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टी-20 वर्ल्ड कप 2026 को सिर्फ़ दिग्गज टीमों के मैचों के लिए ही नहीं किया जाएगा याद
- Author, हरप्रीत कौर लांबा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
आईसीसी टी-20 वर्ल्ड कप 2026 में रोमांच और उलटफेर की कोई कमी नहीं रही.
चाहे ऑस्ट्रेलिया का ग्रुप स्टेज से ही बाहर होना हो, या पाकिस्तान का वर्ल्ड कप के बायकॉट को लेकर विवाद, या न्यूज़ीलैंड का ख़िताब के प्रबल दावेदार दक्षिण अफ्रीका को सेमीफाइनल में मात देना, फैंस कई रोमांचक और दिल को छू लेने वाले पलों के गवाह बने.
लेकिन इन सबके इतर जिस बात ने सबका ध्यान खींचा, वो थे एसोसिएट देश. जिन्होंने भारत, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड जैसी दिग्गज टीमों की मौजूदगी के बावजूद बड़े मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.
क्रिकेट इतिहास में एसोसिएट देशों की उपस्थिति पर अक्सर मिक्स्ड रिएक्शन देखने को मिलते हैं. क्या वे केवल संख्या बढ़ाने के लिए हैं, या वे वास्तव में इस टूर्नामेंट का हिस्सा हैं? यह बहस लगभग हर वर्ल्ड कप में देखने को मिलती है.
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अगर भारत और श्रीलंका में हुए टी-20 वर्ल्ड कप को देखें तो, आठ एसोसिएट देशों ने सिर्फ इसमें हिस्सा ही नहीं लिया बल्कि एक अलग छाप भी छोड़ी.
अमेरिका के भारत को हार के कगार पर धकेलने से लेकर, फहीम अशरफ की पारी से पहले नीदरलैंड्स के पाकिस्तान को संकट में डालने तक.
कनाडा के 19 वर्षीय युवराज सिंह समरा के न्यूज़ीलैंड के खिलाफ 110 रन बनाकर टी-20 या वनडे वर्ल्ड कप में सबसे कम उम्र वाला खिलाड़ी बनने तक, ये टूर्नामेंट साहसिक और प्रेरणा देने वाली कहानियों से भरपूर रहा.
एक लंबा रास्ता
साल 1965 में, फिजी और अमेरिका इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (तब इंटरनेशनल क्रिकेट कॉन्फ्रेंस) के पहले एसोसिएट सदस्यों में शामिल थे. उसके बाद से ही एसोसिएट सदस्यों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है. 2026 तक, आईसीसी के यूरोप, अफ्रीका, एशिया और अमेरिका में 90 से अधिक एसोसिएट सदस्य हैं.
2026 टी-20 वर्ल्ड कप की तैयारियों के दौरान नीदरलैंड्स, कनाडा और पहली बार टूर्नामेंट में हिस्सा ले रही इटली को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा.
एमस्टेलवीन स्थित वीआरए स्टेडियम नीदरलैंड्स टीम का बेस था, लेकिन ये पूरी तरह से बर्फ ढका हुआ था. वहीं कनाडा को भी इसी तरह की भारी सर्दी का सामना करना पड़ा, जिसके कारण खिलाड़ियों को इंडोर में ही रहना पड़ा.
लेकिन इसके समाधान भी अनूठे रहे. टीमों को अलग-अलग हिस्सों में बांटना और विदेश में ट्रेनिंग करना. नीदरलैंड्स और कनाडा ने श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका और भारत में टीमें भेजीं, जहां उचित सुविधाएं और ज्यादा ठंड नहीं थी.
नीदरलैंड्स टीम के मैनेजर जॉन वैन व्लिएट ने बर्फ से ढके मैदानों की एक तस्वीर दिखाते हुए कहा, "हालात को देखते हुए हमें तैयारी के लिए विदेश जाना पड़ा."
"हमने एक दल को दक्षिण अफ्रीका भेजा, दूसरे को भारत. आखिरकार, वर्ल्ड कप से 10 दिन पहले हम सभी चेन्नई में जमा हुए और फिर कोलंबो चले गए."
टूर्नामेंट के दौरान नीदरलैंड्स के मैच नेशनल टीवी पर लाइव टेलीकास्ट किए गए. कुछ साल पहले तक इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था.
