You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पंजाब में बीजेपी ने अकाली दल को छोड़ अलग चुनाव लड़ने का फ़ैसला क्यों किया- प्रेस रिव्यू
बीजेपी ने घोषणा की है कि वो पंजाब में लोकसभा चुनावों में अकेले ही उतरेगी.
इसी के साथ ही उसकी शिरोमणि अकाली दल के साथ चल रही गठबंधन की ख़बरों पर विराम लग गया है.
अंग्रेज़ी अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स अपनी रिपोर्ट में लिखता है कि बीजेपी और अकाली दल के बीच सिख क़ैदियों (पंजाब में अलगाववाद के दौरान शामिल रहे सिख क़ैदी) की रिहाई को लेकर बातचीत विफल रही है.
दोनों दलों के बीच किसान प्रदर्शनकारियों को लेकर भी गठबंधन नहीं हो पाया है. इस समय हरियाणा-पंजाब की सीमा पर किसान एमएसपी की गारंटी को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं.
बीते कुछ महीनों के दौरान वरिष्ठ बीजेपी नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कई मौक़ों पर साफ़ संकेत दे चुके थे कि बीजेपी और अकाली दल के बीच 2024 के चुनावों को लेकर गठबंधन की बातचीत चल रही है.
पार्टी के अलग-अलग सूत्र अख़बार से कहते हैं कि एक मौक़े पर तो दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन लगभग तय था और अकाली दल ने 8-9 सीटों और बीजेपी ने 4-5 सीटों पर चुनाव लड़ने पर सहमति दे दी थी.
वहीं पंजाब बीजेपी के कई नेता जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, राज्य ईकाई के प्रमुख सुनील जाखड़ और मनप्रीत बादल शामिल हैं, वो गठबंधन के पक्ष में थे.
ये तीनों नेता पहले कांग्रेस में थे जो अब बीजेपी में आ चुके हैं. इनमें मनप्रीत अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल के चचेरे भाई हैं.
अकाली दल ने क्यों नहीं चाहा गठबंधन
वहीं अकाली दल का एक वर्ग हमेशा से गठबंधन के ख़िलाफ़ था और उसका मानना है कि बीजेपी की राजनीति और उसका वर्तमान नेतृत्व मूल सिख वोटरों को छिटका सकता है.
इसके साथ ही ये वर्ग बीजेपी को तीन से अधिक सीटें देने पर राज़ी नहीं था.
बीजेपी के पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद अब वहाँ चौतरफ़ा लड़ाई हो गई है.
आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, अकाली दल और बीजेपी अकेले चुनाव लड़ेंगे और 13 लोकसभा सीटों पर एक जून को वोट डाले जाएंगे.
अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा करते हुए पंजाब ईकाई के बीजेपी प्रमुख ने कहा कि ये फ़ैसला जनता, पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के फ़ीडबैक पर लिया गया है.
शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन काफ़ी पुराना रहा है. दोनों 1996 से गठबंधन में शामिल थे और एनडीए के सबसे पुराने दल थे.
लेकिन साल 2020 में तीन कृषि क़ानूनों पर विवाद के बाद अकाली दल ने एनडीए से अपना नाता तोड़ लिया था. हालांकि बाद में इन क़ानूनों को वापस ले लिया गया था.
पंजाब में विधानसभा चुनाव के दौरान अकाली दल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया था.
वहीं, मंगलवार को पंजाब में कांग्रेस को एक नुक़सान और उठाना पड़ा. लुधियाना से लोकसभा सांसद और वरिष्ठ कांग्रेस नेता रवनीत सिंह बिट्टू बीजेपी में शामिल हो गए.
बिट्टू पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं और नई दिल्ली में उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ली.
द हिंदू अख़बार सूत्रों के हवाले से लिखता है कि तीन बार के सांसद बिट्टू को बीजेपी लुधियाना से अपना लोकसभा उम्मीदवार बना सकती है.
