जब कश्मीर मुद्दे पर ईरान ने दिया था भारत का साथ, लेकिन क्या दोनों देशों के संबंध दोस्ताना रहे हैं?

    • Author, आर्जव पारेख
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 13 मिनट

"भारत और ईरान नए दोस्त नहीं हैं. हमारी दोस्ती उतनी ही पुरानी है जितना इतिहास. सदियों से हमारे समाज, कला और आर्किटेक्चर, विचार और परंपराओं, संस्कृति और व्यापार के माध्यम से जुड़े हुए हैं."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2016 में अपनी ईरान यात्रा के दौरान यह बयान देते हुए भारत और ईरान के संबंधों की गहराई के बारे में बात की थी.

वैसे अगर देखा जाए तो भारत की स्वतंत्रता के बाद दोनों देशों के संबंधों में कई अहम पड़ाव आए हैं.

मध्य-पूर्व की लगातार बदलती परिस्थितियाँ, पाकिस्तान के साथ संबंध, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अमेरिका-रूस-चीन जैसे देशों का प्रभाव और ईरान के आंतरिक हालात, इन सभी ने पिछले सात-आठ दशकों में भारत और ईरान के संबंधों को प्रभावित किया है.

ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हालिया हमलों और आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद भारत ने खुले तौर पर ईरान पर हुए हमलों की निंदा नहीं की.

ऐसे में जानकार भारत-ईरान के संबंधों का हवाला देकर भारत सरकार के इस रुख़ पर सवाल उठा रहे हैं.

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इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसी घटनाएँ दर्ज हैं, जहाँ ईरान ने भारत का खुले तौर पर समर्थन किया है, तो कुछ ऐसी भी हैं जहाँ दोनों देशों ने अपने-अपने हितों को प्राथमिकता दी.

पिछले दशकों में भारत और ईरान के संबंध कैसे बदले, किन मौक़ों पर ईरान ने भारत का साथ दिया और कब भारत के साथ नहीं खड़ा हुआ, इस लेख में इस पर एक नज़र.

'भारत और ईरान: दो बिछड़े हुए भाई'

भारत और ईरान के संबंधों के प्रमाण इंडो-आर्यन संस्कृति की शुरुआत से मिलते हैं. सब यह जानते हैं कि भारत और ईरान धर्म, संस्कृति और भाषा के स्तर पर सदियों से जुड़े हुए हैं.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में भारत-ईरान संबंधों पर लिखा था कि "भारतीयों के जीवन और संस्कृति को दुनिया की अनेक मानव प्रजातियों और संस्कृतियों ने प्रभावित किया है. उनमें से सबसे पुराना और सबसे मज़बूत संबंध ईरानियों के साथ रहा है."

1946 में इलाहाबाद के दौरे पर आए ईरानी कल्चरल मिशन के प्रमुख ने कहा था, "ईरान के लोग और भारत के लोग भाइयों की तरह हैं, जो एक फ़ारसी जानकार के मुताबिक़ एक-दूसरे से बिछड़ गए थे. एक भाई पूरब में गया और दूसरा पश्चिम में."

"दोनों के परिवार अपने बारे में सब कुछ भूल गए. अगर शायद इन दोनों में कुछ कॉमन बचा है, तो वह हैं कुछ पुराने सुर, जो कभी-कभार इनकी बांसुरी से बज उठते हैं. इसीलिए हम अपने पुराने सुरों को बजाने बार-बार भारत आते रहते हैं, ताकि हमें सुनकर हमारे चचेरे भाई हमें पहचान पाएं और हम उनके साथ फिर एक हो पाएं."

नेहरू काल में भारत-ईरान के रिश्ते

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1946 में प्रकाशित 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में लिखा था, "विश्व में हो रहे परिवर्तन एशियाई देशों को एक-दूसरे को फिर से देखने के लिए मजबूर कर रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि आने वाले दौर में भारत की ईरान से नज़दीकियां बढ़ेंगी."

भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को 'फ्रेंडशिप ट्रीटी' पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों की औपचारिक शुरुआत माना जाता है. इसमें कहा गया था कि दोनों देश शांति और दोस्ती के रास्ते पर चलेंगे.

यह वह दौर था, जब विश्व अमेरिका और सोवियत यूनियन के दो ध्रुवों में बंट रहा था और भारत ने नॉन-अलाइनमेंट का रास्ता अपनाया था .

