वक्फ़ क़ानून में प्रस्तावित बदलावों से क्या-क्या बदल जाएगा?

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- Author, इमरान कु़रैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
वक्फ़ बोर्ड को नियंत्रित करने वाले क़ानून में प्रस्तावित संशोधन विधेयक को लोकसभा में पेश कर दिया गया है. हालांकि, इससे पहले ही बिल की आलोचना शुरू हो गई थी.
ये कहा जा रहा है कि इस संशोधन के ज़रिए दान और परोपकार जैसी अवधारणाओं को कमज़ोर करने और अतिक्रमण करने वालों को संपत्ति का मालिक बनाने का प्रयास किया जा रहा है.
वक़्फ़ क़ानून का नाम बदलकर 'एकीकृत वक्फ़ प्रबंधन, सशक्तीकरण, दक्षता और विकास अधिनियम' कर दिया गया है. जानकारों का मानना है कि प्रस्तावित संशोधन इस क़ानून के नाम से मेल नहीं खाते हैं.
अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की ओर से प्रस्तावित संशोधन विधेयक की कॉपी भी सभी सांसदों को बांट दी गई थी. सरकार का दावा है कि ये संशोधन 'क़ानून में मौजूद ख़ामियों को दूर करने और वक्फ़ की संपत्तियों के प्रबंधन और संचालन' को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी हैं.
वक्फ़ में ये रुचि इसके तहत आने वाली बड़ी संपत्तियों की ओर भी इशारा करती है. वक्फ़ की 8.72 लाख संपत्तियां और 3.56 लाख जायदादें कुल 9.4 लाख एकड़ ज़मीन में फैली हुई हैं. रक्षा मंत्रालय और भारतीय रेलवे के बाद अगर सबसे अधिक संपत्तियां किसी के अधीन हैं तो वह वक्फ़ ही है. इन तीनों के पास देश में सबसे अधिक ज़मीनों का मालिकाना हक़ है.

अदालत में क़ानून को चुनौतियां

पिछले दो सालों में देश के अलग-अलग उच्च न्यायालयों में वक्फ़ से जुड़ी करीब 120 याचिकाएं दायर की गई थीं, जिसके बाद इस क़ानून में संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं.
अदालत में दी गई अर्ज़ियों में वक्फ़ क़ानून की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि जैन, सिख और अन्य अल्पसंख्यकों समेत दूसरे धर्मों में ऐसे क़ानून लागू नहीं होते.
वकील अश्विनी उपाध्याय ने बीबीसी हिंदी से कहा, "धार्मिक आधार पर कोई ट्रिब्यूनल नहीं रह सकता. भारत ऐसा राष्ट्र नहीं हो सकता, जहां दो क़ानून हों. यहां एक देश और संपत्ति के लिए एक क़ानून हो. अदालतों में दायर 120 याचिकाओं में से तकरीबन 15 मुसलमानों की ओर से भी दायर की गई है. दान और परोपकार वाले काम कभी भी धर्म के आधार पर नहीं होने चाहिए."
राजनीतिक विश्लेषक क़ुर्बान अली संशोधन को 'प्रमुख ज़मीनों पर सरकारी कब्ज़े की कोशिश' के तौर पर देखते हैं. वह कहते हैं, "ये सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंदू वोट बैंक को ख़ुश करने के लिए है. हां, मौजूदा वक्फ़ क़ानून में कुछ कमियां हैं और वक़्फ़ बोर्ड से जुड़ी कई ईकाइयों में भ्रष्टाचार की बात को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता है. इसका प्रबंधन भी ठीक से नहीं हो रहा है."
वक्फ़ अधिनियम में प्रस्तावित 44 संशोधनों से पहले ही कई छोटे शहरों, कस्बों, ख़ासतौर पर उत्तर भारत के राज्यों में वक्फ़ बोर्ड को ख़त्म करने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन देखे जा चुके हैं.
बड़े बदलाव क्या हैं?
वक़्फ़ कोई भी चल या अचल संपत्ति होती है जिसे कोई भी व्यक्ति जो इस्लाम को मानता हैं अल्लाह के नाम पर या धार्मिक मक़सद या परोपकार के मक़सद से दान करता है.
संशोधन विधेयक के 'उद्देश्यों और कारणों' के अनुसार वक्फ़ को ऐसा कोई भी व्यक्ति संपत्ति दान दे सकता है जो कम से कम पाँच सालों से इस्लाम का पालन करता हो और जिसका संबंधित ज़मीन पर मालिकाना हक़ हो.
प्रस्तावित संशोधन के तहत अतिरिक्त कमीश्नर के पास मौजूद वक्फ़ की ज़मीन का सर्वे करने के अधिकार को वापस ले लिया गया और उनकी बजाय ये ज़िम्मेदारी अब ज़िला कलेक्टर या डिप्टी कमीश्नर को दे दी गई है.
केंद्रीय वक्फ़ परिषद और राज्य स्तर पर वक्फ़ बोर्ड में दो ग़ैर मुसलमान प्रतिनिधि रखने का प्रावधान किया गया है. नए संशोधनों के तहत बोहरा और आग़ाख़ानी समुदायों के लिए अलग वक्फ़ बोर्ड की स्थापना की भी बात कही गई है.
वक्फ़ का पंजीकरण सेंट्रल पोर्टल और डेटाबेस के ज़रिए होगा. इस पोर्टल के ज़रिए मुतवल्ली यानी वक्फ़ संपत्ति की देखरेख करने वालों को ख़ातों की जानकारी देनी होगी. इसी के साथ सालाना पाँच हज़ार रुपये से कम आय वाली संपत्ति के लिए मुतवल्ली की ओर से वक्फ़ बोर्ड को दी जाने वाली राशि को भी सात फ़ीसदी से घटाकर पाँच फ़ीसदी कर दिया गया है.
किसी संपत्ति के वक्फ़ के तहत आने या न आने का फ़ैसला लेने का वक्फ़ बोर्ड का अधिकार वापस ले लिया गया है. नए प्रस्ताव के अनुसार मौजूद तीन सदस्यों वाली वक्फ़ ट्राइब्यूनल को भी दो सदस्यों तक सीमित कर दिया गया है. लेकिन इस ट्राइब्यूनल के फ़ैसलों को अंतिम नहीं माना जाएगा और 90 दिन के भीतर ट्राइब्यूनल के फ़ैसलों को हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.
नए विधेयक में सीमा अधिनियम को लागू करने की अनिवार्यता को हटाने का प्रावधान है.
इसका मतलब है कि जिन लोगों का 12 साल से वक्फ़ की ज़मीन पर अतिक्रमण करके कब्ज़ा किया हुआ है, वे इस संशोधन के आधार पर मालिक बन सकते हैं.

