भारत को लेकर जस्टिन ट्रूडो के इस रुख़ से क्या उन्हें कनाडा में फ़ायदा मिलेगा?

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- Author, सर्वप्रिया सांगवान
- पदनाम, डिजिटल वीडियो एडिटर, बीबीसी
भारत और कनाडा के बीच तनाव अपने चरम पर है. कूटनीतिक रिश्तों में बेहद खटास आ चुकी है.
मौजूदा वक़्त में दोनों देशों के बीच संबंध अपने सबसे ख़राब दौर से गुज़र रहे हैं. दोनों के बीच रिश्तों के सामान्य होने की संभावना कम दिख रही है.
इस बार बात यहां तक आ पहुंची है कि दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को निष्कासित कर दिया है.
हालांकि भारत का दावा है कि उसने अपने राजनयिक को बुला लिया है.

ये मामला जून 2023 में कनाडा के नागरिक और खालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या की घटना के बाद से शुरू हुआ है. कनाडा ने आरोप लगाया था कि भारतीय एजेंट्स ने कनाडा में निज्जर की हत्या की है.
भारत लगातार इन आरोपों को खारिज करता रहा है. लेकिन एक बार फिर कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो ने इस बात को उठाया है. लेकिन सवाल ये उठता है कि कनाडा में ऐसा क्या हो रहा है जिसकी वजह से कनाडा और भारत के रिश्ते इस हद तक आ पहुंचे हैं.
कनाडा में ट्रूडो की राजनीतिक स्थिति
इस साल अगस्त में ही पीएम जस्टिन ट्रूडो का एक वीडियो वायरल हुआ था. वे स्टील कर्मचारियों से मिल रहे थे और एक स्टील वर्कर ने उनसे हाथ मिलाने से इनकार कर दिया. वर्कर ने कहा कि नौकरी होने के बावजूद उसे गुजारा करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.
ट्रूडो ने जवाब में उन कामों की पूरी लिस्ट बताई जो उनकी लिबरल सरकार ने कामकाजी परिवारों की मदद के लिए किए हैं. लेकिन इसके बाद भी उस वर्कर ने ट्रूडो से कहा, "मुझे आपकी किसी बात पर भरोसा नहीं है और लगता है कि आप बस एक साल के लिए और हैं.”
इस क्लिप को इंटरनेट पर लाखों बार देखा गया है और टोरंटो ग्लोब एंड मेल ने इसे कनाडाई राजनीति में परफेक्ट मिनिएचर ऑफ द मोमेंट बताया यानी ये आज की स्थिति का छोटा सा लेकिन सटीक रूप है.
जब ट्रूडो कनाडा के प्रधानमंत्री बने थे, तो शुरू के कुछ सालों में वो आइकन की तरह देखे जाते थे. कई बड़ी मैगज़ीन उन्हें कवर पेज पर छाप रही थीं. लेकिन उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल के नौवें साल में उनकी अप्रूवल रेटिंग 33 फ़ीसद पर आ पहुंची है. अप्रूवल रेटिंग में उनके विपक्षी नेता पीयर पोयलिवरा आगे चल रहे हैं.

