ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच प्रधानमंत्री मोदी की इसराइल यात्रा की चर्चा क्यों हो रही है?

    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

26 फ़रवरी 2026 की शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसराइल से रवाना हुए.

28 फ़रवरी 2026 की सुबह- ईरान पर इसराइल के हमलों की पहली ख़बर आई.

उसके बाद अमेरिका ने पुष्टि की कि वह भी इस हमले में शामिल है.

इस हमले से ईरान में बड़े पैमाने पर तबाही हुई है और ईरानी बल लगातार जवाबी हमले कर रहे हैं.

क्षेत्र में आने जाने वाली उड़ानें या तो रद्द कर दी गई हैं या डायवर्ट कर दी गई हैं, और कई बड़े हवाई अड्डे बंद हैं.

अमेरिका और इसराइल के बयानों से साफ़ पता चलता है कि इन कार्रवाइयों की तैयारी कई महीनों से चल रही थी.

वैसे भी, अमेरिका ने ईरान को निशाना बनाते हुए इस इलाके में कई दशकों में अपनी सबसे बड़ी सैन्य तैनाती कर रखी थी.

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अब जो सवाल उठता है वह यह है कि प्रधानमंत्री मोदी की इसराइल यात्रा ने दुनिया को क्या संदेश दिया?

भारत और पश्चिम एशिया

यह क्षेत्र भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह इससे समझा जा सकता है कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) देशों- सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कुवैत, क़तर और बहरीन- में ही लगभग 89 लाख भारतीय रहते हैं.

साल 2024–25 में भारत और जीसीसी देशों के बीच व्यापार 178.56 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जो इसे भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक बनाता है.

भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए भी जीसीसी देश अहम स्रोत है.

भारत इस पूरे क्षेत्र, जिसमें जीसीसी भी शामिल है, को अपना 'विस्तारित पड़ोस' मानता है.

इसराइल यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भी यह बात साफ़ कही कि 'पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता, भारत की सुरक्षा से सीधे जुड़ी है'.

संघर्ष शुरू होने के बाद, भारत के विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर ने पहले इसराइल के विदेश मंत्री से बात की और फिर ईरान के विदेश मंत्री से बात करने की घोषणा की जिसके बाद उन्होंने क्रम से यूएई, क़तर, बहरीन, कुवैत और अंत में सऊदी अरब के अपने समकक्षों से बातचीत की.

'अरब देश अब चीन की तरफ़ झुक रहे हैं'

कुवैत से बीबीसी से बात करते हुए 'द टाइम्स कुवैत' के एग्ज़िक्यूटिव मैनेजिंग एडिटर रेवेन डी'सूज़ा ने कहा, "मुझे लगता है सबको समझ है कि भारत ऐसे किसी सैन्य अभियान का हिस्सा कभी नहीं होगा, इसलिए कोई भारत पर आरोप नहीं लगा रहा है. लेकिन हां, मेरी नज़र में इस समय इसराइल के प्रधानमंत्री से मुलाक़ात टाली जा सकती थी. शायद भारत प्रधानमंत्री की जगह किसी जूनियर प्रतिनिधि को भेज सकता था. भारतीयों ने कुवैत और पूरे खाड़ी क्षेत्र में अपनी मेहनत और कौशल से बहुत सम्मान कमाया है, और ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जिससे यह खराब हो."

डी'सूज़ा के अनुसार, इसके दीर्घकालिक असर हो सकते हैं.

उन्होंने आगे कहा, "मुझे नहीं लगता कि अरब देश भारत की खुलकर आलोचना करेंगे. लेकिन मुझे पूरा यक़ीन है कि जो तस्वीरें और संदेश गए हैं, उन्हें नोट किया जाएगा. भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन के स्तंभों में से रहा है. हमने हमेशा निष्पक्षता की बात की है, लेकिन मुझे नहीं मालूम कि इस क्षेत्र में हमें अब भी उसी तरह देखा जाता है या नहीं. अरब देश अब चीन की तरफ़ झुक रहे हैं, और मुझे इसमें कोई हैरानी नहीं है."