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मौजूदा क़ानून में क्या कमियां हैं?

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वक्फ़ एक्ट 1995 में के रहमान ख़ान की अगुवाई वाली समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर साल 2013 में बड़े बदलाव हुए थे. उस समय इस पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) और फिर राज्यसभा की सिलेक्ट कमिटी ने विचार-विमर्श किया, संयोगवश जिसकी अगुवाई एक बीजेपी नेता कर रहे थे.
वक्फ़ बोर्ड की कार्यशैली को साफ़-सुथरा बनाने के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं के साथ ही कई वकीलों की राय भी एक समान है. सुप्रीम कोर्ट के वकील रऊफ़ रहीम इस राय को संक्षेप में बताते हैं.
रहीम ने बीबीसी से कहा, "बुनियादी तौर पर कुछ धाराओं को जोड़ने और वक्फ़ बोर्ड के भ्रष्ट सदस्यों को जेल की सलाख़ों के पीछे भेजने के अलावा मौजूदा क़ानून में किसी भी बदलाव की ज़रूरत नहीं है."
लेकिन वक्फ़ अधिनियम की वैधता को अदालतों में चुनौती देने वाले 119 याचिकाकर्ताओं ने भी इस क़ानून की ख़ामियों को रेखांकित किया है.
राजस्थान के बूंदी में रहने वाले शहज़ाद मोहम्मद शाह ने कोर्ट का दरवाज़ा इसलिए खटखटाया क्योंकि फ़कीर समुदाय की 90 बीघा ज़मीन वक्फ़ बोर्ड ने अपने कब्ज़े में ले ली.
उन्होंने कहा कि राजस्थान कोटा और बारण ज़िलों में रहने वाले उनके समुदाय के कुछ और लोगों ने भी इसी तरह की याचिकाएं अदालत में दी हैं. वह कहते हैं, "हम मध्य प्रदेश में एक मुजावर सेना के बारे में भी जानते हैं, जो वक्फ़ बोर्ड के ऐसे ही कामों से परेशान है."
मोहम्मद शाह ने कहा, "यही वजह है कि हमने हाई कोर्ट में अपनी याचिकाओं में ये कहा है कि धर्मार्थ ट्रस्टों और ट्रस्टियों के लिए समान कानून की ज़रूरत है. इसकी बजाय केंद्र और राज्य ने मनमाने ढंग से धर्म आधारित वक्फ़ अधिनियम बनाया है जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है."
शाह बीजेपी के मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सदस्य हैं. उनकी याचिका वकील अश्विनी उपाध्या की अर्ज़ी जैसी ही है.
अश्विनी उपाध्याय ने कहा, "सरकार मंदिरों से एक लाख करोड़ रुपये पाती है लेकिन किसी दरगाह या मस्जिद से नहीं. जबकि वह वक्फ़ के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को वेतन देती है. हमने याचिका में ये भी मांग की है सभी धार्मिक संपत्तियों पर फ़ैसला सिविल क़ानून से हो न कि वक्फ़ ट्राइब्यूनल के ज़रिए."
नए संशोधनों पर क्या आपत्तियां हैं?

