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मुसलमान लड़कियों की ज़िंदगी बदलने वालीं रुक़ैया सख़ावत
- Author, नासिरूद्दीन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
रुक़ैया सख़ावत हुसैन यानी नारीवादी विचारक, कथाकार, उपन्यासकार, कवि, बंगाल में मुसलमान लड़कियों की पढ़ाई के लिए मुहिम चलाने वालीं, मुसलमान महिलाओं का संगठन बनाने वालीं.
उन्होंने मुसलमान लड़कियों के लिए स्कूल कायम किया. उस स्कूल ने सैकड़ों लड़कियों की ज़िंदगी बदल दी. हालाँकि, उनकी चिंता सिर्फ़ मुसलमान महिलाओं तक सीमित नहीं थी. वे तो स्त्री जाति के सम्मान और हक़ के लिए काम कर रही थीं. ऐसा समाज और दुनिया बनाना चाहती थीं, जहाँ सब एक साथ रहें. महिलाएँ ख़ुद मुख्तार हों. उनके हाथ में दुनिया का कारोबार हो.
रुक़ैया का जन्म सन् 1880 में अविभाजित भारत के रंगपुर जिले के पैराबंद इलाक़े में हुआ. आज यह इलाक़ा बांग्लादेश में पड़ता है. ज़मींदार ख़ानदान था. भाइयों को तो आधुनिक स्कूल-कॉलेज की तालीम मिली लेकिन बहनों को नहीं. रुक़ैया में पढ़ने की जबरदस्त ललक थी. उनके बड़े भाई ने सबकी नज़रों से छिपाकर छोटी बहन को पढ़ाया. ऐसा पता चलता है कि रात में जब घर के सब लोग सो जाते थे, तब घर के एक कोने में भाई अपनी इस बहन को पढ़ाया करते थे.
रुक़ैया काफ़ी ज़हीन थीं. दुनिया को देखने का उनका नज़रिया अलग था. उनके भाई को इस बात का अहसास अच्छी तरह से था. इसलिए जब शादी का वक़्त आया तो वे फ़िक्रमंद हुए.
रुकैया की शादी की उम्र के बारे में भी मतभेद है. ज़्यादातर मानते हैं कि रुकैया की शादी 1896 में 16 साल की उम्र में बिहार के भागलपुर के रहने वाले और उम्र में काफ़ी बड़े सख़ावत हुसैन से हुई थी. दूसरी ओर,कुछ विद्वानों का मानना है कि शादी के वक़्त उनकी उम्र 18 साल थी.
जब एक लेख से बरपा हंगामा
सख़ावत हुसैन काफ़ी पढ़े- लिखे, तरक्कीपसंद इंसान थे, अफ़सर थे. उनके साथ ने रुक़ैया को काफ़ी कुछ करने, सोचने-समझने का मौक़ा दिया. हालाँकि, दोनों का साथ बहुत लम्बा नहीं रहा. सन् 1909 में सख़ावत हुसैन की मौत हो गयी.
दुनिया के सामने रुक़ैया सबसे पहले एक लेखक के रूप में आईं. सख़ावत हुसैन के गुज़रने से पहले रुक़ैया की बंगला साहित्य में ठीक-ठाक पहचान बन चुकी थीं. अपनी रचनाओं के ज़रिये उन्होंने महिलाओं की बदतर हालत को समझने और समझाने की महत्वपूर्ण कोशिश शुरू कर दी थी.
उनके एक लेख 'स्त्री जातिर अबोनति' ने तो हंगामा बरपा कर दिया. कहने को तो इसमें बतौर महिला, महिलाओं से ही उनके हालात पर तल्ख़ बातचीत थी लेकिन असलियत में यह मर्दाना समाज का आईना था. उस समाज में महिलाओं की गिरी हुई हालत का बयान था. ऐसे सवाल और ऐसी बातें रुक़ैया से पहले भारत में किसी महिला ने इतनी शिद्दत के साथ नहीं की थीं. अंदाज़ा है कि जब यह लेख उन्होंने लिखा तब उनकी उम्र 22-23 साल ही होगी.
