ट्रंप ने ग़ज़ा के बारे में जो बात कही, क्या वह मुमकिन है और इस पर मध्य-पूर्व के देश क्या कह रहे हैं?

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के साथ एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस की, जिसमें उन्होंने ग़ज़ा पर अमेरिका के नियंत्रण होने से जुड़ा चौंकाने वाला प्रस्ताव पेश किया.
उन्होंने कहा, "फ़लस्तीन के लोग केवल इसलिए ग़ज़ा वापस जाना चाहते हैं क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है." ट्रंप ने ग़ज़ा को एक ऐसी जगह बताया जहां सबकुछ ध्वस्त हो चुका है.
ट्रंप ने ये प्रस्ताव भी दिया है कि ग़ज़ा का पुनर्निमाण होने तक यहां के बाशिंदों को दूसरी जगहों पर भेज देना चाहिए. हालांकि, मध्य पूर्व के देशों ने ट्रंप के इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है.
दूसरी बार संभाल रहे ट्रंप के इस कार्यकाल में अमेरिका का दौरा करने वाले पहले विदेशी नेता नेतन्याहू हैं.
संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीनी राजदूत ने कहा है कि उनके लोग ग़ज़ा में अपने घरों में लौटना चाहते हैं. वहीं हमास ने ट्रंप की इस योजना को 'बेतुका' बताया है.

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ट्रंप ने क्या-क्या कहा?

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति के तौर पर अपने दूसरे कार्यकाल में पहले विदेशी मेहमान बनने के लिए बिन्यामिन नेतन्याहू को शुक्रिया कहते हुए अपनी बात शुरू की.
ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन को ये कहते हुए निशाने पर लिया कि उन्होंने अपने चार साल के कार्यकाल में इसराइल के दुश्मनों को मज़बूत होने दिया.
चंद मिनटों बाद ट्रंप ने ये कहना शुरू किया कि ग़ज़ा में रहने वाले 18 लाख लोगों को दूसरे अरब देशों में भेज देना चाहिए, ताकि अमेरिका ग़ज़ा पर नियंत्रण करे और इस बर्बाद हो चुके फ़लस्तीनी क्षेत्र को फिर से बनाए.
ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ग़ज़ा पट्टी को नियंत्रण में लेकर यहां से ज़िंदा बमों को हटाकर, पुनर्निमाण करके और अर्थव्यवस्था को गति देकर सच्चा काम कर सकते हैं.
उन्होंने ये भी कहा कि हम पहले जैसी स्थिति में वापस नहीं जा सकते वरना इतिहास खुद को दोहराएगा.
ट्रंप से पूछा गया कि क्या 18 लाख फ़लस्तीनियों को उनके स्थान से हटाने वाली उनकी योजना में भविष्य में ग़ज़ा के लोगों के पुनर्वास को भी शामिल किया गया है.
रिपोर्टर ने उनसे पूछा, "आप ग़ज़ा में किसे रहते हुए देखते हैं?"
ट्रंप ने सवाल को टालते हुए कहा, "वहां रहने वाले लोग. दुनिया के लोग."
रिपोर्टर ने उनसे पूछा क्या इन लोगों में फ़लस्तीनी भी शामिल हैं तो ट्रंप ने हां में जवाब दिया.
उन्होंने कहा, "मैं क्यूट नहीं बनना चाहता. मैं कोई महान आदमी नहीं बनना चाहता लेकिन ये (ग़ज़ा) मध्य-पूर्व के सबसे शानदार इलाकों में होगा."
ट्रंप से ये भी पूछा गया कि क्या उनके इस ताज़ा रुख़ के मायने ये हैं कि वो इसराइल और फ़लस्तीन के विवाद को सुलझाने के लिए 'दो राष्ट्र सिद्धांत' के ख़िलाफ़ हैं.
ट्रंप ने जवाब दिया, "इसका दो राष्ट्र या एक राष्ट्र या किसी भी राष्ट्र से कोई मतलब नहीं है."
उन्होंने ग़ज़ा पट्टी की तुलना नरक से करते हुए कहा, "यहां लोगों को कभी जीने का मौका नहीं मिला."
ट्रंप से पूछा गया कि भविष्य में ग़ज़ा पर अमेरिका का स्वामित्व होगा.
एक रिपोर्टर ने राष्ट्रपति से पूछा, "क्या आप किसी संप्रभु क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की बात कर रहे हैं?"
ट्रंप ने कहा, "हां". वह अमेरिका की अगुवाई में लंबे समय तक ये नियंत्रण करने की कल्पना कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "उस ज़मीन के टुकड़े पर अधिकार पाना, उसका विकास करना, हज़ारों नौकरियां पैदा करना. ये वाकई शानदार होगा. हर कोई इस विचार को पसंद करता है."

