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सड़क पर नमाज़ और पूजा जुलूस को लेकर पुलिस के रवैये में फ़र्क़ क्यों- ब्लॉग
- Author, नासिरूद्दीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
दिल्ली के इंद्रलोक में सजदे में झुके इंसान को पुलिसकर्मी ने ठीक उसी अंदाज़ में किक किया था जैसे कि फुटबॉल को मारते हैं.
फ़र्क़ इतना था कि फुटबॉल की जगह इंसान का बदन था, जो इबादत कर रहा था.
किक तो एक या दो लोगों को लगा लेकिन धक्के कइयों ने खाए. इसकी तस्वीर के वायरल होने के बाद दिल्ली पुलिस ने ज़िम्मेदार पुलिस वाले पर कार्रवाई कर एक बेहतर संदेश ज़रूर दिया.
लेकिन ये पूरा वाक़या किसी भी सभ्य समाज को कमतर करने के लिए काफ़ी था.
ग़लती क्या थी… मस्जिद में जगह नहीं थी तो अनेक लोग सड़क के किनारे नमाज़ के लिए बैठ गए. मुमकिन है, पहले भी ऐसा हुआ हो. इन्हें रोका भी गया हो.
मगर रोकने का यह तरीक़ा काफ़ी वायरल हो गया. वजह साफ़ थी- इंसान से इंसान का सुलूक कैसे होगा?
अगर सड़क पर नमाज़ पढ़ना ग़लत है तो उस ग़लत काम को रोकने का तरीक़ा क्या यही होगा?
नमाज़ में खड़े लोगों को धकियाना, गिराना, सजदे में बैठे लोगों को ठोकर मारना…यह तो छोटे से वीडियो में जो दिख रहा था उसकी झलक है.
नमाज़ और अज़ान पिछले दिनों काफ़ी विवाद का मुद्दा रहे हैं. मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रती अभियान का भी यह आधार रहा है.
पिछले साल इसी रमज़ान के दौरान कई जगहों पर नमाज़ को लेकर विवाद हुआ था. कई जगह रमज़ान के दौरान पढ़ी जाने वाली विशेष नमाज़ तरावीह पर लोगों ने एतराज़ किया.
मगर सवाल है कि किन्हें और क्यों इबादत से एतराज़ है?
अफ़वाह और नफ़रत के बीच बँटा समाज
देश में मुसलमानों के बारे में पिछले दिनों अफ़वाहों की तरह बातें ज़्यादा होने लगी हैं.
सोशल मीडिया और ख़ासकर व्हाट्सऐप जैसे मंच मुसलमानों के ख़िलाफ़ प्रचार में ख़ूब इस्तेमाल हो रहे हैं.
मुसलमानों के बारे में समाज के बड़े तबके में नफ़रत अब आम विचार की तरह पसरता जा रहा है.
ख़ास तौर पर हिन्दू और मुसलमानों के बीच दूरी बढ़ाने या नफ़रत की खाई चौड़ी करने के लिए मीडिया और ख़ासकर सोशल मीडिया पर कुछ न कुछ लगातार चलता रहता है.
इसमें मीडिया की भूमिका भी काफ़ी अहम है.
मीडिया पर होने वाली बहसें दूरी पाटने या नफ़रत की खाई को कम करने का काम नहीं करतीं बल्कि वे तो समुदायों के बीच अफ़वाह को और विस्तार देती हुई देखी जा सकती हैं.
संविधान के रक्षकों पर भी पड़ा है असर
सवाल है, जिनके हाथ में क़ानून की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी है, उनका व्यवहार ऐसा क्यों है? इन सबसे हमारे समाज का हर तबका प्रभावित हुआ है.
इसमें पढ़े-लिखे या बुद्धिजीवी माने जाने वाले लोग भी शामिल हैं. इसलिए इसके असर से किसी वर्दी वाले का बचा रहना कैसे मुमकिन है.
हालाँकि, वर्दी वाले ने जो शपथ ली है, वह संविधान को बचाने की है. सड़क पर वह राज्य का प्रतिनिधि है और संविधान के मूल्यों की हिफ़ाज़त उसका धर्म.
मगर जब वह वर्दी पहनकर किसी को इबादत के दौरान ठोकर मारता है, तो देखने की बात है कि क्या यह महज प्रशासनिक ठोकर है या इससे इतर भी कुछ है.
अगर यह प्रशासनिक किक या ठोकर है तो सब पर एक जैसा चलेगा. हालाँकि, अगर यह चयनित तौर पर कुछ लोगों के ख़िलाफ़ उठता है तो यह नफ़रती क़दम है.
दिल्ली में जो हुआ, वह प्रशासनिक ठोकर नहीं दिखता. अगर प्रशासनिक ठोकर होता तो वह सबको ऐसा ही दिखता. मगर ऐसा हुआ नहीं.
कुछ लोगों ने किक को सही ठहराया. बल्कि वे उस पुलिस वाले के पक्ष में दलील देते देखे गए. बल्कि यहाँ तक कहते पाए गए कि जो किया सो सही किया.
इसका मतलब है कि वह किक कुछ संदेश दे रहा है. संदेश भी तीन तरह के हैं. एक, जिन्हें किक मारा गया उनके सम्मान को भी ठोकर मारी गई.
