Gaza: ग़ज़ा पर किसका अधिकार है? क्या Trump इस पर कब्ज़ा कर सकते हैं. 5 Points में समझिए

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- Author, एथर शालाबी
- पदनाम, बीबीसी अरबी
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार, चार फ़रवरी को ग़ज़ा पट्टी पर अमेरिकी नियंत्रण का प्रस्ताव रखा. ट्रंप ने कहा कि उनका देश 'ग़ज़ा पट्टी में काम करेगा.'
उनके सुझावों में ग़ज़ा पट्टी का पुनर्विकास करना और इसे 'मध्य पूर्व का रिविएरा (छुट्टी बिताने वाली ख़ूबसूरत जगह)' में बदलना शामिल है. इससे पहले ट्रंप ने कहा था कि फ़लस्तीनियों को मिस्र और जॉर्डन में स्थायी रूप से 'बसाया' जाए.
ट्रंप व्हाइट हाउस में इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू से मीटिंग के बाद बोल रहे थे, जहां नेतन्याहू ने ट्रंप के सुझाव को 'ध्यान देने योग्य' बताया और कहा, "यह ऐसी सोच है जो मध्य पूर्व को नया आकार देगी और शांति लाएगी."
हालांकि दुनिया भर के कई नेताओं ने इसकी निंदा की है. इसमें ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर भी शामिल हैं. ऐसे में ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या इससे भूमध्य सागर के तट पर बसी इस पट्टी को लेकर नया तनाव पैदा हो सकता है.

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अभी ग़ज़ा पर किसका नियंत्रण है?

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साल 2007 से ग़ज़ा पर हमास का स्वाभाविक शासन रहा है. हमास ने पिछले साल अपने कब्ज़े वाले क्षेत्रों में संसदीय चुनाव जीता और ग़ज़ा में खुद को मज़बूत किया.
ग़ज़ा पट्टी पर हमास का नियंत्रण है, जिसे इसराइल, अमेरिका और कुछ अन्य पश्चिमी सरकार चरमपंथी संगठन मानते हैं.
ग़ज़ा भूमध्य सागर के तट पर स्थित 41 किलोमीटर लंबी और 10 किलोमीटर चौड़ी पट्टी है. इसकी सीमाएं मिस्र और इसराइल से लगती हैं.
ग़ज़ा को लेकर हमास और इसराइल के बीच कई बड़े संघर्ष हुए हैं. लड़ाई के हर दौर में दोनों पक्षों के भारी संख्या में लोग मारे गए जिनमें अधिकांश ग़ज़ा के फ़लस्तीनी थे.
7 अक्टूबर 2023 को, हमास के लड़ाकों ने ग़ज़ा से इसराइल पर हमला किया था, जिसमें लगभग 1,200 इसराइली मारे गए और 250 से अधिक इसराइलियों को उन्होंने बंधक बना लिया. इसके बाद इसराइली सेना ने ग़ज़ा में बड़े पैमाने पर हमला किया, जो लगातार 15 महीने तक चला.
हमास संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इसराइली हमले में 47,540 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें से ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं.
कई महीनों की मध्यस्थों के ज़रिए हुई वार्ता के बाद जनवरी 2025 में, इसराइल और हमास ने युद्ध विराम समझौते पर सहमति जताई.
इस समझौते का मक़सद लड़ाई को स्थायी रूप से ख़त्म करना और इसराइल द्वारा पकड़े गए फ़लस्तीनी कैदियों के बदले में ग़ज़ा में हमास द्वारा बंधक बनाए गए लोगों को छोड़ना है.

क्या ट्रंप ग़ज़ा पट्टी पर कब्ज़ा कर सकते हैं?