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मध्य पूर्व के देशों में कैसी प्रतिक्रिया?

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ट्रंप का कहना है कि वो ग़ज़ा को ऐसी जगह बनाने के पक्षधर हैं जहां रोज़गार के अवसरों की भरमार होगी और जहां फ़लस्तीनियों समेत दुनियारभर के लोग आकर बसें.
उनका ये भी कहना है कि उनके इस विचार को व्यापक समर्थन हासिल है. हालांकि, मध्य-पूर्वी क्षेत्र में ऐसे संकेत नहीं मिलते. मिस्र, जॉर्डर और सऊदी अरब ने तो ट्रंप की इस योजना की खुलकर आलोचना की है.
ट्रंप के ग़ज़ा पर नियंत्रण की बात कहने के बाद सऊदी अरब ने एक बार फिर अपने रुख को दोहराते हुए कहा है कि वो फ़लस्तीनी राष्ट्र के गठन के बिना इसराइल के साथ संबंध नहीं विकसित करेगा.
नेतन्याहू के साथ ट्रंप की प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करते हुए कहा, "ये रुख दृढ़ और अटल" है.
सऊदी के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ये 'कोई मोलभाव का मुद्दा' नहीं है.
हालांकि, ट्रंप ने तकरीबन 10 दिन पहले से ही ग़ज़ा पर बयान देने शुरू कर दिए थे. उन्होंने कहा था कि फ़लस्तीनियों को ग़ज़ा से पड़ोसी मुल्क मिस्र और जॉर्डन भेज देना चाहिए.
मिस्र, जॉर्डर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, फ़लस्तीनी प्राधिकरण और अरब लीग ने एक साझा बयान जारी करते हुए ट्रंप की इस योजना को ख़ारिज कर दिया था.
अरब देशों के बयान में ये चेताया गया कि इस तरह की योजना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए ख़तरा पैदा करेंगी और संघर्ष के बढ़ने का जोख़िम भी बढ़ाएंगे.
ग़ज़ा के लोगों को दोबारा उनके घरों में बसाने की बजाए उनके पुनर्वास के बारे में ट्रंप के बयान की फ़लस्तीनी गुट हमास ने भी आलोचना की है.
हमास के प्रवक्ता समी अबु ज़ुहरी ने कई मीडिया आउटलेट्स से बातचीत में कहा, "ट्रंप का विचार इस क्षेत्र में अफ़रा-तफ़री और तनाव बढ़ाने का ज़रिया है. ग़ज़ा में हमारे लोग इस तरह की योजनाओं को पास नहीं होने देंगे. जिसकी ज़रूरत है वो ये कि यहां के लोगों की ज़मीन से कब्ज़ा और उनपर आक्रामकता का अंत हो, न कि उन्हें उनकी ही ज़मीन से बेदखल कर दिया जाए."
वहीं फ़लस्तीनी प्रशासन के संयुक्त राष्ट्र में राजदूत रियाद मंसूर ने ट्रंप की योजना पर कहा, "जो लोग उन्हें (फ़लस्तीनियों)खुशहाल, अच्छी जगह भेजना चाहते हैं, वे उन्हें इसराइल के अंदर उनके मूल निवासों तक जाने दें."
उन्होंने कहा, "हमारी मातृभूमि हमारी है. वो ग़ज़ा का पुनर्निमाण चाहते हैं, जहां फिर से स्कूल हो, अस्पताल हों, बुनियादी सुविधाएं हों...क्योंकि उनका यहीं से नाता है और वो यहां रहना पसंद करते हैं. मुझे लगता है कि नेताओं को फ़लस्तीनी लोगों की इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए."