'इंडियाज़ वेस्ट एशिया पॉलिसी: लिमिट्स ऑफ़ बाइलेटरलिज़्म' शीर्षक से प्रकाशित शोधपत्र में प्रो. मुमताज़ अहमद शाह लिखते हैं, "ईरान, सऊदी अरब और दूसरे राजशाही शासनों का अमेरिका सुपरपावर साथी बना हुआ था. वह पाकिस्तान और इन खाड़ी देशों के बीच सैन्य सहयोग का समर्थन कर रहा था. भारत ने ईरान, सऊदी अरब, मिस्र, सीरिया और इराक़ के साथ कूटनीतिक साझेदारी स्थापित की थी, लेकिन वह इस क्षेत्र में ऐसे सहयोगी की तलाश में था जो धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में विश्वास रखता हो."

वो बताते हैं, "ईरान के शाह ने 1956 में बग़दाद पैक्ट के सिर्फ़ चार महीने बाद ही भारत का दौरा किया था. उन्होंने भारत को यह आश्वासन दिया था कि ईरान के पाकिस्तान के साथ क़रीबी रिश्ते कतई भारत के ख़िलाफ़ नहीं हैं और इससे भारत और ईरान के दोस्ताना संबंधों पर कोई असर नहीं होगा."

उसके बाद 1959 के सितंबर में नेहरू ने भी ईरान का दौरा किया और तेहरान से भारत की 'नॉन-अलाइनमेंट पॉलिसी' को विश्व को समझाने का प्रयास किया.

भारत-ईरान संबंधों पर कुवैत और इराक़ जैसे देशों में भारत के राजनयिक रह चुके तलमीज़ अहमद से बीबीसी ने बात की.

तलमीज़ अहमद कहते हैं, "ईरान के शाह के समय में हम ऐसा कह सकते हैं कि शाह भारत के बहुत नज़दीक आना चाहते थे. हमने 'ईरान-हिंद शिपिंग लाइन' और 'मेंगलुरु ऑयल रिफ़ाइनरी' की स्थापना की. ईरान भारत को पेट्रोलियम सप्लाई करने वाला बड़ा प्लेयर बना."

भारत-पाकिस्तान युद्धों में ईरान ने किसकी मदद की?

नेहरू और ईरान के शाह की मुलाक़ातों और भारत और ईरान के बीच 'फ्रेंडशिप ट्रीटी' के बावजूद यह दौर ऐसा था, जिसमें पाकिस्तान से संघर्ष की वजह से भारत और ईरान के संबंधों में बदलाव देखने को मिला.

भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्धों में ईरान ने किसका समर्थन किया था, उसका ब्योरा अमेरिकी विदेश विभाग के 'ऑफ़िस ऑफ़ द हिस्टोरियन' के दस्तावेज़ों में मिलता है.

मई 1972 में प्रकाशित 'इंटेलिजेंस मेमोरेंडम' में लिखा गया है कि "1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद ईरान ने पाकिस्तान के लिए पर्चेजिंग एजेंट के तौर पर काम किया. उस समय पाकिस्तान को पश्चिमी देशों से हथियार मिलने में मुश्किल हो रही थी. ईरान ने 90 एफ़-86 फ़ाइटर जेट, एयर-टू-एयर मिसाइलें, आर्टिलरी और कुछ स्पेयर पार्ट्स पश्चिमी जर्मनी के एक आर्म्स डीलर से ख़रीदे थे. इन एयरक्राफ्ट्स को पहले ईरान पहुंचाया गया और फिर वहां से पाकिस्तान भेजा गया. बाकी हथियार सीधे कराची भेजे गए थे."

इसमें लिखा है, "1971 में ईरान ने पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान में इस्तेमाल के लिए 12 हेलीकॉप्टर और अन्य सैन्य साज़ो-सामान उधार दिए थे. इनका इस्तेमाल पूर्वी पाकिस्तान में भेजे जाने वाले हथियारों की भरपाई करने के लिए किया गया था. जब भारत की सेना पूर्वी पाकिस्तान में घुसी, तब भी आर्टिलरी और स्पेयर पार्ट्स जैसी सप्लाई पाकिस्तान भेजी गई थी."

लेकिन जानकारों का मानना है कि ईरान ने पाकिस्तान का खुलकर समर्थन नहीं किया था.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पश्चिम एशियाई अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर सुजाता ऐश्वर्या ने भारत-ईरान संबंधों पर काफ़ी शोध किया है.

बीबीसी से बात करते हुए वह कहती हैं, "इतिहास में कुछ मौक़े ज़रूर ऐसे रहे हैं जब ईरान भारत के साथ खड़ा नज़र आया. 1965 और 1971 के युद्धों में ईरान ने पाकिस्तान का खुलकर साथ नहीं दिया, जबकि दोनों के बीच इस्लामी एकजुटता की उम्मीद थी. यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत था."