इतना ही नहीं, हाल ही में कनाडा में उपचुनाव हुए हैं, और जो टोरंटो की सीट 30 सालों से ट्रूडो की पार्टी के पास थी, उस पर विपक्षी पार्टी की जीत हुई. मॉन्ट्रियाल, जो उनका मज़बूत गढ़ माना जाता है, वहां भी उनकी पार्टी की हार उनके लिए बड़ा झटका है.
ट्रूडो की मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब खालिस्तान के समर्थक जगमीत सिंह के नेतृत्व वाली न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी ने मॉन्ट्रियाल में हार से कुछ वक्त पहले ही अपना समर्थन वापस ले लिया था.
ट्रूडो अल्पमत में सरकार चला रहे हैं, दो बार नो कॉन्फ़िडेंस मोशन से भी बच कर निकल चुके हैं, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि ये उनकी राजनीति के लिए संकट का समय है. उनकी अपनी पार्टी में भी उनके इस्तीफ़े की मांग बढ़ती जा रही है.
कोविड के बाद से ही कनाडा के नागरिकों में भी असंतोष देखने को मिल रहा है. घर खरीदना महंगा होता जा रहा है, आम चीज़ों की कीमतें आसमान छू रही हैं, अपराध ज़्यादा दिखाई देने लगे हैं और कनाडा की स्वास्थ्य सेवा खराब होती जा रही है.
हालांकि, इनमें से कई मुद्दे कनाडा की केंद्र सरकार के ज़िम्मे नहीं आते, जैसे स्वास्थ्य का मुद्दा कनाडा के प्रांतों के अंतर्गत आता है. इन सबके मद्देनज़र, ट्रूडो का भारत के प्रति ऐसा रूख होना हैरान नहीं करता क्योंकि अगले साल कनाडा में चुनाव हैं.
कनाडा में 7-8 लाख सिख लोग रहते हैं. ये कनाडा का चौथा सबसे बड़ा एथनिक ग्रुप है और राजनीतिक तौर पर कनाडा के नेताओं के लिए महत्वपूर्ण भी है.
कनाडा में सिख समुदाय
कनाडा की जनगणना के हिसाब से सिख समुदाय 1-2 फ़ीसद ही हैं लेकिन उनके पास ताकत बहुत है. उनके पास ज़मीन पर संगठन है, चंदा इकट्ठा करने का कौशल है. कनाडा के आम चुनाव में 338 सीटों पर चुनाव होता है. 170 सीटें बहुमत के लिए चाहिए होती हैं.
2021 के आम चुनाव में ट्रूडो की लिबरल पार्टी को 157 सीटें जीती थी और कंजरवेटिव पार्टी को 121 सीटें मिली थीं.
जगमीत सिंह की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी 24 सीटें हासिल कर पाई थी. उन्होंने ट्रूडो को समर्थन दिया और ट्रूडो सरकार बना गए. सिख समुदाय का लगभग 23-24 सीटों पर प्रभाव है और पिछले चुनावों से ज़ाहिर है कि ये सीटें महत्वपूर्ण हैं.
2015 में जब ट्रूडो पीएम बने थे, उस चुनाव में 17 सिख सांसद बने थे.

ट्रूडो ने तब एक इवेंट में बयान भी दिया था कि उनकी कैबिनेट में नरेंद्र मोदी से ज़्यादा सिख हैं. लेकिन, उसके बाद से कई ऐसी घटनाएं हुई जिससे भारत और कनाडा के बीच तनावपूर्ण स्थितियां पैदा होने लगीं. जैसे कि 2018 में जब ट्रूडो भारत आए थे तो कनाडा एंबेसी ने उनके साथ डिनर के लिए जसपाल अटवाल को आमंत्रित कर लिया. अटवाल 1986 में एक भारतीय कैबिनेट मंत्री की हत्या के प्रयास के दोषी पाए गए थे.
भले ही बाद में ये निमंत्रण रद्द कर दिया गया था लेकिन भारत की नाराज़गी बढ़ गई. फिर 2023 में नई दिल्ली में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कनाडा में चरमपंथी तत्वों की भारत विरोधी गतिविधियों को जारी रखने पर चिंता व्यक्त की थी. इसके बाद हरदीप निज्जर की हत्या के बाद जस्टिन ट्रूडो ने अपनी संसद में निज्जर की हत्या में भारत के एजेंट्स के शामिल होने का आरोप लगाया .
भारत ने ट्रूडो के आरोपों को बेतुका बताते हुए ख़ारिज कर दिया था और कनाडा के खालिस्तान समर्थक सिखों का केंद्र बन जाने पर चिंता व्यक्त की थी. और अब बात यहां तक आ पहुंची है. ये देखना दिलचस्प होगा कि कनाडा के अगले चुनावों तक ट्रूडो इस पूरे विवाद को कैसे डील कर पाएंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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