चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से जुड़े जिस बिल पर होगी चर्चा, उस पर विवाद क्यों?

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इस साल मार्च महीने में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया. साल 2015 से चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता को लेकर कई जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं जिस पर ये फ़ैसला सुनाया गया था.

सभी याचिकाओं को एक करके सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इस पर सुनवाई करते हुए फ़ैसला सुनाया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सरकार के नियंत्रण से बाहर होनी चाहिए.

जस्टिस के.एम. जोसेफ़ की संवैधानिक पीठ ने अपने फ़ैसले में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक समिति की सलाह पर की जाए, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति को लेकर एक क़ानून बनाने के लिए भी कहा था.

इस फ़ैसले के बाद मॉनसून सत्र में 10 अगस्त को मोदी सरकार ने राज्यसभा में एक बिल भी पेश कर दिया जिसका नाम था मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) विधेयक, 2023. इस विधेयक पर राज्यसभा में जमकर हंगामा हुआ.

सुप्रीम कोर्ट

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विपक्ष ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वो चुनाव आयोग को अपनी कठपुतली बनाना चाहती है. उन्होंने इस विधेयक को असंवैधानिक, मनमाना और अनुचित विधेयक बताते हुए इसका विरोध किया.

आगामी सोमवार यानी 18 सितंबर से संसद का विशेष सत्र शुरू होने जा रहा है जो शुक्रवार, 22 सितंबर तक चलेगा.

लोकसभा और राज्यसभा के जारी बुलेटिन में इसकी जानकारी दे दी गई है कि इस विशेष सत्र में कौन-कौन से विधेयक या बिल चर्चा के लिए पेश किए जाएंगे.

राज्यसभा के बुलेटिन के मुताबिक़, संसद के विशेष सत्र में तीन बिल पर चर्चा होगी. लोकसभा में भी दो बिल पर चर्चा होगी.

राज्यसभा में जिन विधेयकों पर चर्चा होगी उनमें एक विधेयक चुनाव आयुक्त की नियुक्ति वाला भी है जिसे राज्यसभा में पहले ही पेश किया जा चुका है.

चुनाव आयोग

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विधेयक में क्या है?

  • इस विधेयक के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों का चयन एक सिलेक्शन कमिटी की सिफ़ारिश पर होगा और राष्ट्रपति की अनुमति के बाद उन्हें इस पद पर बैठाया जाएगा.
  • इस सिलेक्शन कमिटी की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे. इसमें विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और एक केंद्रीय मंत्री सदस्य के रूप में शामिल होंगे. केंद्रीय मंत्री का चयन प्रधानमंत्री करेंगे.
  • मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के नाम एक सर्च कमिटी सिलेक्शन कमिटी को भेजेगी. इस सर्च कमिटी की अध्यक्षता कैबिनेट सेक्रेटरी करेंगे और इसमें भारत सरकार के सेक्रेटरी रैंक के दो सदस्य होंगे.
  • मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति छह साल या 65 वर्ष की आयु तक के लिए होगी और इनको दोबारा नियुक्ति नहीं मिलेगी.
  • अगर किसी चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया जाता है तो उसका कुल मिलाकर कार्यकाल छह साल से अधिक नहीं हो सकता है.
  • वहीं सिलेक्शन कमिटी के संविधान में किसी रिक्ति या ख़ामी के कारण भी सीईसी और ईसी की नियुक्ति को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता है.
  • मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाया नहीं जा सकता है. उन्हें केवल संविधान के अनुच्छेद 324 के खंड (5) के तहत ही हटाया जा सकता है.
  • इस अनुच्छेद में बताया गया है कि सीईसी और ईसी को सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया के तहत ही हटाया जा सकता है.
  • विधेयक में कहा गया है कि चुनाव आयोग का काम जब भी संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए और मतभेद की स्थिति में बहुमत का दृष्टिकोण मान्य होगा.
मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार

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अब तक कैसे होता था चयन?

चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसका विवरण संविधान के अनुच्छेद 324 में विस्तार से दिया गया है. इसमें बताया गया है कि चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग की है.

अनुच्छेद 324 (2) में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है. हालांकि इसमें सीईसी और ईसी की नियुक्ति के लिए क़ानून बनाने की भी बात कही गई है.

सीईसी या ईसी की नियुक्ति के लिए कोई क़ानून न होने के कारण ही सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं. अब तक राष्ट्रपति ही सीईसी और ईसी की नियुक्ति करते हैं.

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क्यों हो रहा है विवाद?

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इस बिल को लेकर विपक्ष के साथ-साथ कई विश्लेषक भी केंद्र की मोदी सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं.

उनका तर्क है कि इस विधेयक के ज़रिए सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ही पलटा जा रहा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में सिलेक्शन कमिटी में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को जगह दी थी.

सवाल ये उठ रहे हैं कि इस कमिटी में शक्ति का संतुलन नहीं रखा गया है क्योंकि विपक्ष के नेता प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही अल्पमत में चले गए हैं. प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री के सहमत होने पर विपक्ष के नेता की आपत्ति का कोई सवाल नहीं रह जाएगा.

आलोचक ये भी सवाल उठा रहे हैं कि एक ओर जहां सरकार चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संविधान में जो कमी थी उसको पूरा कर रही है वहीं वो चुनाव आयोग की स्वायत्तता से भी समझौता कर रही है. जब चयन प्रक्रिया एकतरफ़ा होगी तो इससे चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता भी प्रभावित होगी.

अब मांगें उठ रही हैं कि केंद्र सरकार को सिलेक्शन कमिटी की समीक्षा करनी चाहिए और इसे अधिक संतुलित बनाना चाहिए ताकि निष्पक्ष निर्णय की प्रक्रिया पूरी की जा सके.

मांग हो रही है कि इस सिलेक्शन कमिटी में विपक्ष की मज़बूत उपस्थिति होनी चाहिए. साथ ही सर्च कमिटी में क़ानूनी जानकारों को शामिल किया जाना चाहिए.

सवाल ये भी उठ रहे हैं कि केंद्र सरकार इस बिल को बहुत जल्दबाज़ी में लेकर आई जबकि उसे राज्यसभा में इसको पेश करने से पहले इस पर विपक्षी दलों और क़ानूनी विशेषज्ञों से गहन विचार-विमर्श करना चाहिए था.

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