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इस बारे में कोई जानकारी सामने नहीं आई है कि ट्रंप ने ग़ज़ा पर अमेरिकी नियंत्रण का प्रस्ताव कैसे रखा है.
हालांकि, ट्रंप के इस प्रस्ताव की वैश्विक निंदा हुई है. ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया, रूस और चीन सहित कई देशों ने इस योजना को ख़ारिज़ किया है.
खाड़ी क्षेत्र में, सऊदी अरब ने फ़लस्तीनियों को बेदख़ल करने की किसी भी कोशिश को ख़ारिज़ करते हुए अपना रुख़ साफ़ कर दिया है. जॉर्डन और मिस्र भी 'फ़लस्तीनियों के विस्थापन' के ख़िलाफ़ हैं.
अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत, किसी आबादी को जबरन बेदख़ल करने के प्रयासों पर सख़्त प्रतिबंध है. फ़लस्तीनियों के साथ-साथ अरब देश भी इसे फ़लस्तीनियों का निष्कासन और उनकी ज़मीन से नस्लीय जनसंहार ही मानेंगे.
घरेलू स्तर पर, अमेरिका में ट्रंप के चुनाव से पहले विदेशी संघर्षों में शामिल होने के मुद्दे पर कोई ख़ास जोर नहीं दिख रहा था. ट्रंप के समर्थकों के लिए अर्थव्यवस्था और आप्रवासन मुख्य मुद्दे थे.
अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए मतदान से पहले जारी किए गए 'इप्सोस' और 'यूगोव' पोल से पता चला था कि अमेरिकी चाहते थे कि सरकार महंगाई पर ध्यान दे.

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यह साफ़ नहीं है कि ग़ज़ा पर नियंत्रण को लेकर वहां अमेरिकी सैनिकों को भेजना शामिल होगा या नहीं.
जब पूछा गया कि क्या ग़ज़ा को अमेरिका के नियंत्रण में लेने के प्रस्ताव में अमेरिकी सैनिक शामिल होंगे, तो ट्रंप ने कहा, "हम वही करेंगे जो ज़रूरी होगा."
संवैधानिक रूप से सैन्य बल के इस्तेमाल को अधिकृत करने वाले प्रस्तावों पर अमेरिकी कांग्रेस से मंजूरी लेनी होती है.
अमेरिका के दोनों सदनों में सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है. विदेशी हथियारों की बिक्री के लिए कांग्रेस की मंजूरी की ज़रूरत होती है, जिसमें विदेश विभाग आगे बढ़ने से पहले प्रमुख समितियों को सूचित करता है.
वॉशिंगटन के मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में प्रोफ़ेसर हसन नीमनेह ने बीबीसी को बताया कि "ट्रंप को कांग्रेस के बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उनके पास मजबूत समर्थन है."
ट्रंप ने ग़ज़ा के पुनर्विकास पर बड़े पैमाने पर खर्च के विवरण के बारे में बात नहीं की.
हसन नीमनेह के मुताबिक़, ट्रंप का प्रस्ताव अभी भी 'अस्पष्ट' है. साथ ही, उनका मानना है कि ट्रंप का मकसद, ग़ज़ा और वेस्ट बैंक के पुनर्निर्माण के लिए अरब देशों के धन का इस्तेमाल करना है.

ऐतिहासिक रूप से किसकी है ग़ज़ा पट्टी?