नीदरलैंड्स के नामीबिया को हराकर अपनी पहली जीत दर्ज करने के बाद वैन व्लिएट ने कहा, "यह बिल्कुल अनोखा है. तीन साल पहले तक ऐसा नहीं होता था. हमने विंटर ओलंपिक के लिए एक बड़ा दल भेजा था, फिर भी उन्होंने हमारे मैचों को लाइव दिखाया. ये आगे बढ़ने के संकेत दिखाता है."
नौकरी बचाने की जद्दोजहद
नीदरलैंड्स और इटली जैसे फुटबॉल, हॉकी और साइकिलिंग के शौकीन देशों में क्रिकेट अक्सर नॉन-प्रोफेशनल खिलाड़ी खेलते हैं. वो वर्ल्ड कप जैसे आयोजनों में अपने देशों का प्रतिनिधित्व करने के लिए बिना वेतन के छुट्टी लेते थे या यहां तक कि अपनी नौकरी से इस्तीफा भी दे देते हैं.
नीदरलैंड्स के ऑलराउंडर कॉलिन एकरमैन ने कहा, "नीदरलैंड्स में क्रिकेट के प्रशंसक उतने ज़्यादा नहीं हैं, इसलिए यह थोड़ा मुश्किल है. लेकिन खेल निश्चित रूप से आगे बढ़ रहा है. उम्मीद है कि इस साल यूरो टी-20 स्लैम का आयोजन होगा. मुझे लगता है कि देश में क्रिकेट का आगे बढ़ना जारी रहेगा."
कनाडा की कहानी भी अलग नहीं है. ऐसा देश जहां की स्थितियां और कल्चर आइस हॉकी के अनुरूप हों, वहां क्रिकेट के लिए अपनी जगह बना पाना बेहद मुश्किल है.
कनाडा के विकेटकीपर बल्लेबाज़ श्रेयस मोवा ने कहा, "हमारे लिए गर्मियों की शुरुआत मई में होती है और सितंबर या अक्तूबर तक चलती है. अगर आप खुशकिस्मत हैं तो अक्तूबर के आखिरी हफ्ते तक क्रिकेट खेल सकते हैं."
"उसके बाद हम इंडोर प्रैक्टिस करते हैं. हम नेट प्रैक्टिस करते हैं. लेकिन वहां कोई असल मैच जैसे हालात नहीं होते. एक खिलाड़ी के लिए ये जानना महत्वपूर्ण है कि टीम के लिए मैच कैसे जीतना है, दबाव को कैसे झेलना है. लेकिन ये चीज़ें हमें इंडोर प्रैक्टिस में नहीं मिलतीं."
श्रेयस मोवा कर्नाटक से हैं और 2016 में वो कनाडा शिफ्ट हुए. 32 साल के श्रेयस इंटरनेशनल क्रिकेट खेलने के साथ ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर भी हैं.
श्रेयस बताते हैं, "मेरी कंपनी मुझे खेलने जाने देती है और रात में काम करने की अनुमति देती है. क्रिकेट मेरा जुनून है, पर मैं अपनी सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी भी जारी रखना चाहता हूं."
अलग-अलग देशों के खिलाड़ियों का एक साथ आना
संयुक्त अरब अमीरात की टीम कई संस्कृतियों के मिलन को दिखाती है. भारत, पाकिस्तान और अन्य दक्षिण एशियाई प्रवासियों से बना समूह एक ही ड्रेसिंग रूम में एकजुट है.
भारत, ज़िम्बाब्वे और अफगानिस्तान को कोचिंग दे चुके लालचंद राजपूत अब यूएई की टीम के मुख्य कोच हैं. उन्होंने खिलाड़ियों को साथ लाने और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करवाने के लिए कड़ी मेहनत की है.
वो कहते हैं, "एक कोच के तौर पर सबसे महत्वपूर्ण बात है टीम का एकजुट होना और ड्रेसिंग रूम में आपसी सौहार्द. जब वे मैदान पर उतरते हैं, तो वे एक ही टीम के रूप में खेलते हैं. हम कभी यह नहीं सोचते कि हम अलग-अलग जगहों से आए हुए हैं. हम बस यूएई टीम के रूप में एक साथ होते हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए शुरुआत में हमें हमेशा कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा."