लेकिन भारत के पूर्व विदेशी सचिव शशांक का मानना था कि प्रधानमंत्री की यह यात्रा किसी भी तरह से नुक़सानदायक नहीं थी.

उन्होंने कहा, "भारत को अपने हितों की रक्षा करनी होगी. इस समय दुनिया में कई मुद्दों पर अनिश्चितता है ऐसे में इसराइल जैसे पुराने साझेदार के साथ हमारे सहयोग को और मज़बूत करना ज़रूरी है. आतंकवाद, व्यापार और अब तकनीक- इन सब क्षेत्रों में हमारा सहयोग अच्छा रहा है और इसे आगे बढ़ाना चाहिए. हां, अब लगता है कि ऑपरेशन से ठीक पहले भारत के प्रधानमंत्री का इसराइल जाना, दिखने में इसराइल के लिए फ़ायदेमंद साबित हुआ, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसके पीछे इससे ज़्यादा कुछ पढ़ने की ज़रूरत है."

'इसरायल के साथ- पूरी मज़बूती और पूरे विश्वास के साथ, इस समय भी और आगे भी'

आज़ादी से पहले ही- 1946 में- तत्कालीन अंतरिम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तय कर दिया था कि भारत को दुनिया में अपना व्यवहार कैसा रखना चाहिए.

उन्होंने कहा था, "हमारी नीति यह है कि हम शक्ति की राजनीति में नहीं उलझेंगे और किसी एक समूह के साथ मिलकर दूसरे समूह के ख़िलाफ़ नहीं खड़े होंगे."

बाद में 'गुटनिरपेक्षता' और 'रणनीतिक स्वायत्तता' जैसे शब्द इस्तेमाल हुए, लेकिन मूल भावना वही रही- किसी पक्ष का साथ न लेना.

प्रधानमंत्री मोदी की दो दिन की इस यात्रा में प्रतीकात्मकता के कई पल नज़र आए.

यात्रा के दौरान 17 समझौते हुए और 10 घोषणाएं की गईं, लेकिन दिलचस्पी उस बात में भी पैदा हुई जो इसराइल के प्रधानमंत्री ने यात्रा से कुछ दिन पहले कही थी.

22 फ़रवरी, 2026 को अपने साथियों से बात करते हुए उन्होंने कहा, "…हम एक पूरा ढांचा बनाएंगे, जिसे आप मध्य पूर्व के चारों तरफ़ या अंदर एक 'षट्कोण' जैसा गठजोड़ कह सकते हैं. इसमें भारत, अरब देश, अफ़्रीकी देश, भूमध्यसागरीय देश (यूनान और साइप्रस) और एशिया के कुछ देश शामिल होंगे, जिनका मैं अभी ज़िक्र नहीं कर रहा… इसका मक़सद ऐसा समूह बनाना है जो हालात, चुनौतियों और लक्ष्यों पर एक जैसा सोचता हो- कट्टरपंथी गुटों के ख़िलाफ़, चाहे वह कट्टरपंथी शिया धुरी हो, जिस पर हमने कड़ा प्रहार किया है, या उभरती कट्टरपंथी सुन्नी धुरी."

अपनी तरफ़ से, ऐसा लग रहा था कि दिल्ली, इसराइल के साथ मज़बूत साझेदारी बनाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है.

प्रधानमंत्री मोदी के इसराइली पार्लियामेंट, जिसे कनेसेट भी कहते हैं, में दिए भाषण को वहां मौजूद सभी लोगों ने खड़े होकर सराहा.

इसराइल में 7 अक्तूबर 2023 को हमास के हमले में लगभग 1200 लोगों की मौत हुई थी और 251 लोगों को बंधक बनाया गया था.

इसी संदर्भ में मोदी ने कहा, "भारत इसराइल के साथ है- पूरी मज़बूती और पूरे विश्वास के साथ, इस समय भी और आगे भी. किसी भी कारण से निर्दोष लोगों की हत्या को सही नहीं ठहराया जा सकता".