1948 में इसराइल की स्थापना से पहले, ग़ज़ा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन था. इसराइल ने जब अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, इसके अगले दिन इस पर पांच अरब देशों की सेनाओं ने हमला किया और उसे घेर लिया.
1949 में युद्धविराम के साथ लड़ाई खत्म होने तक, इसराइल ने अधिकांश क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था. वहीं समझौतों के तहत मिस्र ने ग़ज़ा पट्टी पर कब्ज़ा किया, जॉर्डन ने वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम पर कब्ज़ा किया, जबकि इसराइल ने पश्चिमी यरूशलम को अपने कब्ज़े में ले लिया.
1967 के युद्ध में मिस्र को ग़ज़ा से बाहर निकाल कर, इस पर इसराइल ने कब्ज़ा कर लिया, जिसने यहूदी कॉलोनियां बसाईं और ग़ज़ा की फ़लस्तीनी आबादी को मिलिटरी शासन के अधीन कर दिया.
साल 2005 में, इसराइल ने ग़ज़ा से अपने सैनिकों और वहां बसने वालों को वापस बुला लिया, हालांकि इसने साझा सीमा, हवाई क्षेत्र और तटीय क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाए रखा, जिससे उसे, लोगों और सामानों की आवाजाही पर प्रभावी नियंत्रण मिला.
इस नियंत्रण के कारण ही संयुक्त राष्ट्र अभी भी ग़ज़ा को इसराइल के कब्ज़े वाला क्षेत्र मानता है.
हमास ने 2006 में फ़लस्तीनी चुनाव जीता और अगले साल भीषण लड़ाई के बाद अपने प्रतिद्वंद्वियों को इस क्षेत्र से बाहर निकाल दिया.
इसके जवाब में इसराइल और मिस्र ने नाकाबंदी कर दी. इसराइल ने क्षेत्र में आने वाली अधिकांश चीज़ों पर निगरानी लागू कर दी.
इसके बाद के वर्षों में, हमास और इसराइल के बीच कई बड़े संघर्ष हुए - जिनमें 2008-09, 2012 और 2014 के संघर्ष शामिल हैं. मई 2021 में दोनों पक्षों के बीच एक बड़ा संघर्ष हुआ था, जो 11 दिनों के बाद युद्ध विराम में समाप्त हुआ.

क्या ग़ज़ा में गैस और तेल है?

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संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी क्षेत्रों में तेल और गैस के संभावित भंडार हैं. साल 2019 में, संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास संगठन (यूएनसीटीएडी) ने एक रिपोर्ट जारी की थी.
इसके मुताबिक़, वहां 3 अरब बैरल से अधिक तेल होने का अनुमान है.
इस रिपोर्ट में बताया गया, "भूवैज्ञानिकों और प्राकृतिक संसाधन अर्थशास्त्रियों ने पुष्टि की है कि कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी क्षेत्र में तेल और प्राकृतिक गैस संपदा के बड़े भंडार हैं- कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक के एरिया सी में और ग़ज़ा पट्टी के भूमध्य सागर तट के समुद्री इलाक़े में."
इसमें लेवैंट बेसिन में तेल और नेचुरल गैस की नई खोजों की ओर इशारा किया गया है. यह बेसिन भूमध्यसागर में है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें 122 ट्रिलियन क्यूबिक फ़ीट नेचुरल गैस है जिसकी क़ीमत 453 अरब डॉलर (2017 की क़ीमतों के आधार पर) है. इसके अलावा यहां 1.7 अरब बैरल तेल है जिसका कुल मूल्य 71 अरब डॉलर है.
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का प्रस्ताव ग़ज़ा से तेल और गैस संसाधनों को निकालने से जुड़ा हो सकता है. हालांकि, अन्य लोगों का तर्क है कि ग़ज़ा में दिलचस्पी आर्थिक से अधिक राजनीतिक है.
ऊर्जा नीति विशेषज्ञ और मध्य पूर्व में ऊर्जा की भूराजनीति की जानकार लॉरी हेतायन ने बीबीसी को बताया कि 2000 के दशक में ग़ज़ा के समुद्री इलाक़ों में तेल और गैस की खोज की गई थी और इस क्षेत्र को विकसित करने के बारे में बातचीत हुई थी.
वह कहती हैं कि यह "उन कारकों में से एक हो सकता है" जो ट्रंप ने ग़ज़ा पर नियंत्रण का सुझाव देते समय ध्यान में रखा हो, लेकिन यह एकमात्र कारण नहीं है.
वो कहती हैं, "ग़ज़ा में तेल और गैस की मात्रा का सही से आकलन करने के लिए और अधिक काम किए जाने की ज़रूरत है."
ग़ज़ा से एक आर्थिक विशेषज्ञ माहेर ताबा कहते हैं, "ट्रंप के पास खाड़ी और ऐसे देश हैं जो ग़ज़ा की तुलना में गैस और तेल के मामले में अधिक समृद्ध हैं. ग़ज़ा पर उनका ध्यान राजनीतिक अधिक है".
बीबीसी से बात करते हुए इसराइल में अमेरिका के पूर्व राजदूत ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ग़ज़ा में संकट को "रियल एस्टेट निर्माण की समस्या" के रूप में देख रहे हैं.
डेनिस रॉस कहते हैं, "मुझे ऐसा लगता है कि उनका इरादा कुछ इस तरह का है कि- हम एक ऐसे क्षेत्र को बदलने जा रहे हैं जो हमेशा से ग़रीब रहा है."