जिन्होंने देखा और अपने को इस घटना से जोड़ा. उन्हें भी यह कहीं न कहीं बुरा लगा या सम्मान को ठेस पहुँचाने वाला लगा.
लेकिन एक तीसरा तबका भी है, जिसे इस ठोकर में किसी के अपमान का मज़ा दिखा. इसीलिए यह कहना बेमानी है कि पुलिस वाला महज अपनी ड्यूटी निभा रहा था.
यह ड्यूटी के दौरान की कार्रवाई है. सवाल है, उसकी यह ड्यूटी किस तरह का संदेश दे रही है.
एक और महत्वपूर्ण बात है कि क़ानून व्यवस्था का पालन कराने का यह कौन सा तरीक़ा है?
किसी को इस तरह पैर से ठोकर मारना, मानवीय तरीका नहीं है. यह मानवाधिकार के दायरे में नहीं आता है.
सड़क पर नमाज़ और पूजा
इस तर्क में दम है कि सड़क पर नमाज़ नहीं पढ़नी चाहिए. सड़क पर आने-जाने में असुविधा होती है. मगर सड़क पर आमतौर पर रोज़ाना नमाज़ नहीं पढ़ी जाती है.
नमाज़ रोज़ाना पाँच वक़्त होती है. रोज़ाना के नमाज़ और शुक्रवार यानी जुमे की नमाज़ में फ़र्क़ होता है.
अनेक लोग हफ़्ते में एक दिन जुमे के रोज़ ख़ास नमाज़ पढ़ते हैं. इसलिए उस दिन बहुत ज़्यादा भीड़ होती है.
ठीक उसी तरह जैसे बहुत सारे लोग मंगलवार या शनिवार को ख़ास पूजा करने मंदिरों में जाते हैं. उस दिन मंदिरों में और आसपास काफ़ी भीड़ होती है.
कई मौक़ों पर विशेष पंडाल लगते हैं. भंडारा लगता है. बड़े-बड़े जुलूस निकलते हैं. रास्ते रोके और बदले जाते हैं. आना-जाना दुश्वार होता है. परेशानी होती है.
मगर हम इसी के साथ जीते हैं. पुलिस तब कैसी व्यवस्था में लगी रहती है.
क्या हमें उस दिन यानी मंगलवार या शनिवार या विशेष पूजा के दिन लगने वाली भीड़ से यह लगता है कि सड़क पर किसी ने कब्ज़ा कर लिया है?
या तब हमारी प्रतिक्रिया किस तरह की होती है? पुलिस किस तरह व्यवहार करती है?
जिस दिन दिल्ली में जुमे के दौरान यह घटना हुई, उस दिन महाशिवरात्रि के मौक़े पर कई जगह जुलूस निकले थे.
क्या कहीं से क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसी किसी घटना की जानकारी मिलती है. बल्कि ज़्यादातर जगहों पर तो पुलिस के सहयोग से ही जुलूस निकले होंगे.
विशेष इंतज़ाम किए जाएं
विशेष दिनों की पूजा-अर्चना या नमाज़ के लिए विशेष व्यवस्था होनी ज़रूरी है. इन दिनों में भीड़ रोज़ाना से ज़्यादा होगी, यह भी तय है. नमाज़ घंटों या दिन भर चलने वाली प्रक्रिया नहीं है. ज़्यादा से ज़्यादा से दस-पंद्रह मिनट.
कई मस्जिदों ने भीड़ को देखते हुए कई दौर में नमाज़ शुरू कर दी है. मगर शहरों में जहाँ इंसान की तुलना में मंदिरों-मस्जिदों में जगह नहीं है, वहाँ तो भीड़ बढ़ रही है.
सवाल है, इस भीड़ को काबू में कैसा रखा जाए. यही नहीं, पूजा करने वाले हों या नमाज़ी दोनों के साथ एक जैसा सुलूक कैसे किया जाए.
कोई नियम बने तो सब पर एक जैसे कैसे लागू हों ताकि किसी को यह न लगे कि उसके साथ भेदभाव या ज़्यादती हो रही है.
राज्य का काम नागरिक व्यवस्था का बेहतर इंतज़ाम करना है. भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राज्य में वह इंतज़ाम भी धर्म से निरपेक्ष होकर ही किया जा सकता है.
ऐसा नहीं हो कि कहीं तो फूल बरसे और कहीं डंडा. राज्य का काम जिसमें पुलिस शामिल है, व्यवस्था को सुचारू बनाना है और क़ानून का पालन कराना है. अराजकता न फैले यह देखना है.
कोई क़ानून तोड़ता नज़र न आए, यह देखना है. धर्मनिरपेक्ष राज्य में अगर एक धर्म के कार्यक्रम के लिए सुचारू रूप से चलने की पूरी निष्ठा, गंभीरता और बिना किसी दुराव के व्यवस्था की जा सकती है तो बाक़ी धर्मों के लिए भी ऐसा किया जा सकता है.
यही बेहतर तरीक़ा है. अगर ऐसा नहीं होगा तो एक समुदाय को हमेशा अपने साथ भेदभाव नज़र आएगा.
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