ईरानी क्रांति के बाद संबंधों में आया बदलाव

1979 में ईरानी क्रांति से मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी के राजशाही शासन का अंत हुआ और रुहोल्लाह ख़ुमैनी ने 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान' की स्थापना की. इसके बाद से भारत-ईरान संबंधों में काफ़ी बदलाव आया.

प्रो. सुजाता ऐश्वर्या कहती हैं, "1979 के बाद का दौर ज़्यादा पेचीदा हो गया, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के उभार के ख़िलाफ़ ईरान ने भारत के साथ मिलकर नॉर्दर्न अलायंस को समर्थन दिया. यह शायद दोनों देशों के बीच सबसे ठोस और व्यावहारिक सहयोग का उदाहरण था."

यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 1979 की क्रांति के बाद ईरान को क्षेत्रीय अलगाव से बाहर निकलना था और भारत एक बड़ा, गैर-पश्चिमी और गुटनिरपेक्ष बाज़ार था, जिसकी उसे ज़रूरत थी.

तलमीज़ अहमद कहते हैं, "इस्लामी क्रांति के बाद ईरान को ऐसा लगता था कि भारत इराक़ का समर्थन करता है. लेकिन जल्द ही भारत-ईरान संबंध फिर पटरी पर लौट आए. इसके बाद पूर्व राष्ट्रपति रफ़संजानी के काल में भारत-ईरान के दोस्ताना संबंध आगे बढ़ते रहे. वे भारत आए, नरसिम्हा राव ईरान गए और स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप आगे बढ़ी."

जब कश्मीर मसले में ईरान ने भारत के पक्ष में वीटो किया

भारत और ईरान के अच्छे संबंधों की बात आती है तो कश्मीर का उदाहरण हमेशा दिया जाता है.

तब भारत के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे.

1994 में पाकिस्तान और ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक को-ऑपरेशन ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र के ह्यूमन राइट्स कमीशन की जेनेवा बैठक में भारत के ख़िलाफ़ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी, जिसमें भारत पर कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए गए थे.

हालांकि इसमें पाकिस्तान को ज़रूरी समर्थन नहीं मिला, जिसमें ईरान का 'वीटो' मुख्य वजह रही.

कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने अंग्रेज़ी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने हालिया लेख में भी इसका ज़िक्र किया था.

उन्होंने लिखा, "1994 में जब ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक को-ऑपरेशन ने यूएन के मानवाधिकार कमीशन में कश्मीर को लेकर भारत के ख़िलाफ़ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी, तब ईरान ने इसे रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी."

सोनिया गांधी ने लिखा, "ईरान के हस्तक्षेप की वजह से ऐसे समय कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण नहीं हो पाया, जब भारत की आर्थिक स्थिति काफ़ी नाजुक थी. ईरान के साथ हमारे संबंध सिविलाइजे़शनल और स्ट्रैटेजिक रहे हैं."

इस पर प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, "कश्मीर के मसले पर ईरान ने कभी पाकिस्तान की तरह खुलकर भारत का विरोध नहीं किया, यह सच है. लेकिन इसकी वजह इस्लामी एकता से ज़्यादा ईरान और पाकिस्तान के बीच की आपसी प्रतिद्वंद्विता थी."

'तेहरान डिक्लरेशन' से लेकर चाबहार तक

2001 में भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ईरान दौरे पर गए, जहां दोनों देशों के बीच 'तेहरान डिक्लरेशन' हुआ.

भारतीय विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक़, पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की ईरान यात्रा में हुआ 'तेहरान डिक्लरेशन' और उसके बाद ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी की भारत यात्रा में हुए 'नई दिल्ली डिक्लरेशन' ने भारत-ईरान संबंधों को और मज़बूत किया.

'तेहरान डिक्लरेशन' में दोनों देशों के बीच स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप, ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग, आर्थिक और व्यापारिक संबंध, क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों से लेकर अफ़ग़ानिस्तान में शांति के लिए प्रतिनिधि सरकार की स्थापना जैसे अहम मुद्दों पर करार हुआ था.

भारत ने 2003 में ही ईरान को चाबहार बंदरगाह विकसित करने का प्रस्ताव रखा था ताकि भारतीय सामान पाकिस्तान को बायपास करते हुए सड़क और रेल परियोजना- इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) के ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच सके.

साल 2016 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान का दौरा किया था. उसी साल इस समझौते को मंज़ूरी मिली.

फिर साल 2024 में चाबहार स्थित शाहिद बेहेस्ती बंदरगाह के संचालन के लिए भारत ने समझौता किया, जिसको लेकर इस साल अमेरिकी दबाव की भी ख़बरें आई थीं.