वो बातते हैं, "सबसे पहली बात है कल्चर को समझना. एक बार कल्चर समझ आ जाए तो खिलाड़ियों को एक साथ लाना आसान हो जाता है. इसके लिए, जब हम दौरे पर जाते थे. मैं एक भारतीय खिलाड़ी और एक दूसरे कल्चर के खिलाड़ी को साथ रखता था. ताकि वे एक-दूसरे को बेहतर तरीके से जान सकें. इससे उनके बीच दोस्ती और मज़बूत हो जाती थी."
"मैं हमेशा मानता हूं कि खिलाड़ियों को एक-दूसरे के प्रदर्शन का सम्मान करना चाहिए. अगर आप हमारी टीम को देखें तो मुझे लगता है कि हमारे बीच सौहार्द बहुत अच्छा है. वे हमेशा एक-दूसरे के लिए लड़ते हैं. यह हमारी टीम भावना और आपसी जुड़ाव को दिखाता है."
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के स्टूडेंट रहे शोएब खान यूएई के लिए लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "भारत में मुझे खेलने का मौका नहीं मिल रहा था. 2021 में मेरी शादी हुई. मेरी पत्नी और मेरे माता-पिता सब वहीं थे. मैंने सोचा यही खेल है, मुझे अपना सर्वश्रेष्ठ देना होगा. अब अगर मुझे यह मौका मिल गया है, तो ठीक है."
बड़ी टीमों के खिलाफ खेलने के अलावा वर्ल्ड कप सीखने के मौके उपलब्ध करवाने वाला प्लेटफॉर्म भी बना. इटली की टीम के खिलाड़ियों को भारत के महान खिलाड़ी राहुल द्रविड़ के साथ समय बिताने का मौका मिला, जिसका उन्होंने भरपूर लुफ्त उठाया.
इटली के कप्तान वेन मैडसन ने कहा, "राहुल ने हमारे कुछ खिलाड़ियों से बात की. विश्व स्तरीय खिलाड़ियों और क्रिकेट जगत के दिग्गजों से मिलना हमारे लिए अद्भुत अनुभव रहा. एक विकासशील क्रिकेट राष्ट्र के रूप में उनसे सीखना हमारे लिए हमेशा यादगार रहेगा."
कई मोर्चों पर लड़ी जा रहीं लड़ाइयां
चकाचौंध और ग्लैमर के पीछे बेहद सख्त वास्तविकता भी है- वित्तीय असमानता और खेलने के कम मौके.
आईसीसी ने बेशक ग्लोबल इवेंट्स का विस्तार किया है और उभरती टीमों को वित्तीय सहायता भी प्रदान की है. लेकिन फिर भी सहयोगी सदस्य देशों को मिलने वाली धनराशि पूर्ण सदस्य देशों की तुलना में काफी कम है.
टीमों को शुरुआती प्रोत्साहन तो मिल जाता है, लेकिन यह अंतर बुनियादी ढांचे और उचित मौके नहीं मिलने देता.
अमेरिका के शायान जहांगीर का कहना है कि एसोसिएट देशों को अधिक अवसर और धनराशि की ज़रूरत है.
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि हमें एसोसिएट देशों का दर्जा दिया गया है, लेकिन हम एक बेहतरीन टीम से कम नहीं हैं."
जहांगीर ने कहा, "हमें जो अवसर और आर्थिक सहायता मिलती है वो काफी नहीं है."
उन्होंने कहा, "हमारी अच्छे से देखभाल नहीं हुई है. लेकिन हमारे खिलाड़ी ही हैं जो कड़ी मेहनत कर रहे हैं. वित्तीय संसाधनों और बुनियादी ढांचे के बिना भी हम प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. अगर एसोसिएट देशों पर अधिक ध्यान दिया जाए, तो आप और भी बड़े मैच देखेंगे और ये टीमें अपना दर्जा बदलेंगी."
सीमित संसाधनों के बावजूद एसोसिएट देशों की टीमों ने कई मौकों पर दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों को कड़ी टक्कर दी.
नेपाल के प्रदर्शन की पूर्व भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह ने सोशल मीडिया पर तारीफ करते हुए लिखा, "टीमें इसी तरह आगे बढ़ती हैं और चैंपियन बनते हैं."
2026 का वर्ल्ड कप इस बदलाव को सामने लाया है. एसोसिएट टीमों के कई मैच अंतिम ओवरों तक चले और खिलाड़ियों ने कई रिकॉर्ड बनाए.
एसोसिएट होने के बावजूद, टीमों ने एक बात साफ कर दी: वे इस खेल में अपनी जगह बनाने के काबिल हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.