उन्होंने 'आम यिस्राएल खाई' भी कहा, जिसका अर्थ है 'इसराइल की जनता जीवित रहे'.

लेकिन इसके साथ ही, उन्होंने ग़ज़ा में हो रही तबाही का ज़िक्र सार्वजनिक तौर पर नहीं किया, जहाँ हमास के चलाए गए स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार इसराइल की सैन्य कार्रवाई में 72,000 से ज़्यादा लोगों की जान गई है.

मोदी ने इसराइल पर यह दबाव भी नहीं डाला कि वह ग़ज़ा को दी जाने वाली मदद बढ़ाए और कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में हो रही बस्तियों की हिंसा पर रोक लगाए.

प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद, भारत की पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने एक्स पर लिखा, "विदेश नीति एक शतरंज का खेल है. लेकिन पश्चिम एशिया ऐसा नहीं है. यह एक जीवित, पीड़ित और बदलता क्षेत्र है. भारत यह मान रहा है कि वह बिना किसी पक्ष का स्थायी समर्थक दिखे, अपनी चाल चल सकता है. समय बताएगा कि यह दांव समझदारी था या अति आत्मविश्वास भरा."

समय पर सवाल

लेकिन यात्रा से पहले ही इसके समय पर सवाल उठने लगे थे.

24 फ़रवरी को कांग्रेस पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने लिखा, "कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में इसराइल द्वारा हज़ारों फ़लस्तीनियों को बेघर और विस्थापित करने की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिसकी दुनिया भर में आलोचना हो रही है. ग़ज़ा में इसराइल के हमले लगातार जारी हैं. इसराइल और अमेरिका ईरान पर हवाई हमले की योजना बना रहे हैं. फिर भी प्रधानमंत्री कल इसराइल जा रहे हैं अपने 'प्रिय मित्र' नेतन्याहू को गले लगाने- जो भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों का सामना कर रहे हैं. मोदी सरकार फ़लस्तीन के मुद्दे पर दोहरे मापदंड और पाखंड भरे बयान देती है."

24 फ़रवरी को ही पूर्व राजनयिक केसी सिंह ने भी एक्स पर लिखा, "प्रधानमंत्री मोदी अपने 'मित्र' नेतन्याहू के बुलावे पर, ऐसे समय में इसराइल जा रहे हैं जो खाड़ी और पश्चिम एशिया के लिए बेहद संवेदनशील है. इसका मतलब है कि भारत, अमेरिका और इसराइल के पक्ष में खड़ा दिख रहा है. समय बताएगा कि यह एक समझदारी भरा कदम था या एक रणनीतिक गलती."

लेकिन कई लोग प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के समर्थन में भी थे.

जॉर्डन और लीबिया सहित कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके अनिल त्रिगुणायत ने कहा, "मेरा मानना है कि अमेरिका और इसराइल पहले ही हमले का फ़ैसला कर चुके थे. मुझे खुशी है कि उन्होंने ऐसा हमला उस समय नहीं किया जब हमारे प्रधानमंत्री इसराइल में मौजूद थे. मुझे नहीं लगता कि सिर्फ़ इस यात्रा की वजह से अरब देश भारत के ख़िलाफ़ कुछ सोचेंगे. हमारी 'डी-हाइफ़नेशन' नीति बिल्कुल साफ़ है- यानी एक देश के साथ हमारा रिश्ता, क्षेत्र के दूसरे देश से हमारे रिश्ते को प्रभावित नहीं करता. हमें यह नहीं भूलना चाहिए इसराइल भारत का मुश्किल समय में भी भरोसेमंद साझेदार रहा है. और अगर आप भारत के कल के बयान को देखें, तो हमने न सिर्फ़ ईरान की संप्रभुता की बात की, बल्कि उसी सांस में क्षेत्र के दूसरे देशों की भी बात की, और मुझे लगता है कि यह एक बहुत महत्वपूर्ण बात है".

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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