यूपी: अपहरण के मामले में सभी अभियुक्तों को टांग में गोली मारकर पुलिस ने पकड़ा
उत्तर प्रदेश के औरैया के एक जूलर्स के 12 वर्षीय बेटे के अपहरण और उसकी हत्या के बाद पुलिस ने सभी आठ कथित अपहरणकर्ताओं को पकड़ लिया है.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस लिखता है कि पुलिस का कहना है कि उसने सोमवार को एक मुठभेड़ के बाद सभी आठों अपहरणकर्ताओं को गिरफ़्तार किया और उनके पैर में गोली लगी है.
सभी अभियुक्तों का अस्पताल में इलाज चल रहा है और डॉक्टरों का कहना है कि उनकी हालत स्थिर है.
पुलिस के अनुसार, छठी क्लास के छात्र सुब्हान का शनिवार को औरैया के एर्वा कटरा के उसके घर से अपहरण कर लिया गया था. इसके बाद छात्र का शव दिल्ली में बरामद किया गया था.
औरैया की एसपी चारू निगम ने बताया है कि गिरफ़्तार किए गए सभी अभियुक्तों में एक रियाज़ सिद्दीक़ी पीड़ित का पड़ोसी था और उसने ही फ़िरौती के लिए अपहरण की योजना बनाई थी, उसने अपना अपराध कुबूल कर लिया है.
औरैया सर्कल ऑफ़िसर अशोक सिंह का कहना है कि सभी अभियुक्तों की उम्र 20 से 30 साल के बीच में है और अपहरण के बाद उन्होंने लड़के को एक ट्रॉली बैग में छिपा दिया था जिसमें दम घुटने से उसकी मौत हो गई.
जेएनयू छात्र संघ में तक़रीबन 30 साल बाद दलित अध्यक्ष पद पर
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) चुनाव के सभी पदों पर लेफ़्ट के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, अध्यक्ष पद पर तक़रीबन 30 सालों के बाद किसी दलित ने जीत दर्ज की है.
जेएनयूएसयू के अध्यक्ष पद पर आइसा के धनंजय ने एबीवीपी के उम्मीदवार उमेश चंद्र अजमीरा को पूरे 922 वोटों से हराया था.
इसके अलावा महासचिव पद पर भी दलित छात्र ने ही क़ब्ज़ा जमाया है. बाप्सा की प्रियांशी आर्या ने इस पद पर जीत हासिल की है.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, उत्तराखंड के हलद्वानी की रहने वालीं प्रियांशी मध्यम वर्ग परिवार से आती हैं.
वो कहती हैं कि दलित समुदाय से आने की वजह से उन्होंने हमेशा से अलग व्यवहार देखा है और इसकी वजह से उनके पिता की नौकरी भी गई.
वहीं धनंजय का संबंध बिहार के गया ज़िले से है. उनके पिता रिटायर्ड पुलिसकर्मी और मां गृहिणी हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स पर रोक लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फ़ैसला
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालयों से कहा है कि किसी भी मीडिया हाऊस के ख़िलाफ़ कोई रोक लगाने के आदेश को पारित करने से पहले ‘सावधानी से चलना’ चाहिए और ऐसा सिर्फ़ ‘अपवाद स्वरूप मामलों’ में ही होना चाहिए.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी प्रथम दृष्टया आरोपों के मामले में मीडिया हाऊस के ख़िलाफ़ एकपक्षीय रोक से अदालत को बचना चाहिए.
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पर्दीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि किसी लेख के प्रकाशन पर प्री-ट्रायल में ही रोक लगाने के मामले में लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनता के जानने के अधिकारों को लेकर गंभीर परिणाम होंगे.
कोर्ट ने ये आदेश ब्लूमबर्ग टेलीविज़न प्रोडक्शन सर्विसेज़ की याचिका को लेकर दिया है. ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राज़ेस ने ब्लूमबर्ग के एक लेख के ख़िलाफ़ ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.
इस दौरान कोर्ट ने ब्लूमबर्ग को ज़ी के ख़िलाफ़ लेख प्रकाशित करने पर रोक लगा दी थी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)