प्रो. सुजाता कहती हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान दोनों देशों के लिए साझा ख़तरा था, इसलिए वहाँ सहयोग स्वाभाविक था. चाबहार बंदरगाह समझौते ने पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए भारत को अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचाया."

तलमीज़ अहमद कहते हैं, "हम तेहरान डिक्लरेशन तक पहुँचे. लेकिन मनमोहन सिंह के समय में अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया कि उसके ईरान के साथ अच्छे संबंध नहीं रहेंगे. चाबहार की बात आगे बढ़ी, लेकिन मनमोहन सरकार ने अमेरिका को अधिक तवज्जो दी. फिर ऐसा समय भी आया कि जहां ईरान भारत का नंबर 2 तेल सप्लायर बना."

"ट्रंप ने फिर से ईरान पर प्रतिबंध लगाए और भारत ने ईरान से तेल ख़रीदना बंद कर दिया. चाबहार में भारत का प्रभुत्व कम होता गया और अंततः भारत को वहां से पीछे हटना पड़ा."

उन्होंने कहा, "चाबहार जैसी जितनी भी संभावनाएँ थीं, उन्हें हमने गंवा दिया. सबसे बड़ी ग़लती हमसे ट्रंप के शासन में हुई, जब ट्रंप के दबाव में हम झुक गए और ईरान से तेल लेना बंद कर दिया. हमें अमेरिका को बताना चाहिए था कि अगर वे हमसे दोस्ती करना चाहते हैं, तो हमारे हितों को भी प्राथमिकता देनी होगी."

क्या भारत-ईरान के संबंध वाक़ई 'दोस्ताना' रहे या सिर्फ़ 'मजबूरी'?

प्रो. सुजाता ऐश्वर्या कहती हैं कि ईरान ने कई मौक़ों पर भारत को 'समर्थन' दिया, लेकिन इसे 'हितों का साझा होना' कहना ज़्यादा सटीक होगा, क्योंकि जब भी हितों में टकराव हुआ, ईरान ने भारत को 'प्राथमिकता नहीं दी'.

वह कहती हैं, "शोध और अध्ययन के आधार पर मैं यह कह सकती हूँ कि यह काफ़ी हद तक मजबूरी और रणनीतिक गणना का नतीजा रहा है, न कि भारत के प्रति किसी गहरी दोस्ती या एकजुटता का."

प्रो. सुजाता का मानना है कि भारत और ईरान के संबंधों की तीन परतें हैं, और यही इस रिश्ते की जटिलता है.

वह समझाती हैं, "पहली परत है सिविलाइजे़शनल और कल्चरल. फ़ारसी साहित्य, भाषा, सूफ़ी परंपराएँ और इतिहास का जो साझा धरातल है, वह असली है. दोनों समाजों में एक-दूसरे के प्रति एक स्वाभाविक आत्मीयता है."

"दूसरी परत है व्यावहारिक और लेन-देन वाली. जिसमें तेल, व्यापार, कनेक्टिविटी और भू-राजनीतिक हित आते हैं. तीसरी और शायद सबसे ईमानदार परत है मजबूरी की. जहाँ दोनों देश कभी-कभी एक-दूसरे के पास इसलिए आए क्योंकि उनके पास बेहतर विकल्प नहीं थे या उस समय का अंतरराष्ट्रीय माहौल उन्हें एक-दूसरे के क़रीब धकेल रहा था."

पूर्व राजनयिक तलमीज़ अहमद कहते हैं, "ईरान के साथ भारत का रिश्ता देखें तो ईरान हमेशा सेकेंडरी बना रहा है. हमने हमेशा अमेरिका को प्राथमिकता देने की कोशिश की है. भारत-ईरान में जो स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप का पोटेंशियल था, उसका हम कभी लाभ नहीं उठा पाए."

वह कहते हैं, "परिस्थितियों को देखकर लगता है कि आज यह स्पष्ट हो गया है कि भारत अमेरिका और इसराइल के साथ है और ईरान के साथ नहीं है. भारत ने ईरान पर हुए हमले पर कोई बयान नहीं दिया और ख़ामेनेई की मौत के पाँच दिन बाद शोक व्यक्त किया. भारत ने ख़ुद स्पष्ट कर दिया है कि विदेश नीति में ईरान के साथ हमारे संबंध काफ़ी नीचे जा चुके हैं."

"अभी हम कुछ नहीं जानते. युद्ध चल रहा है, यह कहां जाकर अटकेगा, इसका हमें पता नहीं है. जब इसका अंत होगा, तो मध्य-पूर्व में क्या स्थिति होगी, यह भी हमें पता नहीं है. इससे भारत के सामने नई चुनौतियाँ क्या होंगी, यह भी देखना पड़ेगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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