारतीय लोगों के लिए यह प्रतिक्रिया देने का मुद्दा है. इसीलिए वे एक गोल घेरे के चारों तरफ़ घूम रहे हैं. जो बात छूट रही है वह यह है कि भारतीय जहाज़ों को होर्मुज स्ट्रेट पार करने की इजाज़त नहीं है. यह सिर्फ़ अमेरिका, इसराइल या कुछ यूरोपीय देशों की बात नहीं है. उस सूची में 'उनका समर्थन करने वाले देश' भी शामिल हैं.''

अप्रैल के बाद अमेरिका की बात नहीं मानी तो क्या होगा?

आनंद सहाय ने कहा, "अगर भारत इसे नहीं मानता, जैसा कि कहा नहीं गया है. लेकिन अगर ऐसा होता, तो यह कहा जा सकता था कि भारत ने दुनिया में अपनी विदेश और घरेलू नीति के लिए औपनिवेशिक शासन से आज़ादी की अपनी पारंपरिक भावना को फिर से ज़िंदा कर दिया है. यह एक बहुत ही सकारात्मक कदम होगा.''

हालाँकि प्रोफ़ेसर पानी की राय अलग है. वो कहते हैं, "भारत को इससे इनकार करना ही होगा. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप आपको बेइज़्ज़त करने की कोशिश कर रहे हैं और आप दिखावा कर रहे हैं कि आप बेइज़्ज़त नहीं हुए हैं. ऐसा क्यों हो रहा है? यह कोई नहीं जानता.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.