रुक़ैया की 'सुलतानाज़ ड्रीम्स'
उनकी एक रचना है, 'सुलतानाज़ ड्रीम्स' यानी सुलताना के ख़्वाब. अंग्रेज़ी में लिखी लम्बी कहानी है. इसे लघु उपन्यास भी कह सकते हैं. यह एक ऐसे मुल्क की कहानी है, जहाँ देश और समाज का सारा इंतज़ाम स्त्रियाँ चलाती हैं. स्त्रियाँ साइंसादाँ हैं. पुरुष घरों के अंदर रहते हैं. इसे नारीवादी कल्पनालोक, विज्ञान कथा कहा गया. यह कहानी 115 साल पहले मद्रास से छपने वाली इंडियन लेडिज मैग़ज़िन में 1905 में छपी थी. उस दौर की यह अंग्रेज़ी की बहुत प्रतिष्ठित पत्रिका थी.
ग़ैर बांग्ला भाषी दुनिया में रुक़ैया ज़्यादातर इसी एक कहानी की वजह से जानी गयीं. वजह, उनका ज़्यादातर रचना संसार बांग्ला में है. सोचें, अगर रुक़ैया की यह रचना भी बांग्ला में ही होती तो क्या होता? क्या दुनिया उन्हें जान पाती? अब भी हिन्दी का बड़ा इलाक़ा उनके काम से अपरिचित ही है.
अगर रुक़ैया ने अंग्रेज़ी में ही लिखा होता तो वे नारीवादी विचार की दुनिया में लीडर होतीं. अबरोध बासिनी, मोतिचूर, पद्मोराग, स्त्रीजातिर अबोनति, सुलतानाज ड्रीम्स, दो भागों में मोतिचूर ... उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं.
रुक़ैया पहली महिला हैं, जिन्होंने महिलाओं की हालत और हक के बारे न सिर्फ लिखा बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त बदलने के लिए काम भी किया.
सख़ावत हुसैन की मौत के बाद उनकी ख़्वाहिश के मुताबिक़, उनकी याद में लड़कियों के लिए 1910 में सबसे पहले भागलपुर और फिर 1911 में कोलकाता में स्कूल खोला. इनकी कोशिशों की वजह से बंगाल में मुसलमान लड़कियों की तालीम के बारे में जागृति आयी.
'हम सब की पुरखिन'
काफी झंझावतों को झेलने के बावजूद रुक़ैया यह स्कूल चलाती रहीं. बंगाल की मुसलमान लड़कियों के लिए यह स्कूल वरदान साबित हुआ. रुक़ैया द्वारा स्थापित सख़ावत मेमोरियल गवर्नमेंट गर्ल्स हाईस्कूल आज भी कोलकाता में चलता है.
मगर इस स्कूल को चलाते रहने और मुसलमान लड़कियों को आधुनिक तालीम देने की वजह से रुक़ैया को काफी विरोध और रुकावटों का सामना भी करना पड़ा.
वे भारतीय नारीवादी सोच की मजबूत स्तंभ हैं. लड़कियों की तालीम खासतौर पर मुसलमान लड़कियों की तालीम बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई. मुसलमान महिलाओं को संगठित करने में योगदान दिया. उनसे प्रेरित होकर कई लड़कियों ने लिखना शुरू किया. समाज सुधार और नारी अधिकार आंदोलन में शामिल हुईं.
9 दिसम्बर 1932 को महज 52 साल की उम्र में कोलकाता में उनका इंतक़ाल हो गया. मौत से चंद घंटे पहले वे एक लेख की शुरुआत कर चुकी थीं. उन्होंने इसे नाम दिया था, नारीरो ओधिकार यानी महिलाओं के हक़.
महिलाओं के लिए काम करने और उनकी ज़िंदगी में बदलाव लाने की वजह से बंगाल के इलाक़े में उन्हें राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद विद्यासागर जैसा माना जाता है. भारत-बांग्लादेश यानी बंगाल के इलाके़ की लड़कियाँ तो कहती हैं कि वे न होतीं तो हम न होते. रुक़ैया हम सब की पुरखिन हैं.
(इस कहानी में सारे इलस्ट्रेशन गोपाल शून्य ने बनाए हैं)
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