अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी की टाइमिंग पर कोर्ट में बहस, ईडी ने क्या दिया जवाब- प्रेस रिव्यू

अरविंद केजरीवाल

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प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आगामी चुनावों के आधार पर गिरफ़्तारी से छूट का दावा नहीं कर सकते हैं, क्योंकि सभी पर क़ानून एक तरह से लागू होता है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी ने हाल ही में कथित शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ़्तार किया था.

इस ख़बर को द टेलीग्राफ अख़बार ने अपने यहां प्रमुखता से छापा है.

कोर्ट ने केजरीवाल की उस याचिका पर बुधवार को अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा है, जिसमें उन्होंने ईडी की गिरफ्तारी को चुनौती दी थी. गुरुवार को आदेश सुनाए जाने की उम्मीद है.

इससे पहले एक अप्रैल को दिल्ली की एक विशेष अदालत ने केजरीवाल की न्यायिक हिरासत 15 अप्रैल तक बढ़ा दी थी.

अख़बार के मुताबिक़ केजरीवाल ने उनकी गिरफ़्तारी के समय को लेकर सवाल उठाया और कहा कि यह लोकतंत्र, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और समान अवसर समेत संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है.

उनकी तरफ़ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि एजेंसी ‘फिक्स्ड मैच’ खेलने की कोशिश कर रही थी और उनकी गिरफ़्तारी, अभियुक्त से सरकारी गवाह बने व्यक्ति के बदलते हुए बयानों पर आधारित थी.

यह मामला 2021-22 के लिए बनाई गई दिल्ली की आबकारी नीति से जुड़ा है. आरोप है कि आबकारी नीति बनाने और उसे लागू करने में कथित भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग हुए. बाद में नई आबकारी नीति को रद्द कर दिया.

केजरीवाल की रिहाई की मांग करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि इस मामले में उन्हें गिरफ़्तार करने की कोई ज़रूरत नहीं थी.

उन्होंने गिरफ़्तारी के समय पर सवाल उठाया और कहा कि एजेंसी पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण तरीक़े से काम कर रही है.

सिंघवी ने कहा कि इस मामले में ईडी ऐसे गवाहों के बयानों को दबाने का काम कर रही है जो केजरीवाल के पक्ष में जाते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि अभियुक्त से सरकारी गवाह बने राघव मगुंटा रेड्डी और सारथ रेड्डी के बयानों पर भरोसा नहीं किया सकता है क्योंकि रेड्डी ने इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए सत्तारूढ़ पार्टी को पैसे दिए थे.

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ईडी की दलीलें

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वहीं ईडी की तरफ़ से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने एजेंसी के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह के आरोपों पर आपत्ति जताई.

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया की जांच 2022 में शुरू हुई थी और उस समय कोई चुनाव नहीं थे. इसके अलावा केजरीवाल की गिरफ़्तारी क़ानून के अनुसार हुई थी.

एसवी राजू ने कहा कि मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ जांच शुरुआती दौर में थी लेकिन उनके ख़िलाफ़ गवाहों के बयान हैं और ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में कई आरोपपत्रों का संज्ञान लिया है.

उन्होंने कहा कि कोर्ट ने पहले ही प्रथम दृष्टया इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग पाया है और इस आधार पर कई अभियुक्तों की ज़मानत याचिकाएं ख़ारिज हुई हैं.

अख़बार के मुताबिक़ एसवी राजू ने कहा कि अपराधियों को गिरफ़्तार कर जेल भेजा जाना चाहिए और ऐसा करने में कहीं पर भी संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन नहीं है.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए कहा कि आर्थिक अपराध, हत्या करने से भी ज़्यादा बड़ा है और क़ानून सभी लोगों को एक नज़र से देखता है.

एसवी राजू ने कहा, “चुनाव के आधार पर आपको छूट नहीं मिल सकती. चुनाव के दौरान राजनीति से संबंध रखने वाले किसी भी व्यक्ति को गिरफ़्तार नहीं कर सकते, क्या इस तरह के क़ानून बनाने की बात हम कर रहे हैं, ताकि अपराधियों को घूमने की खुली छूट दे सकें.”

उन्होंने कहा कि चुनाव हो या न हो, अगर कोई व्यक्ति अपराध करेगा तो उसे जेल में जाना होगा, भले वह कोई मुख्यमंत्री भी क्यों न हो.

एसवी राजू ने कहा कि आम आदमी पार्टी भी एक ‘कंपनी’ होने के नाते पीएमएलए के तहत मनी लॉन्ड्रिंग के लिए ज़िम्मेदार है.

उन्होंने कहा कि केजरीवाल की गिरफ़्तारी एक व्यक्ति के रूप में और दूसरा यह कि वे पार्टी के राष्ट्रीय संजोयक हैं, इसलिए की गई थी.

एसवी राजू ने कहा कि एजेंसी अंधेरे में तीर नहीं चला रही है. उन्होंने कहा कि एजेंसी के पास आयकर डेटा, व्हाट्सएप चैट और हवाला ऑपरेटरों के बयान थे.