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क्या कह रहे हैं जानकार?

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ब्रायन कैटुलिस मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के यूएस फॉरेन पॉलिसी में सीनियर फेलो हैं. उनका मानना है कि ट्रंप की ओर से ग़ज़ा पर नियंत्रण की बातें सिर्फ़ ऐसे ही कही जा रही हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति के पास वास्तव में इसकी कोई योजना नहीं है.
कैटुलिस ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "मुझे लगता है कि वह (ट्रंप) सिर्फ़ कोरी बातें कर रहे हैं. ये लगभग तय है कि इसके पीछे कोई योजना नहीं है."
उन्होंने कहा, "और अगर कोई प्लान है भी तो ये ऐसी योजना नहीं है जिसका वर्तमान के मध्य-पूर्व की हक़ीकत से कोई नाता हो और पक्के तौर पर ये फ़लस्तीनियों और मिस्र-जॉर्डन जैसे पड़ोसी देशों से विचार-विमर्श के बिना ही तैयार की गई है."
कैटुलिस ने कहते हैं कि ट्रंप उकसाऊ बयानों से सबका ध्यान खींचना चाहते हैं और ऐसे बयान वो अपने पहले कार्यकाल में भी देते रहे हैं.
बीबीसी के डिप्लोमैटिक संवाददाता पॉल ऐडम्स ने दो राष्ट्र सिद्धांत पर ट्रंप के बयान का ज़िक्र करते हुए लिखा है, "ट्रंप कहते हैं कि उन्हें दो राष्ट्र सिद्धांत से कोई लेना-देना नहीं है."
"क्या उनका बयान गंभीर है? बात ट्रंप की है तो ये कहना मुश्किल है. लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में भी अमेरिका की मध्य-पूर्व को लेकर दशकों से चली आ रही नीति को पलट दिया. था. और अब वो फिर से शायद वैसा ही करने जा रहे हैं."
क्या ट्रंप ग़ज़ा पर नियंत्रण कर के रहेंगे?

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अमेरिकी विदेश मंत्रालय से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग करने वाले बीबीसी संवाददाता टॉम बेटमैन का मानना है कि ट्रंप ने ग़ज़ा के बारे में जो प्रस्ताव दिया है वह उसको लेकर गंभीर सुनाई पड़ते हैं.
एक विश्लेषण में बेटमैन लिखते हैं, "जब दस दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग़ज़ा को एक ध्वस्त जगह बताना शुरू किया था और उसे साफ़ करने की बात कही थी, तब ये स्पष्ट नहीं था कि उनकी ये बातें कितनी दूर तक जाएंगी. लेकिन इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू के अमेरिकी दौरे पर ट्रंप ने जो कहा है, उससे स्पष्ट हो गया है कि वो अपने प्रस्ताव के बारे में बेहद गंभीर हैं."
उनका कहना है कि ट्रंप का प्रस्ताव, "इसराइल और फ़लस्तीन के संघर्ष के इतिहास पर अमेरिका के स्थापित रुख में सबसे बड़ा बदलाव होगा. साथ ही ये अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को भी नज़रअंदाज़ करता है."
टॉम बेटमैन की माने तो ये घोषणा ग़ज़ा में रहने वाले आम लोगों पर किस तरह का प्रभाव करेगी, ये भी मायने रखता है. इससे फिलहाल इसराइल और हमास के बीच जारी संघर्षविराम पर भी असर हो सकता है और ये बंधकों की रिहाई की प्रक्रिया को भी जटिल स्थिति में डाल सकता है.
अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत किसी जगह की आबादी को जबरन कहीं और भेजना प्रतिबंधित है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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