ट्रंप की घोषणा पर फ़लस्तीनी क्या कह रहे हैं?
फ़लस्तीनी मानते हैं कि ट्रंप का प्रस्ताव उन्हें उनकी ज़मीन से सीधे बेदख़ल कर देना है.
फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने ट्रंप के प्रस्ताव को "अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन" बताया है. उन्होंने ग़ज़ा से फ़लस्तीनियों को निकालने की किसी भी योजना का विरोध किया है.
उन्होंने कहा, "हम अपने लोगों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होने देंगे, जिसके लिए हमने दशकों तक संघर्ष किया है और महान बलिदान दिए हैं."
संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीनी प्रतिनिधिमंडल के नेता रियाद मंसूर ने कहा, "जो लोग फ़लस्तीनी लोगों को एक 'अच्छी जगह' पर भेजना चाहते हैं, वो उन्हें उनके मूल घरों में वापस जाने की मंजूरी दें, जो अब इसराइल है."
वहीं ग़ज़ा पट्टी में आम फ़लस्तीनी ट्रंप के प्रस्ताव को सज़ा बता रहे हैं.
ग़ज़ा में 43 साल के महमूद अलमासरी ने बीबीसी को बताया कि ट्रंप के सुझाव से ग़ज़ा में एक भी व्यक्ति सहमत नहीं है.
वो सवाल करते हैं, "भले ही हम मलबे के बीच ही क्यों न रहें, हम अपने घरों से कभी बाहर नहीं निकलेंगे. क्या ट्रंप चाहेंगे कि कोई अमेरिकियों से कहे कि वे चले जाएं और कहीं स्थायी रूप से बस जाएं?"
28 साल की सनाबेल अलघूल ट्रंप के प्रस्तावों को बेहद ख़तरनाक़ बताती हैं.
वो कहती हैं, "उनका (ट्रंप का) मानना है कि हम जिस दर्द, भुखमरी, विनाश और मौत का सामना कर रहे हैं, वह हमें ग़ज़ा में अपने अधिकार को आसानी से छोड़ने के लिए मजबूर करेगा."
फ़लस्तीनी वकील यूसेफ़ अलहदाद ने बीबीसी को बताया कि ट्रंप ग़ज़ा के पुनर्निर्माण के विचार का इस्तेमाल "दबाव के हथियार" के रूप में कर रहे हैं, जिसका मकसद "ग़ज़ा के लोगों को उनकी ज़मीन छोड़ने के लिए मजबूर करना" है.
उन्होंने इसे "दुर्भावना से भरा" बताया.
नेविन अब्देलाल जैसे कुछ फ़लस्तीनियों का कहना है कि वे चाहते हैं कि पुनर्विकास की योजना "फ़लस्तीनी हाथों" में रहे.
उन्होंने कहा कि जब तक पुनर्विकास पूरा नहीं हो जाता, ग़ज़ा के लोग "पट्टी में मौजूद बेहतर जगहों पर जा सकते हैं, लेकिन किसी को भी ये जगह नहीं छोड़नी चाहिए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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