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राज्यसभा के पूर्व उपसभापति रहमान ख़ान ने बीबीसी हिंदी को बताया, "सबसे पहले तो प्रस्तावित संशोधन ने वक्फ़ की संपत्ति के पंजीकरण के लिए एक बोझिल प्रक्रिया बनाई है. सारी ताक़त कलेक्टर या डिप्टी कमीश्नर के हाथों में दे दी गई है,जो पहले ही कई ज़िम्मेदारियों का बोझ झेल रहे हैं."
रहमान ख़ान ने कहा, "बोर्ड और सेंट्रल वक्फ़ काउंसिल में दो पद ग़ैर मुसलमानों के लिए आरक्षित करना ठीक है लेकिन क्या इसका मतलब है कि मुसलमानों को हिंदू मंदिरों के बोर्ड में भी ऐसा ही आरक्षण मिलेगा? सबसे बुरा पहलू तो वक्फ़ अधिनियम से लिमिटेशन एक्ट यानी सीमा अधिनियम के प्रावधानों को गायब करना है."
उन्होंने कहा, "इन प्रावधानों को अगर क़ानून बना दिया गया तो वक्फ़ की संपत्तियों में भारी कमी आएगी क्योंकि 99 फ़ीसदी वक्फ़ संपत्तियों पर अवैध क़ब्ज़ा है.देश के कई हिस्सों में वक्फ़ की संपत्तियों पर अतिक्रमण करने वाले, ख़ासतौर पर पंजाब और हरियाणा में अवैध रूप से कब्ज़ाई गई हज़ारों एकड़ संपत्तियों के मालिक बन जाएंगे."
पुणे के सेवानिवृत्त चीफ़ इनकम टैक्स कमीश्नर और अब एक्टिविस्ट अकरामुल जब्बार ख़ान अतिक्रमण करने वालों के वक्फ़ की संपत्तियों के मालिक बनने के मुद्दे पर रहमान ख़ान से सहमत हैं.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "इस बदलाव से रियल एस्टेट उद्योग और यहां तक कि ऐसी ज़मीनों पर कब्ज़ा करने वाले बहुत से बड़े कारोबारियों को भी फ़ायदा होगा. ऐसा लगता है कि इन संशोधनों के पीछे एकमात्र मकसद ही ये है."
लेकिन जब्बार ख़ान नए संशोधनों के कुछ सकारात्मक पहलू गिनाते हुए कहते हैं, "मुझे ख़ुशी है कि उन्होंने (केंद्र) सेंट्रल वक्फ़ काउंसिल और बोर्डों पर मुस्लिम सांसदों और विधायकों के एकाधिकार को तोड़ दिया है. वे एकाधिकारवादी बन गए थे. उन्होंने कुछ नहीं किया और आम लोगों को कोई फ़ायदा नहीं मिला. इन बोर्डों में भ्रष्टाचार भी था."
जब्बार ख़ान ने कहा, "कुल मिलाकर अगर संसद की स्टैंडिंग कमेटी नहीं बदलती है तो वक्फ़ की संपत्ति को काफ़ी नुक़सान होना तय है."
वह वक्फ़ की एक ऐसी संपत्ति का उदाहरण देते हैं, जिसे अगर ठीक से विकसित किया जाए तो न केवल कई दुकानें बन सकती हैं बल्कि बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार भी मिल सकता है. वह कहते हैं, "जब आपके पास दुकानें होती हैं, तो ऐसे व्यवसाय सभी समुदाय के लोगों को काम देने के अलावा सरकार को टैक्स भी देते हैं."
इस बीच, ऑल इंडिया सज्जदानशीन एसोसिएशन के अध्यक्ष अजमेर के सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने बीबीसी हिंदी को बताया कि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने उनके प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया है कि सरकार अलग दरगाह बोर्ड बनाने के एसोसिएशन के सुझाव पर गंभीरता से विचार करेगी.
नसीरुद्दीन चिश्ती ने कहा, "ये हमारी लंबे समय से मांग रही है. दरगाहें वक्फ़ संपत्ति की बड़ी स्टेकहोल्डर हैं. हमें उम्मीद है कि नए संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान सरकार दरगाह बोर्ड को भी इसमें शामिल करेगी."
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