उन्होंने कहा, “कुछ संपत्ति पहले से ही अस्थायी रूप से अटैच की गई है. कार्यवाही चल रही है. हम ‘आप’ की कुछ संपत्ति को भी अटैच करना चाहते हैं. अगर हम अटैच करेंगे तो आरोप लगाया जाएगा कि यह चुनाव के समय किया गया है. अगर हम गिरफ्तार नहीं करते, तो वे कहेंगे कि कहां संपत्ति अटैच करनी है? जहां तक याचिकाकर्ता का सवाल है, हम फ़िलहाल जांच के दौर में हैं.”

दिल्ली के कथित शराब घोटाला मामले में ईडी ने अरविंद केजरीवाल को ‘मुख्य साज़िशकर्ता’ बताया था.

एजेंसी का दावा है कि केजरीवाल ने शराब नीति में साउथ ग्रुप को लाभ पहुंचाने के बदले रिश्वत की मांग की थी.

ईडी का दावा है कि आम आदमी पार्टी ने रिश्वत का यह पैसा गोवा चुनाव में खर्च किया है.

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान

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चिराग को झटका, नेताओं का इस्तीफा

लोकसभा चुनाव के लिए बिहार में टिकट बंटवारे से नाराज लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय स्तर के 22 पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने पदों से इस्तीफा दे दिया है.

इस खबर को जनसत्ता अखबार ने पहले पन्ने पर जगह दी है.

अखबार के मुताबिक इसका असर आगामी चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और इसके सहयोगी दल लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को भुगतना पड़ सकता है.

बिहार की 40 में से लोजपा को पांच सीट पर चुनाव लड़ना है. इसके लिए टिकट बंटवारे को घोषणा होने के बाद से पार्टी के नेताओं की नाराजगी का असर इस्तीफे के तौर पर दिखा.

अखबार के मुताबिक हाल ही में पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद अरुण कुमार ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. टिकट बंटवारे में समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी से नाखुशी का असर इस्तीफे के तौर पर दिखा.

बुधवार को इस्तीफा देने वालों में पूर्व सांसद और पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेणु कुशवाहा, राष्ट्रीय महासचिव सतीश कुमार, प्रदेश के संगठन सचिव रविंद्र सिंह, मुख्य पार्टी विस्तारक अजय कुशवाहा, प्रदेश उपाध्यक्ष संजय सिंह, प्रदेश प्रवक्ता विनीत सिंह समेत 22 पदाधिकारियों के नाम हैं.

खबर के मुताबिक नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख से महज चंद घंटे पहले पार्टी लोजपा से इतने बड़े स्तर पर बेरुखी पर आगामी चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर सवाल उठने लगे हैं.

अखबार के मुताबिक पूर्व सांसद रेणु कुशवाहा ने निशाना साधते हुए कहा कि टिकट बंटवारे में पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं के बजाय बाहरी उम्मीदवारों को तवज्जो दी गई. पार्टी में कई युवा प्रत्याशी हैं, लेकिन उनकी अनदेखी की गई.

पूर्व सांसद अरुण कुमार ने कहा कि पार्टी में अब मूल तत्व नहीं बचा है और मैं इस फैसले से हतप्रभ हूं. इससे जनता में नाराजगी है.

अखबार के मुताबिक पार्टी ने जमुई से चिराग पासवान के बहनोई अरुण भारती, खगड़िया से राजेश वर्मा, हाजीपुर से चिराग पासवान, समस्तीपुर से शांभवी चौधरी और वैशाली से वीणा देवी की प्रत्याशी बनाया है.

इलेक्टोरेल बॉन्ड

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नुक़सान झेलती कंपनियों ने ख़रीदे इलेक्टोरल बॉन्ड

द हिंदू अख़बार ने स्वतंत्र रिचर्स टीम के साथ मिलकर कम से कम 45 ऐसी कंपनियों का पता लगाया है जिन्होंने बिना किसी मुनाफ़े के करोड़ों रुपये का चंदा राजनीतिक पार्टियों को दिया है.

अख़बार के मुताबिक 33 कंपनियों ने कुल 576.2 करोड़ रुपये इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए पार्टियों को दिए. इसमें से 434.2 करोड़ यानी 75 प्रतिशत पैसा बीजेपी ने भुनाया.

अख़बार का कहना है कि इलेक्टोरल बॉन्ड देने वाली इन 33 कंपनियों को 2016-17 से 2022-23 के बीच कोई मुनाफा नहीं हुआ है.

अखबार के मुताबिक इन 33 कंपनियों को एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हुआ था.

ख़बर के मुताबिक़ इस डेटा से इस बात का संकेत मिलता है कि ये कंपनियां यो तो किसी दूसरी कंपनियों के लिए मुखौटे का काम कर रही थी या फिर इन्होंने अपने लाभ और घाटे की सही से जानकारी नहीं दी है, जिससे मनी लॉन्ड्रिंग की संभावना बढ़ गई है.

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